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Full text of "Devata-murti-prakaranam and Rupa-mandanam"

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(^. 84 दण शपः 


(1€10) (4101 : | 
परिप (प्प ४५५ ताह्क प्त, ४. 4. 


अ4 0 प्राः.+ 114 1).41 48 


07 1€ब0ा1 गातं ताणठन्वाह 0४: 
पठा" 24151124 025 (त्र) 


01 26-118-2015. 


॥ ४ # (क 


वाग्चि-भ््चार्य -सांख्यतीर्थ-मीमांसातीथ-तत््वरनन-क्खी | 


१ 


( ^^ 5 0 [^ (नवल पी ^ (कता) 


(17774 लकाटक ४ 4८ द द क 70 


2114 (८1111267; (1/1 


1 ६. ) ॥ 2 ^ ५ प 


। 2५ 
(1८ चि 0९ 7014 5^ बतसि 


(7 द ८४८00 6/ `, 
। 9. ¢ 


+ २170^5 1९२6, ४. ^. 


1 1111 1.1 11.1. 


ादयाप0षप्ठामतत द एप्त 40 
ए्ागरप्रादत प्रतार, कावा) 
ह ध ११४४१) १ 


212९4 @ 14601544 ९) 


ऽपान 64८, | + 
। क्ता नष्वर0छा नवक रिरादिववप्तठ इ एका .प्ताप्रिठ पठ) जश्रावह7) ४ 
| ६6, एप. 5, (6८५. 9 


ए ^ 


[एताका < प्ल{ल्ला€ 9त दिला 1.8 पदु, 11[पडपा6 प्ल 


व्रर्द्वत त णात्स्णुणाफ 8114 कला) प्राता 86 शा 11€णत€त 
{02610 11 {18 (परध. 


(पपा कणत लमक] कलु 211008 ग 0प्रा कलिला 204ः 


416 पाद्व, = ताः €दक016€) 2 कततकतत €पुक्षा8 116 


71161110 0१ {6 {17826 ठ = हप्ा (दि दात्त) पात 118 -0पा [शातः 


एद्वाता19 40/04 (लगाल-शृल, (10 "पल्ल, (कवे प्ल) पणत्‌ 


101170८ ¶0तः+ : = 641८ 1ल])16€86€1118 लाला, 4420 पात्‌, 4वरवदवे 16, 


20/17110 सला 871 1116 10296 1४861 1176 सत्वा. = प्रः, 16 पाह 


प प्ाप्रदध0व वलुछला8 6 [तल्ध (४ एलालवा[ष दत्‌) प्रद 16. 
र्प])]005 प6 ला्व्षठा पावरत6 9 प्ल ४6 हा"058 वुलणलणाम, [088 | 
एसप्ट्‌ पल णरटण6 शष वल आष्ट ण दिष्य ४6 व०प्वर्ण 
[चालला दुला 118 #प6 वलीप्प्लउ (क्क /त), + लालवत्तना, | 


1 (लाका00; तल्सपला०ाः), शर्ट लड क्त्‌ = द्वप्रद् इषुक्प्रना. 


(11९ तल्नु्टडा शदा0व्व८€ ण € [706 [4166 ज दिवा व्व 


€ कपल्त्‌ ग पणप्रप 6 [ष्वा [ए = पाल्वऽ 9 गल्वर्क. | 
(र, 10 (पाः ^ लुाल्लता€, 80 छि 88 {लालः 5045, €९.+ 816 


८काल्लनाल्त्‌, € 7०व प्ल इक वसंक्रत्‌ क उणजाहा. 41] तण होएत | 
एष्या णरणैका९ #0 (ता तारविलिल 16४ ० 61109 5प्द) 8 । 


< तवा द्ा2 +14 0800६ एकार, 


(16 € द्वप ६10१६888 7 2 {दप 011 
[ता२ [लगाता छात्‌ [ल्००णल्र 0४ सिप्तिप्ताोह्न ६48१78३ 
{0 188 {0 113 दाल्वा, क्ष जलः एकाद 0 [तादा प्ली ल्ल 


१५ दलणपा. = का8 पणर 185 76६ [दला षात्‌ 0रध०ा6, 


(6 [टला {ल 188 ल्ल (०प्राला(6्त्‌ पठण न" 10८ 1 


1976 [ए 6 लवाः [डला 410 पा) पः 088 ष्ला [प011816त्‌ 
17 †पि]] 61" ल 5 11016 6 धडा ज 6 प 02 7814818 तो 
त 6 31106 तप्ताः त प्रल्वप्रद  1प०16त इण]. {+ 15 10064 
 पाक् परल प्रप्तलस॑श्फताछ गं प्ल ए फलद्चा एज पषा 06 व्लााप्॑6्प्‌ 
एष 1. 6 (लप्र वरट्‌ फल्ला ववृलत्‌ णप को कादा फक्पाऽलत) 


॥ 
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( £ ) 
(4६. 110, 1. ©. 89, एलन 0 € 4 दशा हिव्लंल ण दश्वा, 
(2104. 6 व्वृाध्ठः ल्पात्‌ प्रज तत पतष्ट तीव शात 16 वाति 


एका ज वतृल्वुप्व् फवप्र्स्ल पालय णाः (तप) 116 लवः 
वटे 6८५ कलव ष्ठा ४ 116 कदणफलन 6 लतत फु 16 


ऽत्‌ 10 [8९९ 0016 8 प्छावद्‌ तिन शला तव्‌ पल [ल्फपल्त्‌ तकत 
[एलत्‌ ल०पफ्रलकाकु 0 6 ९४ प्क 1 ४१ ६२१३. 1080 + 
पलो [€ ववतल्व्‌ ५0/0८ 1/5 ६00८, 10 छिस [16 (लदा पणा), 11 35 


10260, 06 (0परशवलाल्त्‌, 8, पर्य [(वप्लप्म), 


{05 (छतत प्ादण(य्ड ताह वध्ट 10 21. प्दवतकछ भ्ठ, +. ^. 
116 # 18 तावा, 38111111, 10 1895 [तात] प का{@ 90 {0 छत्र 
109 {0 {17656 छार, पह [घर कस्ठतरस्ट्त्‌ 7 1 € एवातकणः वल्लः 
{16 [ठि ण [लता गा वाता -्टष्लपाट वपात्‌ सिठपापा 
98 ए४८]] 85 (1{11ल्‌' लला कारतः, 


पः [्{ष्ठ्वृलाजो तञ चवृवृह्त्‌ 9 ती सत्वत्‌ ज प्री एमा). 
1 [तृढ त तर्वत्र पतापु ववर वारण रलो वृणृलवृत्व्‌ ध 112 
€1५. 


^ 5141९ तदल ज दलाष्टव्यः पि पतता [लाता णर € उपव्प्रतशलः. 
एप {0 (भः एलालठणः (छ-णुलावा0) 1४0 {€ कवलः 7६ एछपते [वष्ट ल्ल 


` 0 ्रा1€ 1000881016 {0१ एड {0 [पाह छः (८२6 [€स. 


€ आधा 96 द्तााण्ट फ छपा त्वक ए तठ 0 लसः छता 
ला€5# = पात्र 0 (शित तवा (दर्णा, अ. ^, 71. 1. 


 एल्तवसोोव<{ त ध€ (सल्पतधि (0ाप्लाल चत्‌ लप 
` (लला ता0ः न 1८ लल€ः, ध0 वात्‌ प्ल {0 {€ पिल 
ग (€ एपालता०प त पाल प्ण, 


निभ; फ€ पाठ 006 1 € पल्वलाः फा] ददल एः 10 


 ; कु 1ाएलल्लिण प्ल फक्क ०0166 €्शूव्लवा काशक १, 


^ "तलु, 


क ॥ , ` दरश्षल्णवाद (शावा उीाववलान्कुव 


| ॥ 1 -1910 18/94 1 (9), 
1 
५४()1९€ 


(116 (८ त्तका 1, ९, 6 86० ०) £ 
1171486 ग वलं जनह 8 [वाग क 1116 [दा -दा10 (9 एित्ावतोद्ध 0 
सपतयः म [पपूरतकय, (6 500 त शोरडल्र) वत्‌ 15 % एकतर 09 इलया] 
11116. ^ 8 1115 {1८ [पु)1€5, पतितुय प्यः च) काष्टा 6141024 
([ला1]$, ७८ 10 [जवः [1165 0 फलकः 6 कुप} -11706) 


एनी द्विपिता पात्‌ [5 विप्रल, सितया, परल€ पणता 116 
1021700406 = सीीद्रात्म [स प्ा0108, 6 सव्लेलााचा6त्‌ प्रह ज #6फथ-- 


[र पधि कपालावाच्च ज ल्कृद, ^+ 08098106 1610, 
६ 108 0 [लल5 त 2 7016 [पाकलः ज 1फणपााला18,. [रपा 8 
प्तऽ 81 05104108 [लहत 110 116 [150 ज 1416 लवा | 


[वा (15४ €). भणक्चच्चयाष्त [रपण)088 60फहठा प्व5 0 
धवद्रक्, शला-कत फा 10 [ल कलातालः त तल्लुगफु 161ह0पऽ 1166. 


। [पणव (षच त[सालाताष्)ो पत्ठह 8 (छक्का ध€ लाव 
तस्यात ज वदफव्वलद कत्‌ 1 1 लात्तल्त्‌ 45८ /22/क ( (द 
 ॥0८दव्वतदु). व्0 जप्ालः फएणपूरड (जय ्रा्रट) 26 ३80 तप्र< 10 काप ; 


7.  “व्नीमेदपाटे नृपङ्म्मरकणंसदडत्रिराजी वपरागसवी । 
स मण्डनाग्यो भुवि सूव्रधारस्तेन)द्‌छतौ भूप्रतिवज्ञभीऽयम्‌ ॥ ४२॥'7 च्रष्णायः १४॥ 


वास्तुराजवद्धभः । ओीमण्डनसूतधारविर चितः । काशीस्यदिन्टुवि्रविद्यालवाध्यापकज्यौतिषाचाय- | 


पण्डितगरोरासयवन्रोभाविरवितभाषाटीकोपेतः। विक्रम-संवत्‌ १९९१ । ` 


1. श7+ प 01404. परा8 वध ^ 


2. एप्ाशोन्त्‌ 10 6 द्धक अला. वििपव2क्ुा 07658) ` | 


स 


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( 2.) 


1116 5447-0 0पष्वे चव 16 90 -+द्‌/4. प€ 2150 प०४6 16 
001140१, = अविप्रो रि प008 15 इत्‌ ४0 वष्ट द०र्प्ललतु 
{1€ (ल€09६6व (0कल ग #ालजपु 81 (111106५, | 


1६, प्रलर्दमा ९, इतः 10 १6050 (86 गद्या प्रा त्दध्ा8 
शपात्‌ ९8 कछ भ भल्लः ऋत इत्पाणमाडः [प 1४6 102 
ए1ज२ गं द्व धारानगरीपति-मदायाजाधिराज श्रीमोजदेव (11४) €.) ]00 
(0पुभाह्त्‌ प्ल उवाताकुवावक्िदतका ९, घ पठान छा कलह्ल्लणाट ०४ 
{0 एज 876 १६९१6 पछ कालाः पुम एठः, इलो 28, {16 
< द् (-4 भोपर) कत्‌ च काद्वतक 2004106 
0 [€ 8िगणलइएव्ाव्तल्छ, 116 (श्प 10 ( 17 €.) 
{6 प्रम (० प्ल एषषा जं प्€ सयाम) क0 व्मणजाल्त्‌ {€ 
 €ाङल्‌गृण्ता८ फण्ण--पल = कद्वातन्द््धत गा प्ल 40111८57 14- 


(*1111 11101011 


रिप्ध्व्वााद्वया 91748018 0 अपण असतु रल्ल5 {0 1६१४८ }€्८ 
8 एना ल्लः त प्ट 0 कष्ल्ट्लपाह वप्तृ इला, € 


3. 3९€ ‰, ¢ पल्लो : (वकद (र रछा, [, 0. उव 
(2). (£. लाला : 4 (-वदछदुप्रट णा उवध्य 55, &15118 7 {16 
` (€181 ए८०ण1668.) 96 ` | 
| (०). 2 -(, लका : [98 9 6 5208६ पआा्ापञ्लातए६§ ए0णप्१३56 
0 ६0य्लापिफला वपा (16 $€815 1874-78 & 1869-78, 314 2 115६ ज (€ पा21४5- 
11015 कएषवदाा486व तश्रा 14 {0 व्िठर्लफण्लाः 1881) 15 


4 9०११९ ऽतीनृवाऽ 08९5 व०पएाऽ गहद्मतणह ८6 ०03] पृ0056 9 धल | 
$धापतपयाल पठप्ाला) प ६८ फव8 पठा 3 0ला ववञ्हत्‌ ६0 त्ाप्रप्रलााला३६€ 2 प्रत्न 
२४ 311. ऽ€€ 7. (२. एमाय : 24८ दतत ज कद वाव 

` [0प््ठ जा € [पवक 5०८. ग 0160181 4, ©], +७. 7. 


` (च्छत्‌ पप पातद्ठणाव्दण ऽप्लएा€ ए 61 5501) 525 ¦ 
(^ {185 ० {1910 2115, 11115 355 9 4८०31101 13 80 5४४06 (र 1६ 77. 


70 वष आप्रह्लालि€ ला पला का कट तपप्ट ० पल हुलण्लाछ सल्ल पल [रान 
1६८ 15 [0पिपालकु एला ६2816 पीवा पा ९१८८० 027 क 272. | 


च 9८44/1402 00 = 6पात्व एफ (1111 1, 1111 14 | 

02121041 91. 009. ४ & + रा) 2 ४०15. (1924) 25), 8202. | 
6. दिद व्वाप्ल्य्‌ एफ ©, ह, अामाह्गण्वलत्वः, 605. सदङ्प्ाा प 
2 ४०15 (1925 7) ; 46047044, €4ा६6त एष 07, 1२, उद्ााद ऽवप 
144. 60. {1926}, 95016, ` | 


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(8 ) 


ण0काद् 18 8 181 ण कणुत्ड 880 60 [प9, शात्‌ 8006 म प्रीला) 816 


816 तारिलिष्लाङ 11 188. 


[9.11 1011 ॥ (111 1141 
1.2 4111 / 1/१ ,  प्रद्रऽप्-श्ा, 
१1111111, 1. ४ करत -फकै श्म. 
पपएमणवएतयाय, | | प्व 


इ व्रऽपाावातृक्षाध. 
गतु जिन्व णा शलहल्लतकट एववा धा पतल्छ-- 
# । 7 | | 
(1, 1 11. 10 1 ता | 111 
9 ऽप." = ^ (ताता 0 5801006 इलाजुक्षाड) 11 18 [00880] तपाणल 
८81घ्व्‌ ५6 त्पुस्रमासादनााद्पतृमा द (0 शप्रपुणक (दिद्मुस्णासा) न 
116 "©प्त{.त107्रा2.10 21021154 


0 पल पपवृप्ड वपन ग कट उत्क्रपुक्ताहव | 
एठणाताद्रल््ाफ2 (17 प्रा €.) फला 8॥जगल्व्‌ 80716 188, 0 छा (सणलाह््व्रताह 


अत्‌ इला), शण०ा कला ॥€ जाम क फणी) 76008 


रिव्पसाल्रप्रकरण--2146 राजवहछम;, 2849 बास्तुमण्डन; 2150 प्रासाद मण्डन, 
2151 स्पमण्डन, 2152 राजवछछमरित्प, 2153 वस्तुशाख्रशिस्प. (1118 00०६ 
10र्ल' [ए क्ताषद्छाप्थ, प 2, ९८८41 हव्य वात्‌ ३ एलन [ल्ा76त्‌ 


छदा), {€ १€्छत्‌ ग ४6 शस्ता (माप्रा एला) 9 118 प्रा12 


तयजित तनजात्मतन ान८०१ ५ ५ 0११९७०१५) 


+ ¢ 


7. 566 ¶, ^ प्लव : (८८१0९८५ (८०१0022 एना. 1, 7. {3० 31: ॥ 
4150, 1252118 [पाद लाच : 4 4८42८८1८ 4८८0 ६4 | 
12८2567४ -0 22545, 0 07व ए परार, 21. 1927. ए. 103-5 | 
8. 175६ 70 प्व्ल्वे एष ©. एप्पल; (100 [58 9 921151६ 2488. 70 । 

2, ¬. ‰, @, ४01, 42, 538 ‹ । 
०. 86€ चि०४€ 1 5472, वाद्व 9 2210411 ए्ा2 213 00179; त्ाातप् तापापर 

10. , 28810 > 2. +* 17086 {८206८ 2 5411520 = 155, | 

८ ८ 2,162.८ 2 (८८, 3142, 1297 ; 3147, 2253 ५ # 
| 2, ६. ^ वाव : (20 ८) 2, 102. ८ 
12. कवौन््राचायसूचीपतम्‌ [6वणाा7ताव्लव्य 2 [15 ए५१४८त ण्ण [पध्0वपल्प्रम | 

एष १. ^ पवाद्वञ्ा2े ऽव प्त 2 एगलफगत्‌ एष [7 ति व्272003 108. ७008, 


` ०. दषा, 1921. ( सूची ) सवैविद्यानिधानकवीन्द्राचा्यैसर खतीनाम्‌ ( गन्थस्य } वैदान्तौकौ वाग ष 


~--वदङ्णोतर--व॑नारसं | 


धात क05रछव्त्‌ [तात्ृल्पदट 7 सा वकृत्पकप्लाहि जं सिवशपप प्र 
28 (द), व्वृद्वाफन भात्‌ एल्माप्रपि. 4 00 ऽता 6 
{00 {0 01011 क5द, प्राणऽ 810 115 वालि 6१९6 ॥0 6 फठपत 
09 75 वलाण8ऽ€ [8 [रवप [पक पः 01810686 


पाक 9 6 168 फ 116 सिपप्ववा {20408 0०4 ४1९8 
लाता {9 -11410कतत ना ४16 86036 म 4८०० शतात्‌ आ 1 एं 
7171]003ह1916, पवः स ऽ पजन [पत्‌ जपहासीङ् इपला टः. 00 106 
छाल [क्त्‌ 6 [ल्वत्ास्व्‌ (र पणप्वाद्ल्छयय [ताल प्ट (द्युलदपप्द्तः कात्‌ 
16 तात तक्त ततत 10 16 1० उदु पणन ; एलणरमुःः 16 
016 भवः 0 (द्र (कालापहल्लपाष्टो, पप धल गाल पकः जा 6110 
(दपए). 


(1८ तदक तात्‌ इताह गलाः (ह क 
` पसितृत्यावे+ कल्ला 10 [तष्ट [द्ल एलन गुप्त, = चा {० व्ल, 
पिला ल्पी, फट [पित्‌ ल्लः ग [5 {ल वलत्‌ [फ 6 
{0 एवपद्6 [कका 0 स कपोातादरलद्यषए निषा {€ 1९ ताः 
0 कविता, {प्रात्‌ प्रलाः पसप ६0 एलाता€ः, € एष्टा ला एटलला९ 
(1171105) क [ताश लतहपता6, 


` | शिण उल्ल, व्कृतकेपद् ऽ शठावुरः [0100 16 {0 06 
[01१९९ प्रण्डपसत्‌३"२ वड एल्‌ ३ लकार, कड. [र फएकारह वा 
880 लः पाध आ घोल छपा पल6 पङ्क गा 18१6 966 
` धवगः दवाव पलप 6 (दत्थ पता. (प्य 1 2 €प्तलणः पा 
धमात्‌" 12007008 प श्लााल्लपा6 = ऋणत्‌ = इल पा& कण रल्‌ 
-द्गाश वल [णपा पाध 2117518 296 ला{506). 


॥ 
1... 
( 
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| 
॥. < 
{ 


| तावता 


, 13. &एएषपलाक 06 त च व्तुव218 फणाऽ ०5 एपएा9ल्व्‌ पमस वाद्708 
` | एए उष्म २६ 8876042, 1891} 866 2. इ. ^ 0ावा2 ; 2. ल 2. 103 


4 = -106€ ९८264024 28 पडत एक दिस्य रस्वाशप्ााध्य्‌ 
| 0€९ प ऽ एकुल्‌नव्ल्वात ल्जपश) शन्द्कल्यदुस्‌ 92642640 4-4८४4, §66 = | 
८ पतल 01444057 शिलयशस्म्‌ 1. | | व 

। ` 5. ्णफ्रण्पड चद्व पण 6 व्या वरल एलन 24€ 9 

^ (सत्पात्र 11 १20 : तल म दक 2८000604, 2{24125, ` 


2. 80८ क गप्र 
एर ााा-+र ^^ 4. 


0 ९0110 118 00117. रित्त्दताात्रा धातुतात इव्लााः लला | 
। {0 [षर्< लार्लाक पत्रोहल्व्‌ प्ल सितता [वाम [लप्र जा 10 [8१6 कलपु 
28९त्‌ [६ फछा्ूर 0 ला. = | | स 
पतवल््त्‌ [ह 00007. 1 एका ६. [तादा तकया क. [तादा प | 
` लदाठलवला. (ऽ एकपात्‌ द जगाल शतक वीर्ा, तडा [0व9 प्रह 
घा ग {लापल-पालाव्लापा€ फवड कल्कवृक इतण वाट 10 € रर०ना 
1, 1/1. / 1.1.111 1,911.18 118/1 1/1) | | 
नि कपा, 0 [णु [18 (0116. पशत प्ाताल्व्‌ लारर्लरि 
६0 िणपक्ी [ऋतावा इता ८९६. ^ पत्रालयः आवत व्ल 18 धात 16 
९एला' प्र118€त्‌) 58 च्ि' 25 18 €ष्पवृला 116 (तत जिकाणः 0 #वाह्दप् | 
` 4 वह. = एप 06 1186 (णरठपड प = पल 50५५ कात्‌ | 
प्€ 700 0 कनङ्क पमण जप्ाप्ठा कथिक्छमण ऽ0पाल्छः, | 
॑ एठा 8301016 16880118, 0; छषतलाा ५6 9. [पताक्षा 40000145 
०6 70६ व८0८्डशं 6 0 [धप्तवृव8. = पोल सि १८6 7 ५6 त्प] | 
8140६ {61 ए (नुप 2108868 170 एलयातछपाद्य फला6 पा एध्वाश्षणह 
0 धशातृद्माद ; 0 € 11165 ग (नणााप्रापादव्णा [लाक्य द एषठ 
६1५ {16 (द्णा] 140व8 = एल6 068० का = ०054ष्य्‌€ः. = 116 कल 
ष्ठा 18 2] ध6 प्ठा6 काष््ञएाल, पला पठ 1व6 10 8्ल्छपफ, 
६16 पणरर्लद्रल्त्‌ एगात्तल्छ्‌ (ाताप्र०ण5 म ४6 प्पा68. = व 
एव0नतत्‌ पप्कड०गाऽ कात्‌ गाशृश्पषटा6 म € ्ला० पतारड श्त | 
1000015 पलु6्तव्‌ ४6 पज वजा 9 कलाह ऋआ करणत्ालण, 
पिया 50 (जणथ्‌ [ताद ^ पत्‌, प्र6 पथकः इकणातड पलाठ आम6 | 
77 18वृ प्रर प्ल प्रधा 6 एकलः [षनाहा68 0" ध6 = शंमाह-फव50ा8ः | 


11065 कपत [लालह. ` 1 


। ` 16. अवकुककदछ र छिप्तप्क्रा2. 291६ 1. 20160 पष 1. [. 63102702 
` अह्व) 1922 ; 1६६0. एव र. तात्‌ 0 प्न ९. तदपा0व्ञ ४8 98) 1929 = 
त. कद्वदः 9 कववपापप्रा, 541६6 एङ धपा, व. लथु0वत पदम्‌) 


(८.9 
4 70016 6 दतग्ालपा वटस्त्छ पिपत, हव्छोऽ दवो ६0 
186 पप्त;६6्त्‌ 6 = एवात कवष्छा 6, [आ प्ल 5 106६. 
 ग5 18, धकताप्तकानमाक, उद्यत्‌ 16 € 8 [ष्य म #॥6 कदा एकृत-( ए केषा | 
1 1/८ 1 
^+ वल्गता ४0 श्ानलः गूभप्मा०, 7. [नृगा 0 #1€ 8८० [षमः 
म क्र८ एषण. | 


^€ 01520101 1170बददात/ 15 = 0ल्लव्डात0प्त] ए दाणला ठ च5 २ [एक 
0६ च एप्त, एवल € (तिका, [ता शलपलातव 1४ 78 (0प{6त 
8 एत्नलुलातनौ (पए पन्न 1४ 18 एकरृरल्कष्तीद् 4प०४९त्‌ एष लप्र 
३8 116 (शा शएपतााप्मना ०, [४ 18 8 क कलपापत भवतश्च 900 1 € 
सृणृव्ष्छ्वाट लोव्य्ललः क प्रा ८ हष्टि0ष्ड, रल्लयणपे ¶ तदट्त्यऽ की ६6 
रच्‌ पललः ण प एपाद्रा0धर---रिद्द्ठाः [आ वट्यः फा) [वफ 0फत्‌ 
010९8, घः एला चह पाती फल्तीलपल ४6 इललाष्€ ता फक) वरत्रिठाताङ़ वत्‌ 
48110109 [61€ 18 [आ प्र ४ [1056 86८01 ` - -सीतरावोाव-सितताक्षपाक 
ध {118 15 वा) ९ीातटाः प प एप्स प्लवता फप्न्ला [ 
| 18. कभ. प्णाप्ल्टः द द ठ ताद्व 2.2८. ४०]. (8. 
ध०१४,, .. 1927} 9. 586. 


| | 
| 1 1011... 1 1111111 11.13. 7 1- 
1 0४ 2141४25 {20 प्ञात818 20 71201129 20125508 = वा 2705 01 2 195. 
|: | 00{217ल्त ए (प्रा. ऽपर व्2 सव्वाा पात्‌ एष्ट (जता स्ह वद5९278 
|. , ` . एि655, एठपाएवक) 10 ८्ट्ं 1969, 1834 546 (4. €. 1911-12) 

| । 


9€€ 0 (5, ० नौावप्लाऽ 2) 27, 25-43, 0. 3 पलो द्वष्यणाप्रञ्नु : 2/८ 
1 | प्रतु द्वरकव (हता [)) & वाष्वप्ञ€ जा [पताका 2109110. ठप] 
| | ` र्ण [लल्लः एज्‌, 1, (तपर, €ग, १924), अत्‌ 70८ व व्र पल्‌, 1924, 
| 4. <, (00 वावा : 51000८22 (क), 41, 1405. 1. 1932; 
| 00. : वृद], प्णथ्का०दर, (व, 43) 1 5 (00 [00 
` (छत (र्न) त्‌. एफ 1. पि, (दभपर्ववम, | | 


0१ 966) 2150, प्िभाव85 178 : वक 0 2 वु 5८ 
7 € 2) 4. 5. 5. (प. 8.) एण, उशा. 1933 प०. 1. सलक प्र, पज. 


६ ‰4, \शापप्लाप्ट : लल्लः क दरद ८) 88त | 
(0ल103) एत्‌) 48० 1888, = | । 


| 966 पाताल्‌] : (वरद कट ८ 66८, 105. 2 0८ 042८८ कटं 2 421001६, 
। 20. 566 दण्द 1 ६४, ६० चल &व, ग (द, जितर्लमृच्रवपय ए 


"4 “4. 


एगोणश्छप0& 10 628 ^. 0, ४6 फाप्पताीक्तपरमाकव क्र 18.56 ९८ 
©0ण१ुभाल्त्‌ एल 628 8० 1000 4. 0. ल्ल. [+ 00; 18 ग 8 णप | 
0 8व्लाक्ल्छप्ऽ वात्ललः) तलकीपद् ग वव्णल०, अणद्वा0 अत्‌ आप्रञ९, 
अगाप्रा€ चात्‌ [क्र0 (॥€ फभप्तद ण 1102268 ग 2०48) वत्‌ अलु (| 


†ह्य॑प्ा6 (छगाईपल्जा) ज {लप0168) 


वृ¶€ = 11त्5/4-121112104, € = -वदात- (12000, 6 = सकवल-  | | 
10/20, #त्‌ प्ल -211410010- 7012020 पलाठ २150 प8त्त्‌ {ग ॥४€ (3१४) 
{702 पणत्‌ (श्या) सद्मा 8ल्छपणा8 ; शात्‌ 19388868 [09 ४6 = 
0000-6 वण, 18९८ 06 = वु्गह्त्‌ लाए 7 6 (क्क 


6101 


^10116€ा' लसा» 1106 शक्न दफन 6०ःपा+९त्‌, 15 16 = 14001011व- 
6510. (1118 18 व्लव॑श्रु 8 ा[08 पठाव म 116 कवि गीलता 80०012४, 


` ए {€ शला 1008६ [रर्कपिह्ल्‌दन ताषक्ा पुता), क्लि ०९10, 


18 वलन्नपाक्ग 1116 द्त्वा वऽ कक € वलात्‌ क्ाप्रि | 
1116 1€# 9 ॥16€ ३806 क्ा€०२, 116 वठरः त प्ली 15 ०8606 ॥0 | 


{21048118 11118 


- 22; - "तू, जणा 12 ९20 : © 1८770 मा ८ (८०067 वू" ५/0 
23६ | ॑ 


23 56€6€ 56०01 1, 9474, ` । 


21. प्025 [धव : वव 44 2004. 1116 52125811 11303112 
51६. 5165, 8€19165 ; प०. 48. = [््तन्वप्ल०प ‰. 3. 4150) 866 पि०६८ 27. ५ ५४7द 


५2 , 
(प्न कप्त 6५08 07 वहा ^ ^ 


116 11451/4- 11/21 लाप््रलाध1658 16 कवा ग लशीाह्ल्ल 


` (बास्त॒सस्त्ोपदेशक) श द्रपदकणृव्वलपरकः 0 [पल 0 ॥€ ८७०९९ 


० ^ लृाललताल सिलपाुपात वात्‌ एत 9९; १७ {01[ठएः :-- 
मगुरति्वरिष्टश्च विश्वकर्मा मयस्तथा | 
नारदो न्निव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥ 
ब्रह्मा कुमारो नन्दीः शौनको गर्म एव च| 
वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा य॒क्रो बहस्पतिः ( युक्रवृहस्पती ) ॥ 
अष्टादशैते विख्याता वास्तुशाशरोपदेशकाः । 
संक्षपेणोपदिष्टं यन्मनवे मस्स्यरूपिणा ॥ | 
{1€ 4111-1" ०१९ त0जप्लः [5६ ज 2; कणप्राला्पा र्ट 
{€ {8, 88 {0110 प्र :-- | 
` हयग्रीवं उवाच-- 
विष्ण्वादीनां प्रतिष्ठादि वक्ष्ये ब्रह्मन्‌ शणृष्व मे| 
प्रोक्तानि पंचरात्राणि सप्तरात्राणि वे मया ॥ १॥ 
व्यस्तानि सुनिभिखके पच्विंशति संख्यया | 
हयशीरये तन्तमाच्रे तन्ते तेलोक्यमोहनम्‌ ॥ २॥ 
वैभवे पौष्करं तन्त प्रह्वादं गार्ग्यगालवम्‌ । 
नारदीयं च संप्ररनं शाण्डिल्यं वेदकं तथा ॥ ३] 
24. 14414 720. वदद ९५. 1907. (20६९ 252. 
2६. 566 0211085 {1८18 : (+¢, ८2. 
८ ` <4८7-17104. 41164 0 ए भुलावा318्‌ = [74. (526८04८८ 


2). (०. 39, ४. 1- 


, ब {1€7€ 816 80116 त106ाल€ा1६ 168 07195, 10६6 113 ४015 €411107 :-- 
- १ समीके चेश्वरं तथति ग; घः, उ~--चिद्कधितपुस्तकवयपाटः। दगाग्यगालवं । 


8. कापिलं इति पाटः+ ` 


| | ५, तथााङ्गमिति ख, ङ--विङ्ितपुरूकपादः। 
 [0€ {€ वृ्रजल्त्‌ € ग्ठिणा £, &, 4 लो 1. 1८07९८12, {, 165--- 


` प्रिमोपतम), पज २०६८, एप इल्ला {0 € चज प्र, 96८ व्ि५6€ 31 + 


| (9 } 


सत्योक्तं शौनकं तन्त वासिष्ठ ज्ञानसारं | ५ 
स्वायम्पुवं कपिं च ताक्षयं नारायणीयकम्‌ | ४ ॥ ' 
आतियं नारसिंहाख्यमानन्दाख्यं तथारणकम्‌ । 
बौधायनं तथाभे तु विद्वोक्तं तस्य सारतः ॥ ५॥ 


च 0्ालाः उद्८्छपफ( कष्ला 1 € (्व्तकुतकष्यवदरव व्‌ 
एषलसलरएलवै ऋ कपा पलानाः 18 एवल 3 व्मफुभभौमा ग 9 क्लः | 


५०१८ :-- 
इति भोक्त वास्तुद्ास्तं पूर्व गर्गाय धीमते । 
गगातराशरः पापस्तस्मास्ाप्ो बृहद्रथः ॥ 
बृहद्र थाद्विश्चकम प्राप्तवान्‌ बास्तुखाख्नकम्‌ । 
स एव विश्वकर्मा जगतो हितायाकथयत्पुनः 
वास्तुदेवादिषु पुन्टोकं भक्तितोऽत्रवीत्‌ | 


41110108 1}1€ -द्याकाव)16 वलि5 ग द्द कात्‌ ७१", 
{116€ वा€ह 9 दषकाः वत्‌ कविय 216 पालाप्रजलव्‌ एलु रल 


(176 {26000  द्ाषल्ड € ववार गा | 
प्रार्य] जटा ज कल की ग [व्ण्षण्ड, सात्‌ 168 (द्छणाऽ, ¢. 1 
(1111057061-441) 10 {116 <€ दद्रु ए [श्षाप्ल्त 0 सकी | 
ऋत, प्ल ]प्रंल्ह रमं कव180 ल #€ णह ग २ शफएलोक एल्छपत्रप्ा | 
वत086ो, चत्‌ {0 [पाणान ५6 [ल्वषलपाङ ८५/54 16 10 ९ल्त्‌ 
[लयः स 16. एणा 16 [लेष्ष्ः जा ण, (लवणो आ6€ ऋष | 
१1८ (५14६7 (ह्णन) जगक). = विल - धालवा॥ ३१९6 [दह = पषाह  लाट्छ्ल्वि | 
` {€ वर [ष्ण (८१), प्प कदष्ककाताश्ा 1185 00000;. 


॥ 30 (111€ (1 4(त 1040० 0 दि वद्पशु पलाप्रजाऽ क ईषवद्कापाक्रा, | 
|  रिष्यपद्ववद कत्‌ दि द्हपश्पु यपत € फोवरालि8 01 [ष्यप्र 116 {6 | 
वतनाद ग ९०48 शात्‌ 2०५८88९8 (+१८045/ 745); 8४ € [दाल्वालजा 


४ 


5 लप, धपवक वदतेथ) छतत @षदद्द-कप०८७ प्णफा 116 
८. -प८.12६. ९88 [7655 20108 ; 2150 (1401164८ 07 9140118. ४ एपव्फ2।2 
पव दादा. 666 3150 नि०65 व 42 

दत एधा, रवप, न्म. 35. 1 | 
2200201 10 ^ 102075८6 ८125८, ` 4255 ^ | 


2५2. 8617101 [बण 
द ज 1245 (21152047 [लुण्ट 1913 


| 
। 
॥ 
| 
॥ 
| 
॥ 


.(-10 9: 


(ददाल), तल -वलीप्र्िजा ग कल सपल्वलाः (तष पयातद) 
९८. 10 {€ एदट्ाणः 4 दय अङ. | 


40 व्ल काचक 16 ऋत 10 एलातवृलः [ल९ आणतात [584८ 
क्लः 0/0 कपतीफाठ सिका, [फ षट (तलना प््ऽक्ौणाः प 


क, 2. - [वपल वकाकत्षह सवृषणं #6€ च्ल ४ट ५, 1, 
 फलञंम) ज प्णाल्‌ा 8 [णयः 10, प्रल्कशी 9 पिला कत्करसच्ल 


0 7 1098 [णतपातौलङ 1९९ [9टसलगटत्‌-५१ 


आदौ चन्द्रमसं वन्दे महादेवं ततः परं चृडायामिन्दुशकरं मूध यः संविभर्ति वे । 


 दिष्णुभयेन्द्रं सूय जलाधिपाग्री तथा वायुं ततोऽमिवन्देऽहसमेष पजापति-विद्वकमाणौ 
घतः परं नञ्चजितं पादयोः प्रणतोऽस्म्यहं सवीनपि तथाचार्यान्‌ कताज्ञटिपुटैः करः | 
 यथानुक्रमतधितसास्नाणां वर्णमाश्चितं यथामति यथाशक्ति मया किञ्चित्‌ प्रवक्ष्यते |) 


सम्यक्‌ परीय सक्षेपान्मर्तानि विश्वकम -प्रहाद-नञ्नजितानां 
ततो धीमतां कृते हि जिज्ञासूनां समासाचित्ललक्षणे मया उक्तम्‌ 
तेनाधुना शण्वन्तु तचिव्रलक्षणें हि मत्तः पण्डितानां धिवाम्‌ अवे | ये निषाताः | 
71९ 11181/2-/1111/1015 € -4 (1111-0 41200८0, {€ [ 1&१त/ 0/7 


{1.6 ददत वात्‌ ताल वतरत, कवक 18१९ ॥प0्रवल्त्‌ वठपप् ध€ 
00ालो प्ता ज चाल (016; 


` ¶€ 11द27/57/49 18 {16 051 (0ण्णरलल = पालवल्लंघा 1 


1 वा 


299. {656 , (जगुल्त्त्पाण्‌ एल्त्छाप्रलंठाइ = पप्वतडदिद्त्लाक 110ष्हा, धाल्छ 
प्रष्टु 06 ज ॥प्ला€ञ६ ६0 ६1656 0 प्प पट छउलाःपफद्मो क्प (एला €ता९०४5 
` वले 1940त659016 छप ००४ ऽपर्रिलनल्प 1ल7हण्< । 


 , 3०. 2. ए. वायत: वू, (ागृ्लाऽ [सप्पा 3.2, 7; 


` | 25) ककः कवा ८८८ द 2 75८ -200-दद, 1. 
1. १010 एप्वलाल€§ 6 प्णवठपष्ल्वाक जाः€ उपद्नला ८३६६ 3० ऽप08ध्का3 


€ श्प7111& ४06 (ज प्रल्लत०ा जा धल दक्र पयप्या (द-67द्द (150 4.7.) 


| 0 धल € प्रनत साति पाल 5425706 (55० 4.70.) 0 घाल वप्रा... ४४6 ऽ] | 
५ ४6 1८51964 17 ाव्लपद्टु ५6 4107.25 तत 0606 {€ = 5+.426-5 2111 कदत उप्त 80016 
` फला त५6 ६0 ल (0४ आ) उणु लप्ाति प€ एला(एा€ 0 [जवि प्र | 
` पल लप्रवहयत. वपव धल कदलयाजत्य ग पाल फलान्ते त पवद पठिप ६०० 
| {० 709 6. 2.1... & (व्य 2 ; ~. . 1 98 


1.11. 
6 वत्‌ ज पः णपुर पह [कण्ठ 2 दनव हत्‌. 1४ ए्८ 8 151 
क -{0 82 वप्रधगा65 :-- 0 


विश्वकर्मा च विश्चच(शः) विश्वसारं(रः) प्रवोधकः । 

बरतश्चेतर मयश्चव त्वष्टा चव सनुरनकः ॥ ५ ॥ 
मानविन्मानकत्पश्च मानक्ारो वहूश्र॒तः। क 
परा च.मानबोधश्च विश्ववोधो ना(नोचश्च तथा॥&॥. क 
आदिसारो विशाखश्च विश्वकरादयप ए(ग्रेव च| 

व।स्तुबरोधो महातन्त्ो. बास्वुविद्यापतिष्तथा ॥ ७॥. 

पार कसरीयकश्चव कारयूपो महा ऋषिः(दपश्च) | 

 चत्याख्यः चित्तकः आ(शावयंः साघकरसारसदहितः॥ 
मानुश्वन््रध लोकज्ञः सोराख्यः शिचपिवित्तमः 

तदेव ( ते एव >) ऋषयः प्रोक्ता द्ालिंशतिः संख्यया ॥ ९ ॥ 


| अध्यायः ६८ ॥ 


गङ्खारिरः-कमलमू-कमलेश्चणेन्द्र-गीवाग्र-नारदमुखेरखिलमनीन्द्रः | 
मोक्तं समस्ततरवस्वपि वास्वुशास्त तन्मानसार-ऋषरिभापि हि लक्षयते स्स | २॥ 


( २ अध्यापः ) संग्रह 


 पितामहेन्द्रपधमुखेः समस्तैः देवेरिह शास्तवरं पुरोदितम्‌ । | 
तस्मात्समुद्धत्य हि मानक्तार शास्त खोकदहिताथंमेतत्‌ ॥ ५८ ॥ अध्याव्रः ७० ॥ 


{1€ [181 1 {€ 4011 01121000 88 फलु वड प प्ट कदप्दस्काद | 
8 (कापिंएट वत्‌ ववार लवतत). = पलाल चा [प्षटफर्ट वत्‌ गल = 
कातिल 1 116 कल्व्वाणष्टः 0 6 411 -120 11861 भ 2 | 
 वप्ीलत्ठह ; 0 ४6 काल" चत्‌, ९] 11656 १16 887त ६0 96 (८0 १ (न 
वात्‌. उत्क पजकञ--एषणवा फन , वणस पलट कवन | 
` {€ [रलः इकृन्नु स श्‌] च््ररष्प्‌. प्रह कष्ठिष्यल्दाद [8४ 18 व्वप्र | 


न 


। ` 31. व्ल कल्व्वाणह 7 6 द्ण्कतक्य, कावप 9) ए, 4 आकण ए | 
कादि प ८11€ €(€ १०९७ 10६ आच्क 1६, ` एप आ प. 5 6 पऽ 7624 त्रातय | 


` नारसिंहाष्यमःनन्दाख्यं तथाऽऽरणम्‌। 07 ण्यं त्वार एकम्‌! धत ०५६ पद्यं तयार्णकम्‌ 1. 


` 866 ०४८ 26. ७46 = € 18६ पल€ १९०८३ प्र०६ श्ल 10 द्वाव (25) (कलग | 
0 ४९ 12311265) 3.6 31 ४ 1 च 


३ 32. 566 ०६८ 30 भ 27 (क 


४ क. 

 तैप०ण--अण्णााः नः इक्षाल वापा एल्लापतण्टठ गलुरट6ता. > 8096 

क्06ः प वा€ 101 इप्ा'ठ कल ऋ कलहणययक्‌ छक्ष€ऽ 07" 16 न्ध€३ ग 

पठ | | 
[पाल वलया (टस, वत १5410 4/072 02/75 01 [दाव सिप्रा -]08 


ष ` गप ्प-}00 क८-55 वएष्म-ककणः (1702-17 75), पच८68 16 कपप 0 € 


अरर ए ८० र श्ण 6 16 (एस्यति 6 ष्पा त 8 १९8 
एतो लोपात्‌ पत्‌ ॥0फ € 204, शवोताा 0र्टरह्ति 1 पधी 1६6. 
{चहल ग प्ल छम म॑ कष प्त्षणड सवतः [णुष्व पापठपोा एाहवथताायफ, 
घ्‌ द्वि द प्लुय फा तारव्छष्लत्त्‌ व्बाष्ष्युणाक. (106 [वलाः 1 ठप 
0 वएलत्ा इ0परा८हस ३8 (€ वपाः ग पः [लगा कणप, एलः 
18 [छस्दारत्त्‌ 10 तवाानखा0), 1 116 क्रु पा 


पिधा ज 8, {ल 11016 वीमि 0 पावरप्टि5 व 350 ता0पता 
छा (सप पालाप्जपः ऋ) कपालः इण्वा८्छः. = लाः पपुः १16 €रप्टा 
,१। 18881 
(ला 18 ४ शिका करलनीत्त ४ 1 षत, € 4/८ 
` पञ, ब80 लमीान्वं धल 421401८4. = [६ [दऽ = ल्ला लताल्वस्^, 
ए द्कणु)2 1 81 (0 04९6 [हवमा पाऽ 86160९6 ष्ठा सिष्व. 
(1€ 44051८४ नवपद) 15 कलावत ६0 4 एवक2ग 
न]6 लः लपन्‌ द्दात, २ दरव्घालछय णः एलप्ीलः एमपाणः- 
० (रलणाका८९, 18 वव ध ^ धकर २ ६२९6 01086 [पर्छ 


` 0८्लफए€ः ॐ (एण्कडुण्ल्पलाह {16 ३0. ४6 (1110015. = 8006 छ इत््रनाः 
` का कऽ फण छह ६0 6 ठक रः पाती ; कात्‌ पध्र6 ग्ला फक्रिल 


ताता त ७१७१५१११ तथान १५९०५११ 
11 ५०९५५०५ जातितो 


3३. 2 ९5व ४४ = 524/2. व. 9व478601130क7व {48 (21८८३) 1908. 


(1 1 0 


31* 44744650 7ते क, त288द्त्‌ पावला = 74 414#, 0. 01 


।  -- ल (तमप), क कण्व द्ईक5 ८5, 


` 35. प्छ 455. 9 44007004) 966 (र्द पए, व, 0 165. 
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( 16 ) 
1 १८. भरतश्ास्रम्‌ | 


एवं नाच्वभर्त-हसमरत-मावभसत-नेत्रमरत-अभिनयमरत-वाग्भरत सीतवादित्रादिः 
सतश्चतमरतप्रबोधकं चतुष्व(ष्प)षटवध्यायात्मकं भरतशाल्न भगवता गणपतिना 


त विरचितम्‌ ॥ 


{€ 11814 @014.010८त4त 8150 {0085 स्रा व६€ा08 88 {€ वणन 


र {€ ल्त्ातण8 क वात, (पततदि 


| १२६. चिलकर्मरासख्रम्‌ ॥ 


एवं नखचित्र-केल चित्र-शत्यचित्र-अङ्गचिल-भावचिल-आढृत् चिल-शिर। चित. लोह्‌- 
चित्राचेकोननवत्यु्तसरतचितभ्रवोधकं द्ार्तिंशदध्या[या]त्मक चित्रकर्मशाल्ल भीम- 


` विरचितम्‌ ॥ 


(16 शव 11८४९ {पील प्रणि वारा सिवदव 


भत {€ क्प्ल ज २ एनक्राणयर ,०(|7 द ; 


|| ७. शिस्पशास्रम्‌ 


एवं य॒क्चदिल्पि गन्धर्वरिव्पि-किन्ररिदस्पि-किंपुरषदिस्म्यसुरशिसि-देवशिस्पि-मानुष- 
शिल्म्यादि-पसोत्तरत्तिरतसिद्पप्रमेदान्पप्रहेम निरूप्य मूलोकसंव्र धद वविग्रहदेवार्य- 


 राजग्रहगरडस्तं मङुञ्यमटपावेकोत्तरद्तविधरचनावि धिगर्भितं कदयपद्यायापुरषरमारुतिमय- 


विश्वकमेत्वष्टमनुबाणरिद्िवधनवटकशद्यातिप्र तीनां परस्परद्िसपप्रमेद मामप्रदशनपूर्वकं 


ष छ द्विचस्वारिशदुत्तरेकसदलप्रबोधक द्वाविश-गुच्छपरिमित शिखद्याल्ं मगवता कदयपेन 
म्रणीतम्‌। 


वयौ सद्यं योगः पगपतिमतंर्यवमिति प्रसितं प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यं हितमिति च । 
` रचीनां त्रैचिच्रााद्‌ छजुङुटिलनानापयचुषं बृणातरेको मम्यस्त्रमसि प्रयसामयैव इव ॥ 


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{01956 = 276 ` € = 6200105-- 912. ६06 ण८€ 0€५९०{६ - ९८ {€ ४१5) 


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7 ^ र साममीप ज लोत्तप्रोठप्ड, गणष ६५ पलैः भारहलु। 


1ए6९81व्‌ा0& ५16 50100 5द5105, र्ण [दिव इवकषर+ :-- 
श 18 प्र 5 ध6 तराप्ताऽ कलह 10 00888880 क = पपराालतयऽ = 
16811868 0. काल{द्वा16, इलपाापा€, &९. दा (नाल्लरलङ 81८ ९९16 


धल लात उदव, एप पापणिपतााभलुद् क्त 18९68 ण ध्ाला एला, 
1166 शुणशढ्दाड {0 [षठ 660, १८९०ता7द् 10 8076, कगपक्-+पफ0, 2४्‌ 


 9(गताप ४0 = भालाइ अद्रिणा) शतशत ४680868 00 116 200१्€ ` 


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[7 2 शला९8 त ऋलोज परल [1 €लशात्व्‌ 2101010 {116 07818 


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0 पल], पत्‌ ॥िप-{प0 00 0 उपनता 6 


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0411071/17265 ज ५16 तल्लछ क0 --6द्मृल्त्‌ ॥€ वानौालाहया का 0 


` प्लालाद्पाला(§, एप्त 1116 060 ताल पर्ला8, पणता, {ल प्त उपड ताः तपा ` 


21017 लप्ला1{6णड (णाा865) 20 एला, = पात्ि्रातदलुङ, पप्तं धवला एतऽ 20 प्रलादहूह 0 
17110 € 562 -- €रला, 171€ पा7६० 113६, {14660, 0 ! पण्ड [.0प्त्‌) एष्य अआला€ € | 


€ 8016 (रर€प९€ ग {€ [पपात एलं 78 


{1656 {€ = 008६ = 170 007६370 {€ ्िल668 ६० ध्1€ अलल 1(85६ला5-- ` 
एव हुवण्डा ©) ववा, ए वत्‌ पए 2204 -- ६6 715४ ६फ0 - वधलिः6068 
एल च्शुन्लंभाङ् ऽध, भल ६0 6 लिप्त 70 ककड कुद वध्णञद्नन्य 
` (कद्वरष्छवा , लु0वपठल्व्‌ एष वपता व. पणव 9851 त 53०6,  , 
` वृपरशा9्‌. 77६० छण. ए चाल [2६6 (रवच्थणाञ्‌ 1. न्त 2० ©, पएलाभचव्लाद2 | 

5212. 0 4121016. ४, 8. 5600 गू & 905. 82021016) 1931. 


(0 पष्ट7 पलाल 6 ऽप 71261110115728 {0 ` प्€. व्ठाप्०, 35 7602108 ` | 
71  ‰{8पंऽत्421278 : १३६९ &८., धाला€ 376 - ४16 501665६ हठप्रा05§ ६0 ऽप6०8€ 
६१12६ {€ 1647160 ?22141६8*5 ०] 6वाप्०प 18 308गाप्र॑ लुङ हदलापा76€, 45 
| 70 तष 2 116 {९९६5 1161६076 21€ 8लहप्व श 12664916 210 0718, हण्ड, ॥ | 
` एएणाशल्व्‌ एर ध16 शत्त्ाल--पाए 6 ` 4105 ४-ब्क््‌ ० -उप्द्ार्वप्री हिक फा 
(0171, 2 ध 0 | 


45 7164705 116 716 € ज र्वापञ्तेव8 68725१91, 2. स्प णलाव्‌इ | | 


01 {€ ` 10४ 0प(-रगएा३८०6. . पट ¶तपा8[€त्‌ एलणिल सा (भनादुवतल्फ, ऋ | 


५ 2601881 200 प28 , {6 वपाः जा लप्लाव्‌ एठाऽ णा हा€वः लपतत, कप्त 


प्रिया व 50कदा2ऽद/कक (50. 4८धव/ 07110017774त, = एनवा66 ) वात्‌ 

 -वववदक (हत. एशलपता2 (०9 (21६६2) ^ 1 
1 इा. क्प सिट; दद 0 ट दव क ८ 22005, [0001 ५ ८ 
` 1. ०८८८. सषकपर 1 त 


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` क्रा 02 म{91ल] लो कतमैः 6६6, 0 0 {€ वातः + € 68568 


1116056] एः, 16 प्लाठपह्तव्‌ 71075 0 110 फला, 10 १16 इत्‌ {0 
187९ अ0प्तपरश6्त्‌ 10 {16 दधा 2६6६. 


{16 &0प [पताध्ा 41205 6 दलए प्णाधरऽ वतं वल्त्‌ _ 


1 1008 पप्रा जिर. = (लाह 976 = ॥एला्ि-लष्ट णट्टण्णाल्व्‌ 4९88. 


ईष म प्ल {0<तलणद] १९8] पती सालााल्लपाथ्‌ इपणुल्लैः 1 हल्य 


तमातो ७१५५१ तात तोता तेत भमतम० कवततमधपाकषणन 


। ` 529. प्ण 6 तपती [वाभा दथोष्पेद्चभ७ 566 --- पि, ४, उतानप्लाणऽ ; 
न ८ पण्-अवत कट चज 7क, 1सएटाहु, 1, £. पाण ०5००€ 
एप्रलशावापष्ट, 1912. ए. 78. पएपालध्णषट : 2. 016 (कपर्दः, 016 पदप 
` पाजः 4७ (अाण्य-अवताप्राौ2 (4) एला एाञुापाष्ट 270 025 ५ ्ल वलाः द ष्दाः2 
(9) -1€ (पएणरलप्र् वला 4 ६३012 वत्‌ पप (शह ; 1. ४. 1143 1119 
9४ तथ गदः ज पाद्वत अप्प्लान्चफव, 2124738, -*1€91211त2311 (1655, 
19123. 0. 111-1५, 115६ ज + 81185 01 (वा छा ए एष 5. 

६2 9. “90706 ग 116 4&्ध्कऽ १९६] एध रला ध्ल्तत्डं आा2ल्ञ पणोपलौ 
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तया पाठा (्छपत्लपंपद्ठ इल्पाएप्पाल 2प्त्‌ चाक्त्लद् पणोञ्िपष्ठ 1प 06 2८45 


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€र्ला 06 5145 म रवाकीक््ा2. | ध 


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6 जवार एलहणाः, 0 छ्द्ापु0ा6 ज #6 णद भं शप्रल | 
वत ज श्ण] 96 [ा€्डलशत्व्‌ 10 6 लादुवमृ्वाठ वध 


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९0011105 वरला106त ॥0 सिदवातएपत्ठ 9, ता166४ ताऽल]016 ° प्6 5168864 
(116. 


53. †. 4. ©0प412 २20 : 7८ = 0 ४४ 71678" ४०, ५ ४ | 


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54. (गतालाः ; (क्व आ सषु 2 6८क 4 5012040८ ॥ 
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६5, 566 ०८९ 29, "9147८2९ | | | ५ 
56. 1028 (भाव : 2८ कव क2-2864व पणि प्ल (तका 


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(6४७. पि. 48. (ए@०१९, 1933), 566 ४6 [प्ठवपलप्ा, 11 


हत, (पजा पल तित्‌ लए ज -कषववय कवप्ता एल ० 4 । | 


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2६ | 
४92. 866 एनत [व्पलि : 00. क समलध्पाष्व. ल 8 पणत इल यद. 
९ | ५9 : 1116 [लला ऋल्ला, 0 १६ {0 € [प्वा७ऽ ग {76 |लवा6 [शपः | 
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0 । `. € 4 प्रप्रीलाश 0 16 ४४० 18 2561064 10 वक्चपुर्छः ए1 ए)लप. | 


1 ` (0 2 (4 अवद क) तमद त०वक), प 0०४58. 
: एपणादछपठपन - ५ 


। 617. 2005५०१2 < 2128४६1 "४464८, = ( ६.4 9 । 
85111, 2122210४} ५ 1 भ 


~ 60. स्पा कश्चण्ञञगाऽ ज कच्छ वपृप्ठञपिताऽ कवठ एत्या दण्ट 0 पाष 


[ 24... 


अथोपवेदाः ॥ आयुवदो, धठुवेदो गान्वर्ववेदोऽथैशाख्रे चेति चत्वार उपवेदाः ॥ 


|} अथाथेशास्राणि | 


एवमर्थेशाख्र च बहुविधम्‌ । नीतिशास्र [अश्वशास्र] शिस्पजाखर सूपकार] 


शास्र चवुष्मष्टिकल।शाख्र चेति। अपि च मोतिकादिमोतिकशाल्नाण्यपि | नानामुनिभिः 
प्रणीतं तत्सर्व । ] तस्य सर्वैस्य च लोकिकत(ब)सपरयोजनमेदो दषटव्यः॥ 


प ्रलाः6 18 [कतक आङ क्ाजाप्ति णः (ष्वा, 0" लोप्ता ` 
॥16 उल्ला ण का, = भलपाष्छपाल, इलपाएपा6 लट--6 = (कर्के ` 
आत्‌ 6 इद्वः, 100 € इतक म नगा प्ल -4110त- 


52511... 


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 शु‰€ 00 ४0 परल ८्वद(/1८- 4141८50, ( (५/0 ) ७14८-1, = | 
य्त्‌ प्र सि्लसवः, गाल सकण धा6 ्लर्जठ6 लण्डलुक 
 पल्भघ्व्‌ 0 #€ एत्वा ८%5 कात्‌ फाप्डा 0९ एच्‌ ४8 8, ए९व८ (दात. = | 

वुल <ण४त-उद्ा+५७०२० {छण इपाणुव्छलात्याप षइ 0 06 द04- _ । 
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१८५४ दण ४06 5656 ग व /10 (छातः 0 = फल्वडप्ालाल्य( भ | 


0115{8.0688 


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, 0 ककदुवाात ऋत्‌ 4050, व क0 ` डणथालः त्री जण [अलः ` 
त4188, 26 6 12120४0 धत 6 11401/24/47014/त  छद्रएव-दा16, वलाल = 
 ‡8 8180 > द्ा॥7/01" 60 24115, वृजष्ट 10 पत &्ठ = 


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(6 @पालार्वदप्नलाऽ (धप ण्ट) ज धल दिश््भ्न (दप, 216 एषि | | 


धा€ 01686 पलः) ठा ठ (जप्ता ६116 तारिलाला६ लवाप्०8 


622, 7, © दणि ; अवः अद्र, क 4, 5. 2. एवा 1. 1875; 
` . 150, घाल 210, त 5न1&8 (1874; 1876) ४08. [2 & ~ ; 210 दिल 3ला{65. ` | 
` (1876, 1882) ए०15. 1 क्ण ¦ ८ | ५ 
| | 629. लि, 1, एप पल्ला ; त 75100 द व 2४६, ४७, 1 ~ 
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210 € (एमी लक्ता) पला 35 एलु ४० प्€ (वि३९२- (22, 
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~ ` ऽत्ति) 2 एष्2शष्ा9 ©] 1253 21 2 18231183 ९4-ऽ 2.४ 


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` ` सिशिप्रात88), 18. , 06 0715 एत्तदक्वु४ ६0 पल्न्लशल ऽकशलापत धल्व | 

1 ल्ल फ््चपव्रऽ) पाल 50-व्माल्त्‌ [भएकछ8, लङ्ग 21056 छप 9 ६6 16घ्वं ण 

¡(णपु घाल पपाच णि प्ल ऽवति प्प आ 2 आनल) प्जगा€ प्रा ६३016 ^ 
कण्व दनप्ाल८6त्‌ {ग 0: ६6 {1361681 एए0086§ 9 ४6 {11655} ॑ 


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[06 [पकम 404 भात्‌ धल कष ककण वप्टे एल्ला व्याहत 
00/-{९८011004 (6व868०5 ¦ वात्‌ 16 दाद वणल 8 10 11007009108.56 = 


116 41114251 ग [रका 66 80006€ 8 जा 5एला 
लाशूलऽ 0 {0ष्राभापा0९, {06 (्०ाश्लीता त एटडातलाध्भ्‌ एफात- 
128 27 + कत्‌ शृण्ल्लदष काक = वालुाहल्लाया€. 11116 41104 


52519 ०7 वपु 18 970 जत्‌ कणप एप 10 118 छलौ {गि 70 मतल 


{1181 {16 इत्वं (लान 4 (1.4 


10 रप्र 4 11वद4के5 0, पाह्य = एव्रापतद्ाप्रपा 


ए 9थु0् 20 [1580885 186 ल्ल ल{6त 8 ्व्लौालः छ 4010८. 


(ग8ा€ 150 कवत, [. 5६, फणालाह ३{ 18 यशतछसत्‌, पावः दज = 
{16 शाल्व; शतार ङ 6 दाल्छम०ा व117108ी ता) 16 (पवात्‌) कद्र | 


86081818 प्र6 कृकण तल्वोणट का्ी 0कल = षावकुरी-का 00 


4111८ ६०५ 0011, 1४85 इला पव प्र€ 0ा€ 0) 4 21110. र खाप्र- 


0111818, ¬ 17, 89, 280.., 6. 


0 ता ण च + 
[1 


= ब्र 


(जा लदवत प 0 त6 प्लवञपालाालपध (उपार ऋ6€वा15 (वा€वऽपा118- ` 


ऽध) 27 धल 0प्पताणह त 16 1866 ०{ 58611006 30 16 € - व] वा5) 


2०१ 28 ६€ ०4९5४ णऽ ० [पवाद लल्छप्रलौफ), 276 भ 70 [ल वपम कात्डे ` 


{° (16 [ऽज 9 8616066 | 
| 62. 566 ०८८ 62. ७42८. = ` # | र 
५ 64. 0: €78 7170165, 36€ श्रौखीशरदातिलकतन्वम्‌ । 224८424) पणा 


| (्छप्ाालातवा$ पटार्थदशे । 40024504. = 4160 ए {द द्व13743 52728२६, - 


72022 7८.45 ५018. 3 ४1, 214 2, 45 
65 ए. ह. 4 कष : 7, 2) ए. 132. 


66. दविगलयतदकश्त [व : 4-220-7४ = ८005) | 


क, 44. एन, उव. प्या, 2. 256 


स 67. #. प्ता पन्लक्ोष्ट ; (दरण कथ 25८0. पद) ` वु 
-3974. .. (लपु ण६..1922) ५3. ६ 1 1 


| 24 | 


= (पाहः शावलषत्त्‌ कण्‌ 3 नाह पवा 58. 
47 त्रोपत््ा 78 वरना प्राह र ताद 1 तल दद्य 
` (कत, (द्रत, द वपताणः [वादतः दिप तातं द्रावसुकपी ९ १ 
० 161, 6164 85 {6801165 अ 14.९9 


| णना लो र कवाट 0 र वताता एवऽ 2150 क 
अलल ष्वद म वक्व 8€8त68, चाऽ प्लाट ऋ 06 वपता 


लपका, प0 पः #€ चपप्राछा ज भा पठण जा 4007्व/८-- 4001 


10010002, 416 श्मः = ठिलसप€२१,२० 


` क95]0ी 18 8 {€ 506 प 8 दलाल ज 16 [कदर 
पषुरास, 81 प्रालल 15 086 एलत्ाछाासा]0, [दा एल्€प 1.0 वरत्‌ 
11118555. गि) {€ वद्र, 1 15 [ला वातः {1 
षता विवता्णा एद्टधतल्त्‌ एतारी 7६ {€ जप्तल कत {€ 
4 ्ाकड्लत, 5 नत र पादन ता ष्ादरुःवी, वृकः 1 
। [छलात्‌ 10 पड 0] 7 प, पलास सतर वलत्‌ कत्‌ करस्तव) पी 
ए10तृहता लसोला(5.71 | 


न[€ लिप्त्वा 1. € {6 ष्दप्कलर्‌ क नुत पलन्ला }$ 
२ ९ त | | 
सिप्र 0 {088 33 १ पठार 0 वपा वल्लौ [प आ ४८ ५० परौ ल्त 


| 68. ऽ६€ 7. म. प्रलाप : (5८47८0८ वदा" 20205८4 2८८2४, [1 
2384, (लए, 1922) एए. 50५7-8 ६१ ए. 5०8 2०६6 1. 6466 धववञव0र त ध$ 
 क्षि०८ 5 ककल 200४6. 
69. 566 (ल 2 ०६6 25 648८ = | 
` ` 70. तिशवालसप्वा2'8 46404 -दवद 04, ©तात्ल्त्‌ एष कदपजाप्जशः 
` ल08. (लप 6 वाह ऽ&68. विध. 5. (ल्त०एगीध्ठप एप 2 ए पणा9& 


`... ` पवठ्पञ्€, प्व. (मल्पत्तः8, 1934).  ए0ा पिधा पणित गल्भ ह3161- 
&दष्ना) 56 प्ल षल्ञ्लयाद पल्ला (पभय कध) ; रवद व्रि 07512 


| 4.5.25. (रकः इन्मरमे, प्न. उका, 935. 50. या, € प्ण्वलः दिष्ण्त- = 


` €4५212. 


भ. - र - पदसा; ल क दादव्फदय ल एञत्‌ 7, 
१. ६०8. (ह 2१०९6 2583826 185 एष्टा) गलातलल्व्‌ पिल्ल] २0 एह, स्न 
18 0061, एष धट ए्ठ्छला पला, | । 


72. श. ्रएल्लःप्रध्य 1. ८2.) 2. 532 (766 (वण9]व्०प). - 8651465 ` 4 


` प्ल -ल्भोजः ग इपत्तच्पधं = 6 06६ (र्वा) 1882) पलाल 15 3180 रज 


` -[ग्0062 1042522 (वदप, 1882) ते 5€४ल2] [पताद्प 109६5 पद 


भव्णञाश्प्ज् पप एतष्य) कथं आत तक, वक; उछाल ९ ४४ 28. £ 


` अव्य (न्मा एषण 1975); एदु, वकण्ञन ए छट उपल (्वाष्नव्त), 09 


| % | 


1, 8 छाल. लल प्र€ कलाप्व्ा0ाऽ 9 आ 0ात्‌ ^ 1195018: 11दए६ 
एल्ला) [कलएह्त्‌ 70 #€ सिपाह ज पज का 06 एकततत पम 
1116 जिततद्पोत् 10 व भूतल विवा पावक 6 वर्रालितंणः (0 (6 11045)4-7 

` फाला ्लाा8 जिपातद्वल््फव्‌, 28 गाल त 116 लंय - वणान #68 
11. 1 1/1 1 
फार शलाव्छा6 कत्‌ इठपतपा€ 10 वशुज््लः फ, 8606008 4 91 6 
(1066 वाल 6वुप्ला शला (वता कर्यललालछऽ 10 जगी 11686 शा ल्ल8 
11) 01116" [0 ्रठणड ग 16 न्टत786 88 ९]. = 


(४ वाद्वकापापादऽ -सष्ायाडविपूापाद्धि 2 016 9 प्ल काठाः फर्क 
कणरः ग ५९ [पताक [लता [15 8 नाला कजाः 00 कर्पा 
4 8770108. -48 प्रः अ] दल 18 गा [ऋका 10 8] तनुक्ालणाह 0 
1& ध] ध6 कनल [छाल ज धह एएषणाट कणत प्ल (रपट 
116 [वड व्यप ॥रटपल्त्‌ 71 € फएणषर, व्हा = †# कषातशुप&8 10 80116 
दपला{† ० दण लालुलृमुष्ट्ताल वाकप्वलंला चात्‌ 18 (प्ललनाल्त्‌ . कराती 
कालाग 0लाः का18 810त्‌ 86616681." ५४१ 


(तऽ #6 111 व5 102, तञपक्नाष 0188860 पतनः ५6 450 । ५ 
10111102] 8त्‌ कडाणुणड्ठाल) तिषटदहठः) 15 [पा 8 नप्प), तद्म, 88 = ` 
 1{ व्ल, शा [लल(थलाल्छप 51])}द्ल5 16 {6 -पाद्र)85 प्राला0ऽलए्ठ, । 
---0 ध पल्वल पला वाह [षा षठ लाक्ण॑लऽ वलश्म॑ह्व्‌ 0 [ण्न 
वाठुव्लप्राह 8त्‌ ऽपचा९. = पा {€ इपफदस्लह [चए6 [दा {6816 फी | 
 & रलः 174. -- "दरे (०डञलतृङ पप्र 18 86086 0 णएमकन) ॥ 
पवाद १९०९ गष गाल लशुलाः 10 शपा) 7 कला 
तवा]8 9 10049९8 व वद्लय0त्त्‌ 1 च शललाक्र6 पाकणालाः एणपट 18 


न्क 
५ न 
मा नन 


{€ घा) 38. 1. 6 श्प ४2561 (€ ण्डा्रणठ 340ह्ठपाात ग प्ाप्रवप ४ 
60८010६ †, 7 (ल ऽश्वान्त्‌ 80०5 ग (€ पाके, 11212020}. ^ 
३. 1050-7 द व, (-477वव7 20.) 1907); 000, 252. 966 0६6 
25. 52८02. 

० पव. 2. . ^ वाथाप2 : 4 2701707 मा त 464.) ए. 799 ; 2150 566 

४ उक्ल; 2त ध6 ए]. 251. [ङ ए. ए. उभार 
४ 75. - 4. दला ; © ८0४ त) 2. 567. | व । 
2511102 :-एत. 0४ प्त, ला (5200704८ 246) ; एव. एष - कषप, | | , 
 इपवष्द्वा2े [्यप्ल्तवाप् {1 6 (गफ्ापालाध्ाफ ज 81100212 (22002421 


` भद्र 54) 95]. जि पाल दहष्ल्य्ला एक पि ति. इला), 7.९९ .4< 
(187०-7). (दगप्फालल गप्वयाशव्रठा ए (पववकक [कल (व्तप्य2) 18854) 


[9] 


कशल रश 1 भाला कालल [दतापह" न" 7 [78 प्रलव$€ इए 


शाल ल्ला] कपीठता168 876 पालाप्रमा6त्‌ ताल" 


€ वरप्मव€ ० कप्लाललणट पत्‌ उलप, शनभ 


` ल्छ्०न्त्‌ 9७ 218 वात्‌ सएव), (वाटत ३06 रवप, सिविद 
888 शात सद्वः]पथा8.र | | 
(प्त ^ एणः पा 
गृणे 64108९8 0ए पराह 4 एत ((णण्व.) 


पक ा€, ॥ 18 101 प€्व्ल्डडदाकु {0 त्र दाद 001 त्का कण 


1 शलिला०€ 10 6 ल्वा, € 01८ (जा धतरव)ो अत्‌ 6 


(148 शदत उश चत्‌ € पतता [दाक्पा€ः €.) गा इपणल्लः 
[€ भ्लहटलयाा€, च 6९, 168९ 067 तल्प, धं श 


1600105 क 1171016 (नापु स्नान दुहलपालाल, € (द्धन 


17 {1015 (जाणलप्रणा लल] {0 इएल्लंस्‌ एना८८न१. 


76. ए. ए, 4ताथङ्वे : (क, 47.) 9. 22. 
7. | भूमिका ङलसानेनं सधस्याौत्तरं गतम्‌ । 
न खाघं हसतयं चेव कथितं विश्रकमखा ॥ २९ ॥ 
 मप्रास्ादलच्तणमिदं कथितं समासाद्‌ 
गगणं यद्विरचितं तदिद्ासि खवम्‌ । 
 सचादिसिदिरवितानि पृथूनि यानि 
तत्संखति' प्रपि सयाव हतोऽधिकारः ॥ ३१ ॥ षटुपच्चाशोऽध्याचः ॥ 
अष्टो सोषखकभागाः कांख्ख दो तु रीतिकाभागः) 
| मथकथितो योगोऽयं विच्तेयौ वचपंघातः ॥८॥ सत्तपद्धाशोऽ्यायः॥ 
` सरहृलप्रमायैर्दादथ विसीय॑मायतं चसुखम्‌। 
॥ नग्रजिता तु चतुदश दष्यण द्राविडं कथितम्‌ ॥9। 
` चतुरङ्ल वसिष्ठः कथयति नेवान्तकणंयीवित्ररम्‌ 
 अधसोऽङ्लप्रमायससयाधनोचरोष्टश्च ॥ ८॥ ` 
अन्धत्वं ष्वा करोति विनामधौसुघी इषि 
सभप्रतिमाखवं शुभाम भाकरोक्तसमम्‌ ॥ ५२ ॥ अटपच्चाशोऽध्यायः 


(1.0), 


78, एः कनाल द] प्रछि प्रत 70 पि], वल्हुगतापहु धत कः+ 366 :-~ = ` 


106 51454 ज धवा्भपापा2. हत, प्र. हल, (20100८८ 


2 प्ल लपल्लप जा पाल्या 1107द-1101120005, 0च्9त्‌न 6 जलः 
 04-101012100679, 8016 01706 19८ शूण्ध्लंक् र्ललल्1९€ ` 0 - धालृा(6्- 


016 811 इछता 6९. 21081 ग 116 (7712125 216 {415104८८ 810त 


25 70 क्ीकु 88 {0ष्रा{द्ला त 7067 216 त€श०€व 10 #06 प्णञ? 9 0151074 ; 


एप प्ल तद्द फा {16 1702268 0 2] [€ (166 वल65, 10, 


07010 € (प्व 


1. 16 41011211 [दइ अल्ला कधुलाह जा ठ5४ वत्‌ ७10८ = 
--016 ग पालो 00 {0 का, {0 ग 1कव€ा02 0पाताकाहऽ शप्त = 


{1117ल्ल 0) इत्र 


2. 16 (८11५-1 ४1दशतः 188 0 लाद 00 शादे 
4106 {0 0 इदप्एपा'€. ि 


३. [€ द" कष्]/५-1 11 दश (लव णड ॥6 वराञयलाला) गं 


{6711016 7९इलाष्णः, पल्‌]5 त्‌ साऽ 711 15 006 दशरथः 


4. (16 5 (01712100८-11/1.21000, = [1लप158, 11688 116 (00 त८- 
{0 0 {लणु7]68 47 @]©' एप्ाता0९8 17 1४5 006 नामुण्णल, = ४ 


8. (116 0४161401 188 पा" लाल" प्66 न्ट 


०१९९०६४९ {0 छपा क्त्‌ 0€ 0 #6 कठराहलता"€ ग ला ]068. ` 


6. {11€ 11९4-0 {88 लंक = (्गणगलालाशक6 वभु 
. व्वा 10 शा तलवम्‌] पयता शलात्लंप्ा€ पत्‌ इलपाफ््ा€, लडपि 


4. फपत्लपाध्ट : 4, द ८0/ म व, 2. एन्‌, 1, ऽल्व्गय ा ; च्न्लनाष्, 


ए. 517--58९ क 
4190प्६ (116 24 5661075 न (16 475, 566 :-- 


५ >, ए, ^ वाथा ; तव, 24, 1. (लना ७४८), आ. 2/८ द्ध, | 
फ, 2 46८ वक; ३४ 250 4 रव मा व्ण न, _ 
4022 (1. ; नि. [वः ८-८-00) 0 424.) ॥ 
एण. शाण | | ० 
9. 0 णि] 1508 ग ध त वात्‌ पाल दरवत : 366 4. शल 
पपा ¦ क प्रथ (1893, 1.गपव्‌), -ता००४, इ ४. 220 5 ; वात्‌ 866, ` 
 -  €शएव्लंगक-व00प ल्ल्ला 2109045 ` 00. 513-714 210 200६ लद्ुालला ९4 
| व) 0. 521. 4130) ४. जणाक्हलप्र्ट ; 0. न+ ए. 532-33 क 
: : “एप ध्1€ 113८802 -एपादव ण्ठप्रगा8 | क्रु णप एव णा88. 6 | 
| छवथुपपाव-प्थातव ए. पयो्रातप लापापलार्दु धालणा, 545 09६. लष्टण्ल्ला (एक, 
` €15 {€ चा य- 2, शापाप्लाःद ६९७ धल. ^ न 


6 दलाय-ए7व्वाववा 1 €. 076 उद्लीमा ०0 कदल्या. पि 


0016 ग 1686 वाधूर्यलार शल्छ्छपाह धा6 हिषल ग 6 संदा एक 
ई 10/41९दत4द5, = वालटाला( प्ावरमऽ क वालव 006 करल 
2 तज॑स ० (गुप, हृ्त0 {0 [ताः ००6 {0 [पातापष्-प्षलपप्‌ः 

0166 वाशूुलाड काठ इषकृ ए्लृ वरनाल्त्‌ ५ = इदपुौपाल--006 [लष ० 

वकेदक्ा्ठः, लजालफालकु कात्‌ {प0 0तालाह 0 {16 740४ 


' ८. [€ -44-112000 188 & 5916 वशु 00 इक्टलिध 


` [४8, ्ट्णुलह कात्‌ धल ऋहधा््त०प ज वल 

8. {116 "61/11/1280 25 & 81716 वाशाः 200 एप्त 
 {लफाछ गा ०8 | 

| 9. {€ अवात] 1ठ 148 {10166 नकूलड गा = करः धप्त्‌ 
कब्‌]. 076 तव्यः तकल णत गिः [ड वाका पदयणनव९ 
पापहरः वदत्‌ 8 ष्मा ल्णार्पलल्व्‌ एष पएय्व्छावा) पतल 6 


पपठ ज [ड (407041८ अवाद्र(छ्ाक 8त्‌ 10 लहष्लः [नरण्ऽ जगा 


6-6 (लुणलव्प०णऽ त 9] 048 फला 19848 प्रललाप, शनात्‌ पल 
शठ लया 6 2०३ प्लणडचोष्टड कषा पढ शत्‌ पणातलय 4 जरल 
(वालः वच्डल068 116 ववि छपा ति ादएथरक्षाक्षा (1084, 9 8 
[धट वक 1140 ्वच, एठा श्जौलः लाधुध्ल, ४6 (मा 10 (10 
पठ ४ हमवा 09] कव 0906 ए एततप्धप्रता, 8 6 ल्णणणश्छत्‌ ण 
णवाषसपपणत, [ठप पथर्क 726 266 दद्व08 8६ € 
(्णपरपाक्पत्‌ भ द्वात 20 00 प्रलाः 108स्िभैठा सव्ललपछाक प 


 एर्व्पगश्त्‌ क #3 ‰8:. 


| 0] रपाणनणद्प्रजाऽ उष्यात्र, ` 6114 9 (४८ -- 
{€ "0 पुजर्॑ताः -017के षः 80८६७ 16 116 44112 6 1121540 


छत्‌ 06 ककव | 4 
~. श्ल करु न कुक 2एाकक , , 18 ०6 ग त जवल 
णुः 0116 एपाद्ठा8 [लका ताः क [च गा€ ग 0086 ल्‌ 1४९8 

| ए्छलचकव्त्‌ पातः ण 6 चलंलाह पल षत्‌ त० किः पडत 10 पल 
तली ग 8 कृपाच्च). [{ (गणाणला८्छड पप्र प्र मतु ज प€ | 
` श्छ 7०न्द्‌ जपं ण पला छईप्रप, 70 € णिता ग 2 08 (भो 
| अछ कणा पथ. एए प्रा6 6 अर 70 पठा कवा 18 ऽत्र 


20. 19 10420210 15 षएाञऋ€ व= वतदरहाा इशाञ्प६ ऽलाल्ञ 
1९०. 54 अत्‌ दधद181, 00 11, 17 98 प्र. (01 ०9८6) 41213020} ४०1. 7. 


566 त. क्ल ; 4 त क 14, ल ४०. 1 ए, 575-76 


| 2 | 


द०ण्ठ 15 एनप्‌ वाक्पा पक्षाः 6 3०० मि ५6 08, पलः6 1४68 
१०6 एलक्ल्छय फिफे शात्‌ एहपत्‌, [प्ट्वकर्त्त्‌ 9 8 08], 8 ठगारलाऽछ- 
{010 पाल {जव्रा8 [€ इप056766 ज {€ एप्प = (द्ध्म 7 #6व6त्‌ 
10 तला], चाल गाठ ध एलाल्मणव्श@.---रिलपालयः कह ॥16 पड 
` ९60प्शु011९य, वडाषाजपालत कत्‌ . द7100्नणर्ाल्स्‌ उल्छ्माऽ वरल धत 
46९0प्काप्& 10 ध, 44. 8011141... 6 15४5 त [तदऽ 10 पण पाद्व € 
वा{लपाथ्ण एल906 णिः 6 + 0त8 पुदपकडा {६ 188 एलाक 0प्रली | 
171 010 पात) प्र€ क माद्माक्राकत, वत्‌ पल प्श :--- शात्‌ [लल 


18 गीला) [लाथ शदषट्लााला. = (पिल6 876, 10 प्रललः एलक प्तणालछणह [वमल = ` 


द्वृता्र08 कत प्रालि(नुक््जाऽ, 0 व्ल." -लललनगालऽ 8६ प 
` एषात्र ज॑ 2 [जगाऽ€ (कानु. 25-25 7), ॥6 लव्ल्ठ कत्‌ वह्वाल्छप्रणा 
0 अकयः ग तल्छ्‌, [लण7@ऽ ऋत्‌ [0२८९३ (ला ब]008. 258--270) - -- 66. 


५/६ {छि 88 {116 कलृक्ि०णड (ज्र 15 (८०ा<ल€त्‌, {6 1868 
` (लिता 1010106 06 दत्ा6्व सिशत 6 फा | पडा 28 प्ल 16860 88 17 18 


८२३३6 ६४ ४186. = -परथाद्ातऽ च्डित्ण्व]ह | 9 #6 #किह्ुीदर28 ऋ6 | | 
09861080 8106 9) । 8106 (111 {108 2 € ७६188, 21710 0011 ९718110 ` + 


` धणत्‌ @1एद 1९द्सातह 816 1612060. = 1४ @11व06€ः 123 {)€्५ं @1 (+0010688 र व 
सिवः पाट (उि्पात) कापाल्स्डि 0 श, ¶6 गाल पपत चत्‌ = | 
ल९0॥ 120088 ए फपल 306 फांड© 0 06 &0१6त. [+ 18 (एरजाऽ = ` | 
87 00 8९68 ए३6त्‌ प्र€ पणर 28 8, 8866 १00२. = ५ 


81. "२९९00 16 121524-/2204) 7065807 त. प. पणा [§0 फ 68 :-- । 


"1116 125 2- ए पकका)2) 1६ पा] 06 ऽ6्ला११,..70प . , 15 601{605) 15 2. ॥11566112- 


` - ८०४5 (0121010) एष [ऋलपताहट) 7 165 व्०पाला5, 16 ललप्रल६6 9 8 हलाप्र€ = ॥ 


01212, ^ ६ ६16 82116 {1106€, 1६ 15 9 {00 प२,6त 2 क21 36६6 0 06 01510616 
28 28 हलाप्76 ऋणा चाल एवपद्रा त्‌ ; 800, पत सदा प्रहु 1 ववल्ग, | 
१६ ठ 06 5४56०८6 {1126 10 15 उपवच्छल्त्‌ ६0 एवाप एतऽ) प्रजा 0णुकग 0 168 | | 
12) ०0६ 0 1४5 ०९८५३. 9 | क 9 | 


& [व्यष्टि 8 उपव पणार, 1६ 18 ० कलृप्ञण्लृक्ग 80 कात्‌ 1८ 195 00 ऽपल]। | 


86041147 205प्ात1६©5 25 ध6 [ता3 274 11042. 1४ 35 8 व्छपाएवशप्तमा रज त्मा ` | 
 अंवलादणल प््लल्छः } एष) २८ 145 @ध-८६6 1४5 प्शलर्‌ऽ पठा पाल 7व712-- ` | 


` एल 1६ 2150 वृप्०ा6ऽ ०1 076 0त्ठवला, 16 86 2 ५06 एएषपपद्वाध-- 

` 1६ 15 ऽप05ऽध्वृ पलप ६6 प्ट एठा शात्‌ 710 पला लाला | ८ 1 ५ ४ 
एध 11060 56061215 (019 वा 5 ए पाश्चा)9 25 016 9 ४16 0०1465६, 711 86६. 

६16 (2 2८7214 56605 ६0 2४८ 10010764 0 ६16 42544 - 2त्‌ 116६ ६16 ॥ 
` लष्ा66, (प्र ए्रल्ला उप्ोत§ द 5 क ४ 31 त. 0. + 
 21--23) | । 


3) 


` ध्नुौ6 4८0} गा 4411110 011210,5> 15 &0 ९५ ]€त्‌ एल्लप€ 1४ 18 
स]7086त्‌ . 0 क्छ एष्ला दणफ्फप्ाप्लरयल्ति 10 कवा 0 चण, 
वल्लः प्रा6 आ0्टक्वजाः ((पर्वाद्िवः) गं फागु, वकष पल 2150 
{1086 ऋ परिधा पत्‌ रप्र, पाला 1; ल्0ङ्ङत्ता {0110 ४6 
ि्वणाद्18, पशादा कात्‌ प्रदतप्वपत. 4 1लाणषटी 11 दगणाला९९ः 
पपी शध) 18 एला ठरला 8 सिर्का फणाः वत्‌ वल्ल्ऽ 10. 
तलवार परल 05506 तप्रो त धल [षद पपत म प्प. 1४ 2159 
01लाप्0ाह व्वप्त्ट 168, @ार्छः आरत्रतलाठाः काः धल [ष्ठ्व्लःमा म 
118९5 ग .2०व्‌§ कत्‌ प्रलाः (०0800 वत्‌ रललिऽ 0 {16 लप ग 
(३१6६ (लृ19]६. 71) 804 ५6 इप्ा-लप( (लास). 3). --ए्५ € 05710 
10शल्य, 2ा€गणद्वाट्य्‌ शत्‌ एल्व्छातालतय इ्ला0ाऽ = [द्ल् कि 0 € 
एपा्प्वः काल 0४ पा1551प. 116 सनरब्ट्ीकक वालष्ट दस्पपाह 
11118 पात 15, 10 फलकलम+ 1४5 €पलुलणष्टतवा८ लाक्षललयह. [४ वलाप्प्पाक 
वृ्णऽ प व त10 सात्‌ €रलक प. +€ 10 इल्ला0ाऽ 01 (€दवु 
4 कातो चात्‌ ^ 30109" "ला (709 कात्‌ 0८110, = [का६6 [पाता 
धात्‌ 0क्रलः णव्लुक008 गं वला 11९. --¶0 पला चठ पड एलोक्मनपत् ९ 


`, @कलछलणएषट्ताधः 01 5 उद्धा6 [5 0600, 11 18 1010083 016 {0 सव.” 


| {6 112८४८५ (*1८/210व दाप्ा्लद&ऽ 6 आता 0 स्पत 
वपल (ल्वलालाऽ 0 कल्हार, 88 वृपर्जल्व्‌ एम. 6 ५5६4९८७ 


` [षह 06९ ष्टनरलक्वे ४७ एनत. 


`. (€ 518 28160 :-- 
ईप ! 06 शष्दल०णऽ आन्य) (0 ध्‌] पह 0 पए 181६९68 वपते 
` गलः 00३68 @6 = (गाऽ्लह्तव. = 4150 दपण ६0 पड पधा 13 ४ दऽ 
061 ४ 
॥ रिप्त॥2, 16716 --(1) ए1ए्ण, (2) 41, (8) सथ्दी{19, (4) ४156 व 
` प्रथा, (5) व्यि (6) दरद्वाधत्‌त, (7) दरव््ाव४ (8) भाड्द्यः३६, 
` ©) णवा (10) उसाणद्च, (11) रषदा क्रय, (19) दै वातीएदा 
` (13) दिव्णानव, (14) तु (15) सपण [एहय, (16) 4 प्रापतत्‌ 


तोति ििितमाततनिततोानोिि 
ति 


82, 1. धा 0 0660 ध । 
<->. 60. 111 56000८८८ ` शकत (1813-9) गात्‌ आवक €, , | 


५ ४ | 9८८5, 40. 41 ; 19191, ए 4. ष, प (€, 1901} 


1 ॥ | > ४11.) ^ एनत 2) 0 15 0 वपवा2 ४1012 पए) ए. ८४. 


1 83 74८ (वव्व्दव, (व ए & (वप्वृत्थ्ः रज कप्तौ, (2 
` थ८्य 50065 ‰, 4८ 5, 64. एङ धुण ए. 0. एकप, 1. ध. 5. एणा, 


| 81 | 


(17) दपा, वपत (18) एध 86 च्ल वीर्यं ल्ल्य लललम 
0 116 भक्रःप्विड. गत कका [8्त्‌ सकुकषस्व्‌ पर्थी ४6. 
४ द््चऽ18 10 16 10 ४ वाश्रा णण ; ९-4 


## 111 [ प्रा] छक 16816 10 एज, 


116 4411-0 [181 ° (एलयाए-0िष्ट = भर्पा0का भ प€ वला, 


4१८०१९५ एर्ध0"€ 18 10{6न768द ` प्रह : 


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116 ९003668{101. ग {€ 1118068 0 शहकिप् 87 006 ' 2०05--(1) 


1 [श्क< शुष्लछत वलम फा 06 [पप्रलणकछ ग एत्लाकाद्दछत कात्‌ 
रिधर 8000018 ग [गरणा फलौ 06 वृच8त्त्‌ र 
{16 -[प्रााड = प्ातलः एला वार्विलिला 06668 88 = ता5ला88९्त्‌ 
116 {01101 00018 0 त्ा8, ए. ; , ध 


84. 4121-1", ष्टु. {1036 धका], एष कि 12112120 प, €> 
1903. (गध्या +र | 


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1610. [४ एमा ध्ल्वा§ ज ७25108४2, पिव वात्‌ सप ऽ ज | 
0ा8[1]0, ४ 215 प्ला€ 2 (कलात्‌ ज उवा [6€वाा्ह प्रा ६06 भवृष्ण्व्वत्छ । | 


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061051४€ ५1015101 4 {116 7 प1211251. | 1 


2068801 ४४11801 प पला181{5 01 ६16 &€161281 लान्व्८लाः ज धणऽ ए पा)३. 


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 6005ध्वृ्धलयङ् 1६ 025 20 ल्या 170 16 ८0 वण. 168६ - क्वण) अप्राठपद्टुी त्न 


{€ 205ला166 ज वफ 0६6 फाशलल1418) 1६ पणाह11६ 26 ए0छपयात्ल्व्‌ ल्ल्य, पाद्व | 
70112108 2 हि €८6एप्रजा5, पढ < कशता आरव७0प, = ठा 6 20566 ` | 


2150 ०१ 2 ल्गध्रणर्लाऽंश्‌ ठाः ऽन्वा अक, 1८ 15 एक्छव्णङ् वण्लान ६0 धट | 


50163 ६12६ ६0० 1866 ऋ 8 अरव ` 9 (लणफा168 ग ठप लाद ए€ाफएल्लया) 116 


8६. “(€ प्लत शरवद 5111065 10716486, 20 116 404८4 2- | 


। अद, फिला 15 06 ग {1716 5६21021 7लाहा0पऽ ०5 प0नतापह्‌ 116 ए पाला 
` 9 € एला 2६9 80700 ज. 1110800, 06165 (€ पला 28 = प्ाल्वाााष्टु | 
 ध6 ऽप च्छव] ग धल ष्ठ तकाञधपलः ऽना ण ाज्लवद्ल फल वणल ण पल 
 छर्व्लाव्‌ कठतत्‌ त०्पष्टीष ठाः ऽल15@8 :-- = - ५ 


राच ज्ञानवचनं ज्ञानं पञ्चविधं स्यतम्‌ । 0 
तेनेदं पृञ्चरा च्च प्रवदन्ति सनौषिणः ॥ आः १।१; नारद्पञ्चराच्म्‌ । 


[ ॐ | 


(1) †7€ प्िर्दतलाते प्रण, प्ल 35 6 षस तेत्‌ कण्ट 
000र {6 0 पलवार 1101, (८) ल (वात अला) वपा), 
` (32) ध€ छतत वृत्तता, (4) € तत्पयः वापी, (5) {1६ 

ए्यणत्त्‌ तपकि्ो), (60) धल दवाव, (7) {€ तततो, (8) 1116 
 दिदयवतीय पातवा, (9) (€ दिवपुलपो) प्रत, (10) € इवपताकुच 
(वाणा, (11) ॥€ एवसएवाप्या), (1१) 116 दिरयप्याफा), (13) 16 
 शलपाशत्ताम दृपरण, (14) तल्‌ एवसु), (15) 016 (वकयाद्वष्टाः 
पताका, (16) प्ल सकारा), (17) वट [रत (तपा, (1 1€ 
(धातत वध्र, (19) धल रि द्वाद्चवाताो, (20) 16 ~ पिता, 
(21) {11€ 2 ताध वतप, (22) € ^ पक्णवकुप्य, (23) 11€ पा 
[वदि्ा, (2) € एजपताीवर्त) पलार, (22) 116 + एरक) 01 {16 
` कणत ताता) पकाल 15 5 अताजु0ऽ 0 (16 ]€वलवणट् 00९- (2). 


[शु ग {1 कक 100 लश्लिका5 कीत 18१८ लालू 7 विष्णा 


भ 


६९९३ 870 1116 दका काऽ ्प्टनृलसतणाो एलसप्रााट सषाष्ला( 


तात नक त ता ता ११५१११८५ ता ५११०५१११ 


1६ 09 96 52 2556160 [लाल 18६ ७2308४18 065 18 017 ६0 (18 


| , 86०५] ज एा०इनङ, पिला) पता प्ल अत्‌ त इल्र्लाःव ऽपडल्तृच्ला कल्लल्पठाइ ज 
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पव्र(प्रा€ 370 0का०0) ज 115 तात 10 न्ता ८७, दव व्ाद्लत्र8 

0८6 वृष्ल्ञ[लानल्व (€ ऽ0पा्ता1€55 पपत नप11लवठरक ५ 11८ 1€ा&{8 त लो ९8418 

` 8०1५५, पत्‌ €ष्ला अ्लणाल्व ४0 ०४ धल तप्ल्मापु्प्रप्ष णतः, ६16 
एला न (ल प९व०. | 


(74८ 1212-8 2--2-2-42) 2-2-44 2110 2-4-2६) 


िपदपपु 9 [्जकल्ष्ल) लात्‌ 8 लठप्तभपु एल वत्‌ वप्जह्त्‌ 4०15 पठा ५06 
1207 01167813 311 उ्ाल्या ६वा्25 {0 5८ 12६ 10६ 11 (16 ८2 €द78{78 5८11001 


लपन्तं फण ३6 ४6 61166 प्ल ज एवात अप) एप 


2 ६३5 वृर्पाप्लि उप ्वापठपरङ एतत ताल छण्लक्छणऽ 9 116 ४6088 116 116 
सन्म पान्न फपिल् ६0० फ तलाठप्ातत्व्‌ एर धवपद्नवाद ता वल्लव जा 
. 18 6६0० :-- | | | 


सांख्यं योगः पञ्चरावं वेदाः पाष्टपतं तथा । 
किमैतान्यकनिष्ठानि परधङ्धिन्धानि वा सुने 
| | त ` एवमेकं साख्यवेदा (2) वेद्यररकमेव वा 
परस्पराङगान्तानि पञ्चरायन्तु क्य ॥ 
ध | सांख्यं योगः पञ्चरातं वेदाः पाण्पतं तथा । 
ध ` आत्स्रमाख्छेतानि न इन्तव्यानि हेतुभिः ॥ 


7010 1088 त [कता0ण5 1 तिजा [ता 06 दद्य 18 
ण € (2८414 44415 8 = (्णणलृपण्लृक एष्णएव्त्‌ 10 ६ 


7016011९, 


^ पि 0ष्, 11 {106 ९886 0 1116 दौ 2118; 11941010 11111005 


006 1100त7ल्व कणत ल उवप @5 204 111 8. क्त, [68 प प्रप्8 
 पप्रएलः ४6 उछ्ाश कपाः, सप्ला 15४8, ९० पल फा 6 
8806 पप्रा एल" 108, ६6, ° (0प्ा'इ€, (ला ६0 इपशजलन 


16 {4९9 = 10 फ्€एला) ना 1006 9 6 कर्भाध्6 168 01 


9व7010्धि5, - 1दृप्रताणट 0086 फला [ललात 0 &रढ 108 पशा68, | 
2प९५] $ 00108 0 {118 पाल 0 पा धी ग प्ल) काप्ाालव6 धप्ाल 


11016 11810068 07 [©8र, 18 06 1111 {61102 10 तला चिठा ; तात्‌ एल), 


88 18 1116 88९, 7 (व पिप्लि 06 अठका प्राक 8 11811 
1116 {ल लापफरलाकलत्‌ का6 ध्रा] चरसद0€, फी ० 8 शकि ज € 
065 816 {छप्‌ {0 06 वप्०ष््त्‌ मा उप्र क्ा8९त्‌ 10 6 [वल [लकप्ा6, | 
47त्‌ प्क 8 प्रापलाः त उवप प्ररला क्ष< 00४ लृपतह्व्‌ 10 क्षा 0 | 
€ 1518, ९ अतलः ल गः वु्ठ॑ल्त्‌--्ला 06 पथत्टरण प्ल [भला = | 


(1 10 1008लाः € वलणाल्त्‌. +€ [र€, ९०१56व लाक, ९०126त 086 


1808, {ताः 10 श, पत्‌ फ्ात प्ल) 8 तधि [8६ पात्‌ 1 € 400 | 
एप्त, 804 88 2 1€5प( उरला € --"{90€ 1 पला भर {€ 07068" 


18९ छा 8710066 [1 21002068] कतल 


` € रगु] 1180" ° "९0001868 106 12068, {€ 115 ण 
एष्व (18.112, 1 म काह 18105" 141, पण धक" 
152, 2410101" --34, 20 84 0पा०त 10 ६16 8011 क्वाकृक्रर9 ग +^ ह्णा 
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^ 1] आनानलः 115६, प्थछलुक् प्म त 6 वन्यान्‌ ति क्राव्ता$, 


0848 1101 ॥९€€) {व्त्ला 100 8&6९0पाप 4 


(6 [ल्षा6 ग € ्द्ौदवाद्व्व8 [6 नाला ऽध्ज॑क्षतं्ण 
{ल ्प्ा€३, 9118 1६0 ॥प0 नवत्‌ तांशं०ा8 वनणकतंशा1द लशुतल्लएलक = 
| र्ण फण त 1080164 ठाः वाह गनश कत म [पाक्ष व्त्रठाइि0 | | 
06 [लः तथ" "08 करली भ 086 816 2116 ४८4॥४ 80 1704004 ( 
` आत्‌ ल्छाशं8४8 ग 0186808, = (गलाकल8, ल7वटा8ि शात्‌ ईती भा | | 
 अत्छथ्‌ अ्रत्य5, चत्‌ ४6 प्रात 16 णलः तुत्छञ,-"त0ा8 6 | 
` हिवापप्ष्ठः 0: चव्णाणुप्िगाऽ (उ०पाकएलषता)) पक 18) पल] फण = | 


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तल्याण्, "गी प ऋपााएल ण (नुटः न वट ०, ग € ल्ल 
पात्‌ सल. 
९.१... {16 लुपं इतस्त कष्टा वआ प्र6 द्तल्त्ह 
6 इललौ0९ श्तल)ह श्ल] [ण पव #॥ ल {6 वारत्णशषः) ५1६ 
{0110 का © :-- 


(1) 10:00 ; 
(2) [पटपाः८ 0ल्लातिहपा (मतेः ; 
(3) गुल्फ ज प्वहाल्‌ टिपाष्टः (५८१7-7) ; 
(4) नि्वलौल्य १११९८ ("7/0 ) ; 
(5) ५०९१ ; | 
(6) “€ पाता (काद) 
(7) ष्टा ( [11600111 ) 
(~) {01116816 छ0शलाकतीललः (+20151द 11, 21011144) ; 
(0) ‰छन्लंघ्‌ प्प (घ १1 द4/101114- (11101411) ; 
(1)) णाा< †सलर्णुर 01 0): 
411 €्सपारशानाो 9 {116 [लात] उपद्र, [वलत्‌ 1 प तिल्य 


त्प, पा] स्वा] आतम {€ वठ€ पलद्मानाा0) ज प्श 9 {ल 
11.81.118, 1111 


[ए € ल्मपठप वपव प्रह वहलनुणलफ ण पल एपावाण2, ॥€ 
एिवरा८ पत्‌ 6 ल्युट + ज ताय, ---- ५€ {८120 
0175८ शात्‌ ॥6 = तक्ष्व (5(थ) 62748, = ॥16 = कतत ततर वत्‌ 
116 < 4411145, € (7015 वत्‌ प्ल दीद, ९९, 
 [्धष्€, यकन {€ ग्द्नाप्रव लड त्वह सकि ल०्नप्ीठ8 

[षट प्ल वश्च 80व्‌ (16 ततता, तात 0 149 6 फलत 


{५ छा], 106, ॥€ छप ज [६८८ 0 पक्ष व$ तीरया 0 {€ विल 
80111068; 11616 | | 


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ताता तातान 


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` 87. न. 26. 


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(एः एषापरा एण 


(16 [कु्द्पमा ण वल्ल्य एताप्तगाह ग चल एिवपशतप वलयड 
01 1१८ (छ, 4412) 75 0९8 प्रा प्राक्याएु ताला इल 


प्र 1116ु 416 0 28, एल इल00ऽ दोक्दरयल 


1106 19022९6 15, 0 {€ ०06 26, 00806 @त पि] त (ल्वा 
(1168 ; €ष्{व्काल्छतड कात धल 81865 ज लपुामाक्षणान लजाप्रााला{8ि 
वात 1016६ साला का€ किनपावलुकर 80 श्पाातृद्मा 1 6 ९8 कपाल 


{1व0165 ग [ताद [कलाक पा€ वा 88त] फ (8101098 111 {16 ९8868 9 16 
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हश्षप्डलत5 ग (1686 षणालालउ ण दिवा, ३16 प्राता दगापु0 छा 


3 प्ाक्नपषह्त्‌ 5प्य& तप्ड, पर०६ गक 0 च्ल 1088 ज वा प्रतारः 
६ 21६0 8100 गलः 16880085, 10 {€ 1प्तार्लिट०९6 रम ध16 लावणः 


लाडि शात्‌ शना58 प्लइलुर्डड 10 06 [लिन ए णवऽ 000 (6 पन्य, = ` 


11616, [0फल्एलाम. - [गलकथ18 आ = पाणितपाका6 शात्‌ (दटटालध्यणिह = 
व{प्रि्ात€ ग पात पला 10078 कठ परा 6566 लालायिता वरक्ााला 
६1 क्ा7808 10 कट स्वाषततल्त्‌ 00 ऋ, 100४6 कात्‌ एलालदषप्िठा छल 


(शला) प्राला€ फल 10 लालछपा्लााला5, ॥्6 88ा6त] तुता म ल्लूभषट 


णु {0 एथशालाक्रालषञः 106 14068 ग [प्रताप शीट | प्रवता | 


ध]1१९, (6 = छद्मा = त्राल्गजद्ाव्याःः दष्ट वकर त0क्ाा प€ शा 
वत्‌ {16 ला्वीहाला०, 116 9 111दत/4-4त/"वड = 8ए६ = लोप्ालया९्व्‌ 


88, (00०2 नदद छवयवाद दद त 02, 4, 1 0, 
7129040, = (किप 8 15.) (०ल्€त ए € 18६6 किरणा. ऽवचचतीशावाव कषा112), 


071 धा [वपदकूपयः प्तप < ८व्वल्पाफ) खखिगोन] ।* (2) अर्थ, शबरुशरुाम्‌ वुङ्दिशं 


शून ोख ररत मश्वृलैख । वीमटङ्ण्टय (७८८) रिषत कुक चद्वाल्लि। रविर्‌ ` 
 यद्घ ¡ शररत (द्रौछ, कखन) । नन >२१8६ मोन;७२ याब । 220770८4. (वुक्न्‌ तब (यम्‌ । ` 
मन >००० मोन । “स।ख्िट्कोगूपरौ ७ कोलिमकघब्र ” यीप्दगैमोशव शोब्दब्र॒कर्टुकं गङ्षनिङ | ` 


कृषक स्च । सम्‌ >२०० मान्‌, कङ्न्‌ | 


( ॐ6 ) 


€ पालकः 8100 ए 16 का-धा0व(ह, दद्द 5 ६1५ 
‰28९818.5> | 

५१4, इल 16 ०4/५6 5८9८710 वात्‌ 116 त, 6८, किला 
ष्<€ ४] कलुर्णल्त्‌ 5८४ ज [तवाक पप्रिः 98 वलाः -जाप्रतलाः 
०४९ कलाः का ६ त्प पराक. € [त१९, ्रलरल०्ट  ॥ला€, 
वकलः 86 का कका [वा्रत८स्छः ग [प्रतार लापा, पालौ कपत 
{10८06 उल€नछप्ड दवृप्ाार. | 

पलार लक्ग्ह तरलता वाट ए ण वल छलाह (71 - 
57 कात्‌ -4717 तपतत) {0 वास ९ ए०णः 0िपपतश्रप्िठफः+ 0 €1&{1132 
३4160 ₹उ्रप्रलालः ईप्ला उ5 11€ तल्वालसछा त कव 1028 रा कछया 
वल्ल 00 {26 [क 0 {€ वला, 2/7 प/तप.०० = र क काप्रडट कात्‌ 


तिति मिनि जानि नम ०११०७१५०१७५०अ१ 


“सूवघरौ दिजानान्तु शपेन पतितो सुति । 
शौ प्रद्च यज्नकाष्टानि न दष्दौ तेन हेतुना ॥? 1; 3 
“निग्ात्‌! यद्कष नष न्‌। कटुत्‌ लुक्रटम्‌। 
मृ[टभ ग्त्वेत मं भडिक 4 काद्र!" 2 
“व्यक्गि(ति) क्रमेण चितां सदयथितकमर्स्था । 
पतितो ब्रह्मशापेन त्राद्मणनाच्च कोपतः ॥? 1, 2 
शरभुत | कमञ्प्रि एिलट्तदद छनि श्लिक्ट्द्‌ | 
{शिं भिस कद्िन रि्थ॑वट््‌ |° 9 
98. , पण 6वव016 866 ४१6 वका जति वावा, (55) वदप 
ण प्णपलाा [१6 एल्ला ८8८6 अत्‌ एप्फाञल्त्‌ 0 च€ पिष धप्ल- , 9, ररि्ावपवद्या 
8 कषा ; (4८80 ्-- र -41005 व<, 001२5 \०1, +, 27. 8--84 
90०. तथा हि--ग्रौगोपालमदटक्रते “खौ इरिभिक्तिवि तास" १८ विलासे-गीमूरचयाविभीवमाहा सा-- 
'विषुर्मौ चरे! दवस प्रतिमायान्त थावनः परमाणवः ; तावद रैसडखाणि विलोक महीयते । 
तथा--श्यौ इरि०-- १९ विलासे--पौमूति प्रति्टामादहात्-- 
माछ । प्रतिष्ठायाः सुराणं च दैवताश्षनुकौत्त मात्‌ । 
| दैव॑यन्ञमद्छवाञ्चौपि बन्धनेन विसुचखते 
तथा--स्तवंद्भाषित-प्रतिसालकच्चण -विवरण्यास्‌ | 
| यावन्तः परमाखवो भगवतस्तु पेषु शिस्वषु वा । 
तत्वात्‌ दिवि भतस च नियते तावन्ति--॥ 


 ---रुषदोऽदखिला | 
9 भुक्ता च सवे सुखम्‌ । 
प्राने जग््जराविपत्तिरहितं ` 

प्राप्रोति वद्धं पदम्‌ 


(भ) 
0411602 18१6 णश] लल &1006** शुत्नगादशौा € काा58 अत्‌ 


25706 = त्ला१६५ १९३) = वपवातप्ञाङ = शा०पट), (दला = $ १६2९५64 
{00811018 10 800 


{008 € [ट्छल^ए0ा 0 614८ (लक्§ 1 116 04168 ग ५6 
0नण््तवा स्क क55 80 दार्ध्िलो 16 फए€ा€ 1007र6्व वा पुमा, 8 
06860 11 8006 कालाप, = एषणाः डया कात्‌ [पु9888 1 6 1188. 
व16 {नपाल 8९८10110 ९117075 रक (०ाणा०551017. वत 0 8 शिकत) पाके 
96 वपल 0 10८ 50068. = (0ल्डड वात्‌ पात्र [रल = 76कता0६5; 
ऽप]00ा्त्‌ 0 उपाएडनि#2 शाठपात्‌र, (वा) 06 5प्६९६6(6्व्‌ 1६ 18 एत 
2]0क]< ४0 पलुल्छ गृच्ण््लाालः पा€ जप धरास्र पट प्र्ल्‌ा एल्छ प्राह 
वाणु) ग तवता पापष्टा ३ 10 आत्ल्छ्ाजा ० एलालाक्रग8. 
{४ 18, पलार्ल0ाल, एला प्द्टल्डडदतक {0 श एलान लप 6 गुणा 
(०0 शात्‌ (0 ्छतालठाक 16801028 ५1 106 ला16 लनल शुणुणणद््ाड 
2 फा ताऽ{060881*=> 

410 प्र €1 1{6'€ 18 8 @1€द्† [श्ालत्ति क कादातद्हि 1 6 एप ण 
138. 28 18 {06 (व86 पा 116 लड = {€ = ८एकवना 
.2101101101001010, 1 18 06८्ल्छडदयाप 10 0ानाप्रो्6 80106 हचालाव [कक 5) 0 | 
६0 वल्वप्०€ इ०ा€ [पप्रल्र् {0 पित्पा€ हवातक्रा८&, त षणु 2 लत्वम्‌ 
९011100. ऽ९्८्छपत्‌प+ 1 18 2150 एक पाला 10 तलट्णऽ€ फथक६ 804 
68118, {01 10ंलनु7€् हट 116 1लस8 ग ७८14, पाला 9] €््पल्ठणऽ धव्‌8 
216 80 1108९८68881016. 


0०१, (006 विशाता्ल्दरक्ा2)5 4640 (1८ १.4. ० ४6 
6८ पद [प्त्ठ्त्‌न वदवञन ०७ 20 [ाप्ञ्ठप्जा8, एए धद्ाजाप० दय 
(110811., (¢, 5, 5८-7८5, 9. ४ .); [शन 15 ६] < † 09--119 (2110 2.11. 
1121191} व्क 0 
पजा ० 52/1८ -दकेड+ ९६८.) = 2180, 1४ 28 (00896 ८0 हार पप्र्ला0पञ | 
€221111165, ग ऽप्८ €पा८द्् | | ( 

92. 1४ ए०पुत्‌ ०६ एल 0ण(ः ० (146) ४० ल्प 026 066, ण सदवपा6 
{16 प्प0ला5ऽ€ प्ल) पणता 6 एण्ठ्ञलणौ फणाः वर्तत्‌, पि ऽपणुल्लवह 
ध1€ एवल व्छपिप्ष् 1601185 ६0 264704८ 20 0८4८1666 
638, €{8€प्11€16, 91116 एलु 9110& 115 लतातला ज (116 पगा ७4८ (क्छ 
1116 अ ्व(दक-150द 16 वरव 50८ 95 7९) 
7१0. 48. (02168, 7933} | १ 


प 0 2 1006688 16016 200 व्नीपिऽ6त्‌ ] पप0ा6 ज तद) (वापि उदायत | ५ | 
2710 16066 लीग लादण्‌6वै चल एकलः फपल) ४0 तल्पप्त् ३ फपल = 


` 65६ 11001६2 (प्ल८ह" 


({ 38 ) 


{9 056 20810 ६0 {€ णठः ण ऋ्टपूणलस्धएप्ड, 16 ता 
11020 9 421400८ चत्‌ 17110050 62145, ए पडा [न्प {6 
50प1€ तलः, {0 ४656 < वलः, 00. 

^8 {116 (<17/10) द तडा 1८ वा (लद्द कफात्‌ कहल 
1400६९९, 0 ए१०ला (णकष्टा0र 07 [वनिवदवान्त्‌ ललातवदलार = दप३ 
816 एतानत्ा(व9€. सादिः 1 प€ त्तस प € 47) आत्‌ 
¶ 1.1.111 

016 ग € प पपा परं उ्लतात्‌ 0६ क्रत, कश € 88 
00 ~ 

(५) 0 2 पटा द शछपात्‌ 06 गप्रकात्ति ठाः एष्टा 8. 04 
{7 1[€ (1/५) {का व {€ 12114" ८२1३ 

मात्राखछाववो नाऽनुमन्तव्यो बास्तु-रिद-तन्वसास्नादिष 

()) ५६77 {116 101४5 जदवत्‌, ५९ र0पोत्‌ त ६ वल्ल्ण्प {0 
चतं [काकाजास्ट साफ पुवान्छाौ दणतक्रतलाजा $ हला 26116 01 {11€ 
१€{३ ६1€ 16६ (जपा्रवैतालजान, ताह दे 06 (छप्सवलष्व्‌ ६ ॥6 तवष्ट 
{0 वरह्लल८& 10 वल्ल्लाञजर, एथ्लजा३ 0 †०ाल. 

| 
सति भिन्नवाक्यत्वे शाखाभेदः प्रकरणमेदो विषयभेदो वाऽवगन्तव्यः | 


(९) (णचल्टाछपड 870पत 96 (्ह्तप्ट्ल्तव {0 धह कणप 6. 2 
[€ श्ववाप्छप ग ध -44इत, चर चदा" भ" 1111८11. 


स्तोकमाच्रा संुद्धिः ¡ योगोऽकाराऽनुस्वारादीणाम्‌ । 
(५) ` 70" तललतापा02 1176 लकल = ल्वता795 10६ र = ६116 


116८६] समाव ६16 शा्तारवत्टवा लगाडातलद्षप्त0ऽ 80पतात 96 एट्रशतल्त्‌ 
18 [00 एप ४50 ध6 [दासा तक्ष च ववृत एष्व 1९. 


ठनिणये छन्दोव्याकरणवत्‌ प्रामाण्यं छिपिशास्रस्य 


| 3681468 {686 पा छदना नालाः, गीला" 1ाुठा्व॑ता# 00६8 
119010६ ऽपः प्ल ६6]ए९ऽ 01" 96 6१०1१66 


| ` किण्क प€ ऋः नरपत फवलुर्‌ 10 आल आफु वु्ट्सत ण #ल 
 ्ालि0िलदाला ग प्ल8. 4.5 [धः 0660 81६64 006 ६166 15 ४ 2८१ 


` एएव्पर्ल् र प्तऽ 0 सपुव्पाधत्रणा, (लाला, 10165; 80 व" 88 00011 


 #€ (€प्द) एठः चत्‌ चल वाद इदसढ छाठ द्णट्छपन्त्‌, वा = | 


( ॐ ) 
लाक ० = # € {0686 शपु<ा8 ऋ€ 9 80 छलतः 10008066, प्रादा 80016 
16111045 एषा 10€ प्रत्‌ जा [07 ४16 दणनह्छं पाातलसमाता1& 0 11636 (सा8, 
जिधर 000 [लाऽलगाध््‌ लपुश्टतलाल्ल 6 [ठौ पणिः ल्क 
९010060 एल्व्मपापलात्‌ {0 एलाकु लल्षा 16111005. 


1. {116 8६ 116{/04 18 {0 (001040८ 45 410406व्‌, ©", 
१1444९0 (11८ {0 ८0१०-८, {060४ 44४॥ 4004 ८८40 | 


ए पपरीणा), पड 06 पकतृलऽ०0त्‌ आपााक्षतप्त 48 1९108 68860९९ 
810 जाति वत्‌ [ठ्ठ 10 [ना ग प्रप कात्‌ 11966. एण 
{ल€6 ठ 6 110 6 (म्पः0णः [लफष्ला आिल्लड पापल [दष्ट 
00 {नोऽ क शपोदातत €. £~ (नष्टा ध तजप्ररछ कात्‌ 8 काप्रशा-0रः. 

२/९, अपपाद) 70 6 1086 परमतः 1व्लोातां ला] 56056, 38 
९0764 88 ग10 कऽ :-- 


तद्धिन्नत्वे सति तद्रतभूयोधमेवच्वं सादद्यम्‌ | 


{प्र० ग€8, (उपदा) {< 06 ताला 1 [लु [वट 8 पीदलण। 
प्रा0])€ा' ० दपा लाद्वदरललारः768, 1001200 06 गद्वलतं च 10 
ग< 688ला९€ ग अक्क, ९2.६0 18 ॥018 (गाठ लाशाव्रललनऽ | 
(42011 11/4 (141110व | | 


20116 11018016 €्क्ो]0168 ग ०निुल्यड पप्र शाला ल्जााानी 
{68{पए्168 216 {116 .400111101/4-1045६45, 116 ४ दट1/-0(15{05 07 42100045, 
116 51074545 ऋत्‌ 6 17100 णकः) = प्पुगला कक {6 
८०ाणकाल्त्‌ प्रा गा6 वप्जौल. उपा 1 पणात्‌ € प्लु ए25{6 
{17116 घत लाल 10 चक 0 (्वपा्ा6 6लणद्ूलाल्यऽ 09€ल8 चत्‌ 
उप्र} ९0ाका8008 पा 06 00088016 एल शु) 616. 916 [कलत 

[. व76 इद८०्णव्‌ कवयी ११८व्‌ त पदनूुणरलक्ीठ ग ०08९6 
10838286 18 10 {10८८ 686 04८, 1 0३७0161 1 90101८८ 6001:5. 
एञुल्लंशा्, फला फ€ 18४6 10 १0 प्या (कपपुतराक्ामा8, (४९ 18 116 0486, 
स ॥11 116 ली एजृ, 6 कक्कर 01014170) प्ट) = १6 
1986 लाप्रप्लङग गा लवाधालाः [68 1118 171600त 18 एलका सव्ठष् ; ऋत्‌ ( 
18 2 0066 द०व०गष्त् € 8904 व्०ाणट्छप ; 0 9] लाा0)8 छा) 6 = । 
11105 0[6९८€त| ॐ 00166 कात्‌ पा) 20801८6 (लाक्ष क 


(णाक स कम; 


93. 36 &पपव110109{{2*8 7 271९054170020 ् ५. 
366 471, एकि पष्ठव्वाए [भदथ ; 22/00 (0 पाव 9८, §ला168) | ५ | 
9, ४, सादृश्यम्‌ 


( 40 ) 


एष पला ]7लर्‌ {0 धल छाल, १४ 160 चाप [त ग {1९ 
11776 {€ ज प्ल लकष {-12/110090/1 (0पात्‌ € णः (८६1८ 
111. (116 [पपप्त्‌ त्रफ6 म {€ वरस 0 {16 [टल पनः 045 
पार्राद्राणवलक वलवत्‌ ४ ऋ) 00६8}31€ {0 {1१८९ ०16 {0 1086 €ष्लश 
02886 ४ €] इप८८टः5 = (एष्ट आल्‌ वा कलत वद 
1101 {6 11901008811916. 

016 {0 8]], 0पाः 106 0 प 0ा {4९6 {दलो तवललपप्ल्व्‌, 
०10 {6 वषड त्व्‌ पिलत 16186त्‌, प€ ल्त 1010८त्व्‌ पा दष्टलः 
 {ज€ ज 1606४, 10 दुध {116 नन्द्य €0;#0 0 {16 ८ 
ति 1.17 1 1 . . 0116161 0 11€8€ 810\& 
एप्ल]1€ः 10 ९१५६१९९, त € 11601105 ग -पलनुगलदित्ला)ः फ 
1१2 ताद पदर, (णप ल्ल पालः 27] वरूपाण्0िणःि पविता सा {01€721॥ 
1218 स्]} [€ 16व६९९त 10 कपामक्पपोप, १[7160ष्ला, पत्वा [धः 1110९ 
86०९ {0 के$ गाल {7 {€ ुट्लप7स्ल्त 11111 0 स{पतद. 

 पूणृ< पक्तल ज कालप्ल्मण्ड्टु कफ [सकाकु क {00 कत्‌ (५ तपम 
 {11€ +*८५<1 ८४ | 

(977 ॥@€ ॥ १1 1 पलत, 1६ फछ्पात्‌ ्रठप्र € का), 
{0 तास्त 1116 (लपतः त 1116 1) 41711171 11- 0101101" 20". 116 
10388063 11191 1 दत कपप ३ 8१८ व्र 10 पट [शटस्लपा ए {ल 


स क 


` [ 41 ] 
(^ 1 * 
1018( 0 07 पा स^. पाहविचार 
(१८11211 11/1 11114411 (111, 
प्रथमोऽध्यायः | ( (वलः 1. ) 


<10105, 2, 8 (0न6शु00त्‌ 0 114 कन्म (1141), (पूरय 33, = | ५ 


 & ५८५5 8, 9 


` ९. 4 (०तल्छगातह 10 1141.; (11. 38, 8. 10 
&. ठ वगनछगगणतः 0 2111., (1, 88, &, 119, 128. 


वण्डोपलेन कव्ये) ब्रह्यकुमंशि(ले)रस्त(सोथा । 
प्राल्तादाऽनलङ्कण्डादि कमे ङयाद्धिदक्षणः ॥ ९ ॥ 


यदि च “'प्रासाद-तख-कुव्यवादि' पाठोऽपि दभवत्‌ तथापि "प्राक्षादाऽनरङ्कण्डादि” पाठः 
साधीयान्‌ इति मदिरस्माकम्‌ । 


<. 8, विमरूमिति पारश्चिन्तनीयः । मन्ये--““"सविष्टम्‌ः' इति भवितष्यम्‌ । वणं विपर्यस्य, 
सकार-मक्ारथोः परसूपरश्रान्तेश्च स्व॑र अदशेपुल्तके सम्भवात्‌ । मयमते “'्नविरावयवा? 
पाटोपखम्भात्‌, खविरुरिलायाः प्रतिसादावनुपयोगाच्च । 1 


अपरं पारिभाषिकं 'विमरूमप्यस्ति । किन्त्वेतत्‌ विरेष्यवाचि, न तु विशेषणम्‌ । एतच्छनब्द्‌- 
स्यार्थह्तावत्‌ °विष्णुधर्मोत्तर,, वृतीयलण्डे, ९०अध्याये द्श्व्यः । मन्ये- तदुग्रन्थीय-३य-खण्डस्य 
९०अध्यायल्य ८,९्टोकद्रयात्‌ अस्य शछोकल्य च उद्धारः कृषः । तथा 'विमरू-पदन्याख्यानम्‌-- 
अग्राह्या ज्वख्नारीढां - --- ॥ 
-- ~~ - --- ॥ & ॥ 


---- --- ---- ॥ 


तिरः सम्भूषिताः या ठु विचित्रेबिन्दुभिश्चिता ॥ ७॥ 
रेखामण्डर्षङ्कीणां षिद्ध विमलसंयुताम्‌ ॥ 

विमलं त्रिविधं जेयं रोषं कास्यं च देसजम्‌ ॥ ८ ॥ 

या रोहविमरुजंश खा जनक्षयकारिणी ५ 
काँस्याभविमलोपेता जनसमानविनाशिनी ॥ ९॥ 

हेमेन युक्ता दुभि्चं तथा ऊर्यादवप्रहम्‌ ॥° 


विजः सन्दरूषिवा' दति वाप्रादः। = 


+. (3 ` 


[ 42 ] 
<. 0 ल्छागण्छः 1200141 १ {0 विष्ुधरौत्तरम्‌ + ३अ-खण्डम्‌ , २१२३ शोकाः । 
वेत पन्चवरणश्र कुखमोपणसद्निमः ॥ 
पाण्डुरो युदवणंश्च कापौतये श्द्घसन्निभः ॥२९॥ 
लेयाः प्रशस्ताः पाषाणाः अ्यवते न संसयः? ॥ 
<. 1:5-194 लजासपृात्‌ (3 (1१1110८7 (७), (त 
11200. (त 11), (६, 45 ५. 1- 
<, १९क} श्लोकार्धं परित्यक्तमिति मस्थे) तस्य '्ारं विभज्य इद्धा भाग- 
मेकं परित्यजेत्‌ 1 इत्पेवंरूपौ हि पाणो मविठुमहति । 
<. १९1 महाप्रतिमादीना भूयः, रमश्षाने, चतुप्पध्रे च पुजाविधिः लाच 
लोकिकव्यवहाराच इयते } कोषेषु च वलत्मंवाचकल्य ""पद्या'श्राब्दल्य सतत्वात्तथा हिपिदाच्लानु- 
सोधात्‌ , “्चतसणं पचान समाहारः चतुप्यद्यम्‌ःः इति पाटः संघटते । 
त्था शिल्पशाखादौ भूयः धातूनां विकरण-व्यत्ययदर्चनात्‌ “पूजयेत्‌ इस्यत्न 
“पूजयेत्‌, इति च पाटः सम्मवत्‌। तेनास्य श्ोक्ताघंह्य पाठ एवञ्चातः- 


““वाणवेदकरानू यावच्चतुप्पये पूञ्पेत्‌ छष्ीः ॥ १९ ४ 
 'महाप्रतिमाशप्रमाणं च शिल्पप्रन्धान्तर, नेपाख्देशादस्महुपरन्धे “आात्रेयतिरूके ०५ 
एवडुपदिषटम्‌ :- 9 
| ““महाप्रतिमाविन्यासं प्रवश्याम्यधुना श्रणु ॥ 
 दशपन्चाधिकेंस्तेः प्रतिमा कन्यसी स्ता ¶ 
| ` दवियुणा मघ्यमा केया ज्चरेष्ठातु चरिगुमा स्ता ॥ 
अतः परनन वीत यदि(दी)च्छेत्‌ श्रेयभात्मनः ॥१ 
तथा शुक्रनीतोः, ‹ “कर-उरी-पेशाघीमूत्तिन्यवल्था ऽपि द्रष्टव्याः> ॥ 
2] 26--81 'मत्स्यपुराणीग्याः, अ= २९९ श्योर १८-२०, एते । 
^. ` अ. 36-43, एते, सवऽपि शोकाः "बहत्‌संहिता"तो यथा-यथम्‌ उद्धृताः । ब्र सं° 
25. { 0117011८ 111८ }) अ० ४६ ८ सिद्वेकते >) शो १--८ . ५150; 
[ललाप दमण 14) ( (1811.1(1110111011641410) [, 44. 13, <. 5-9 
18.48... 


५ मात 


9, 70 वर्दा16्व णिव गटदुगाताषट ध6 -4दट)व- द्रव 566 {6 
01656 फपल $ 22/01/6102 (45014. 1116 (ददद ददद्द्‌ सलपर ` 


ध 9९25 ०. 48. एलावा65) 1933, [प 0तपल््रलम, ए). 5--8 


5, [प्रणिपपात धा (ठ 18 10{ १८८65896 7 (6 [क5लाा, ॐ वृ्छध- 
{100 दवा ७९ हषो, वद, (1, ४) दद्दा त 


[ 43 


<, 1. मन्येऽ, वृक्षवेङृतमथिह्त्य किच्िद्कमासीव्‌। ८ 10). 1, 
4471. . 136, ०4. 4. 5 ; 6, 40 ६८. ; त 4. 410. 46, 6८. 28 = €[८. 


तथाल्य शछोकल्य प्रथमादधंस्य पूर्णमेवं भवित शक्यते--“स्वदेश्चध्वंसः स्कोटे भवेत्तथा 


देवपादपानाभ्‌ ॥ ४४ ॥ 
<, 45--{7. (०ण0< 1. 1, 4८174 135, 5. 1-5) 
त्‌ 7, 40. 144 <. 1-2. व | | पि 
€. 50-57. ८ गः 70. [ा, 47. 135, 7, 18. बहतसंहिताः- 
मनुखत्य संशोधनं कामिति पुनः पाश्प्रदशेनेनाऽखम्‌ । एतेऽत्र शोकाः अपपाघ्वहुराः । 
"विश्ालणहतावत्‌ ल्कन्दल्येव चतुभदल्याऽन्यतमः । 3९९ 149. [1], 440. 71, <. 3 
| <. 58. मन्ये-“वत्से नाऽभिघुखे याह यात्राद्वार च ॒वास्तुनः । इति 
भवितव्यम्‌! तथा “शुविणीनाम््‌ इति, श्ृह्ारम्मे बत्सचक्र'विचारस्योपयोगात्‌ । वथा 
यात्राकारे, “"धेनुवत्सप्रयुत्ता"दिवचनेन धेचुवत्सप्रश्टतिदशंनस्य च माङ्गङिकत्वात्‌ 
(10111086, २१80 5/४. 1, 44/॥. 1 €. 6 £ 
तथा वाल्तुराजवद्यमे १९साध्याये “यृहारस्मे वत्सचक्रम्‌ । 
सौरादिकं त्रितयसल्य शिरःप्युक्तं भानां ततो हितयमग्रपदे च दक्षे । 
कुक्षौ चतुष्कमपि दक्षिणगे प्रश्सतं प्रष्े तनयं त्रितयमप्यथ पुच्छमागे ॥ २३ ॥ 
पाश्चाच्यपादुयुगरले द्वितयं इयं स्थाचत्वारि भानि च ततः खदु वामङ्क्षौ । ` 
द्रे चाग्रवामचरणे द्वितयं च वक्त त्वेवं वदन्ति सुनयः खलु वत्सचक्रम्‌ ॥ २४ ॥ 
शीषंस्थिते छखनिदत्तिरथाग्रपादे शूल्यं च दक्षिणकडुश्चिगते घनं स्यात्‌ । ` 
पृष्ठे छुभं भयकरं खल एच्छे मे पाश्राच्यपादयुगरे विविधा गुणाः ल्युः ४२९ ॥ 
दुःखं मयं स्यात्किर वामङ्क्षो भयं चिनादरश्च सुखेऽग्रपादे । 
विद्वद्धिरेवं खुं वास्छुखाते वत्छल्य चक्रेण निरीक्षणीयम्‌ ॥ २६ ॥ 
<. 597. ''विशेषकाश्चःः इति मवेत्‌ । - 


द्वितीयोऽध्यायः । ( (धयः 11. ) 
<. 1, (1 (251८1100, 4 ८, 1 


 छाया-वा-ग्‌रेणु-केञग्र-रिक्षा- ` 
यका प्रोक्ता स्यायवस्त्वद्रूधं । 
छायादिभ्योऽषघ्रमानस्य बुद्धि | 
प्रोक्तो हस्तो नेनसंख्याङ्खेशं ॥१॥ ` 


| 44 | 
<. 2 (0ानछना)०५्‌5 ६0 87. 11, 4} ५ च 2 21 


<. 4. “क्ीक्तिनरुलं त(ता)रयुखम्‌ः' इत्यपि पाठो भवितुमर्हति । कीत्तिुखं तावत्‌ 
सिहमिवापरम्‌ः, व्यात्तसुखोऽखट्करणदिकशेषः । तल्योत्पत्तिः प्रयोगश्च शिस्पलास्त्रेष्वनु- 


°"नर सं 
सन्धयः | 
<. 1138. (जावा 87. ए, 1. =+ =. 37-30. 
& 79. “नीला” इति भवितम्यम्‌ , ष्टीलेःति नान्नाः देव्याः कुत्रापि अनुपलम्मात्‌ । 
तथा '्पाञ्चरान्रागमेःः नीला श्रीः, युरिश्नः पर-विष्णोः शक्तिरूपेण निर्दिष्टाः । 
नामेकदेशग्रहणेन यदि च 'नीरश्ढ्देन नीरक्षरस्वतीति नाम्न्याः तारायाः र्णं भवेत्‌ तथापि 
ताच्त्रिकरेवतानां नाल्ति भन्न प्रखङ्कः । | | | 
` छल्यं ब॒हट्बहमसंहिताशया रय-पादे एधऽध्यामरे १४४ --१९९छोकेष 'टीलखद्ेन्याः८) 
प्रघङ्धोऽस्ति। तत्राऽपि 'लेखाः-पदल्यं 'नीखा' इति पाशान्तरं हस्यते ० । 
27} 99. "जिनेन्द्राश्न" दति पाठः स्यात्‌, (तकारः-'नकारः 
अत्रैव ग्रन्थे निनप्रतिमानां च स्थापनविधानात्‌ । र््ाघ्याये २५-्ोके दषट्यम्‌ । 


योश्रं मसस्भवात्‌ ; 


तृतीयोऽध्यायः । ( (६])< 1. ) 
<, 1-2 त्छपलगात्‌ {0 1.1. 1.4, 33, 4. 88-4 


5}. 9-17. अथ देवताहि 
("416 112॥. 411. 7, $. 80, पद्देवताविन्यासः । 
“समानि यानि भागानि चतुःषष्िवदाचरेत्‌ । 
असमाल्यपि सर्वाणि चेकाशरीतिपदोक्तवत्‌ ॥ ३० ४ 


इत्यारभ्याष्यायान्तरपयन्तं द्टम्यम्‌ 


[1 


| (0. (€. (4191 : ८ यादव, 2 तल वसा (10 वर्प), 
80. 1, [€ 7०, §०८. न (01६21 47, (वला द, 

८ 07. 866 ?. (00 लगवा ; नद 2 रट -2्८वद स्य 

८ 44044010, ववा) 1916; ए, 5353-5; 

| | | 98 सुहद्बरह्यसंष्िता ॥ नार्दपञ्चरातान्तगैता {10424 ,५ ९, 6८5, 0. 68 

1912, 2. 68--09. तदेव १७६३-खोकः-- ` न ५. - 
ध  “मोपायति जनान्धस्मात्‌ प्रपत्रानेब दोषतः | 
अतो गीपौति वियाता शलौलाखया परवता ॥*› ` | 
| ध `  श्नौला०। ` 


पानम्‌ । 


५.०५८.५५८ ४१ १०५१५ ताता ना १ ५५ 


[ 4; 1 


<. 18४. “वाक्यभेदो न क्तव्यः" इति मनसि निधायेकवाक्यताञ्च अनुसस्धायैवं 


दिङ्निणेयः ] | 
` (गफएक्षः€ द्धाकसकाःव, 1; 887, ; 80, (ककु कपत00त ४, 13 
` “्रह्मविष्ठारितरन्दभास्करगुहाः पूत्रापरास्याः छमाः 
प्रोक्तो सर्वदिकयामुखो शिवमिनो विष्णर्विधाता तथा । 
चायुण्डाग्रहमात्तसे धन्पतिदवैमातुसे मेरो 
देवा दक्षिणदिङ्युखाः कपिवरो नेकरेत्यवक्तौ भरत्‌ ॥ १३ 
5. 28. ` यथाशक्ति पा 


युद्धि प्रदश्यंते ङिपिक्षाश्चदीननुखत्य । 
“(ज्ञात्वा क (मोघ्थापि पेन रीलया 
देवा दैत्या मानुषाश्च सवं । 
ह(ष्टा)त्मानं व्यापकः खुशिकारं 
स्थापी(पि)-दष्टा (दष्टा9-विक्वकमं माणं) श्च(तं) बन्धाः ॥ २८ ॥ 
इष्टः, आत्मा येन त्‌ । ष्थापी स्थपकः, सिल्पी । दश कविः, विश्वकरमा । स 


र्या; । सवत्र िल्परास्ं चु विकरणन्यत्ययः पद्ब्यत्ययश्च । 


चतुर्थोऽध्यायः | ( (शुणध्टः भ. ) 


1. 1. इ्ट' शिषस्यैव चन्द्ररेखरत्वम्‌ । तथा मन्ये, अन्थमध्ये छत्र कुवित्‌ "द्‌-कार- 
"र-'कार-योभ्न्विद्नात्‌ , ““ह्तीकमान्ना संशचदधि०-रिति न्यायात्‌; “वास्शेखरः इति पाठः ` 
 ाधत्तरः। ६ 
1  &. 2. त्यं हपमण्डने१०० शप्रमदेनेःति पाठोऽल्ति ! तथापि म्रन्थकारः यथेच्छं परिव 
| कृतवानिति मत्वा श्प्रभेदो्तयाः इति पाठोऽल्माभिरङ्गी क्रियते । | 


। 9. 8-4 (णगण्छडुणत्‌ 10 हूपनण्डनम्‌ 


प्तं कमण्डलुः घतते सक्वः कमरासनः ध" 


तामा १९५ क 
(ताता ००५१५०५ मन 


99. ग्ल वस्कणदृव्क 185 एदल वप्मल्त्‌ २६ [कणत एए 7. |4. जण ८ | 


0213 २६0 : 2 (दाद 0 4४ 7८०४0९0" ४४€ 112४€ 46060480 तरल ` 
प प्6ऽ€ वृप्जदप्र०ाञ, पाल एल उपकलाप कपत एठण्ताक्रह 210 


[| 46 | 


तेन च, ग्रन्थमध्ये न्त--कार-"नः-कारयोर्वम्‌ (उ -कार-'क"-कार-'रः-काराणां परस्पर 


५, 3) 5, 6, 7. ब्रह्मणो हष्तेएु युगपत्‌ शति(धद्‌-)पुष्तकयोरकत्रायुपयोगात्‌, त्तथा 
"स्पमण्डनीयेः पूरवद्ोके 'लवरि'तिपाण्द्शं नाच्च श्रुतिः? छदिःरिति उभावैवाऽपपाहो, इत्यल्माकम्‌ 
आशङ्का । श्लुचिश्शवब्दः कोऽपि कोये यदि र्यते, स एव पाठः साधुतर इति मन्ये । 


. 1. नविप्गधभोत्तरः तृतीयखण्डे ७ अध्याये 'विददक्छमणोः ध्यानद्ुपलस्थते । 


<, 8. “हपमण्डने”ऽरि अधिकरूष्ति । 


, 14, 15. श्हपमण्डनेः प्रायेणाऽविकर्मल्ति ! तथा "णेश्चः स्यात्‌? ध्यहाश्रेव... 
न्थसेत्‌ः 'देशाल्ये करखादेवीसः इति पाषमेदाः 1 किन्तु ब्रह्मायतने श्याम व्युहार्माः चात्र क्षिं 
प्रयोजनम्‌ १ तेन, "गुहेव ८ का्तिकेयम्‌ ) इति पालेऽवश्यमेव भविता । 

91, 16---20. प्राय्ेणाऽविकलं "रूपमण्डनाुणरुताः । प्रघानपारमेदाश्च प्रदर्यन्त- 

“पद्यं खक्‌ पुस्तकं दण्डं सत्यो वामेऽथ दक्षिणे । 
 सन्थापसभ्ये करके प्रारूतूलधमंकः ॥ (17) ` 

अक्षं पद्मागमौ दण्डं करेधत्ते प्रियोद्धवः । 

--खक्फख्कयन्तः स्थादाथुधः शुभः ॥ (18) 

--सूत्र-- खेटदण्डविजयनामकः । 

---------- खेटकं ------- ॥ (19) 

-----ः पाश्चाङ्कशौ दण्डो भवे स्यात्‌ सार्वकामिकः । 

---- पाशप्चेविभवस्‌ ----- ४ (20) 

तेन पाण्मेदाः। (श्लोके) दण्डं सत्य-(१८)-पश्चागमदण्डान्‌ ; करतरेरद्वेदवः ? 
 -सुवाफठेः यश्च ; (१९) भरेत्‌ (२०)--ुरदण्डान्‌ भूयश्र(--ङ्ान्‌ दण्डं ), --ङ्कशे 

--त्परे धिभवः-- । 


८. 21{--34 [अथ द्वादश सूयंडत्तयः| 1प (र< {011 [15८ 1111111/1- (1८100 
८८707, तत्र प्रधानाः पाटसेदाः-- (२१) जगत्प्रकारकस्सूर्यौ जायते -यंथा ५ 
(२२) सा धात्री-- ॥ (२३) चास्या -- । मंत्री --- ४ (२४) -- सश्च; पाणिपहवेः 

(२९) --सन्ये- -- ! (२७) -भवेत्सम्पता-- ॥ (२८) यस्या दक्षिणतश्दरूलं - 
खदशंनः । भगमूतिः-- - ञ्युभा जय ! ॥ (२९) विवस्वन्मूत्तिरिषा स्यात्‌ ॥ (३०) -स्थ 


न माता तानामा ाााााा 


= १००. {16 एकदस 45 एला तृध८षट्व्‌ एष , 4, 60028 
280: 00. न, पाह णपा [95 एष्ल) प्ाअल्व्‌ प्रस तिल ९०६८ 27} ` 


1/1 


({ 47 | 
भवन्मरूतति- । (३२) खं च -- होमजकालिकाम्‌ । -मनेत्सा स्यात्‌ पञ्च-- ॥ (२३४ एषा 
स्याह --॥ (३४) -- सविता द्रामल््तः ॥ पुकादस्तथा त्वशा विष्ण्कीद्श 
उच्यते । ए | 
अत्र भन्ये ` 'विक्वकम॑लाखयाण्त्‌ छत्र इत्रचित्पारमेदो दश्यते । तेन अस्माकं मते, 
(रर्रलोके) उधा(ज्ञी) तथा (३२) होमज-नीरकम्‌ इति पार्मेदौ भविष्यतः, छकार 
 (लः-कारयोश्र॑सददंनात्‌ । 
1. 38-89. यथादक्ति श्लोकयोः पाटोद्धारः क्रियते । 
त शहिरम्न(म)तङ्खङ्ष्णाः ॥ ३८ ॥ 
भरीकण्ठसूरयौः श्द्रस्तथाम्बिका (उ)(त्र)-- । 
---ते (दलन्ति विघ्नानि परसंस्था ॥ ३९ ॥' 
एते देवाः स्वल्यानल्थाः अभीश्ानि परस्थानत्थाः विघ्नानि प्रयच्छन्ति दस्यथंः ॥ 
<. 42-- 46. "हपमण्डनभत्‌ किञ्चित्‌ पस्विरित्ता 


८ ४४श्छोक्ते ) तजनी द्रौ ब(ज्ोरना--- । ८४९) तर्जन(क)द्ौ पद्यानां चिच्रको- ० | 


(४६) तजनी दौ किरणं दण्डमक्षकिरणो भरेत्‌ । | 
२ इति संशोधनानि क्रियन्ते “रूपमण्डन'मनुखत्य 
<. 47-5?. शशिल्परत्नेः उत्तरभागे रद्अध्यायस्येते १४१ १९रश्लोकाः 
कुत्र छत्रचित्‌ मेदा अपि इष्यन्ते । तयथा- 


( ४८रोके ) -- एथदरीम्‌ । (५०) पुस्तक-- । (५३) ततो -- श्॒क्श्च-- । ध 


(५५) सौरिं नीर -- चतुसंजम्‌ 
तत्र (४ ९क्छोके) "मेषंगमः" इति पाठो भवितुमहति । 


<. 59. श्ञिल्परत्नेः उत्तरभागे २दअध्यायस्य १४७दरोकः । तत्र गगृधाः -- ` 


का्या-- ! इति पास्मेदौ । श्युधाः" पाठत्‌ श्रहाः? साघुतरः। 
| दति नवश्रहाः 


7. 59-66. शरूपमण्डनभत्‌ त्र त्र विशेषाः सन्ति। मन्ये, सव॑ऽपि शरोकाः 
तस्मदेव उद्धृताः । . (ैर्रोके) --- कतिक -- । :-श्वानारूढ-- । (६३) नक्रा-- ॥ ` 


इति पार्मेदाः प्रधानाः, सर्वत्र कारकन्यत्ययश्च । 


इति दश दिक्पाखः 


पोतन व "ल 


 पन्चमोऽध्यायः । ((4])॥८' \. ) 


<, &--13. (पापु (१4१11111 101400, = + "ता 4८८ कुत + 


40014. 10, ( (11 [तदक 11. 127; (५८416 01111 
1107740, 4114. 19 ; (+, 1104. 1; ; {0 वल्लः ग {€ 
91171101. 

<. 15-20.  @पम€त्‌ कणो = ८4्वद- 01 पक 
1110101" ९1811९6६. 

<. 21. दोप्जल्त्‌ शल 1147 पी पठा 
(11722६६. 

९. १2. निप्ठ॑ल्व्‌ ठ न १111111 1१, 1 । 

(1171226; 

<, 2८. णता {16 (तद द1॥1- 5410111, (71211111 1 10169 
४ # 11/01 (17111 01 (11.111 त20 व 1111 021 {02 

““शुद्धाभश्वातिकोणम इति कवित्‌ पाठः । नान्तरीयके संहे 1 

०१. 27, @०६€त्‌ किण 101८4८41 11211020. "9 

आ, 2६, किपल शल (वाद 1112401," 

आ. 29. @कपज्॑व्‌ वणा ए लकलनदव ; (7 4कवदध्रकू-(.१५ 

"पलान्रयपरिवतो देवः पथ्येन रान्छितः ।* इति पाठः 

<}, 50-51 "मादो दिष्णुध्रोक्तोःः 1 03 | 

इति स्तोकमात्नं मरन्थान्तरेभ्यो दशितम्‌ । मन्ये, आक 
सवंऽपि श्लोकाः प्राप्स्यन्ते । समयाभावात्‌, काहुल्यभिया च, अर्म 


101, 566 (रिक्त लप८१त्‌6 ५६०७ 9466 कक 7) पैलः (9 त4दताथ ° 

102. 866 ` /प0405 व (57, ), 2 तवहा एप उपप्लव | 
7८17744 26 व402} 0 = रि 200६2108 चतवव ्ता3 पीतल {06 क वा्ल)3९6 ० 
2 ४18४8 9 4424) 90 (6 ७4068 (50114). िता21052102 
 प28 (116 ह€व(-हा ववज (०1११८ 06.442} ना 16 (लला 26व 4 ६9३६8 


9 ` (16274748, 16 वजाः ज दवद) गा6 9 176 ०65 लला तदव 


` ए. 348--57 


` 70 बकञ,  व्छप्लपताप्कोऽ 0 एजतो वपते कहत }8. ६6 7. लणलकब- 
द्वृ)  (वदाण = -लववणदद) (वकवद्क्द्ा6व क) (दव छतर); 


, | ०३. 8० ए, ए. 357. “शवसेभव वर्यमेदेन पूजने सूरि.विशेष उयते ईमादौ 
^ विदि 1 | ६ 


५ . । 


तथा, (मत्य संबन्धीय-९ शदरोकस्थले (जनादन संबन्धीय-९रदरोकपाठे कमभङ्दोषस्य । 


परिहासे भवेत्‌ । 


<. 64, 65, 67, 6 [वद्मा (0) {€ 4). वा, (), 24. 


^ 180, (01016 [लादहता, 1 2111014.417क(101. "०94 
तथा 'विष्णुधमोत्तरे' पाढमेदाः ( वि० ध० । ३ेयख० । अ० ९४ । ) 
-- मारकत०- -- ~ -। 
-- - - - स्ततः॥ ६४॥ (२ वि° धर) 
~ - - -श्छयविभूषणः। (३?) 
-- - - करापेन विवर्जितः ॥ ६९ ॥ (४क) 
-- पूणंङ्ग्मञ्च - - ५ (ब) .. 
- ग्रमे त -- -- तथास्य रचिता०-- ॥ ६७ ॥ (पक) 
तथास्य १ भगवान्‌ -- -- "धरो करौ । (ख) 
१८यदा इति पाडः । ) 
[ न कत्य कर्तव्यौ देवपादधरौ । &क ] 
फिल्चि०- क -- ६६८१५ (६ख)ः 
तथा ष्देमादरौ दानखण्डे' उद्धूताः पाठाः - 
 ूस्यजानूद्धं जानुश्च ~~ ` ~~ ४ 
परभारसंस्था तु सौवणंकखयेन विवभितः* ॥ ६९ ॥ 
| % विवधितः क्चित्पा्टः | 
 छत्रन्ते ~ ~ ~ । 3 
विष्णुः पुरशरेत्‌ कार्योऽसौ द्विभुजो रचिताञ्चसि"रिति पाठः 


कल्पितः ! 'प्षदरधविभूषितः+--०विभूषणो? वा गर्डः कथं "करापेन विवर्जितः" स्याच्‌ । 


इति पाठ एव साधुः । 


वथा ` यद्ल्व .. ~~ (६८ क)" पाठः साधः। 


1.1 


एवं पालान्‌ विचार्यं (६प्ररोक्े) "कलापेन विव्भितः” इलयतल्माभिः श्चद्रत्येन परि- ५ | 


पूवं सति च तस्य सोन्दथंहानि्मवेत्‌ ¦! न हि गरुडो हुदंशंनशच कदापि, पक्षान्तरेऽसौ मीम- ` 
कान्तश्च हर्यते । एतद्विवा्, एकवाक्यता चानुसन्धाय, अस्माकं मते “कलापिन विवर्तः | 


तदनन्तरं इकोकार्ध॑ः परित्यक्तः--“¶ न करव्यो कर्तन देवपादधरौ । ] ” समीचीन = | 


1034. लप्यत (4 क० 2१ (62010८4 ८८्द 77047८2), ^. 9, त | 


{9 
मवत्‌, यदा ग्ड विष्णुयुष्ेत्‌ तदा चाऽल्य पादौ भियरेतेति । द्िहस्तस्य गर्डस्य युगपत्‌ 
छन्नक्ुम्भघारणं विष्मोभरवहनं च हस्तसाष्वाघ्यं विनाऽखम्भवात्‌ तेनेवमल्वधौ भवितुमषति- 
| भ्यदास्य धृष्टे भगवान्‌ भवति, तदा गदडस्य करौ छनरङ्कम्मघरो न कर्तव्यो ` इति । 
| क, 71. दलया एला पा 4.4 वातै [4 (1. 25 ई 
111, 1120. | 
तत्र पाठमेदाः --° जिन्युपवीती -- छृतकसण्डलः । 
| ~... -- `. महोवुरः ५१८ ॥ ७१ 
वु्पो वामनाकारस्तथा ८ ब्राह्मण~)बदः सहोदरः एव भवि 
९. 72. शहूपमण्डनेः "०५५ रामल्य दादरभरेल्तथा बरङरामस्य एवं वणनं प्रप्यते-- 
(रामदशरेपुषटकुख्यामः ससीरसुसलो वलः । तेनाऽल्माकं मते प्रासस्य ॒शछोकाघो- | 
` दुनन्तरं ८ ७दभ्छोके ) बररामल्य अनन्तबलरामस्य वा वर्णनमासरीत्‌। तत्य च रलोकार्ध 
भ्रमात्‌ परित्यक्तं, मन्ये । बलरामल्येव आयुधौ सीरसुषलो । ` 
। ५. 72-74. "शिस्परलाण्ुतं "४१ मन्ये 1 ६1९. 1, 1111. 27; <. 11211; 
तत्र पाठमेदाः- क 
(७२) --कोभिवम्‌। (७३) --फुष्टखोचनां । | 
| ५1. 76. शजिल्परलेः 1०; ७४कखोकत्यानन्तरं दखोकोऽयं विन्यस्तः । तेन प्रसागा- 
` स्तरमिदम्‌, अघ्माकं मते स्थानव्यत्यासल्य । ,९1. [[, %;, 4. 116. 
9.  7-80, 82. श्ञिल्परकाुद्धुताः । 5.0. [[, 27, 4. 117-1214. 
„4. 83-85. “क्षिल्परलसंयोजिते कषमिशचिद प्रथेः? *०५, तत्र पाठमेदा- 
(८२) प्रमत्तवदने०-- ! (८४) -- न्छम्बिनौ -- ।! -- वासे शंखं -- ॥ 
 (८९)--( गदां रम्यां ) ङिखेचित्रविक्छारदः ॥ 


ध 0313 प पपप्म [1/1 
८11. | | [ष 
^ 4. १086 1656 तृप्णव(ना३ आत 2150 हृष्टा पा क, 4. (कुर्म 1२80; 
क 00. ८26.} [ऽप 91 {0 3161116 $€ा51010 र ^^ ५ | . "न 
` 1038. 87. 4. 6. 1२०; 0. त न | 1 
10०38. @प्ण्धत्व्‌) ब5०, एष क. &. ©. [२०0६ 06, ८, वकल त्ता ध, ४ 
| गाणलः श्लञ्चनगा ज ०.९.) पणता इ0पालप्पा@ हा ९०8 एन्ला पदवतप्ठुऽ, --न्नोच्नां ^ 
1 १ १ 5[0पात्‌ 1€2 ष एलहिः ६0 16. 96४, पा16 15 35६00्79्त्व्‌, पाध [ला [क्त्‌ ऽ [तप८6, । ॥ 
1.1. 1110 ॥ ८ ^ ५. ~ 
| 1036, ` 300} व, 4. ©. 26; 6, ८८; पत्‌ ९९२. 
` 10 {* ` €प01ल्व्‌ 11. , 4, 0. 220 14. ८. ५ 


९. 86.99. विष्णुधर्मोत्तरे यखण्डे ८ १अध्यायादेते ( इटोकाः, २--७) गश्धतः । 
तत्र पाठभेदाः- 4 (9; ^ ^. 
(८६) -- शेषपत्नगतसर्पगः *५५५। फणादुञ्ु०--दुनिरीद्यशिसेधरः ५०५२ ॥ 
(८७ख) विष्णुघमात्तरं रेय-ख० ८१-अ्र० (३--४)्)कयोः पादैकेकं परित्यक्तम्‌ । 
तद्यथा- | 
(८०) स्वस्वरष्षम्युत्सङ्गतः प्रमो 
तथापरश्च कतव्य स्वल्वप्रभो ०५४ । 
(८८क) एको अुजोऽस्य कतंन्यस्तत्र जानो प्रसारिदः 1०८९ 1 
` क्थापर्च -- - प्रसाधितः ५०८ | 
(८९्क) तथा चान्यः करः कायौ देवत्य तु विरोधे ५०८५। 
तथैवान्यः - - धरः 1०८? | 
(८श्ख) - तथेवाल्याप्रो क १५१९. 
(९०्क) सव॑पृथ्नीमये देव्याः प्राग्वत्‌ कावंः ~ 1०६९ । 
-- परथ्वीमयो देवः ~ 1087 | 
(रन्ख) नाल्रनौ -- - - +०२-४। 


९. 91.98. श्ह्पमरण्डनभद्ि्ेषो नाल्वि । केवलं ऊत डतर कारकन्यत्ययः हृतः । = ` 


संख्या-कमयोवा व्यत्ययः दृश्यते । 


<. 94.115. श्टपमण्डनगत्‌ छत्र छुन्र विषाः! तेषां च प्रदर्शनं श्रीमद्भिः ` 


टीकाकारः चिष्परेण कतम्‌ । इत्यर्मधिकेन ॥ 


116. एतदनन्तरं चहु दश्यते “दति विष्णुप्रतिहाराः”, तस्य स्थानन्तु पू्टोकाच्च = 


(११५)अनन्तरं मविषुदुचितमेव 1 यतोऽगरम्‌ भन्यश्छोकस्तु भाशीवेचनख्पः धथक्‌ वत्तते ॥ 


षष्ठोऽध्यायः । (47 ४1.) 


&1. 1, 2४, 2९. शडपमण्डनगइ गृहीताः 11०, छत्र कुत्र विधेषोऽप्यत्तिं । “खः = । 


| इत्यंशो नास्ति तत्पुष्तके तत्र पाठमेदाः-(१)--°युतं कुर्यादा क०--\। 


पि मा न -------~-~---------~- 7 0) 
त .-५०५५,-५५१४ ५५ 


1040--1099. २6प४5 वप्०ाल्ते, विछ, (16 = ८2. पणा जल धात्‌ 


| ` एाल्छपपा्रर एलः एलअं०ा), 7 ¶, 4, ©, 1२0: 00. न. ध 


110--115. {1686 ` पृपरव05 276 211 कणर 1, & (01211188 ` ‰20 >. 


| ` 1 1049--1092. {२681788 १८०६९) ` ग्य पल कषत 4. न ४6 10. ( (1... 1 
(1 ) | अ ५ 


[{ ॐ | 
` (रक)-- -ङण्डराभ्यामल०--। 'खपमण्डनेः (रख) नास्ति | 
(रग) सद्योजातं-- ---पाणिकम्‌ ५२॥ 
८. &--. श्ड्पमण्डनेः 11 छत्र कुचर विशेषः । तचथा-- 
(४) जटाचन्द्रधरं ङुर्यात्‌-- --। वामदेवं--॥ (५) सर्वाल०--र्त०--॥ 
 शरूपमण्डने" प्रथमवतुथंपादौ न स्तः! 
<. (6-- 12. “स्पमण्डनेः उतर इत्र भेदः 1 तयधा-- | 
( शोके )- वदनं - - -कुण्डर्मण्डित्ताम्‌ ॥ (जख) | यो वत्त-- . । 
गले--नकमािकाम्‌ ॥ 3 व 
(<ख) पिद्धाक्चं-॥ (९) -०कः -- ०कध्ेव पादस्तस्य नषुरो ।- रूपकं इूर्यात्कार०--॥ 
| (१०) - रिपोस्सह्ं -॥ (१?) -च कपारञ--पाश्च एव च 1--शव्यमिदं 
 श्०--॥ ` 
(१२) ~~ परशः खड्गो दण्डश्चवारिमदनः । शख्ण्येतानि चत्वारि दक्षिणेषु करेषु च । 
भस्माकं मते, ( ७म-ष्ठोके) '्योऽनिशं वथा (१२) "दण्ड इत्युचितो पाठभेद । 
( ई-श्लोकल्य प्रथमपष्ं ) छन्दसश्च पातः परिहर्द॑ग्य | 
७. 18; 14, शश्पमण्डननद्धेढो > नास्ति | द्वितीया-स्थटेषु तत्र प्रधमान्तपार 
इति विरोषः \ 
५1. 15; 16. हपमण्डनभत्‌ 1 1"; छत्र कुत्र भेदोऽस्ति | 
(१९५ख)--गरत्युज्चयं--०न्दरमूषितम्‌ ॥ (१६) --०मक्षमाख च दश्चयोः करयोरस्छ्तः । 
~ --°कां वामे--सुद्राकरट्वयः ४ | ४ ` । 
` ल. 19. (खपररण्डनभत्‌ +: किंचिन्मात्रं भिन्नः तद्यथा- 
(१९) रसनो -०बाहुः--०पादाक्षपाणिकः \ -->हर्तोऽसौ किरणा्स्िकोचनः ॥ 
5. 20. “~ ( भक्षयन्तं >) महद्वयम्‌ ॥ २० १ इति सतेऽल्माकं पाहः कायः । 
<. 21, २०५. शहपमण्डनगत्‌ 1 > कुत्र छत्र विदेषः 1 | 
(२९) --गव्ल० --कुर्याचित्र°--) (२२) खड्गं धनुः शरं सेरं श्रीकण्ठं विध्रतं सुनः ४ 
<. 25, 26. अस्माभिरनेकानि 'सदा्चिवश््यानानि समासादितानि 1५ । 
छन्तु ध्यानमेतत्‌ न इपूवंमासीत्‌ । अपरध्यानान्यनुसुत्य संशोधनं क्रियते । | 


५५५ ण [1 ०७ त त ५१०५५ यणा मन 


र नण म ०४ नण 
ध क कन 
व 


0111 | 0४. ८; पापल, पलु्क्ञला४8 चल (स वावषव्क) का साठप्रह्या उरत्‌ ऽप 
1 तािलप्ला रला्०ा), 9 | 3 ५ 
1 छ 116. 566 {€ [लला प्रलाः कजणन्टावा), उदलकण्व करक 2 दवः 0. 
५ ॥ 1 ॥ 2९" { ८40 2 50) स वमक (रदा, 7. 2. 4. 9, ल. (पदल्ण क 
1 ( -इल्प6)) एण्‌ का 935, पण = ५ 


[ 58 1 


(२५) पद्यासनं शिवाच्छायं०--। पञ्चवत्‌ अभीःशक्ति०--॥ (२६) --°सृत्र्च--\ ` 


इच्छाक्ान[क्िया]स्टक्चएतिनेत्रं 0सानतोऽणवम्‌ 


| शिवह्तावत्‌\ “गि रिजाऽभिन्नदेहः,” ^" दच्छान्तानक्रियाशक्ति-च्यसंक्टष्वलोचनः,* ` 
ध्यानान्तरेषु प्राप्यते । तथा (जानन्तु शद्धरादिच्छेत्‌ मोक्षरिच्छेत्‌ जनादेनात्‌ः इति स्मयते, 


तेन सदारिबोऽपि (ज्ञानाणवःः भवितुमषटंति ॥ 


 &. 304. ५ विष्णुघमोत्तरे ॥ )* इति गोपौनाथपादेरक्तम्‌ !1° । किन्तु दुभौग्य- = ` 
वशात्‌ भूय्रशोऽनुसन्धानं इृतवद्धिरल्माभिरेतहु ध्यानं तन्न अन्यन्न वा सवं न समुपरन्धम्‌ । = 
ङ्त्र ऊत्रचित्‌ (२७--३०)द्लोकानाम्‌ आभासमान्रं वत्तते ।! तथापि गौपीनाथपादानां वक्यं 


व्रासाभ्यस्‌ ॥ 


५८. 31, 32. 'खपमण्डनेः "5 अपि । छत्र कुत्र मेदी ह्यते-- 


(३९) “वध्ये उसया-। मातरिद्धं-घत्ते-॥* एतदनन्तरं 'रूपमण्डने' श्लोकान्तरं 


ह्यते सोऽत्र परित्यक्तो यथा- 
भालिङ्न्वामहतस्तेन नणेन्दरं द्वितीये कर । 
हरस्छन्थे उमाहल्तो दपंणं द्वितीये करे ॥ 
(३२ख) “छङ्धिरिटि-°न्निमौसं रत्यसंस्थितम्‌ ॥° 


<. 38, 31; 3:54. ्ृष्णश्च्कर ध्याने तथा ष्णकारिकषेयश्व्याने तु प्रन्थ- ` 


स्यतघ्य महद्र शिष्व्यम्‌ । नेदम्‌ अन्यत्र कुत्रापि अल्माभिदटपवस्‌ । 


[॥ 


५1. 36-- 1. भमत्स्यपुराणगदु" ° विशेषोऽल्प एव । तथयथा- 


(३२८)-- -दयाद्रदाग्वतः । शाङ्कञेवेतरे --॥ (३९) - | --मभणिभूषणम्‌ । दक्षिणध-- | क | 


 --०मदधन्दुक्ृतभूषगम्‌ ॥ (४१) -- कव्यं छृत्तिवाक्तसम्‌ । 


9, 9 “3 -[-{-- 46 ; -47--(~.. धयानन्नमेष्वेतेषु च म्रन्थल्य वेशिष्य्य | 


 वर्तते। छत्र ऊुत्रापि पाठानां संशोधनानि कार्याणि । तदयथा-- ` 


[००1 


 एञन्लव) 00 रक [,  शििर्पवणंनानि, 20050८0 ८८ क्‌  । | 


` 9. 225--2.{2 ; वत्‌ {60८४ च. 4. 50007 क ७0४4 (06८८) 


2. (22०८2८८ वरा ध [0 व) न क ७वणरच्छय. पुराखेक्ता ५ 
1 सद।शिवपूजापद्धति । (27475402) 0, 253; 54 ¦ ^ 


11. 4. 4.6. 226 0" ८ 
118. . 2 | 


ध 119. 10240407 00 व (81) ष्डं 24.) €.) 4, 260) 4, 219४-2 ५ , (| 


. , 279 15 01721६64 


॥ | 
हि| | 
^ 
.॥ 
॥ 


|: 84... 


( एर श्लोके }) तनुव्येक-नि--` (४४) "ऋ(ज्वाोसुखगतःः *-५ । 
(४६) “एवं विधोऽयं कर्तव्यः -->प्रदः # (४८) "(षटेगालीद्ध ` इत्युचिताः पाडः स्युः । 
कारकाणां कमभङ्गश्च परिडरतन्यः। = ` ॥ 
| छ. 22, 53; 0, 55. स्ह्यमण्डनेषऽपि : <: प्रायशः प्वंस्पाः सन्ति। 
 दीक्ाञ्द्धिरपपालयः क्लोधिदाः ¦ | 
<. 56, 57. भविष्णुधर्मोत्तरः ५२ धयानमेतत्‌ यथायथं प्राप्यते ! 
<. >. अघ्रापि ग्रन्थ वं शिष्व्य" दत्तत । कृप्णशद्रयौः संयोगमूर्तीनामन्य- 
त्रा्द्नात्‌) मन्ये, ९८ख-दलोकाद्धं श्तेया द्विजन्मनो बुधं; ॥ इति परो भवेत्‌। तत्र 
"द्विजः इत्यक्षरदयं हु निश्चितपेच । | | 
<, 59. 60. शशिल्परत्ने" उन्तरमागे, अ० १ दइखो० २० आरम्य, अनन्तरं, तथा 
अ० २ शो १३; १४ इत्यत ष्टव्या 
7 ५. 65, 66. शशि ₹० उ०) अ १ रखोर ४२ आरभ्य अनन्तरं, च द्टन्याः । 3 
` तत्र "्वीयंकः इतिनामा कोऽपि बरृक्ठौ नास्ति। भवीरिः, चीरः, चिरश्चः बिल्वान्तरम्‌ आयु॑दीय- 
(वैचक- )निषण्टषु' `» प्राप्यते । तेनाऽर्मामिः व्वरयक-पाठः प्रामादिको न वा निशरतुं नेव 


ष शक्यते । अत्यः 'वीरा'-तामल्की-तमालौऽप्यस््ति निषण्डरषु | घुपविकेषोऽयं तक्षणकरम॑णि ध । | 


अनुपयोगी । 
| <, 732. श्छत्युञ्चय-विजय ॥ } क्रमात्‌ । इति पाहः स्याच्‌ । 
4. ३५.86; 81-89. "मवसतेः अ० ३३२को ४०--४२, तथा ४३--४९श्लोकाः 
तुरनीयाः । भन्ये, तस्मषदेव बन्धात्‌ एते गृहीताः । तत्र पाठमेदा 


| (८४)--श्िवायतम्‌ 1-~- भानानि || (८६) भूतगङ्खाश्निर न ] | ---सावंकामिष्छं- ॥ क. 4 ५५ 


| 1. 98, 99. शश्षि> २०२ उ० ८२८, अ० र इलो ११३ ११०क-भ्लोकाः; तथा 
भयमतेः भ० ३२-ो० ६र्ल--६३-श्छोकाः छखनीयाः । मन्ये, पुरुतकयोरेतयोः रोका एते 
गृहीताः! शशिर्परत्ने एकोनतिशाध्यायेः ( ११३--११७क )स्सोकानां च उदेखो हम्बते \ 


120, € ऋजु (0 पात्‌ ब्राञ्चुष - 17८४644 216 (110 पा८5 ०६ सधान 06९5 वातु 

. , स्थानक ८५८८1८6 0 11 ददु, ~ नवाथ >, 1 -444, 16, 9 64. 
"नु स्यात्‌ ससुखं स्यानम्‌. ` १ 91 | । 
121. (1. 4, @001 (24 1९५५: (0. ८ 


422... 20 (4. ८2८ 


(^ ध : ५ 1 123 ०66 ` । राजनिकण्टसहितो घन्न्तरीय निघण्टः { ` आनन्द गमस तयन्धावंलि, (4 
 : ग्र्ाई. ३३। शक्‌ १८१८ ^ 180 566, वनोषधिद्प॑ण ॥ अभिनवनिघणर्ट्‌ । राजव्दय ओमिरजाचस्ण 
 . गष कान्यती् कविभूषणक्तत! दिती संसरण । वङ्गाब्द १३२४ । ध 


124 ‰18० व८०६6 प 7, 4, उणूप्वपत (०० : 2. ८, (षा) पठण (3 


श । 0;02-60 ४ {51011 19१३ 921000८) <4 4, 2४ 


<. 122. 139. (मल्स्यपुराणेः२८५ अ० २६२, रो० १३--१६क, दरषटव्याः 
<. 134.138. आद्छपुस्तकं चिना यथाशक्ति शोकानां पारञ्ुद्धिः क्रियते, केवरं 
सिपिराखं वास्तुदाल्त्रं च विचायं । तद्यथा-- 
(१६श्छो०) क्ण ]कं साध्यं मागं [मोगं]कञ्चि(कं भि)त्तिका मता । 
द्विभागं चान्तरं कपोता विद्धि(द्धि) साधेकाः ॥ (१३६) 
अधंपंचस(चं) ध्रास्(साय्रोपहि - १ (१३७) 
-- ऽपि कार्या कृणके तु भारं(ग) [धं] क्‌ । 
-- -- १ तत्‌] म(स)कषद्धिते (सरितम्‌) ॥ (१३८) 


कपोत ! 23 स्तावत्‌ तत्पक्षिविकेषाकारोऽल्ङकरणयेदः बन्धविशेषो वा । तस्य वर्णन- ` 
ठग्रवहारादुयः वाल्ठुशास्छषु भ्नु्न्ययाः ल्थमध्ये भूयशः (त-कार- नकार ९,काराणां 


 परस्परश्रान्तिरिव अस्साकं पालोद्धारे मानम्‌ । 


=]. 1111-6. म््स्वषुराणेः अ० २६२, ६--१२ शोकेस्यः उदटृताः एते। ` 


विशेषस्तु अस्प एव । तद्ग्रन्यमवरम्व्य संशोधनानि क्रियन्ते । तथथा- 
(९४ छोके) "्वेरी पाटः प्रामादिक एव, स्वतो वंरस्यजनकत्वाच्‌ । तथा भमत्स्यपुराणेः 
वेदी-पाष्दरनात्‌ वेदी पाटोऽस्माभिर्ड्ीक्रियते। (१४४) सद्राणीसंतोषप्रिया | 


=. 147, 148. (सस्स्यषुराणेः अ० २६२, १६-१८ शोका एते । १९क-ष्टोकाध- | . ध 


ख्तावत्‌ त्यक्तः तदहुयथा--द्देवस्य यजनार्थन्तु पीठिका दश्च कीत्तिताः? । 


६1. 119, 150. तत्रेव प्रन्थे, १९-२० तथा १३-१६ श्टोका एते । भयमत्य, = ` 


` च, अ० ३४स्थर, ३श्छोकौ अत्र स्थित-१०९-श्टोकल्य छायामावहतः । ष 
=]. 151, 152. शह्पमण्डनदुद्धवाः किन्तु तस्माद्‌ प्रथमश्छोकाधेः परित्यक्तः 
तथयथा-- | 
श्ुलटिङ्ं त्रिवक्' स्यदेकवक्तू' चुम खम्‌ । 
“सन्मुखं चेकवक्ु' स्यात्‌ श्रिवक्त पृटकेन हि \ 


-- -- जतरे। -- --०कराषं स्या्प्राच्यां -- ॥ १५१ ॥ ` | 


-- --- तत्पुरुषं -- । -- -- ॥ १५२ ॥"" 


 &]. 167. मन्ये, “धृपमस्य ( विभोरन्ते ) िद्धे ठं नियोजयेद्‌ * इति पाटः ` ५ | 


1258. 11८ (४2:18) 2.0.) (21). 4८14. 262, < 1.3-- 16. ( 

12६0. पताः क 00) कपौत्‌ ४ व्‌ ०012-5 व8८क लाात्रप्ला६ ता तप्त | 
| एऽहत्‌ उ &्लुहल्लप्राल, 8द्€ १, (९. दतान2 ; 4 2270700क1 क 7 4८6. | 
^ - 11६, $+ त 4 1 


[. -56. . } 
=]. 169. त्रा “पादं जाचु-- -- । स्थाननादं-- ॥ इति पाठः कार्यः, 
=}, {69. पााद्चद्धिबहखल्य शछोफस्य संशोधनं, प्रतीकस्य चा आदृशपुरतकष्य 
दशनं विना सम्यक्तया कन्तुः नेव शक्यते । तथापि केवलं छिपिशास्च' विचायं आदयद्टितीय- 
पङ्ततयोरेषं परोद्धारः करियते -““धात[] दितं प्रति(थोऽ)तः कल्पनेऽल्य रूपं 
तत्पादयुग्समगमद्र्था (लौ) हरिं रश्र ।» 


सप्रमोऽध्यायः |! (वुल प) 
अध्यायोऽयमेतल्य ग्रन्थघ्य महान्‌ विशेपः! नजननहरिवंशाष्दो शासन्देवीप्रश्तीनां 
बणेनानि प्राप्यन्ते । तथा नल्‌ चास '** प्रसुलाणां शुरोपीय पण्डितानां ब्रन -परवन्ेषु 
जेनसूती ना वर्णनान्युपरम्यन्ते । तेनालं पिेषणेन । वाहुल्यभिवा च विरम्यते । 


अष्टमोऽध्यायः । ४१11.) 
` ग्र्पमण्डनेष्पि "<> किञ्चिद्धिन्नमेतद्रपं ध्यानमस्ति। पादमेकं तस्मात्‌ परत्यिक्त' च। 
` ्दययथा-- 
गोः -- -- --° निणयम्‌ 
-- ~~ -- - - - - -- ॥ 
५ अक्षसूत्रं तथा पद्ममभयं च वरं तथा) भ + 
--०नाभिता मूत्तयु हे पूज्या भिये सदा ॥ 
| <]. 3, 4, 2, 7, 10. खूपमण्डनभत्‌ 12० कुतर कुत्रापि भिन्नानि ध्यानानि ! मन्ये, 
तत्र ( १०ख-श्छोकाधं ) एवंरूपः पाठो भवितुमहति-- 
| ` 'अप्रतीतोहुमवारपा ८ अप्रतिमोदुभवसूपा )-- -- ॥ १० ॥ 
 &. 13, 14. 'खपमण्डनेः "2, किंञ्चितुभिन्ने ध्याने । 
3. 157, 16, 17}. “रूपण्डनयत्‌ '%० किच्िदभिन्नानि । 
€]. 16-20. शह्पमण्डनगत्‌ ५५1 कियन्म्राघ्रो विशेषः! र 
 &. 21 ; 22-23 ; 22. ख्पमण्डने'ऽपि २ सन्ति। तत्र तु रश्छोकल्य 
` ` विषयत्तावद्धिनायकः । कारकन्यत्ययश्न कृतः । देरस्बध्यानन्तु किञिदभिन्नम्‌ । वक्रत॒ण्डल्य 
५ ` तावहं ध्याने विशेषो नास्ति | 
3]. 29 ; 30-34 ; 35. शह्पमण्डनेः 1५४ ऽपि सन्ति । विशेषेण भेदौ नाहित । 


126. `. ए0ः (16 पाम धल ज भऽ पाद्व; शकल तवक 


ध १ (0 , 566 क, 47264. गदा, 4559, 2त्‌ 75८० छ 0श्वकण्छकय 1 
1: ५ 70174 {05 कका 14050225, त्क, 10. 222, 464 


127--33. @प०६्‌ 1 ¶, ^. तगु ९20: 6, 


णीन 


[ & ] 


<, 26-42४. सरवंऽपि श्लोकाः 'सत्त्यषुरागाद्‌ गृहीताः ५० अ० २६०, शोकाः 


४९ख--९१। तथा शशिल्परलेः 1५५, उत्तरभागे अ० २९, १२८ख--१३०ष्टोकानां कुत्र 
कुत्रचित्‌ ३६ श्रोकाः छारा अपि आदधते । 'मत्स्यपुराणयत्‌ छत्र डत पाठभेदाः सन्ति । 


 तदयथा-- 


(३६). कमखोदरवर्णाभं-- ॥ (३७)--दण्डकश्चीरकय्॑तं-- । 


स्थापयेत्‌ स्वेष्टनगरे भुजान्‌ हाद कारयेत्‌ ॥ (३८)- खवटे-- । शक्तिः पाश्तस्तथा 


खड्गः-- ॥ | 
(३९)-- स्याद्य चाभयदो-- । -- केयृर-कटकोज्ज्वलाः ॥ (४०)- प्रसारिता । 

(2९)-ण्वामे स्यात्‌-- । - --"पाशो--त्वलिः ॥ (४२क) ~~ वापि दक्षिणः 
स्यात्‌-- }" ग्र 

=], 12-471). पञ्चलीलया(जा१) न अस्माभिर्हश्पूर्वाः । सन्न, म्ल्थल्य चान्यद 
वेशिप्व्वम्‌ । च्वृददुवरह्यसंडिताय? > कानिचिद्‌ वचनानि सन्ति। तत्र 'छरिता"दिदिवीनाम्‌ 
उद्धेखः प्राप्यते, नतु तासां नामानि 

~]. 50 ; 52.58. “रूपमण्डनेःऽपि ५५५ सन्ति । 


<], 61-7::, श्विष्णधर्मात्तरः >` यथाथथमेव सन्ति । तत्र भेदा अक्रिित्छरा 


एव्‌ तद्यध्रा- 


(६) -- रड्ञुजा --॥ (६२). पिङ्गला भूषणोपेता - 1 -- सुवं --॥ 
(६रक) -ङण्डी वि्नती-- । (६०) छश्ठेन्दु०- जटा जह्ध--°डखप्रदा । -- वरदा --॥ ` 
(६९क) शरख्वण्टा० -- । (६ क्ल) पताका -- पात्रं -- ॥ (६७) -- -- षण्टां -- 


कुककुःटन्त्वधः । 


गामि त मिता न क्‌ कभभ 


1312. 14 00.010 द) 12, 260 ( 1 प. €१।८प12\. 

1340 20007705, 55. 1 47. 25... ध, 9, 

735. नारदपाचरावान्तगैता चहृहुब्रह्यघंहिता । पाद> र, अ० ४। 

तद्यथया-- । ष 1 

॥ “व्योषं साममलीलातु या लोला सौऽखम्रहं पुनः । 

„ अन्तरं नेव पश्चामि यथा तै शेषशेषिणोः ॥ १५२ ॥ ` 
नित्याय शक्यो चसा ललितायाः सुमङ्लाः 


अथौ नित्यविद्ारख रसन्नाः कोतुकौच्चलाः ॥ १४५९६ ॥*? = (५ 
= ` वावा 6, 9611658) 0. 68. 


४ 136. &66 {, 4, ७ 00112112. २20 0, ८2४ 


7, (८५४९ 1 2. ८. (१) कमलेमिति कां । (र) वर्गि-- पान्‌-- || 


दति “शीतखनिधिःपाठः । "दिष्ुधर्मौत्िर'पाटः। 
५.4 ८.९ | 


9 ००५५१ १५००१०१० ५५०० १ + 
॥ + ॥ 


"~~~ तक्ष्णां ~~~ ~~ ॥ | (६ ८ख) न गद्धिनीं न निश्रती चाभ्तुज० क | 
(६९) -- ऽभयान्वामे सा वेयं --) - - महोदरी ४ (ऽन्ख) -- ऽमयान्वामे ॥ 
(७९) -- -- रत्य -- । क्लं १ -- ॥ (रख) द्द्रो्या -- -- -- ५ (२) - 
कवचं शरम्‌ । अङ्कुशं -- [ दक्षिणे ] स्वध -- ५ -- --°रण्डं ~- चेति । 
(७४) -- सा हिवरूपा च विहगा । - वर्तरब्यक्षा -- ४(७५क) -- -- न्विता ) 
एतेष सध्ये ( ६८श्ोके ) विहितपारेव समीचीनो । तथा (७२, ७३ गयोः 
विद्धितपाटाः एवोविताः । (७२ेख) [दक्ष] चाप्यधः इत्यपि साधुः पायेद्धारः । 
=]. 76, विकरणम्‌ इवि पटं न साघु मन्यं! ( विकरालम्‌) इति 
भवितुञुचित एव । 
शु. 771), 73. 'र्पमण्डने*: ०५" एवं पाटो ऽस्ति । तथ्धा-- 
| “व्वीरेन्वर्च -- - धनुधंरः । (1771) 
ीणादष्तव्रिशयूय ( वीणात्रिदयुटदश्त्च > (7) 
(7 ेमातणामग्रतो भवेत्‌ ॥ 
सध्ये च मातरः कार्या अन्ते तेपां विनायकः ॥ (173) 
` (मत्स्यपुखणेः "४६, अ० २६१, शोर ३८ख--३२ एषंर्पाः शोकाः सन्ति } यथा-- | 
““व्रिनायकञ्च कुवीत मातणामन्तिके सदा । 
-- ~ ~ जटाधरः ॥ (1) 
वीणाहल्तच्िश्चूटी च (182) 
(1 8)मातुणा -- -- ४ 
'अभिरपिता्थेचिन्तामणोः ५५०८ ३ेय-प्रकरणे, अर ?, शोर ८३७ एवं पाशाः सन्ति । 


यथा-- 
| 'वीरेदवमे विधातव्यो मातणामग्रदस्छदा । 


वीणान्रिश्ूटहस्तश्च वृपाख्डो जयाधरः ॥ 
तत्र 'वीर्दवरःस्य कुत्रापि धनुर्कणधरत्वं न सिध्यति । तथा वीणावादने हस्तटयस्यापि 
उपयोगात्‌ , चतुहंस्तर्विरिष्टस्य व्वीरेरवर स्य बाणधारणासम्मवाच्च, अल्माकं मते--श्वनुधरः 
` जाणे' इत्यपपालो । तेन शलोका्ंयोः पामेद्भारस्त एवं भवेत-- 
५ (७७ख) (वोरेदवरश्च भगवच्‌ -- जटाधरः ॥ | 
(७८कः) वीणाहस्तच्िद्ूलन्च वरं चेव प्रका{श्षयेत्‌ । 


1 


` 1348. 3८€ . ^. लला 6 : ` 0. 
1389. कवक (ग्ट एव. 81.) 


। 1386. कयन, 33, पि 63 (43०6) 1926). ए्र, 


[ न 


[ 59 1 


>. 79 ; 80: ; 8170. (खूपमण्डनेः :ॐ० वतन्ते । तत्र ८ <ज्क-श्लोक्षे ) ` 


“अक्षाज्जवीणापुतल्तकंः इति छन्दोऽनुरोधात्‌ स्षमीचीनः पाहः | 

1. 84] ; 8, अक्षपश्चपुस्तकाऽभयाः हि विन्यासमेदेः मह्मरुदमी-महाकाली- 
महासरल्वतीनामायुधानि । तेन पद्योत्पर्योहभयौरव एकत्र अनुपयोगात्‌ ( <४ख-ररोक्ाधं ) 
'अमयाक्षेः इति पाठो भवितुमुचितः! देवीमाहात्म्ये साकण्डयपुराणीयेः च देवीत्रयाणीं 
छक्चणानि अनुस्न्भेयामि । | 


31. 86--80. 'विप्णुधरमो्तरः ५५० इेय-खण्डे अ० ५१ श्लोकाः ८--१९१ प्रायो 


यथाययथेम्‌ उदुताः । तन्न पारठमेदाः यधा-- 
५५८ ८६-श्छोक्े ) आरीदल्थानसंस्थाना*१ चलुःसिहै स्थे स्थिता ॥- (८) १ खड्गं 
धमं च याद्वन । बाणचापे च कतंव्ये*-- ५ 


(८ क) हर्तानां -- -- °च्छान्तिकरः करः१ 1 -- महासागर -- प 


५ भविष्णुधर्मोततरेः+^ पाध्येदाः यथा-(८दख) -गस्वासनल्था च चतुिवे-- ॥ ` | 
(८७)- खड्गश्चन्दशच यादव ! । ~ शङ्कपदये -- ॥ (८८क) सक्खवो ~ तथोदककमण्डह्‌। 


(८ रख)- महाभाग ! ~ ॥ 


नरसिहप्रासादरपाठमेदाः यथा -^(८६ख) --°स्थानसंतस्थाना ॥ (८छक) खड्गं चमं ` 
चे सदृ 1 (८८क) तथा दिव्यकमण्डलः । (<६क) भनेच्छान्तिकरीऽचरः* । तेन अल्माक 


ते, पासेदान्‌ सस्यक्‌ विचाये, एते समीचीनाः पाठोद्धारा यथा-- 


०(८७)- खड्गं चमं -- ! बाणचापे च कर्तव्ये -- ॥ (८नक) छुत्खूवो - 


धोदकमण्डलुः 1 
(८६) ` हैस्तानां -- करस्तु -- । ~~ सहसाय {-- ॥" 


&, 00--09-4. '"विष्णुधर्मोत्तरहुगृहीताः "५ किन्त्वन्तराऽन्तरा श्लोकाश्च केचन ` 


धरिव्यक्ताः । यथा-- | व 
(९०) ~~ चण्डी हेमाभा सा --। 
तिनन्ना योबनल्था च -- -- ~ 
चारपीनपयोधरा ॥ -- - - ` 


ना 


139. 8 व. ^. उणा ९६०: ४. ८ 


140, ष्ट} @॥. न + (१) 50 - वृप्ठ॑ल्त्‌ व {116 ऽतप. १ 72, 18 


४]0{02+@11$ 2 011616६ ४6810. | 
141, (2००६6 एङ 1 ^, लन 20: 00. व. 


(९१) ` -- -- -- -बाइविक्षतिसंयुता । 
-- -- शद्धः --बाणशक्तिपवीनपि ॥ 
- - - ~ 


(९र्क)-- -- सा सदा श्चुमा । ५ 


(९२ख) --०करल्छन्ध० ~~ ~~ ॥ 
(९३) -- - रक्तभ्र॒०- । 
- ~ ~ -\ 
(९४) याम्याङ्घ्रयाक्तान्त०-- -- गङ्घ्यारीढगाघठरे । 
-- -- ° शेयं चाशेषरिपुनािनी ॥ 
<. 95-- 100. 'रूपमण्डनगहुगृहयैताः '+>: किन्त्वन्तराऽन्तरा व्यक्ताः! ङुन्न 
उुश्रचिह भेदोऽप्यल्ति। तथथा-- ` | | ५ 
(९५) -- ण्याः प्रतीहासस्कथ०-- ज्क्रमात्‌ | | 
` वेतालः करटश्चव-- -- -- ॥ 
(९६) - कड्दश्व - -- । । ह 
ेटाननविकटास्याल्स्फुरदशनोदय ॥ | 
।-- -- ~ -] 
(९७) -- चेव साङ्गमूध्व-- । [ ॥ ] 
~~ -- --०तोऽपष्चव्ये करटः पुनः ॥ [ । 1 
(९८) -- नखरं च - - । [५] 
घामाप०-- -- --°नामकः ॥ [ । ] 
(९९) तजंनी वज्नाङ्ुरे च दण्डं धू्क ईरितः ! { ॥ ] 
--ग्योगेदं --°त्कङ्दनामकः ॥ [ । ] 
(१००) तजनी च चिश्यूरं च खटा द्ण्ड एव च । { ॥ | 
-- नामभेदेन वासे दक्षे त्रिलोचनः ८) ॥ [ । | 
[~~ ~ ~ = 
| ध्गोपीनाथ "पादोदधुतानां “र्पमण्डनीयः-पाडर्ना निभेरयोग्यतया वयं तानु्तरमः 
तेनात्मन्मते एवंस्याः नासमेदाः चण्डीप्रतीहाराणाम-- 


न 


(००६९५ ४ {, 4. 00112112 {२२0 : 2. 2, | 


[ 6 1 
(९५ख) वेतालः करश्चैव पिङ्गाक्षो शदुटिष्तथा ॥ 


ष्य । छ 
(९६क) धु्रकः कट्कदश्वव रक्ताक्ष छरोचनः । 


९. 101-- 100. दमपद्वितखण्डे' ५५ विप्णुमर्मात्तरथहुद्धताः । इत्र ङत्रापि 


पाश्नेदाः श्चन्ति। केवन श्योकाल्त्यक्ताश्च । तत्र पाठ्मेदाः- 


( १० क-भधेश्छोके >) दिव्यरूपाम्बरधरा-- । (१०२) पएयक््वतु---- सिह्यसना ~ 


सिहासनस्थं कतन्यं-- ॥ 


। 


--°स्थितम्‌ ॥ 


(१०९)-- --ण्स्था राजन्‌ -- । तस्याश्च द्वौ ~ द्विज ! ॥ (१०६क) ~~ ततप 
ऊङरद्यम्‌ । 


5. 107, 108. भविरवकर्मशाद्लभत्‌ समुद्धत इति प्रतीयते । तत्र मेदोऽप्यस्ति । 


शकारं परित्यक्तं च । तद्यथा-- 


(१०७क) को्धापुरं विनाप्यत्र -गेच्यते ।(१०८) --०्की ततः । वामोध्वं -- - 


[ बिश्रती मस्तके रिं पूजनीया विभूतये । ] 


5. 109--117. ध्यानमेव प्रायेण भ्स्यषुराणीय १५८ अ० २६२० कात्या 
थनीः-ध्यानमनुवत्तते । सदशध्यानानि अस्यत्र च हरयन्त, तद्यथा 'अभिरुपितार्थचिन्ता- 


सणोः८५५ “मयदीपरिकाय्रामःपि (> । तेन मूलण्यानल्यास्य सा्वंमोमिक्रता ज्ञायते । पाठमेद्‌- 


वरदन पिषटपेवणमरात्रमिति मत्वा तल्मात्‌ विरमामः । केवरं ( १०९ख-शछोकार्धोक्तल्य >) ` 
श्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणी' इति विशेषणं, (अमिरुपिताथविस्तामणो' धतं 


'दिवनारायणात्मिका'-विरोषणमं च मनसि आकारयतीति प्रद्यामः। 


5, . 118. श्स्तकः-शन्दल्याथल्तावव्‌ पारिभाषिकः । "करणः चुद्याः काऽ्त्य = 
` छमाना्धकशब्दौ । विनियोगश्च 'इत्तकानामभिनये । तेन ममस्तकरेति पो न कदापि : 


अनुसोदनीयः 


ता 


1.12, प्टपातता : (८८८६८76 द10४ (व, 56620८८्द व ८द) 
144. 566 ¶. 4, लद 20 : ४. ध 
145. 21146410, = 4, 262. (74/64 तॐ 24. (21.) 


146. 4201745710/400८70 4701. १8६. ०, 69 (59806, 1926), = 22-442/८- । ५ | 


` 0 3, 44, 1) 54 8063-8 16, 1 ४ । | 
1. 4. ७0012118 20 : ¢. ६, 


( १०३क )-महाभाग !-- सा स्थिता ।(१-४) ---- तस्याधः-- ! -श्चर्ट! 


[ 5 ] 

04. 119. 120. 'अभिनयदपंणे '+5 नन्दिकेश्वरविरविते' प्रथमद्खोको द्विराधृत्ती 
 वत्तते! तथा द्वितीषाधेपरिविस्था श्लोकान्तरं वारकमस्ति । श्छोक्वयस्येतस्य उद्रिण 
अस्मन्मते दक्षिगात्वमूलकत्वं द्देवतामूतिप्रकरणत्य प्रमाणीभवति, प्रकारान्तरेण । 

यथाशक्ति सवषामपि अनेकेषां वा, पालानां विचारं स्वा, अन्थक्तो लिखनरीतिमधि- 
छरत्य किचित्‌ वक्छ्पमस्ति। द्देवतामूतिप्ररूरणंः खडलनमानत्रमेव । यथेच्छं हि म्न्थङ्रता 
पुल्तकान्तरस्थानां ध्यानानां परिवत्तनं परिव्ध॑नं च कृतस्‌ । तन्न तन्त्ोपासना-द्लाछ्नादिभिरनु- 


मोचते समथ्य॑ते वा। तेनाल्मन्मते शिल्पिनां कृते वण॑नात्राण्येतानि, न तु ध्यानसूपाणि । 


तेन च सर्वथा बेतानि प्रव्यक्षरं म्रहणयोग्यानि । 


अन्यदपि वक्तन्यमस्ति-आदशुस्तकं प्रतीको वा भूल प्रमादबहुखोऽपपास्पूणेश्च 
दभ्यते ! मन्ये, द्वितीयस्य भद्ंस्याभावात्‌ पाडोद्धारो न सम्यक्तया सिध्यति । 


॥ | 148. = दि वातल वा28 ददवव (व, 21100037 1105) 1 1 
. ।  ©98. ०, 5) $¢ 37 20 247 ; 36 ६ 


॥ 
। 
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तला पती कलदुल्लौ$्ट ]कसकाह [1 8 कि त शसक 0108, 
(1८110117. (1115{.- 3111 1117, वा लस छा श्ला (४. 9-2). 11८ वाल्ला 
(ॐ 111९ ललास) {0 पला {16 कल्या रएठ वला तपत्‌ चिल्ल 1) 
{ला1])]९9 ११९ प्९{ छाल (५. 2.{--27). | 

(116 1४ (0ा)ञ 379 0{ 64, हा -86्ला पलास ५८८1६ 
1111208 0 पपात) तात्‌ 118 ावा1{समप608 (क. 1--7) ; 
[18 (050 (५4. 8) $ 02 (6 [लप वात्‌ तन्वा $ (€ [काति 
ग छाल वद्या तलाः आ 8 {लप16 0 णोत (८. 14, 15) 

1211६ पदाता 0 ता) (4. 16-20) 

(6 {लुट [08 ज सिताकत वा८ प८( वृलस्लतल्त्‌ (, 21--34) ; 
{16 [000 ग [८ इलव तवल् 416 06६१९1१) ८. 3585-3) 
कात्‌ प्)€ शलाद्या{8 ग सत्ता (४. 38--4(6). 
| वट 16 ल 1214161६, 1141 ८01(111/॥05 = त16 वृछहलनएल्त्‌, € 8 
(4. -{5--38) ; घः २1:0 {€ ला छपव्वाप्रऽ 0 तप्धान॑ला ३, 0व-111/८-112/615 

(117 ४ ०६३8 शाना पी ५ रणा 8ा9त्‌ लकरः ज 118, 
016 [पता.स्व्‌ २४्‌ असल गलाः, = | 

116 7 {लए एटा (ई. {--6) शतप 1116 उपात्त ज वा 
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 पपद्रा्मल्त्‌ 108065 916 {0 96 शद्व्लुत्तव्‌ छः ए6ुद्ल॑6त्‌, च१६ पल ९1एल) (ॐ. 7) 


1116 1168{ 86९1101 0 {176 (हठा 1ठातााई ` ज = $, (त 
211105411-11171110414 03 दाप्प्ालाप।€३ [6 ताह (पता) त 116 011८६, (दव 
रा [क्षत {0 {6 एक्णलयह 08 (5. 8-- 18) वत्‌ #1€ र्वृ ग तापन 
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वत्‌ इदद्ग ग इत वका 5101068, = 5742/12114-511द-/01:/182 ; (अ. 15) 
116 ऽपता{8016 {ज वपते 6 उप्ाछि06 868 (८ 16, 17) 101 8{0068 216 
छाल ; कड 2180 106 पऽ भ6 क 06 (&. 18--20) एधा वलक्ष 
1110ता0दकी0ा)8 (54. 21) ; 116 वािष्का९८8 7 लना कफ 10 एवाव) 
1 ९०105 (&. 22) ; शत्‌ प्ल कल्शृृल्लक$ठ पद ९ चद्ट्गतृण2 0 पथा = 
0 (००8 (ई. 23, 24) ; 1 176 [गणगौर #6€ काव्या, (कव ' 
1114411171044008. ४१५ 


[0 1 त 1/1 
(पावा पि 068 ग दव्तवर वा€ वटलन0९्व्‌ (ॐ 26--36) ; प्र€ वालि्ा०&8 ऋ _ 
1त1116 द८८ठ्ता7् {0 (गछतां शत्‌ तला व्यत्य ल (५. 87-40) ; 
षट [पप्तह त एव्व वत्‌ कलाः एकडा पालि 0 पणशफ | 
(ॐ. {1-43, 45--51) (¢. 44) ; धत ला क्व्धक्ड म शहा 816 
1७5८19८ (द. 52--60) ; ` ध€ [तप्र लपृज्डपा€ ग ८५॥१८९ (&. 61) | 
घत 16 88 ७९. ग प ध्या (अ, 62) ; ध6€ शगनलतप्रैन ग 
16 5741-0 81006 8 प्लस एकल, 1. 


{1 (€ गाठपंपह इव्लौता, कद्कीलपाक्षः धाह जा ाद्प कपु 
16 008८106 -- शद्रा (&, 69-71) ; क्वाय, (&, एद) ; (वपि 
एतवप्छ्षय, (इ. 78) ; दोरु (अ, 22 - 74, 77-8१, 88--85) ; ध्यव 

१२, (4. 76) ; वशग्डक्ति० (&. 86--90) ; शणपाा> (अ. 91-93) ; 
#1६ष्वाना0९ (अ. 9--97) ; 4 पवि (४. 96-101) 11/91 3/1 1101 111, 
(८. 102-105) ; † व्राता (६. 64-686) ६त ६06 ताऽप [पठा 
रज वप्स्ताशत वल्ल 1 एए (द (. 106--109) वणते 6 
तल८न]000 0 फादापह वर्लातुद्8 (8. 110- 115) 


। लुटः छव्‌ ज 010. 1 घ [दद्द णल्‌ वगा 0 
169, ०6 [प्पराताष्ट्त्‌ पणत्‌ अङक्ति-पा € एला३९ वत्‌ तृतसला068 = प6 1९६ ग 
द्विता भात्‌ प्र भत, {04 | | 


त प {लप रलय७९३ १९ तद्दि § 0 सिवत णुद (&॥, 1, 9) ; 4 
| रज शद्वपादवछत (#. 8--5) ; ज 42108, (&. 6--12) ; 0 1 वपा ॥ 
` `. 13); ग {62 (४. 14) . 1 


दिक कल तरूव्ल्त्‌ किाक्तपौ्छत (& 15; 10); पुष्क | 1 | 
 (&. 17, 18) ; [दापएल्य६ (क. 19) ; 4९10, २ (<. 20) ; सिपीवपृीति 


८ 2) ; ¬1410दव०ा (छा, 23, 94), रिवत्र (<. 25; 26} 


| [ला का6 दएला वल्छल00008, ८८6 श्ल]¶, = 10140 5115928 
(<. 27--30) ; 91 [1द्र- यास्या (51. 81, 82 ) ; एतदित्य्‌ 
(५. 33, 34) ; 1९150 दा ्ाप्ला8 (५. 352) ; जिर्य-पि दाद्रफष्णाय (४. 36-- 
41); प्प] (2८. 44, 43) ; (उठा 2) पन्तय 
द्वाव (५८, 4-4-46) ; = (वण्ताक्रा्व- करणाद (७८, 47, 46) ; 
40411 का18९8, (०८. 49--51) ; भात (०. 54, 535) ; (कका कय 
(५, 54, 55) ; (विधात - प्रभवता (७, 26, 57). 


ठ) € पाणा ग दिव्द्त्पातः ऋत [कलाया छाप 52; पात 
{0 तकालिला कघातला€इ. ण 1018068, भा1द]1 ०6.०0४ 4६६८१19६, प्य ४१८६ 
६0.06 [00 {णारा [रत्र 


1116 171५5 णिक {€ इत्र] ग चा लाक्नाषह [लाटा 8€८ागा 
(1. 59--15>) ; नट तारलिष्लणाः फलद उपृ्प्पल्लः {0 पल्ष 
1100.11005६5 816 8४ हाष्टा (9. 59) ; = प्र6 [णु्रजाऽ ग ऋरलय)]1€ 
1200८/(1६८5 (०८, 60) 8 [लाः एसा € (०५, 61) चत 1८८10२८5 0 
169१8 (¢. 6%) ०6 पशा. 

(16 [गग ्०पः = 004008८5 1त्‌€ ० पण (७4, 63) ; ॥प्ल 
ष्छा16168 (७५. 64) ; प उप्सिह वः त पणय (4. 69.66) $ प्रलाः 
लाका्लला8८ः (5, 67) ; 06 इपाप्म16 08 ° एणाताषट् ज ४८ श्ण 
05 [त1त्‌5. 0 10४८5८5 (.&. 68) ६८ व८६८५।0९्व्‌ 
| (ला, 96, च्ल [णगा्गाऽ 9 (116 81006 ॥॥८(4४८८> (५८. 69 

70) ; ला पएथप०प क्ा68 (७. 70-- 74) ; ध एष्णृमक्रजफः ० ६६ 


111011115९5 {0 {116 8४6 ° प्र (लपु (७५. 75--८8) प्त (0 पट ५८/९८ 


11/00} (९. 79 -- 80) ; प1€ 8126 9 ॥€ 212111५ (<. 81, 82) ; € वाण- 


8075 ग घ षाणड (<. 82, 88) 

व्ल परल्क-0, 118 ७6 लृप य्त्‌ [ष्णृमठयः (७1 
 84--86) ; 6 (करक -वव, 165 लुपः प्फत्‌ [णग (५. 8८-- 
88) ; ५6 ए ८६०-८-401(0८8 16 ०6६ ९856९106 | 
| € 4^शणण्ड्कटम्‌ ल्छञवलयक0ऽ 88 एटटुधात्‌ः वला 06 0 116 
` 101४4९5 . 6९. (€. 90--94) ; ध्र कप्रुरलं०कः 25 (<. 95) ; ५८ 


` लन्ल-एंऽ6€ शू पत्‌ 106 दनतपाली काट (०ाववलंएढ 0 वदप्लः 
(€. 96) ; ध€ पल्लव ग ऋशनवतष्ठ 17765 00 व 11105 ; 16 शीघ0€ | 


भक्ष पणाजः एषठ म वयाण्ण्छ (ङ, 98, 99) ; ४७ ष्व्‌ ब्धः णं 
| 1004८5८5 (०४. 100) णत्‌ 6 णगकीजा३ म लङः] कमत ए००व 
५4५५८ (<. 101) {जा०फ, इप्ल्त्छञएल्‌ 


(^ 67 -. 


(1116 € इप78द्ला०प 38 लछणट्लाक्रह 0 271-11411/48. = 1116 [1868 
0 01010 ७ (क्व 14८4८5८5 (६1. 102, 103} ; {€ ऽलघ्लला ० 7126 
(1141५ (]. 104) ; (€ [ष्व्‌ @एत्0८45 (६1. 105, 106) ; 1176 (छती 
{1018 11 €शला। [16९68 र 8६016 € ३०८1€त (8). 107} ; 116 5घ्८6त्‌- 
1688 0 दल, {ताप वका 1१८९ प {80ल्षला (६. 108) ; (€ शद्‌06 
(0715 1161 21४6 द्ध), ५९. (4. 109-110) ; (€ अवलष्वालः ग 
(1670/1.5, एक्रतल' ६11 लगाता; (६. {1 1- 114) ; ६५16 काला ° 10509 
{17725 (81. 115--121) ; {€ धमक ण जणा 62125 1109179 06 
{0 पाला ८5145 (1. 122) ३16 ५७8८+6त्‌, 10 (तल, | 


116 (ाशावल(ला8्टउ ० इच्टानट्तव्‌ धाऽ ६४४६116 {0 =} 811111168 
(‰, 123) ; प< परलाह ग पथतण४ [षवप्रो 10 ध€ इवा6 (अ. 1219) छात्‌ 
४116 51118 {0४८ 5†दुणुणिणष स्लातञड फाल, पाति मलौ सिष्य 1 वःव 
(ॐ. 1%4}) ; चष्ट [ष्न्ट्ल्वृपाऽ ग लंप्ल्पपासताषट इव्लत्त्‌ अ ज 
11116; (ई. 125) वप्त्‌ अृष्लंष्‌ कठञतललाऽ प्रा एद्‌ #0 वृ 18, 81111168 
(४. 126} 16 वााद्ल{0ाऽ {0 ला (6 पवः व्गातता 1414106 


51101110 14९6 (9. 127) ; {€ लात्ावलल#द ० ष्तच्छ॑थु$ 6८.) ( 128, = ` 
129) धक्त्‌ ल्वा ५८.; ` ६. 129-- 13 804 150) ; पात्‌ ज अपाल्छ 


(ॐ 1:33) 6 ण्ट. 


1116 वाष्ल €. 118 01 २ (7/4 € (¢. 134--138) ; ॥€ वाष्ट्ट- = ` 
1100; दक्षाः पह धल (10/40 1८ 100 त] 0" 112 (&. 189) 


वत्‌ त्यः 0 (७5€ (. 1-{0) २१6 १६६९५०९५ 


{116 पतल ० एल्वलडयऽ (4. 141, 142} स्यात्‌ प्र6 लावान ह॥८३ 


0 {16 तार्वलालणा एल्वल्छ्णऽ (&. 142--1-46) यत्‌ प्रलाः कृल्‌ वगा 


(ॐ. {7--146) ; (€ व्कल्ट्०छउ 07 - फारत हद €९51१्‌5, (0 06 कग € 


सवा नुव पत चठ व्षः (अ 149) ; पाल लवालल्यऽपछऽ 01 
11111041 (ॐ. 151) ४0 #€ श्म ग € तारि 1266; 
(५. 132) € (९5८ ६्त्‌ क | | 


हद, 96 पच्छल१८त्‌, सिए२ (ल्फ पप्रा ०06 4001. 153, 154); = । 4 
६८ पाध, प्रा 40०8 (५. 15 5--157) ; तात्‌ (16 कपवातात्ाऽ 608 प्ल 


` लक (. 158, 159), 6 -इ०प् (&, 160, 161), ४6 फः (६4. 162, 168 


२१ {€ मर (४. 16 ))5 , 6लद्दण्लक्क ; कत्‌ वशङ्कः ॥€. 


[0प्तगाड 0 #€ यप्रफ्म्‌ एलृल्‌@ः, ८2१५१८5 {0 तत0७३ (&, 166, 16) 


` +€ [ल्ह 9 प्ट पणव) 10 ला, पला प68एत्स्र १4145 = शकाोत्‌ = ५ 


10 ण @&. 166) 


[ 68 | 


(लः $, लास ० 24 5कलपक-0णाः एलाम& छः 
 पट्स्लाप्माह 0 (ट कला्ठपाः व्प्ठ (वत तात्‌ पाला 
वलतः कतवर कात्‌ 4६ (16 क्षालः रा प्ल {एला कणिता 
तोपा (4. 1--3) ; पाल कल्यृल्खाष्छ [तता व्गजपाः (, 1), (लाः 
` (1011८105, वधः (+. 5, 6) चत्‌ (6 [नाकः ॥धा810108; 00045 0 19110 
(&८. 7--9) 0! ५१€ तारलिलण च ढः ; पत्‌ प्रलाः षा-करल्ड8, ददर 
` & 10, 11) ता€ शष्ट 


€ जानक, 16 प्रलणलह ग {€ #तइद5, (व वलात्‌ पज ४16 
६९ा*ए16€ 9 {16 41/1८48, 42110125 044.04-4/1/4545 (5. 12, 13) ; {116 लपतत 


{021९ वरल॥&ऽ {0 {16 4711015, 6201141८ 05 (४. 1-1-16). \, 


11€ ल इपःऽल्ला०ाो तलत पात्री तललाा्राः 116 1/4॥ह८5 
धरत {116 0579075 01" ल्ली कक्लादाः 18, 11 तइत~] 51007- 
10211 05--1116 तप€ पात्‌ 416 लिट पलातन 0" (€ {लाक कपा 
१।८४ [06118 छा एला 1 [वः (६, 17-68) 


(लए 18 ‰ 8८८० {एलुरल-द्ात्‌ट्त्‌ पवपालक्क ज (पपक्थ, वलः 


 ल0ल्व्‌ (+. 66-68६) ; 88 8}80 {1८ 01 {07 116 लशा स्लातृक्छि 
10 ॥€ {7141 ढ/4+ = ध्र16 कन{-ट०प्ा्णिल्व्‌ 006 (&, 687, 69) ; वत्‌ 6 
ला वा्सलाा5८8 ग 16 लए कलवान ६0 वृ्लातवाय (&, 70-73). 


(व # 1 सात्‌ प्ल [वरौ (छपा 112, 0प्रलीपाातकट्व्‌ वपात्‌ 


{५१८ गला ६९६) (0ट्ल वा 15८ साका प्ल पतती तटहलतजा६ त 


` {ला} 4665. 1/८1{-111701.11-((८/50.4118 


व< गुघणाद्ठ एला (, 1) €< 116 एदल वल्लनएप्०ा 
` 116 [11908 (लात, (त1 0100 5 त1/4-1015012401 ~ {ला {गाठ 
{6 पाः ग [ल] तालिला( गप्ला€ऽ ०. (लवणे (अ. 2), ४8 एल्‌ 
98 लाः वर्छलतमाऽ (+, 3--14) ; प्ल कललः आ २ शान76 0 (वणन 
(51. 15--17), 204 {76 कौ{दतवद्ा5 10 (वपते ( 18--20) [वष्ट ल 
2708 1661 ५९६९१९५ | ,\' | 
| (€ ` प्ट इटलला (अ, 21{--35) पल्ला 0९ दष्फद् (६. 21) तपत्‌ 
४ वार्छिल फिनः प्रलव्ना]0 & 29, 28); तपनाय (&. 24), 
 एशातपपफतृत (+. 25), ल्लाहव-हयएथुवा) (, 26), प्रल्णणोत (&, २7) 


ए एध-एवाव08४ (५, 28) ; चा6 तलत6ऽ 1 8 शाल ज (कवल्दध ; #6 


4 | प्यति म तष, (४, 30--85). 


[6] 


106 10110 शव्लाना (&, 86--42) वल्म३ पी (रक्तकाले 
118 (एलृरएल-1क्पत्‌लत्‌ षा (=. 36--40) ; ध"6 कठनशात्‌लत्‌ मप (#, 418) 


` ध्रव प्ल एिप्फनऋ्त्‌न्त्‌ जला (अ. 411, 49) ३16 तञ गम € 


(116 चलः व्लीन तकल (&, 48--468) € € तलि ` 


{छपा ता वा सदष्ठ]र्‌ पत्ता लप तलक, पववद (2) पा 
{16 शुरच्लप] लावारकलन6ः ज व्ल [क्प्ल न) (&. 44--478) 


11716 पलप इल्ला आ 4758) ल्ह ज 116 इण) ग 


116 लिप तवला्ठः, -पकहवता् ; वालाः पव्168 ( 47}-- 409) ; 


[ला 1्ताप्ववपव वाक्ाललकत्टः (&. 49--238). पोः + 10106 प्र 


त6इलन0प्०प ग [९ इलाकुत्च (अ. 59, 60). 


1116 € 5861100 (ॐ. 61--76) वल्वइ पाध् 11€ भनाालःः 
11 2--ए110 पाल लटा (<. 61-72), वारव (. 76), (81668 
(8८. 76) धाव छालपधा त (&, 77-78) 


[16 € र्ल्लाता वचला068 6 {एलृर्ठ वारिण 0 


(५. 79--55) 0 छिवारष्वं ; काला" एजलाल लृाका्चरलालः (४, 79) चरत्‌ 116 


वा (पाता लाकाललनर68 0 व्वल, [प्वारातपाक (॥ 80--85). 1116 
लशोप्छा-क्ात्‌ट्व्‌ {ताना 9 वतात्रसछय 18 तरलन०९त्‌, पलप (४, 86--89) 


1116 € हव्टाता) त€हलन्‌0€8 116 [एला वतवल्व्‌ का ग (गाता 


(६. 90--94) त्‌ {16 व्दातक्ऽ गं (त्तु (४. 95-- 160). | 
{116 तल, वल्डला0ल्व्‌ €, 18 [वष (८. 101- 106). 11115 


73 {910 क {गद्या (४ 107, 108). वाला, 28 कएल, २ 


0९सया]011010 त € वलति (र द्वक्दप्पण, ात् (ला [द्तव्‌5 (क. 109--117). | 


(16 पऽ€ ग [डपाठः वत्‌ हठञापाठः (#. 118) ; वात्‌ ग कल ण्ह = 
पऋला{8 गं 1116 [वप्त्‌ः धात्‌ लु€8 [0 € कषपाु०€ ग (वाक्याद्‌) च्ल = | 
णा (8४. 119) ; श्त {€ शृव्लघ] प््लामा ज 6 तारिप ए0वा{5 (1 
1116 तप 17 12411९6 (ई. 120)--0ि्) (€ दलडाण्ट्‌ एश, = व116 [वः {फ्0 
(^, 121-122) एला३€३ (काका 106 वप््ाला8 20010 9 1111 (€ 


(0 अकत; 804 € फि्‌ [लल्वालमा, 


(0 ता.एडाठ 


८५३ 145 ल्ल लुलव एम प्ाल्त्‌ तफ, #ल लवन -014110414- 
2001010 0 ` 1144 1दरत19; 16 4101414 स0 मा सितरईल79, 18 8 
ध 1111 13 | 

(116 क्राप्रणः 1848 प६९त्‌ पाका (€ एल, 06 178 ल्ल] 1006106, 

` परां 78, कौ [5 पता 16 पलम्‌ पला एलवता0०४३, = सिप्‌ वाधा९३, 98 धि 
88 {1९ 00प८छना 16 0001220 &404त5, 8८ 106 वप्णालनऽलस्त्‌ [$ 6 वकत 
01" [1083818 1148, - {ए6 0011, व्रलार्ललल [र्ठ प्€5€ एला 2४ एवमा 
छकग व 66 तठसलपीम§ क 1024268, 0 16 दपावत्माल€ 0 का्ा88 वात 
111€प 416 201 ६0 16 #षप्ला {00 नहगतडङ, 01 {0 06 10110 त्त {00 [लङ 

{116 छपर वलाा०ारावल8 5 सपिद गु 9 14/70 लला 
01 1 द्रा] व्रडडा71112{00॥ जा 116 का त {€ वारिना इलाह ; छली 
1116 वद्षा18, वलः पा८ प4नल्व्‌ च (कौशूलाणतड 1८८. = (5 ए€ [186 
101 01] 6 प्रला-काठप्ता तलत 11*011016 द्ध वालदवात तात्‌ 
1116 ^ वााव-दि द्र्वा [05 एष 2150 इपलौो = लकफणल।९ णिहि 985 {6 
| ९ 111 › {116 [९1६15 र वाद. 
करि जण, एत [वक्ट इप्ला तल्ला 88 सिर्वरिदवाप्तवए0, 
पतनं प्रपवत्‌, (त्क 2) पपन -व-न प्ता, (त्राता 
सि्नितासापज विका --16षलाप ८0३6 वतणोकसपपा€ 0 सएव, पाह्य, 
कषा, रक्ताय, वात्‌ (वप्ता; [णा ए6 काह (णत्‌ ज पक्ति ~0 
तवालिला( 1108068 त्त्‌ एष 6 लगफण्राीणा त ए8 पप्रत्‌ 
वोता द्--णपला [र्ठ 101, पाठिपत्वल्‌र, [दल वललम१त्त्‌ (107 {सवा 0 
[0 [पा प्ला चाड 06 [लाक पता) द्याव). [६ 18 
{0एलषल, तगर 1 फ ॥आ€ तल्डलनल्तव्‌ 108 पलट वर्टापक्षाङ फणः 
` शग]7])ल्त्‌, सिव्तदवाषव +ला इल वव्लतवृङ {0 16 € प्ल 7 प्ल णर 

पिव) ककु त्वार 16 व्ठ 10 च्ल ]ल्ल्नाल्व्‌ एता वत्‌ 16 
एतालालः ग व्णऽ एल्‌] -1ता0्ा दलः, 10 16 106 10 पफ16 छपा 
{1118 [{(तलाना ६0 {€ 0410. = [६५४6 त्रल्‌ {6 १० पार फुर, 28 
€ 88 00881016, [आ 8918 ग € [0116008 रज 6 कत्‌ 10९९३ 
लट. क पु वरु0०8्य्‌. 1 अवा]. 06 [द्टणङ्ग 29996 1 1४ पा] एद म भप 


इलयक८्€ 10 इत्वलाछ ग #6 इपष्लं 


318६ 12119) 1241 8. 


` प्^रा745 11111२५ 
2.4 7एवापार 214 प न | | 


 आसनल्थमध्यमाधमप्रतिमा- 


देवतामृत्तिश्रकरणस्य 


दिषयासुक्रमणी 


विषयाः प्राज्ञः 
१.। शिलापरीक्ञाध्रतिमप्रमाणगुणदोषा- 


धे, 


इताधिकाराख्ये प्रथमध्यये [ १--३५। 
ङंछाचरणस्‌ | + 
शिकापरीक्षा न 
शिकामेदेन कर्मभेदः = ..“ ४ 
शिखाव्थितिक्रमेण प्रतिमा- क 
 हिरोविधानम्‌ ~ ७ 
भाङ्तितो भराह्यरिदाकथनम्‌ ,.. ९ 
व्याञ्य-शिलाकथनम्‌ „^ 
` वणतो ्राह्यशिलाकथन्‌ 9 


गर्भ॑गृहमानेन ज्येष्टादिप्रतिमा- 


| बहिरायतनल्थाप्या देवताः ,. २३ 
अ्भप्रतिमालक्षणम्‌ = = १ 


शिकादाहरणक्षणः ` .. श्ट 
प्रासादमानेनोदधु स्थज्येषप्रतिमा- | 
~ चक्षणम्‌ ~ १३ 
स्थप्रतिमाया मध्यमाधम- +॥ 
` मेदक्थनम्‌ ध ५ 
` भासनस्थोत्तमप्रतिमापरिमाणष्‌ ... १९ 


एषां श्रान्तिनिवस्यानिवस्यत्व- 


परिमाणम्‌ ५ द 
द्वारमानेन ज्यष्प्रतिमापरिमाणम्‌, = | १७ | उतपातविशेषल्य प्राणिषिषेषे 


मध्यमप्रतिमापरिमाणमर = „> १८ ` फर्दायकत्वम्‌ = ३२ 
| ५ कनिष्प्रतिमापरिमिाणम्‌ | | 1 99: | उतपातानां फङ्कालः =" ८ 4३ 4 
 गृहपूल्यायाः प्रतिमायाः परिमाणम्‌ ९९ | एतेषां शान्तिः = * =» 

 देकगृ्ोचितप्रतिमापरिमाणम्‌ „.„ >? | चान्तिकम्‌ = = ग ` % | 


| विषयाः “~. प्रङ्घः : | 
बहिरचेनीयप्रतिमापस्मिणम्‌ ... १९ ` 
तत्रचििषः ^ २० 
देवगृहमित्यादिनिेयः =. १: 


कथनम्‌ [ ति ५ ४ १ | । 


| छभप्रतिमारश्षणम्‌ न १. 

अद्धतम्‌ ॥ १ ०; 
| भन्तरिकषाद्ुतम्‌ = „+ = » ` 
 भोमाद्भुतम्‌ व २७ ् 


1 
देवोचपाते राज्ञो विशेषः „ड रद ` 
शिद्गादिवेक्ृतं ततल = „~ =» 
| तत्रविंशेषः 4 
| अर्ाविकृतं तत्फल == „~~ = ` 
अन्यानि वैतानि ~ ३१ । । 


न 


वस 


` कमरासनः 


पितामहः | 
+: | | | मह्या ` | ००७ | ५ 


| २ ] व 


विषयाः पत्रा 
२। प्रतिमातालनिर्णयाधिकाराख्ये 
दवितीये-[०२-- ५१] 
माननिणेय | ४२ 
तारूमानक्थनम्‌ प ४४ 


ताख्मानेन मूत्तीनां क्तव्यता .. ४६ 


तालाञ्सारेणावयवमानम्‌- 


 सक्ततारेऽवयवमाननिरूपणम्‌ ... ४८ 


| 


मध्यमसक्चतारेऽवयवमाननिरूपणम्‌ ` ४९ | 


 अष्टताङेऽवयवमानम्‌ = 
`  मध्यमाषटतालेऽवयवमानम्‌  ... ९० 


नवताठेऽवयवमानम्‌ ध 


३ । प्रतिमापदस्थानद्रषिस्थानाधिकार)ख्ये 


॥ तृतीये-[ ५२--५८ ] 
देवतापदस्थानम्‌ ४. “ध 
 देवताहष्िस्थानस्‌ ४ ~ 


 देधता्थापने दिङ्निणं श, | 
ध | सुयप्रतीहाराः 


` ४। ब्रह्मसूयंनवग्रहदशदिक्पालाधि- 
` काराख्ये चतुथ--[ ५६--७३ ] 
 विर्वकमा 9 ९९ 


धिरिः ४ स ६ 


नाकिनरी 
# 00 


यद 
र यशि (अनिः 


--------------------------------------------- 


विषथा 
बह्मायत्नेऽन्यदेवतापदम्‌ 
ब्रह्मप्रतीहाशः 
द्रादश्च सुयंमुतंयः 

(१) उधामा 

(२१ भिन्नः 

(३) अथेमा 

(४) शः 

(५) वर्णः 


 (& सयः 


(भगः 
| | (८) बिवस्वाय्‌ 
९) पूषा 


| (९०) सविता 


(१९) त्व 
(१२) विष्णुः 
सूर्थायतनम्‌ 


नवग्रहमाः- 
चस्् ४ 
मोः 
बुधः 


बृहस्पतिष्ुकरो 
शनिः 

राहुः 
केतवः 


अमूर्त साधारणविधिः 


वशदिक्पालाः-- | 


प्राङा 
६२ 


च, (१९) अधोक्षजः 


ईशानः 
 ५। विष्णुशालग्रामशिलापरीन्नाभेदाधि- 
काराख्ये पञ्चमे-[ ७४--&६ | 
व्णविशेषेषु मूर्तिभेदेन दिष्णोः छ्युम- ` 


अवल्थामेदेन यूर्तीनां प्राद्याप्राह्यत्वम्‌ 


विष्णोश्वतुर्वि शतिमूर्वयः-- ` 


(९) केशवः 
(र) मधुसूदनः 
(३) सङ्षणः 
४) दामोदरः 

(९) वादेवः ` 
` (&) पथकः 
(५) विष्णुः 
८) माधवः 

(र) जनिक्ढः 
(१०) द्बोत्तम 


क्ख 


(९) जनार्दनः 
(१३) गोविन्दः 
(१४) नरिविक्रमः ` 


५ (१५) श्रीधरः 
। (छेकः 


(९५) शसि 


[ ३) 


पन्नाङ्ञः 
1 


विषयाः 


(१८) अच्युतः 


(श्दोोवामनः ` ^ 


(२०) नारायणः 
(२१) पद्यनाभः 


(२२) उपेन्द्रः वा 


(२३) हरिः ००० ८, १ 
(२४) छृष्णः ( 
चतुधिद्ातिमूर्तीनामायुघन्यासक्रम 


शाटप्रामशिङापसेत्ता- 


 आछ्ृतितो ग्राह्यज्िखालक्षणम्‌ =... ` 
प्रमाणतो ग्राह्य्चिखलक्षणम्‌ ... 
| त्याज्यशिलालक्षणम्‌ स 
| तत्र प्रतिप्रसवः 4 
। | वणंमेदात्‌ फलमेदनिरूपणम्‌ =... 
र  वणभेदात्‌ संक्ामेदः ^ 
| चक्रप्रमाणम्‌ „^ 


चक्रविशेषरखन्षणप्‌- 
बाखदेवः ` 


सडषंण ६ । ध | | | । 1.8. 


एतेषां पूजाधिकारिणः = + ` 
तनिचक्ररष्रीनारायणः = `... ` < 
| मधुसूदनः ८ 

दामौद्रः 9 
 दिवक्रर्दमीनृसिहः = ~ 
" 9 | दिचच्छसवोत्तमः 
| . (५ एकचक्र वर्णको विशेष | । ५ 4 ४ | 


पत्राङ्ाः 


विषयाः ` 
 यथाक्रममेतेषां एकम्‌ 


॥ हिचे चक्रनिबन्धनो विशेषः 
 यथाक्रममेतेर्षां फलम्‌ 


चक्रान्तयणि 


 ष्रिः 


एततपूजाफलम्‌ 


` न्षिहः 


ध कपिरनृसिंष्टः 
छदनम्‌ 
हयग्रीवः 
मत्स्यः 
जनार्दनः ` 


& 


श्व 


कामनः 


जामदग्न्य ४ 


 कोश्चल्यानन्दनः = 
ध. 


 चक्रप्रतिषटानिषेधः 


` चक्रविक्रयादिनिषेधः 
 चक्रप्ररंसा 
` प्तगाशनः 
मिन 
| । ^ नरवराहः ५ त 
प्रकारान्तरम्‌ 


[ ४ 1 
पत्राङ्ाः | विषयाः ` 

८२ । नरि 

,, | प्रकारान्तरम्‌ 
, । जङक्ायी 

८३ वेङकण्ठः 

,; | विश्वश्पः 

,; | अनन्तः 

99 त्रेरोक््यम्योहन $ 
८४ | विष्ण्वायतनम्‌ 


५ | विष्णुप्रतीहाराः 


9 # 9 


१ |  [ &७-१३० } ` 


८५ | शिवसरूतंयः-- ` 


> | क्षद्योजातः 


अर्धनारीश्वरः 


८ उमामहेश्वरौ ` 


0 कृष्णदह्रः : १ 
। » | हष्णकात्तिकेयः ` 


। शिवनारायणः ` 


„ | ६। रुद्रमूति-लिङ्धाधिकाराख्ये षष 


विषयाः | 
इरिहरपितामहः , 
सूर्यहरिहरपिताम्ः | 
चन्द्राङ्पितामहं 


धातुलिद्धनामानि 
धातुलिडे विशेषः 
 रलङिङ्धम्‌ 

दारविङ्मानस्‌ 


 दारवशिङ्गनामानि क 


 जिह्ोचितच््षाः 

दक्षाणां रक्षणोद्धारः 
 लिज्ञोचितयृष्टाणि 
शेरुलिङ्मानम्‌ 
शोरुषिद्धनामानि 
प्रासाद्मानेन छिङ्मानम्‌ 
ग्भगेमानेन शिङ्गमानम्‌ 
लिष्विष्तारः 

िङ्स्य ब्रह्मादिभागा 


 नागरलिङ्ानि [स 


ध द्राविडङिड्लनि 


वकरणिदगानि 4 ९९ 


` लिङ्गप्रासादौोचितनक्ष्नामयनम्‌ 


| तस्करा््॑ानयनम्‌ १ = | 
धनर्ण॑-योन्यानयनम्‌ क 
 धारानयनबर  “ ` ~ ` ११८। पी 


विषयाः प्राङ्क 


२ | तिथ्यानयनम्‌ „~ १९९ ॑ 
| अ््वचिषठष्‌ ,` "` 
शिद्धे देखाकरणद्‌ ` ` `... > 


छिङ्शिरोवत्तेनम्‌ | | 9 १. 


 दुष्टरिङ्ल्षणम्‌ ०० ० 
स्फाटिकिषिड्िमानम्‌ =.  » 
बाणरिङ्गोतूपत्तिल्थानानि =. >» ` 


बाणलिद्िपरीक्चा „= १२१ 


वज्यजाणखिड्नि त 2 


घ्थानविशेषोतवन्नपाषाणल्यापि पूल्थत्वम्‌ 


यथातथाऽवत्थितस्यापि बाणस्य प्राशस्त्यम्‌ ,› 

भोगदबाणरश्षणम्‌ ८ 
 सर्वावल्थास्वपि बाणस्य पूज्यत्वम्‌ १२२ | 
बाणस्थापनप्रश्चंसा 0. 
-एकाखादिबाणमाहात्म्यम्‌ „~ १२ 
शिवतीर्थोदकरक्षणम्‌ 8 
शिवतीर्थोदकस्यं पुण्यजनकल्वम्‌ ... =,» ` 
शिवती्थोदकखहुने प्रत्यवायः „~ +» ` 
प्रदक्षिणनियमंः ॥ ०००. ॑ 9 ५ 
नेनदेवाख्ये विशेषः =. +» ` 
| प्रणारुदिङ्नियमः व, 
पिण्डिकालक्षणम्‌ “= 
तस्याः स्वजातिकततन्यत्वम्‌ ... ए 
-अतान्तरव्‌ - 
| पीठानां सन्विस्थानम्‌ = =  »» 
(प 
` | प्रगाख्मागक्थनम्‌ = ~ »» | 
लातविषानम्‌ ~ ` 9 | 


५61 


विषयाः | पत्राङ्ः | विषयाः पत्राङ्ाः 
किङ्यी्योन्यू नाधिक्यनिषेधः ... १२९ । जिनानां वर्णाः ` व 
 सयौन्थंनाधिक्ये दोषः ...  ,, । जिनानां धवजाः ए. श 
पीक्किमेदास्तन्नामानिच  .. १ | जिनानां नक्षत्राणि ०१५, ॐ 
| जिनानां जन्मराश्षयः भ 1. 
जिनोपासकवक्षनामानि ५ 
जिनानां श्ासनदेवताः श 


` पीठिकारत्तणम्‌- 

(  स्थण्डिरा .., १२६ 
` पूणंचन्द्रा क 
व्रा ` ट. व 

 ष्द्मा | शि च 

अर्धचन्द्रा क 
` पीषकिनां स्वजातिकत्तव्यता ... १२५ | 
प्रणारन्यवल्था श ५. 


अपराजिता र 


शकद्वारक्षिवायतनम्‌  ..* + 
चसुंलक्षिवायतनम्‌ ~ १२८. 
४ | पूर्व्॑रतीहारो | 1  \ इयामा 4 १३७ 
६ दक्षिणप्रतीहारो र % | मातङ्खः ् ५9 
 पृ्रिमप्रतीहारौ  » | श्ञान्ता | (1 
उत्तरप्रतीह्ठरौ |  „ १२९ | विजयः ४ ५ 
काहनविधानम्‌ | ०० ,» | शकटि प 


बाहनट्ठकथनम्‌ ... १३० | अजिवः 4 


७। जिनमूति-चतुविंशतियक्ञयत्निण्य- वं 
धिकारयाख्ये स्तमै-[ १२३११४२ | न ४ 
एतितीषङ्राः -  0१ | प 


अत्र ४वाचकाः शब्दा यल्ाभिधायकाः सरौवाचका! शएसख्नदरैवताभिधायकाः । ` 


नि ध 


[ ७ |] 
विषयाः | पन्नाः | विषयाः  पत्राङ्कः 
शात ध मूत्तिलक्ञणाधिकारवख्येऽष्रमै-- ` 

मारः | त क | १४०--११८] | 


प्रचण्डा ( टी० ) 


विदिता 


वात्ताः 


५ भृदटिः (यक्षः) 


गान्धारी 


गोमेवः 


ध अम्बिका 
५ पावः 
पद्मावती 


` ` सिद्धायका | 

`  द्ितीयभेदेन च श्वरो 

 निनप्रतीहाराः ` 
/ एषां स्वरूपम्‌ 


| गोरीमूर्तीनां सामान्यरक्षणम्‌ =... 


» | गोरीनामानि- 
१३९ | उमा 
% | पार्षती 


99 तौर 


 %» | छङिता 


99 भिया 

9 क्ब्णा 

99 हिमवन्ती 
श्म्भा 

| स्ाषित्री 

` | किष 

| ो्यायतनम्‌ 

98 | लयः प्रतीष्ठाराः 
गणेक्ञः 


99 हेरम्बः 


। 9. गजाननः 
| 99 वक्रतुण्डः 


 उच्छिश्गणपतिः 
हेरम्बः 


99 


१४२ 


४7 क्िपरगणपति 

+ | गणेश्ायतनम्‌ 
 , | गणेक्प्रतीष्ठाराः 
„ + | कार्तिकेय 
^ १५२ | दादशुनकारकियः = ~ ` 


द्िुजकातिकेय 


श्ट 


विषयाः . 


चतुभंजकातिकेयः 1) 


 पद्चरीख्याः 
| नवदुगाः-- । 


चण्डिका 
` दादश सरसखत्यः-- 
`  महावि्ा 


| | | - | 


=“ ११६ 
१९४ 


4 


भ 


9 


[इ १, ध १ ४ ९ 


९ 


महावाणी 
मारती ` 
| सरस्वती 
आयौ 


राह्मी 


महाधेनुः 


वेदगर्भा 


| रवर 


महारक्ष्मीः . 
सह्मकाली 
महासरस्वती 
भद्रकाली 
चण्डी 


चण्डिकाप्रतीहायः 
छक्ष्मीः 
महार्क्मीः -- 
कात्यायनी 


रत्ये संस्थानवेशिष्व्वम्‌ 
हस्तादीनां रसाभिव्यज्चकता 


नृत्ये आस्यादीनां प्रातिल्विकपिषय- ` 


निरूपणम्‌ 


¢ %@@ : 


8.21 


्न्थकृतः स्वाहृद्धारपरिहारः „„* 


ग्रन्थलमािः 


बिषयायुक्रमणी समाता |. ` 


विनो न शि 


`® 


ग्रन्थकततेमंङ्खाचरणम्‌ 
[आदो यः सूत्रधारच्िभुवनस्चनासूत्रल्यस्य(स्व)रूपो 
येनेदं देवदेत्योरगधरणितले पवैताकाशरूपम्‌। ` 
खष्ठं चितं विचिक्लं जगदिति सकट जन्तुड्त्तादिसवं 
वन्योऽसो खष्िक््ता सुरदनुजनरेः स्विद्याधरादेः ॥ 


4 कृङ्यवक्िल्पै ह ^'वृष्टाघ्वनिखमोन्नादे”"ति (अ० ४९, ९९ छोर ) पाटः । 


ˆ“ कंसं कल्यन्न पर्यायकब्दो । ययपि-- 


प्रथमोऽध्यायः ` ८ 

` च्य 2@फञ् 
ॐ नमो गः शाय 
| [ अथं शिलपरीश्षा 1 | 1 
धातुरलशिखाका्टचित्रलेपसमुद्धवम्‌ । ~ 44 
` यद्रूपं विधिवत्तस्य विधिं वक्त्यामि वस्तुनः ॥१॥ 4 
एकवर्णा घना ल्लिग्धाऽऽमूलाम्रादाजंवान्विता । ४ 
` अजघण्टारवाघोषा सा पु शिखा प्रकीत्तिता॥२॥ । 
 स्थूलमूला छृशा्रा या कांस्यतालसमध्वनिः। | 
 श्लीशिला छृशमूखाऽभस्थूखा षण्डेति निःस्वना ॥२॥ | 


न क 


"= -----------------------------------------------------------------------~-~---~- ~~~ ~ ५ 


` २1 अजकण्टारवाघोषेति । अजगरुरम्बिन्या घण्टाया रवं दवाऽऽ्वोषो रवो यस्याः सेत्यथः। = 
स्रा च किद्धिण्यपरपर्याया श्चुदरा वण्टिका । यच्च मयमते गजघण्टारे°ति (अ० ३३, ८ शो) ` 1 
पाटर्तस्यापि क्षुदवण्टेत्य्थः, गजगठे तादृश्या एव धण्टिकाया बन्धनप्रसिद्धेः । अत्र च | 
क मयमतीयपाख्दर्नाहु गजवण्टेव ेखकम्रमादविहाजवण्टात्वमापन्ना, अत्रत्यपारल्वरसादन- ` 
घण्टेव वा मयमते गजवण्टात्वमापन्ना, उतोभयमेव प्रथक्‌ प्रमाणमित्यपि च न छनिेयम्‌ । ` 1 | 


३। स्थलमूषेति। काल्यतारसमध्वनिरिति कस्यनिरमितेन पाठेन वाच्भाण्डविशेषेण ` | 

 समस्तुल्यो घ्वनियंस्याः सा । तथाच मयमते-- (1 

स्थल्प्रखा कलाया या कंसतारुपसध्वनिः । 1 1 | 
खीशिखा १ इति । (अ० ३३, ९शो) 4 


तारः करतरेऽहु्ठमध्यमाम्या्र सम्मिते। == - = 
गीतकारुक्रियामाने तालः खद्गादिधु्षि ॥ = 


9  ेवतामूर्हिभकरणम्‌ 

५.  [क्षिखमेदेन कर्ममेदः ] 

| स नि प्रतिमा मिभ क्यात्‌ 3 शिरया य" 
युञ्ज्यात्‌ खीशिखया सम्यक्‌ पीटिकाशक्तिमृत्तेयः ॥४॥ 


तामा ०.०.५५१ 


दुमभेदे करासूफाटे तार्स्तु हरिताखके । 
वाद्यभाण्डे च कल्यिष्य  ... ॥ 


इति विश्वदर्शनात्‌ ताख्ब्ेनेव कंस्यनिर्मितवाचविशेषराभात्‌ कास्यपदं ( मयमते च कंसपदं ) 


 ग्यर्थम्‌, तथापि सस्मेदेनान्यतरवेयथ्यंमि "ति ` न्यायात्‌ . (नयनाश्चुः इत्यादिवहु विशेषप्रतिपत्यथ 
वा तदुपात्तमिति क्ेयस्‌। स्पषटमाह कार्यपरिल्पे- 


°“ताङश्चब्दसखमाकासय दीर्घा यासा शिखा खियःःः इति) 
| (० ४९१ ५६ छोर) ` 


 निःस्वनेति। नि्नास्ति स्वनो यस्याः सा निःस्वना शब्दहीना। 
` व्यक्तम्--काभ्यपीये-- | 


 "अचिश्च श्चङरी इ(रू)श्चा स्वरहीना नपंसकाः' इति । (ज० ४९,९६ शो.) 
 मयसते त्वविकरोऽयं शोकः परिहद्यते ! एवं मिश्राभ्यामाकृतिस्वराम्यां मेद उक्तः । केवख्या 


„+ आङ्कत्यापि द्वीपंनपंसकादिभेदमाह काभ्यप 


 : . चतुरता च वसवस सखीरिति प्रकीर्तिता ॥ 
` आयताखा च वृत्ता च दकाष्रादक्षकोणका । 
परिज्ञा सा शिखा ख्याता खद्ृ्ता सा नपुंसका 1 . इति । 
(भ० ४९; ५७-५८ श्छो>) 


शिखानां ब्रद्धाबाखायुवत्यादिसंकला, अन्ये च विकेषाः काभ्यपक्िल्पे (अ० ४९) मयमते 


| | । .(अ० ३२) आरेषे (अ० ९२) च द्याः 


। ४1 लिङ्गं निविधं निष्कलं सकं मिश््नेति। तत्र निष्कलं लिङ्गालयम्‌, सकलं प्रतिमा, ॥ 
(९ ~ साच प्रस्तावाच्छिवस्येव । मिश्रञ्च तयो्िंश्रणादुत्पन्नं मुखरिङ्गाल्यम्‌ । तथा चोक्तं मयमते-- 


` निष्करं सकं मिश्रं लिङ्गजेति त्रिधा मतम्‌ । 
५. निष्कं लिङ्मित्युकतं संकटं बेरुच्यते पध. ् 
` छखरिद्खं तयोमिश्रं छिङ्गाचाङृतिसन्निभेः । 


वेदवमू्तिस्वरु 


बिम्बः शरीरामा विवूततसवरपकः ॥ 


प्रथमोऽध्यायः ` | 4 ध 


` छन्देहपरतिच्छन्दप्रतिमाद्धेसतु नामभिः । 1 
| हरयो देवसमाख्यातः ...  ... ॥ (अ० ३३, १-६ श्लो०) १ 
पं त्रिविधमपि लिङ्क पुंशिख्या कायंमित्याह--लिद्गानीति । कारयपरिल्पे तु धुंशिकाभिः ` 
` तं छिष्धस्‌” (अ० ४९, ९९ शो) इत्यविशेषेण छिष्धमाघ्नोखेवः कतः । व्यक्तमाह मयमते- 1 
। “लकं निष्कलं मिश्रं छयात्‌ पंरिख्या खथीः इति। ` 
(अ० ३३४ १९ छो०) | 


पीषिकित्यादि--पीटिका पिण्डिका गोरीपीर्मित्य्थः, न तु पादिका, 
पंशिखाभिः कृतं रिदं श्चीशिखाभिस्तु पिण्डिका । 
| `  नपुंसकशिकाभिस्तु पादाधारं समाचरेत्‌ ॥ (अ० ४९, ५९-६० छोर) 
इति काश्यपश्षिल्पे, ` ` | 
` चिम्बाथ पं्िखा प्राद्या पीटा चीशिला तथा । 
नप सकच्िखा पादक्षिखाथमखिले मता ॥ इति । (अ० १, २९ श्छे°) 


` शिल्परलोत्तरभागे च पादश्िलापीटशिल्योदधंयोः प्रथगुजातीयश्चिासाध्यत्वेन निर्देशात्‌ ।  लोकरिक- ` 
 दष्व्यापि युक्तमचेतनलस्य पादाधारस्येव छीबरिख्या घटनम्‌, योनिपीरस्य च शक्तिस्वरूपल्य ` | 
शछीशिल्या निर्माणमिति। ग्रन्थकृता तु वद्यमाणश्छोके ब्रहमकूमंरिरेरित्युक्वा पादाधारशिखा 


संगृहीतेति जेयम्‌ । 
 शक्तिमू्तयः खीदेवताप्रतिमाः । तथा च मयमते- 


दितीथा्ं प्रथमा । 


ध ५1 षण्डोपकतेेति। नपंसकलशिरया बरहमकुमं शिले कत्तव्य, तथा प्रालादतरक्ण्डादि कम॑ च । 
` इ्यादित्य्थः । एवज्च "तथे'त्यद्ान्तरितमेकं पदम्‌ । तथा च मयमते-- | 1 


वण्डोपलेन कत्तन्यं ब्रह्यकुमंशिरे तथा । 
नन्यादत्तंशिले वापि कत्तन्या तेन चाऽऽत्मना ॥ 


प्रासादतर्छ्ब्यादिकिमं डया विचक्षणः । (अ० ३३, १११२ छो) ` 

नहयनूमंशिले इति तत्तन्नामकपादाधारक्षिकाद्वयी । तथा चाऽ्धस्ताहुदुतयोः कार्यपरिल्परल- = ` 
वचनयोः नपुंसकशिलाकनतन्यतया (पादाधारः इति 'पादशिराथं'मिति च यदुक्तं तस्येवायं व्यासं | 

इति मन्तव्यम्‌ ! पादशिला हि प्रतिमाधस्तात्‌ स्थापनीया शिखा, तस्याश्च बहमशिकेति दररमरिेति ` 
षदो भेदौ । द्ुमशिलेत्यन्न कमेशिलेशत्याग्नेधमास्स्यसमराङ्गणपूत्रधरिषु पाठः । तदेतहुभये ` 
अपि शिरे उपयंघःकरमेण पादयोरधः स्थापनीये इति पुराणादिभ्यः ससुपरभ्यते । तथा बप्नेये-- 


न ग क क १ 


त. | “शुञ्चीयात्‌ खीशिराः सम्यक्‌ नारीबेरच्च पिण्डिका" (अ०.३३; १० छोर) ` ॥ | 
 नारीषेर् पिण्डिकेति नारीवेशे श्लीप्रतिमायां पिण्डिकायां गोरीपीठे च इत्यथः । अत्र मूकतेय इति ` 


ब्ह्मभागप्रचेश्यश्च जात्वा छिद्धस्य चोच्छ्रयम्‌ । 
न्यसेद्‌ ब्रह्मशिखां विद्वान्‌ सम्यक्‌ कमेक्षिरोपरि ॥ (अ० ५२, १४ श्छो०) 
इति । अत्र च कथं ब्रह्मशिरेवोपरिशत्‌ स्थापनीया न कमंशिा, कमंशिखा चाधस्तादेवं 
स्थापनीया न ब्रह्मरिछेति प्रश्ने तयोरौत्तराधये कारणं परावरत्वमेवेत्युत्तरयिष्यन्‌ स्थापन 
परिपाटीमाह मल्स्ये-- ` 
अधः कूमशिलखा प्रोक्ता षदा ब्रह्मिखाऽधिका । 
उपय्यंवस्थिता तस्या ब्रह्मभागाधिका शिखा ॥ (अ= २६६; ९ शछो०) 


 इति। अधः दमेशिवा परोक्ता (तस्याः) अधिका बह्ममागाधिका शिला बरहमसिला तस्या 


उपरि अवल्थितेत्यन्वयः, वरह्मभागाधिक्यमेव तस्या उपय्य॑वस्थाने देतुरिति मावः । | 
एवञ्च मूलग्रन्थे "कर्तव्यम्‌ इति, बहयकूमंशिरेरि*ति चायपाठो ; शद्धः पाठस्तु कर्तव्ये 


 वब्रह्मदमंरिलेः दति, मथमते तथा पाट्दशनात्‌ ; कोषादौ शिखार्थकस्य "किरशब्दस्यानुपरम्भा- 


दर्थासङ्तेश्च । न हि ब्रह्मशषिख्या दूमंशिख्या वा किञ्चित्‌ क्रियते अपिहुते एव क्रियेते इति 
 कमंकरणयोरविवेक एवाव्रासङ्तिः । तथा चानयोः कर््तव्यतामाह--समराङ्णसूत्रवरि- 
| याताभिधेक (यावताभ्यधिक्छा ‰) ब्ह्यशिरा बर्यारती भपेत्‌ । 

तावत्या १ ता)ेसम्यधिका कार्यां तस्याः कमि धं: ॥ इति । 

ट (० ७०, १४० शछो°) 
अन्यत्र च-- 
+ “"नपुंसकल्लिखाभिस्त क्तव्या बरह्मणः शिलाः” 
2 ` इति ब्रह्मशिखया षण्डोपलकत्तम्यतासुपदिशन्‌ सर्वान्‌ संशयानपनुडति । 
` ्रासादनल्कुण्डादीःति याणेऽपि प्रामादिक इव प्रतिभाति, अन्यन्न ताद्शपाटानुपलम्भा- 


 दर्थासङ्धतेश्र। न च नारूमिति पाटः निर्माल्यद्राररक्षणस्य तस्य पुंिख्या कत्तन्यतोपदेात्‌ ! 
` तथाच काभ्यपे-- | 


““पंशिख्या ठु कत्तन्यं नाकं तु द्विदखान्वितस्‌"ः इति । ( अ० ८० १२ शो ) 
तल्मादु यन्थान्तरसंवादात्‌ "तलः इत्येव पाले बन्धनीमध्ये परिकल्पितः ५ 4 


यद्यपि 'कुड्यादीःति मयमते पास्तथापि साघकबाधकयुक्तयभावाहु भवेदपि छङण्डादीत्यःपि पा =` 


इति छद्धण पायन्तरं नोपकस्पितम्‌ । मयमतेऽपि "नन्ावतंशिरेः इत्यपयाठ इव प्रतिभाति, = 


~. ५ ह्ित्वानुपपत्तेः, (नन्यावत्तशिखाः इति शुद्धः पाठः 


यथोक्तशिसामिर्यथोक्तकायोकरणे दोषमाह कादयपः-- 
कतल विपरीतं यत्तत्‌ सदा कततंनाानम्‌' (भ० ४९, ६० शो) 
विपरीतमिति यदुक्तं तदेव विव्रण्वन्नाह शिल्परब उत्तरभागे-- ` 
ख्ीदिल्ाकल्पिते छिद राष्ट राजा च नश्यति । 
 पंशिङाकल्पिते पीर च ५ पीडे च षण्ठके॥ 


प्यमोऽष्यावः ७ | 


[ सिलास्थिति्रमेण प्रतिमा रिरोविधानम्‌ ] 
पश्चादक्तिणे सोम्ये स्थिता भूमो तु या शिखा । 
प्रतमायाः शिरस्तस्याः कुयात्‌ पश्चिमः तणे । 


सिया पुंसा च भूरपीटे कृते स्थाद्राषटूनाशनम्‌। | 
एवं विन्नाय तहयोग्यामानयेदम्बराृताम्‌ ॥* ८ १।२८-२९ ) 
ध्वनिश्च छेदस्षमथोतपन्न इति चेयम्‌ । तथा च शिल्परत्ने- ` १८ 


पूवात्तरशिरोयुक्ता घण्टानाद्फुखिद्खवत्‌ । 


श ५ |  ॥ (० १४ । १६-१७ शले.) 
६।. प्राक्‌ पश्वादिति। या शिख भूमो प्राक्‌ पश्चात्‌ पू॑पश्चिमायतत्येन दक्षिणे सौम्ये 


दक्षिणो्तरायतत्येन च स्थिता शायितेत्यथंः तस्यास्ततनिर्मिताया इत्यथैः, प्रतिमायाः किरः पश्चिम = ` 
दक्षिणे पश्चिमे दक्षिणे च ङयौत्‌ । प्रा्पश्चादवस्थितायाः शिखाया पश्चिमे दक्षिणोत्तराव- ` 


स्थितायाः शिलाया दक्षिर्णांशे शिरः ङयोदित्यथेः । यच मयमते-- 


काक्थपे- 
प्राग्रं चोदगयरां वा शिलां संग्राह्य दैचिषछः 
प्रागग्र पश्चिमं मृख्युदगमग्रन्तु दक्षिणे ॥ ( अ० ४९६१ श्छ, ) 


`. ; इति पूवाद्ुतशचिल्परलपूवंभागवचने च ( अः १४, १६ शछो° ) प्रायुद्गमरत्वमभिहितम्‌, तत्त॒ ` 
शिरया उरीधोक्ञानाथ न तु प्रतिमायाः शिरःपादादिक्ञानाथंम्‌ । एतच नेकः. तेश्चानकोणायताया 
 चहिवाय्वायतायाश्च शिल्यया व्यावत्तेनार्थम्‌ । मयमते त॒ कोणायताया अपिं श्षिखया मूहाग्रमाह । =. ` 


त्थाच-- । ६ 
(नेकः त्येशानदेश्ष्रा बह्वाग्रा बहधिवायुगाः (अः ३३, १९ छो०) 


इति । अस्यायमर्थः नेत्येलानदेशा्रा नेच त्यश्चा नायतनत्वेनावस्थिता शिखा रेक्ञान- 


दशाग्रा रेद्रान्यां दि्ि तस्याः दिर इति रेशानपदस्य द्विरावरस्याऽन्वयः कायः । 


शिलायाः रिरःपादादिस्थानकथनञ् प्रतिमायाः शिरमपादादिहानाथेम्‌ । तत्र च प्रन्थ- ` 


क्ृतोक्तः समाधिः- ` | | 
“प्रतिमायाः शिरस्तस्याः छुर्यात्‌ पिमदक्षिणे 


इति, यच्च मयमते कोणायताया अपि शिखायाः प्रतिमां ग्राह्यता प्रतिपादिता नेक त्येशान- 
 देशाम्राः इत्यादिवचनेन, तच्छिल्परलवचनविरोधाचिन्तयमेव ; रिल्परतपूवंभागे दिगायतायाः ` 


` शिलाया प्राहमत्वं कोणायतायाश्न बज्य॑त्वमाह । तथाच - 


““शिखामूरमवाक्‌ प्रत्यगुदप्ं प्राुदगदिश्चि (भ० ३३, १८ शोः) इति, 


=-= ------------- =-= 


क  दैवतामूततिघ्रकरणम्‌ 
ल्िरधा शखसहा गभीरनिनदा दियाहिताग्रा शिखा 
 प्राह्या बिम्बविधो "+. 1 | 
(° १४, ११ शोर) 
 दिश्वाहिताप्रेति दिशि आहितम्‌ अथादवस्थितम्‌ अग्रं यस्यास्ताददीत्यथः । दिङ्‌ 
 शब्दश्ुत्या जायमानं जनानां कोणश्नमभमपनयन्‌ स्पषटमाह तत्रैव प्रन्थकारः- 
` “ुःस्पसपदिशं निवेशितरिरोदेशषा विवज्या श्षिखा” इति । (षो १०) 
अपदिश्चमिति अन्तरालं कोभमित्य्थः । तथा च अमरः-- 
` “्खीबाग्ययं त्वपदिशं दिक्योमध्ये विदिक्‌ सियाम्‌” इति । 
कोणनिवेशितशिराः शिखा वल्यं॑यथं 
`  “कोणकीर्षा शिला याजा भक्तदःखकरी यतः? (अ० १४; ४ शछो०) 
इति च स्यष्टात्‌ स्पष्टतरं तत्रेव । ४ 


 भ्न्थकृता कृतः समाधिस्तु न युक्ति सहते । तथा हि~ पूर्वाक्तेः काश्यपमयद्िल्परलादिवचने- 
 रेकमस्येन शिखायाः प्रागुदगग्रत्वं प्रतिपद्यते, एवञ्च प्रागग्रया शिरया प्रागग्रा, उदगग्रया शिखया 


त  चोदगयरैव प्रतिमा युक्तितः करणीयेति किमिति तं पन्थानसुत्खज्य भरन्यक्ृता नवीन इव पन्थाः 
` समवलम्नितः कि वा तत्र प्रमाणं तेनोपरन्धमिति न जानीमः । 


17  यथप्यल्मतूसुषितेऽे स्फुटं कमपि प्रन्थान्तस्संबादं नोपरुभामहे, तथाऽप्येकन्न दष्टः शाख्नारथो 
 बआघक्मन्दरेणान्यत्रापि तथेति न्यायादयमर्धः समथ॑यितं शक्यते । तथा हि, दारवयप्रतिमाया ` 


उपादानस्य बृ्षल्य यथामूरं यथोर्द्ध यथापादवंच्च प्रतिमाया अपि शिरःपादादिकं छरयादित्युप- 


। छृम्यते।॥ तथा चवृहवसंहितायाम्‌-- 


खिङ वा प्रतिमा वा यथादिदं यस्मात्‌ । 
तस्माचिहयितव्या दिशो द्रमस्योडधमथ बाऽघः ॥ (अ० ९८, ७ शो) ` 


अघ्यायमर्थः--खिद्धं हिवरिङ्धं वा प्रतिमा अचा वा यस्माद द्ुमवट्‌ वृक्षवत्‌ स्थाप्या ` 


व | | ४ तस्माडेतोदर मस्य द््वि आशा श्विहू यिंत्या > एवमूद्धौधरो भागावपि चिहयितन्यो । अयमथंः--- 
 द्मल्य यः पूवौभिसुखो भागः सएव प्रतिमायाः पूवभागः कायः । एवं दक्षिणो दक्षिणः । | 


पश्चिमः पश्चिमः उत्तरभाग उत्तरमग एव कार्यः! वृक्षस्य योऽधोभागः स एव प्रतिमाया ` 6 
अधोभागः कायैः \ बकस्य य उबदुभागः सोऽपि प्रतिमाया उ्ुभागः कायं इति तद्वित ` 


 भद्टोतपरः । बृहत्संहिता विदृतिङद्ुतकाश्यपे च-- 


बृश्चवत्‌ प्रतिमा काया प्रागभागा्परश्चिता । 


पादाः पदेषु कतन्याः शीषंमूष्वं तु कारयेत्‌ ॥ इति । 


 काभ्यपरिल्पे- 


स 


पथनोऽष्वोवः 
[ आकुषिवो प्रा्यश्चिखाक्थनम्‌ | | 


कायपरिल्पे तु- 
 ब्षस्य पूंभागे तु सुखं धृषन्तु पश्चिमे । (/ 1 
| दक्षिणं सन्यपारर्व स्यादवामपार्वं तथोत्तरम्‌ ॥ इति । (अ० ७९, २३श्लो*) ` | 
` परं तत्र तत्न शिया ऊद्ौधःकथनं प्रतिमाया अपि उदधौधोनिणयाभिप्रायकम्‌, अन्यथा ` | 
तदुक्तेडपयोगो दुरुपपाद एव स्यात्‌ । एवच्च मयमते शिरया अधोऽ््रादिकमभिधाय सुखष््टादि- ` 
निणयाथेमू- 


8 “खमुदधरणेऽधोऽ"शमूदं मागं शिरो विदुः" 
इति यदुक्तं तदपि निरा्करं सम्पद्यते । दतरथान्न शिकायाः शिरोुलादिवचनमव्यावत्तकं = | 
भवेत्‌ । शोके "उद्धरणेः इत्यस्य शिखाहरणे, “शिर इत्यस्य च मुखषृष्टमाग इत्यथः । व्यक्तमाह ` # ५ 


“अधोभागं सुखं ख्यातं धर्टमूदधभतं भवेत्‌ इति । ( अ० ४९, ६८ शो० ) 
मरुश्टोके पश्चिमादिशिरस्कत्वकथनं शयानश्िलाभिप्रायेण । दण्डायमानशिरायास्तु भूमि 
ऽशो मूलम्‌, अनु भागक्ना्मिति जेयम्‌ । तदुक्तं मयमते-- 
| “अग्रमध मधो मरुं पाषाणस्य स्थितस्य तु" इति । (अ० ३३१ १८०) = 
निविड खषश्िशाङ्षन्धिः, निव्रेणा स्फोरकाङृतिषिन्दुरहिता । बिन्दुमाह काश्यपः-- ष 
.उ०.म म त्िरविधा विन्दर्ष हि 1 
कुष्णोहनिभाकारा कृष्णघ्नरमरसन्निभा ॥ 
` रिखिपिच्छसमाकारा.....-.--.-. ॥ इति (अन ४९, ४६-४७) 
खगन्धेति स्वभावदेव खरभिः न त्वौपाधिकगन्धवती । यथाह निन्दितशिलामधिक्‌ त्य ` । | 
 कारयपः- 


५ “"वर्षातपाञ्निगन्धाच्च खीणा क्षारवारिणाः इति (भ०४९, एर्श्ो-) | 
अथवा व्षातपाश्चिभिरतपयमानो इन्ध एव न तु गन्ध इति तद्नेनमभिषितं कारयपशिल्पे। = | 
वणं इव पाषाणेऽपि गन्धोदमेदोऽवग्‌डक्परोक्षोऽपि अद्ध्वश्षात्‌ कदाचिह भवेदपीति नान्न १ | 
विकल्पः करणीयः । मधुरा नयनग्रिया खददयेति भावत्‌ । ¢ 


कके यक. 9. धः 


“मधुरं स्सवत्‌ स्वादु रिय मधुरोऽन्यवव्‌” 1। इवि विश्वः । 


सवर 


देवता--२ 


1 १० छ -: ` देवतामूरसिप्रकरणम्‌ | 


‡ ५ ४) 


1 | या च कान्तियुता क्जिगधा शिख सा सवोचलिङ्गपीटेषु सवोस्वचीछ प्रतिमा, सर्वषु सिङ्ग ॥ 
पीर चेत्यर्थः, शरेष्ठा । ४ | 
द्री अर्क्चा, न त्वनायासच्छेदयत्वप्रयोजककोमकूतापरपर्यायटदुत्ववती 1 मयमते शिलाया ` 


 ब्रालाुवत्यादिखं्ञाप्रस्तवे- | 
टङ्धातादिभरद्ठी या मन्दपक्ं कोपमा । 
चिरा बाख मता तज्जः सर्वकमंख निन्दिता ॥ (अ० ३३, ४३ श्ो०) 


1. ॑ ध | | इत्यनेन ताद्शक्षिाया बाहृक्नक्रत्वेनं वञं नीयत्वकथनात्‌ । अस्यायं :--टड्धातादिश्द्री 


` पाषागदारणाल्ञाघातविषये श्दरी कोमला तदष्ेणानायासच्छेद्या, अत एव मन्दपक्तेध्कोपमा 


|  भल्पपक्क्टकतुर्या । यदि च द्रीत्यत्र यथा्ताधंग्रहणे भाग्रहस्तदा “टइवातादिष्ी'त्यस्य 
 पर्छृतटङ्काघातेन द्री जजंरा इत्येवार्थः करणीयः । तदेतत्‌ सर्व प्राह्यरिलाखक्षणमाइ  मयमते- 


लिग्धा गम्भीरनिचोषा छगन्धा शीतखा श्दुः। 

नविलावयवा तेजःसहिता योवना शिख ॥ ` 

मध्या स्व॑योग्या स्यात्‌ सवेकर्मर्थ॑सिद्धिदा । इति । त 
| जअ ३३, १४-१५के) 
विमंरूमिति !. षिमरं विरिष्टमल्युक्ं मटिनमिति यावत्‌ › देमकास्यादिचिहम्‌ ! यथान्य- ` 


1. दिति यचान्यदित्यथेः । तथेत्याश्ष्धितपाटस्त॒ निःसन्देहथंम्‌ । काल्यपशिल्पे-- 


, - “स्लाचिन्दुकर्ङ्कादिसंयुकतं परिविजेयेवःः इति ! (अ० ४९, ४४ शछो०) 
९ । हिरा ताबद्रणं तश्रतुविधा--श्वेता, रक्ता, पीता, कृष्णा चेति । तथा चं काश्यपरिल्पे 


6 ` ` *“वेता रक्ता च पीता च कृष्णा चेव चतुविधा इति) (अ० ४९३२ शो) 
| एता च बाह्यणादिवणक्रमेणोपयोगमाह तत्ैव-- ` 


“धवेता र्ता च पीता च विप्रादीनां क्रमा मवेत्‌” इति । (अ० ४९, ३८ष्ो-) = ` 


न क पये इष्णदिखया खया वजेनामिप्रायकं तदुपादानं तदपि मसीङष्णापरम्‌ , तत्रैव-- ` ` ४. ^ 


` ` “ष्णङकष्णा विनादाय इवेत्ष्णा तथेव हि (अ० ४९, ४९ श्ो०) | 0 


[ शिलाद्यहरणक्षणः | 1 क | 
दि नेशः शुभनक्तत्रे शकुने शान्तचेष्िते । 0 | 
प्रतिमाखहकाष्टादिकमं कार्यं न चान्यथा ॥१० 1 

इति शिकापयीक्ञ = १. 


मा 


इत्येकान्तकृष्णाया एव दोषध्रुतेः, = ` ४ 1 
क (रिता कृष्णा शिखा भ्रह्मा सितवा विरोषतः इति (अ० ४९, ९० छो) ` ५ 
 वेषतकष्णाया प्राह्यत्वविधानाच्च । अश्चिषुराणे त्ु-- | 5. 
"पाण्डरा ्यह्णा पीता कृष्णा शस्ता तु बणिनाम्‌2 (अ० ४३, १२ श्षो०) (५ | ५ 
इत्यविशेषेण स्वेषामेव ब्राह्मणादिवणौनां सर्वाऽष्यरणपीतादिश्िखा प्रशस्तेत्याह । इह तु | 
कासाञ्चन कृष्णानां कासाञ्नन पीतानामविशेषेण च दवेतानां छभावहत्वमाह--कपोतेत्यादिना । | 
तथा च कपोतादिवत्‌ कष्णशिका, घृतवत्‌ पद्मवच पीतरिला वेतदि च सर्वच प्रयुक्ता = | 
` कत्तु: खखमावहतीति शछोकाथः । | 
| १०। छदिन दति । छमनक्त्रे कतु रिति ्तेयम्‌›, छदिने इति सामान्यतोऽभिघाय विशिष्य ` 
एुनन्षत्नोपादानल्य फलाभावाव्‌। छदिनज्र ज्योतिःदाख्रादाववलोकनीयम्‌ । विषिष्याह | 
१ “ष्टमासतिथिनक्षत्रलप्नवरे शिलां ग्रहेत्‌” इति ! (अ० ४९, १८ शोऽ१ 
भयमंते चं किलाधाहरणं प्रकत्य- 
उत्तरायणमासे तु छक छभोदये } ५ 
` प्रशस्तपक्षनक्षत्र ुहूततं करणान्विते ॥ इति । (अ० ३३, १९-२० शो<) र ॥ 
शङ्ने शान्तेषटित इति । शकुने छभाश्चभादंखिनि निमित्ते शान्तचेष्टिते शान्तं सौम्थ॑ = | 
कमनुद्धलमिति यावत्‌ चेष्टितं थत्र ताहे सति । शङ्नमाह कादयपशिल्पे-- = | 
| वायसं दक्षिणे बामादागतन्न तथैष ` `  : 
श्येनं वे दक्षिणे वामे युधं मांसेन संयुतम्‌ ॥ 
कन्यागोदश्चेनञ्चेव गावस्त्वाबाहनं तथा । 
दधिना पूणङुम्भच्च क्षीरङुम्भं तथेव च ॥ 
पुष्पं पुष्यटतं वापि छतवतीयु(वदुयु)वतिधियः। ` 
` ` अन्नजच मांसहास्व (हारञ्च) शिवभक्तिपरायणम्‌ ॥ ` ५ 
। ज्वारानलर दीपञ्च जरः पूणवाद्ृतमू {== `: ` ` 


| १९ 1 रः देवतामूततरकरण्‌ 
उल्कापातं दिशं दाहं महावातप्रवत्तेनम्‌ । 


अलयुमान्यन्तरीक्षाणि -“  “* ॥ इत्यादि । 
(अ० ४९, २०-२५ श्यो) 


शुभरङनजेद्‌ गच्छेदश्चभजे न्न गच्छेदित्याशयः । तदुक्तं काश्यपे- 
| , “्ुमञ्ेद गमनं ऊर्यादशयुभञ्ेह विजयेत्‌" इति । (अ० ४९, २८ शोर) 
।  ऋालातिपाताकषमे कर्मण्यञचभराङनदरने प्रतिप्रसवमप्याह तत्रैव 
श अञ्ुमे त्वश्निमास्ती्यं शिवेनैव शताहुतीः । 
समिदाज्योदनेः छुर्याननागान्नं नागभूषणम्‌ ॥ 
द्वा शिवं नमल्कत्य गच्छेदा्चायंदिल्पि च । इति । 
(अ० ४९; २९-३० श्छो०). 
ध प्रतिमे ति । एतदुपलश्वणम्‌ , छिङ्पीराद्यवितशशिखाचाहरणेऽप्येतद्‌ योज्यम्‌ । तथा च कान्यपे- 
| |“ आचायः शिल्पिखंयक्तः शिराग्रहणमाचरेत्‌ । 
1 दिव्यान्तरीक्षभोमानि मिमित्तान्युपर्षयेत्‌ ॥ (अ० ४९, १९ शोर) 
इति सामान्यतः क्षिखाहरणमुक्तस्‌ । 


ममते च- 


प्रशस्तपक्षनक्षनर युहृत्तं करणान्विते । 
 गच्छेिड्ं समुद्य वनं चोपवनं गिरिम्‌ ॥ 
| | | निमित्तैः शकुने्योग्येः स मङ्खरशब्दैः ॥ इति । 

1 ४ ५ (9. (अ० ३३, २०-२२ शोर) 
ओ अन्न लिङ्मित्युपल्क्षणमर्चादीनास्‌। वनं चोपवनमिति परतिमोवितद्‌ मोदे्कथनम्‌ ? 
गिरिमिति शिङ्खाययुपयोगिशिकास्थानकथनम्‌ । 
|  कषिरागरहणमन्परमाह तत्रेव-- 

ॐ अपक्रामन्तु भूतानि देवताश्च सयुद्यकाः 

युष्मभ्यन्तु बखिभूयात्‌ कराश्च वनदेवताः ॥ 

कमेतत्‌ साधयिष्यामि क्छिवितां ववा !1स्तुप्ंयः । इति । 

(अ० ३३, २७-२८ छो०) 


शः स्यात्‌॥ इति! = 


५ मय॑मत-(अ० ३३१ ऋृहतसंहिताख (५८ वनसम्प्रवे्ाध्याये) द्रव्यम्‌ । 


| ५ एकत्रिरादङ्कखा, चतुहंरते एकचत्वारिशदङ्गरा भवेत्‌ । 


। दला बृ्धिः, तेन पञ्हर्तप्रासादे तरिचत्वारि्दङकुल प्रतिमा, षड्दस्तप्रासादे पञ्चत्वारिश- ८ | 


नि 
2 [ प्रासादमनेनोदध स्थज्पेष्टप्रतिमालश्षणम्‌ | न | न 
 एकदस्ते तु प्रासाईे म्तिकादशाङ्कखा । 
 वशाङ्घुला ततो इद्धियोवद्धस्तचतुषटयम्‌ ॥१९॥ 

व | [ उद सथप्रतिमाया मध्यमाधममेदकथनम्‌ ] 

` द्ववङ्कलखा वृशहस्तान्ता शतारद्ान्ताऽहुरस्य च । 
अतो विंशदशांशोना मध्यमार्चा कनीयस्ती ॥१२॥ 


एवञ्च तत्रेव ग्राह्याग्राह्यदश्चानमिधाय तदभिमन्त्रणमाह-- 
अचीथंससुकल्य त्वं देवस्य परिकहिपितः । 
नमस्ते बश्च पूजेयं विधिवत्‌ संप्रगृद्यताम्‌ ॥ न 
यानीह भूतानि वसन्ति तानि विं गृहीत्वा विधिवत्‌ प्रयुक्तम्‌ । ` 
अन्य॒त्र वासं परिकल्पयन्तु श्चमन्तु तान्य नमोऽस्तु तेभ्यः ॥ इति 
ह (अ० ९८, १०-११ शोर) 


"त 


य 


द र. 


 शृहका्टाहरणग्रकारोऽ्ेतवनुरूपः समराङ्गणसूत्रधारेः परशिकषयते । तन्राहरणमन्त्रल्ठु-- ` = | 

अपक्रामन्तु भूतानि यानि बरक्षा्रितानि हि । 1 

॥ कल्पनं वत्तयिष्यामिः क्रियतां वासपयेयः ॥ (अ० १६, २७ छो०) २. 
। तदेतत्‌ सर्वं शेषतो जिक्वमिः समशाङ्गणसूत्रधार-(अ० १६) कर्यपरिल्प-(भ० ४९) ` 4 


१९। अथ प्रथमं प्रासाद्मानेन उुस्थायाः ( दण्डायमानायाः >) प्रतिमायाः प्रमाणम्‌ = | 
 उच्यते-एकस्त इत्यादिना । एकदस्ते प्रासादे मूत्तिरकादसाङ्ुखा भवेत्‌। ततो इस्तचतशष्यं | 
यावत्‌ प्रतिहस्ते दशाङ्कुख व्द्धिः । अर्थात्‌, द्विहस्ते प्रासदे मूर्रिकर्विरत्यङुराः च्रिहल्ते | 


१२1 ततो दशहस्तान्ता दवाङकरा बरद्धिः, अर्थात्‌ पञचहस्तादिदशदस्तान्तपासादेषु प्रहिहस्ते ` | 


 वङ्कुला, सकतस्ते सप्चत्वारिरादङ्ख, अषटहस्ते उनपञ्चाशवङ्कखा, नवहरते एकपन्नाशदङगु, ` ह 

 दशहस्ते व्रिषञ्चाहदङकला प्रतिमा स्यादित्यथंः। = ` 1 
| शतार्खान्ताङ्करस्य च--शताद्धौन्ता शताद्धहस्तान्ता चद्धिरित्यस्यं विशेषणम्‌ । इद्धरङ्खल्य ` 
।  पकाङरल्य ; पकादशस्तादिपन्राकदधस्तान्तप्रासादेषठ॒प्रतिदस्ते यकरेकाश्ुला बृदधिरित्यथः । ` 


४ केवलामर 
 षटूषनारदङ्ला, चतुदशस्ते सस्षपजाशवङ्ुखा, 
` पुषेकमेण बृदधप्ा पञ्चाद्धस्तप्रासादे त्रिनवत्यङ्कख प्रतिमा भवेत्‌! इत्यूदध स्थाः पञ्चाशत 
 प्रविमाः।' | | | 
भत उक्तमानावधि विशंशोना विरेनशेन न्युना मध्यमा सध्यम्रतिमा, दशंशोना 
 दमाशेन दीना च कनीयसी क्षुद्रतरा अर्चा कथितेति शेवः । एवञ्च एकटर्तव्रासादे एकादशञाङखं 
जयेष्टपरतिमायाः परिमाणम्‌, दशाङ्रं विंशतिविभक्ताङ्लल्योनविशसाश्च मध्यमप्रतिमापरिमाणस्‌ 


कशां दशधा विभक्तस्याङुरस्य॒नवांशाश्न कनिष्परतिमापरिमाणमिति । एवमन्यास्वपि ` 


` प्रसाणथिकप्रतिमाड के्‌ । 


परासाद्परिमाणेन उदुस्थग्रतिमापरिमाणम्‌ । 


 गप्रासादल्य प्रतिमाया प्रासादस्य प्रतिमाया 
 इस्तमानम्‌ अङ्कक्िमानम्‌  हस्तमानम्‌ अङ्कुखिमानम्‌ 
+ ११ ध. ^~ ~: ६३ 
क २१ 9 ~ ६४ 
("9 ३१ ` इ 4 + ६९ 
0 ४१ = 49 4 ६६ 
क त 0 4 ७ ५५8 
1. 
र - 
0 १ | ७०. 
0 6 + + ७१. 
क क दह... क 4 4 "७ 
^ 4 1 = 
(1 1 
49 ४ ७९. 


9 ५ @ ~ © न्छ ८८५. „० ~ | 


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1111 7. 


य रकहस्ताह्‌ वेदहस्तान्ते चलुद्स्तपर्यन्तप्रासादे षड्छृष्धिः षट्‌ षट्‌ इदिर्थस्याः प्रतिमायास्तारश्षी ` 
स्यात्‌ । संख्याशब्दल्य वृत्तिविषये वीप्सा्त्वं सषपर्णादिवदि्युकते अथात्‌ एकहस्तप्रासादे मूतः 


 षट्रिशदङ्खा, नवहर्ते उनचत्वारिंशवङ्कुला, दशसते द्विवत्वाररिशदङ्ुखा मूत्ि्वेदित्यथैः । 


इत्यासनस्था द्वितीयाः प्रतिमाः पञ्रादातसंल्याकाः 1 


पथमाऽध्यायः ` स ८ १ ॥ ५ 

५.५ [ आखनल्योत्तमप्रतिमापरिमाणम्‌ ] (4 ॥ ध | 

दु (| दशहस्तान्ता जयङ्कला शृद्धिरिष्यते | 
एका + भवेद्‌ बद्धर्यावत्‌ पथाशहस्तकम्‌ -: 

प्रतिमाया प्रासादस्य ` प्रतिमाया 

अद्गुिमानम्‌  इल्तमानम्‌  अद्गुखिमानम्‌ 

१. 1 
०. =“ ४ ५ ५ ४, द. | 8. 
व व न 


य 


स 


नै 


४२ ध त ८९ (2 क 
४६... , क 
8. ८७ ९० 8 (4 
 १३। इदानीमासनल्थमूर्तीनां परिमिाणमुच्यते । (षडडुल्ा भासनस्या मूतिः हस्तादे- = | 


षडड्ुखा, दिहस्तप्रासादे द्ादक्ाङ्गखा, तरिहस्ते अशदकाङ्कखा, चतहंस्ते चतुविशत्यङकला ` 1 
मवेत्‌ । तदूदधं पहस्तप्रासादमारभ्य दशहस्तान्ता त्रयङ्खखा वृद्धिरिष्यते । तथा हि-पञहस्त- ` | 
प्रासादे सक्तविशत्यङ्करा मूतिः, पड्ढस्तप्रासदे न्रिशदङरा, सप्तहस्ते त्रयक्िशवङ्खा, अष्ल्ते | 


ततः प्दास्तकं यावत्‌ . एकादशस्तादिपञ्चाशद्वस्तान्तमित्य्थः, एुकाङ्ला प्रिहस्ते ` ५ 
 एकेकाङ्करा बद्धिभ॑वेत्‌। तेन॒ एकादशहस्तप्रासदे त्रिचत्वारिदादङ्गला मूत्तिः, द्वादशदस्ते ` ५ 
` चतुश्रत्वास्शिदङ्गलखा मूत्तिः, एवंक्रमेण बृधया पञ्चाशादरस्तप्रासदे द्यशीत्यङ्गख मूत्तिभवेदित्यथः। = ५ 


य 


। `  प्रासादपरिमाणेन आसनस्यप्रतिमापरिमाण्म्‌। . ` 
प्रासादस्य प्रतिमाया भ्रासादस्य ध ..  : पतिनावा. 

` हस्तमानम्‌  अङ्कुकिमानम्‌ हस्तमानम्‌ = ` अद्कुछिमानम्‌ 
९८ ६. 


श 


सि 


| 8 ॥ । ९ ए ०० 2.0 | 8 ३९ ४५। # ककः ३.१. | 8. 


| ३ 
| १० 3 ` ४२ ह व ॥ 
५ 8 ३२ 
1 
त 0" „६, ३५ ^ 1 ~" 0 
9. 2 -* ५9 ३६ --* = 
| 0 १६ | | ` ४८ 0 8 ६९ 


0 4.4 ह व का, 
क १८ | | 1 ० ५० | । ४४ २९ ५४ | 0 | ७१ 
१९ ~ | 0, 1 "५ 


२० । त 1 
0 1. 
॥ व. 1 1 
1 1 २३ 9 (८.५ | ५५ .. ष 9४ 0 ५ ७६ 
॥ 1 4 8 
२६. । 0 ध | 4. ४ + ८ 9९. 
1 4. 1 1 1 
८७. ष ९०  .. -..(अरतविमासद्कथाः) ८२ 
| विशत्येकेति । रविशत्येकत पुकविंशत्यङ्खाद़ अधिका द्वावित्यङ्ुरादिपरिमाणा 
परतिमा ज्येष्ठा! धिशत्योना विदात्याङ्कलेन हीना कनीयसी प्रतिमा भवतीत्यथैः। एवच्च ` 
कण्ठतोऽनुक्तमप्यन्न मध्यमप्रतिमापरिमाणं पारिशेष्यादुन्नेयम्‌ ; तथा हि इाव्कित्याचङ्रूपरिमाणा = ` 
विदात्योना योना क कनीयसी विोकविदात्यङ्रा च मध्यमेति पयंवसितो छ) 
रतिः मापरिमाणनि्ंयप्रकारो ्रन्यङुपक्लमेव नान्यन्न शिल्परास्न उपरुभ्यते । 


प । प्रथमं ज्येष्रतिमापरिमाणमाह--द्वारोच्छेय इति । अदौ दवारस्यौननत्यम्‌ अष्टवा विमन्यैकमं = ` 


| हस्ता प्रतिमा भवेदिति निष्कर्षः! एतच “एकहस्ते तु प्रासादे मूततिरिकादशाङ्ले"(१९१ शछोगेति 


1 ` यथोक्तमागवदात्‌ प्रतिमाया अश्टाविश्चतियवपरिमाणत्वप्रसक्तेः । ` 


६ शयनिऽष्या 9 
[ हवारसानेन ज्येष्टप्रतिमापस्मिणम्‌ ] 8 
दरारोच्छुयोऽश्या कायां भागमेकं परित्यजेत्‌ । 
सप्तभागं त्रिधा कृता दहविभागा प्रतिमा भवेत्‌ ॥१५॥ 


पा ~ ------------------------~----------------------- ~+ 


१९। पं प्रासादमानेन प्रतिमामानमभिषितम्‌, इदानीं प्राल्ादद्वारमानेनापि तह वत ` 


 परित्यन्यावशिष्टान्‌ स्तान्‌ तिधा विभज्य द्विभागेन प्रतिमाः ऊ्यत्‌ । एकेन च पीक्कित्यनुक्त- ५ | 
मप्यत्रोद्यम्‌ । तथा च बहतसंहितायाम्‌- | | 


देवागारदारस्यार्॑सोनस्य यतस्तृतीयोऽ शः । 
ततपिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तदष्टिगुणपरिमाणा ॥ इति (अः १७, ३ श्छो०) 
दवारमानाष्टमागोना प्रतिमा स्यात्‌ सपिण्डिका 
द्रौ भागो प्रतिमा तत्र तृतीरया्राशच पिण्डिका ॥ (अः ९९, १६ छो) 
इति च । अर्टशोनस्थेति कृताष्टमागस्य दइारमानत्याष्टमभागेन हीनस्येत्यथः । द्वारप्रमाणमाह = ` 
तत्रेव प्रास्ादलक्षणमधिकत्य- | 0 


यो विस्तासे भवेद्‌ यस्य द्विगुणा तत्समुन्नतिः । 
उच्छ्रायाद्‌ यत्तृतीर्यागस्तेन तुल्या कटिः स्ता ॥ 
विस्ताराद्धं भवेह गर्भो भित्तयोऽन्याः समन्ततः । 
गभंपादेन विष्तीण हारं दहियुणसुच्द्तिम्‌ ॥ (अः ५९; १-२ शोर) 


इति । तथा च दश्स्तविष्वृते प्रासरदे गभं: पञ्चहस्तः गमंस्य पादेन वु्यौशेन द्वारविस्तारो भवे- ` ८ । | 
` दिति सपादहस्तप्रमाणा द्वारस्य विस्तृतिः उन्नतिश्च साद्द्िहस्तपरिमाणा । एवच्च-द्वासप्तिहस्त- ` 
विवृते प्राखादे षटूतरिशद्धस्तमितो गः, गर्मपादसममानतया च नवहस्ता दारस्य विस्तृतिस्तद्‌- = 
द्विएणोऽधद्शस्तश्ोचरयः तस्य चाऽ्टधा विभक्तस्य एकमंशं षडङकुराधिकहस्तदवयं परित्यन्य ` 
` शिष्टानामष्टाद्शाङ्लाधिकपञ्चदशदस्तानां च्रिभागीकृतानां भागद्वयपरिमिता इाद्राङ्खधिकद- ` 


` यदुक्तं वतोऽन्यादकमेवेति मन्तव्यम्‌, निरकतद्वारमानत पुकहस्तविस्कृतप्रासादे हारस्य षडङ्गरत्वेन = 


ससराङ्खणसूत्रधारे तूत्तममध्यमाधममृत्तीः प्रकत्य-- ` 

(भव १ तच्च) हारं त्रिधा (चत्वा मक्ता) पीठं भागेन कल्पयेत्‌ । 

(ता ? ह) भ्यां (त) प्रतिमा काया ज्येष्ठा (ल्या ? या) मानमीददाम्‌ ॥ ८. 
9 | (अः ७०, १४७ छोर) 
ध र कु तत्‌ प्रकृतग्रन्थस्य कनिष्टप्रतिमामानानुरूपम्‌ । तथा कनिष्टमूरि ध मूत्ति- 


1 (0 देवतामू्तिप्रकरणम्‌ 
6 ४ [ मध्यभप्रतिमापरिमाणम्‌ ]} 
` रं विभज्य नवधा भागमेकं परित्यजेत्‌ 
अशो भागांलिधा छता दिभागे प्रतिमा भवेत्‌ 
| [ कनिष्टप्रतिमापरिमाणम्‌ 1 
लिभागेभाजिते दवारे द्विभागेऽ्वा भकततिता ॥१६ 


इति प्रासाष््धारमानेन प्रतिमप्रमाणप्‌ | 


ता तान ०५०१.१ ०५५०२५९ न 


| ए(व १ क) सुत्स्स्य शेषेण ०२ | (भः ७०, १४९ शछ० ) | 
इत्यपि यदुक्तं तनु प्रकान्तश्ठोकानुसारीति हर्यते । एवम्‌ अल्माभिर्परिात प्रदर्शधिष्यमाणं ` 
 तदुक्तमध्यमप्रतिमापरिमाणमपि वक्ष्यसाणमधघ्यमग्रतिमापरसिमिणानुसारीति स्तेयम्‌ । न चेवं 
` स्माद्गगसूजनारपरामाण्याद्‌ प्रकृतेऽपि ग्रन्थे वेपरीत्येन अधममध्यमोत्तमप्रतिमापरिमाणरक्षकतया ` 
शोकानां परारी; स्वीकृत्य तदेकवाक्यता करणीयेति वाच्यम्‌, व्हस्संहितायां मध्यमाद्विमेद- 
 मनाहत्य कैवरमेतच्छोकोक्तपरिमाणस्यैव ग्रदणेनास्येवोत्तमत्वस्वीकारात्‌। मत्स्यघुतगेऽपि-- 
पि द्ारोच्छयल्य यन्मानमष्टधा तत्त कारयेत्‌ । 
भागमेकं ततस्त्यक्ता परिरिष्टन्तु यहु भवेत्‌ ॥ | 
0 ` भागद्वयेन प्रतिमा... ( अ० २९८, २४-२९ छने° ) 
4 ॥ इति द्वारमानेनेकमेष प्रतिमापर्मिणसुक्तमिति सर्वं डसमञ्चसम्‌ । ५३ | 
| १६। मध्वमाधमप्रतिमापरिमाणमाह- द्वारमिति परिभानैरिति च । स्प्ोऽ्थैः। मध्यम 
५ क - प्रतिमालक्षणमाह समराङ्गणसूत्रधारे- 
५. मध्याया नवधा द्वारं क ( ते ? त्वे ) कं भागयुत्खनेत्‌ । 
दोषान्‌ भागांस्त्रिधा कत्वा पीठं भागेन कल्पयेत्‌ ॥ 4 
भचासुभाभ्याम्‌.......-.-. 1 इति । (अर ७०, १४८-१४९ श्लो° 2: । छ 
1 अधमप्रतिमापरिमाणमप्याह तत्रेव--श्ीनायां विदध्याद्‌ ारमष्टेश्त्यादि प्रागेवोद्धिखितम्‌ । ४.१ - 
८.  हारप्रमाणायाः प्रतिमाया विनियोगमाह समराद्गणसूत्रवरि-- ` | 
|  चात्राथा परतिमा द्वाखप्रमाणेन विधीयते। इति) (अ ७-१४६ ) 
: बात्राथां उत्सवार्थं निभि ¦ | 


| त म समराङ्णसूत्रधारतो जित्ामिर्षिज्ेया । ` ` ८ 
भ त्मानी सुलाचवयवपस्मि न णादिकं दि मत्‌स्यपुराण ( अ० २१८ )-वरहतूसंहिता ( अ० ९७ )-. ध । 
काभ्यपरिल्प ( भ ९० )-समराङ्गणसत्रधारादिषु ( भ० 1 


 [ गृहपूज्यायाः प्रतिमायाः परिमाणम्‌ ] 


 प्रातमा पृञ्या नाधिका शस्यते ततं 
[ देवगृहयोचितप्रतिमापस्मिणम्‌ | 


दान्नवहस्तान्ता पूजनीया सुराख्ये 
[ बहिश्वनीयप्रतिमापरिमिणम्‌ ] 


 वशहस्तादितो याऽचां प्रासादेन विनाऽर्चयेत्‌ ॥१८॥ 


तातन ७५ ५००५१००५.००५५ 


९७। इदानीं त्र कीदशी प्रतिमा पूजनीयेति वकु प्रथमं गृहोचितायाः प्रतिमायाः परिमाण- ` 
| माह--आरभ्येति । एकाङ्लादारम्य उच्दापम द्दश्षाङ्खययन्ता प्रतिमा गृहेषु पूज्या । स्पष्टमुक्तः १५. 


मतस्यपुराणे- 
अङ्कष्टपर्वादारम्य वितस्तिर्यावदैव तु | 


वितस्तद्ादक्ञाङ्ुरस्‌ । 


। १८। देवाख्यषूल्यामाह तदृद्ौदिति । दवादशाङगुकतोऽटहस्तपरिमिणं यावत्‌ प्रतिमा छराख्ये ` 
 पूननीया। तथाच मात््ये-- ` 071 


'आषोडस्ा तु प्रासादे कन्या नाधिका ततः? इति । ( अ० २५८ २३ ) 


'भाषोडज्ा" षोडश वितस्तिपयेन्ता अष्टहस्तपयंन्तेति यावत्‌, प्रासाद इति देवाय इत्यः । = _ ` । 
` पएतदेकवाक्यताविंधितूसलयेव (नवहर्तान्ता इत्यस्य नव हस्ताः. परिमाणं यस्याः सा नवहस्ता, = ` 
सा अन्ते यस्याः च्योदश्चाङ्खादयष्टहस्तान्तायाः प्रतिमायाः सा तथेत्यतदुगुणसंविन्ञानघ्यधिकरण- ` 


इबीहिणा ताहशोऽथेः कश्टकल्पोऽपि युक्त इत्युवपश्यामः । 


दरदस्तादित इति । दंशदस्तायाः प्रतिमाया भादिरादिभूता प्रतिमा ताम्‌ भार्य नबहस्त- = ` 
 प्रतिमामारभ्येत्य्ः, न तु दयहस्तप्रतिमामारम्येति यथाश्रताथेः करणीयः, पूाक्तमतस्य- ` | 
 घुराणवघनेन नवडस्तायाः प्रतिमाया. अपि प्रासादे परूलननिषेधात्‌, सम्भवति च तद्वचनेन | 
` सहेकवाक्यत्वे वाक्यमेदस्यान्याय्यत्वात्‌ ! इत्थ्न-(दसादिकिखृदधया चः (१९) दति वक्ष्यमाण- | 

` वाक्येन दरहस्तप्रतिमामारभ्य पञ्चचत्वारिशद्धस्तां यावचतुष्क्यां पूजनविधानादियमेकव नवहस्ता =. | 


प्रतिमा वत्तते, यत्याः पूजास्थानं किमपि नोपदिष्टं मन्थक्‌ता । 


। इदमत्र मनस्यापततिः- प्रसादेन विनाऽचंयेदित्यनेन सामान्यत भासां दशस्तादिप्रतिमानां 
` भ्रासादे पूजां निषिध्य क्र तदहीमाः पूजनीया इत्यपेक्षायां द्शादिकरङधति विश्ेषोऽभिषहिती अन्थ- ` 
( कृतेति । अत्र च पक्षे 'नवहस्तान्ता इत्यस्य 'दशहस्तादितः इत्यस्य च यथाश्रुत एवाथ करणीयः 


गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधे: ॥ (अ० २५८ रर श्लो) 


4 ५५ देवतामूततिप्रकरणपे 


[ तत्र विक्ेषः ] 
शादिकखृद्धया च षट्विंशत॒परतिमाः प्रथक्‌ । 


बाणवेदकरान्‌ यावचतुःषष्ट्यां(्त वापय ये 
८ देवगृहभिच्यादिनिणंयः | 
कृते तेल दशधा भिनति | 


स्यादन्यथा नवहर्तप्रतिमाविषगरे किमपि विधानं न स्यात्तेन च ग्रन्थकूतो न्यूनता प्रसज्येत । यथा- 
 श्रता्थंपस्थिहपक्चे द॒ पूर्वाक्तमतघ्यपुराणवचनव्याकोपो मतान्तरवादेन प्रतिसमाधेय इति दिक्‌ । 


` प्रज्वचत्वारिशतं हश्तान्‌ यावत्‌ एकरंककरवधंनाजाताः पृथक्‌ षटृत्रिशतं प्रतिमाः चतुष्क्यां ` 
-बहिश्वतुरस्देशे पुष्करिण्याकारनिज॑रचतुरल्ललाते वा पूजयेदित्यथंः । तथा च दश्स्तेकादह्स्त- 


१९। दशहस्तादिप्रतिमानां पूजास्थानमाह--दशादीति । द्ञहस्तत आरस्य वाण्वेदकरान्‌ 


` इदशहस्तादिक्रिमेण पञ्चचत्वारिशदधस्तौ यावद गृहा बिश्वतुरखप्रदेशे पूजयेत्‌! भवति 


च द॑शदस्तां प्रतिमां मेरत्पेन कल्पयतः पञ्चचत्वारिंशदधस्ता प्रतिमा पटूत्रिशी | 
ताश्च पञ्चचत्वारिशद्धरस्तान्ताः प्रतिमाः पूवंवर्न्थेष्ज्यादिकं भजन्ते । तथा हि--निर्त- 


प्रमाणाः प्रतिमाः ज्येष्ठाः, स्वमानस्य वृतीयमागोना मध्यमा अर्धोनाश्च कनिष्ठा इति । तदेतत्‌ 
खविशेषमाह समराङ्गणसूत्रपर- 


भाकारे (‰) प्रतिमा ( येष्टा १ ज्येष्ठा ) चल्वारिदाचच पञ्च च । | 
हस्तान्‌ कार्या त्रिभागोना मध्या हीना तदद्ध॑तः ॥ (अ० ७० १४९-- १४६ श्लोर) 


` इति । इत ऊ प्रतिमाया विधानं नास्तीति इयमेव ब्रहत्तरा प्रतिमा । 


बरहतसंहितायां चतुहस्तावधिकप्रतिमाया एव छुभदायकत्वसुक्तम्‌- 
सौम्या तु हस्तमात्रा वखदा हस्तद्रयोच्िता प्रतिमा 
केमखभिक्षाय भवेरिचतुहस्तप्रमाणा या ॥ इति 1 ( अ० ९७, ५९ श्छो० ) ` 


६. अन्नादं चतुःषष्टवामिति प्रामादिकः पाटः, छन्दौभङ्दोषादर्थासङ्तेश्च । अष्ति च समानतन्त्रे 
 भरन्थक्ृतः कृतौ रूपमण्डने प्रायेणेतत्‌समानानुपूर्वीकः श्छोकः, तत्र च "चतुष्कासः इति पाह 


उपरम्यते । छन्दःुधोऽप्ययं पाठोऽपपाढ एव मन्यतेऽथंदारिदरयात्‌, तस्मात्‌ पूव॑ददितसमराङ्गण- 


 सूत्रधारवचनेकाथ्यात्‌ रूपमण्डनीयवतुष्कदाब्देन साम्यवाुस्याच प्राङ्गणादिसमानाथकं चतुष्क्याम्‌ः = ` 


हति पदं छदधपारत्वन कलिपितमल्माभिरिति जेयम्‌ । 


इति । अन्यथैव भित्यादिविधानमाह बृतंहितायाम्‌, तच पूर प्रद शितम्‌ । 


२०॥ इदानीं गभगृहप्रमाणेन प्रतिमापर्मिणणं वक्तुमादौ गभगृहप्रमाणमाह--चतुरखीकत | ४ 


| मानः पाठः पर्तिुद्धिं विदम्पति, तथापि पञ्चाशेनाः इति विकृतपाखदशनात्तस्य च॒ | 

 प्र्त्यवुखन्धित्‌सया 'पञ्शोनाः इति पाठः प्रथमतः शुद्धत्वेन द्धिमारोदति, ततश्च मध्यमत्वा- ` | 
 दिक्रमान्यथानुपपतत्या सर्वत्रेव "उना" इति पाठः सम्यक्तया प्रतिभातीति स एवास्माभिरनुखतः। ` | 
 क्रमानुपपत्तिस्तु- ५ 


 माध्यमिकत्वमूनप्रमाणायाश्न कानिष्ठ्यम्‌ उपदिश्‌ यथाश्चुतः पाटः क्रमदुःस्थ इति हेयपक्ष एव ५ ॥ ८. | 


नियः 

[ गभेगेहप्रमाणेन ज्यष्टादिप्रतिमएकथनम्‌ ] क | 
गेहत्रिभागेण ज्येशाऽ्चां कथिता बुधैः। 
मध्यमा च दशांशेन(शोना) पथांरोना(शोना) कनीयसी । 
सलि गर्भगेहे तु द्वो भागो परिवजेयेत्‌। ` १ 
[ती भवेदेवः शयनस्थः सुखावहः ॥२२॥ | 
अष्टरोहमयी मृत्तिःशेरलमयी तथा। 
भरे्ठव्र्तमयी वाऽपि प्रवालादिमयी शुभा ॥२३॥ 


~~~ ५ 
4 


२१ 1 गमत्यादि । च्रिमागीङ्कतस्य गर्भगेहस्य भागेनेकेन ता अचौ ज्येष्ठा, षोड्दाधा 1 | 
विभक्तस्य गरमगृहल्य दश्षंशोना अर्थात्‌ सादपादप्रमाणा प्रतिमा मध्यमा ; तथा पञ्चाशोना ` | 
प्रतिमा कनीयसी कनिष्ठा इत्यथः । | १५ 

अन्न यद्यपि त्रिभागेण इति छुदपास्खमीपचयया "दशांशेन इत्यत्राप्यसन्दिग्धत्वेन प्रतीय- 


अङ््टपर्वादारभ्य वितस्विर्यावदेव तु । 
गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधेः ॥ 


 इस्यादिवचनादूनग्रमागाया एव प्रतिमाया ज्येष्ठं प्रतीयते, प्रसागाधिक्रायास्तु कानिष्ठ्यम्‌ 


इत्थ्च गर्भयृहदशेन निर्मिता प्रतिमा प्रमाणाधिकेति तस्याः कानिष्य्ये प्रासे, प्चारेन निमिता = | 
तूनप्रमाणेति तस्या अपि मध्यमत्वे प्राक्च तदुभयविपरीतं प्रमाणाधिकायाः प्रतिमाया ` 


तदेतत्‌ स्वं विस्पष्टमक्तं स्वयं ग्रन्थकारेण तदीयरूपमण्डने-- 
वृतीयांशेन गभंस्य प्रासादे प्रतिमोत्तमा । | 
4 मध्यमा स्वद्ांश्लोना पञ्चाना कनीयसी ॥ इति 
` २३। अष्टलोहकिम्बानि, यथा-- | 
^, सौवर्णं राजतं ताघ्नं पैत्तलं कास्यमायसम्‌। = . ` 
` सेखकं त्यापुषञ्चेति रोहं बिम्बं तथाऽ्टया ॥ 
बिम्बरलानि, यथा-- व 
स्फरिकं पद्यरागन्च वञ्च नीरं हिरण्मयम्‌ । 
वेदू्यं विद्म पुष्पं रलबिम्बं तथाऽटधा ॥ 


स्फटिकं सुयंकास्तच्च चन्द्रकान्तमिति त्रिधा 
टिकस्यव मेदाः स्युः काममोक्षाधंदाः क्रमात्‌ ॥ 
श्रियं कामं तथाऽऽयेग्य्द्ध पुत्रं जयं उखम्‌ । 
कमते प्द्यरागादिविस्बानां कमोऽचंनात्‌ ॥ 
बिम्बवृक्षा, यथा-- 
चन्दनं देवदार्श्च शमीपिप्पररिक्षपाः 
हिरास्तनमाद्रमधूक्ा वञ्ुरस्तथा ॥ 
पद्यकं कणिकार्छ विप्रादीनां रयं त्रयस्‌ । 
` क्मादारवविम्बानां विन्तेयास्तरवः शमाः ॥ 6 
२४ इदानीं जी्गोद्धारविधिं संक्षेपेण कथयिष्यन्‌ भदौ जी्ैत्वेऽ्यपरित्याज्यां प्रति- 


। ` मामाह--भतीताब्द्दातेत्यादि ! महत्तमेम॑दाघुस्येः स्थाप्या स्थापनयोग्या या भूतिः देवताबिम्बम्‌ ` ^ 
अतीताब्दश्ता विगतक्षतवर्षा सती खण्डिता भघ्ना, स्फुरिता विदीणापि सा अर्च्या पूजनीया, 


गमे यदि परतिमा घ्रा स्फुटिता वा स्यात्‌, तथापि तां पूजयेदित्युक्तमनेन  :, 
 व्यक्तिविशेषप्रतिष्टितानां मूतीनामत्याज्यतामाह शिवरिङ्गमधिह्ृत्याधिपुराणस्‌-- स ( 


अन्यथा नोचेच्‌ पूजिता स्यात्‌ दुःखदायिक्ा अष्युभप्रदा भवेदिति ओषः । शतस्य वर्पाणामप- 


 अरेसुं निभिेत्रसतन्त्रविदुभिः प्रतिष्टितम्‌ । 
जीणं वाऽप्यथवा भग्नं विधिनापि न चाख्येत्‌ ।॥। (अ० १०३, १९ शछो०) 


 भङ्धविरेषे ग्राह्याम्रह्त्वसुक्त ग्रन्थकारेण तस्येव रूपमण्डने-- क 


0 ` इक्रनीतिसारे च 


07.  अभिपुराणेऽपिं सष्षषशितमाध्याये-- ` 


 अड्प्रत्यज्गभधरं तु मूत्तिं धीमान्‌ विसजयेत्‌ । 
 नखाभरणमाराख्मस्नां तं न विजयेत्‌ ॥ इति । 


देवाख्ये मानहीनां मूकं भश्च न धारयेत्‌ । 


 ओीणोद्धारविधि वध्ये भूषितां स्नपयेद्‌ गुहः । ४ 
` अचलं विन्यसेद्‌ गेहे अतिजीर्णं परित्यजेत्‌ ॥ १॥ 
व्यङ्घं भन्नाञ्च शेराव्यां न्यसेदन्याञ्चं पूववत्‌ । | 
संहारविधिना तत्र तत्त्वान्‌ संहृत्य देक्षिकः ॥ २ ॥ 
सहस्र नारसिंहेन हत्वा तायुदरेह गुः! ` 
दारवी दार्येह बहौ शेरजां प्रक्षिपेजरे ॥ ३ ॥ 


|. 


प्रथमोऽध्याय (५ ॥ि 0 २३ 
विः रोल ठ्यज्खा संस्कारयो ० काः। ` 
षाणजा भन्राः संस्काराहां न देवताः ॥२५॥ 

| [ बहिरायतनस्थाप्या देवताः ] 
भैरवः शस्यते लोके प्रयायतनसंस्थितः। ` 
न मूरायतने काया भेख्स्तु भयङ्करः! = ' 
नारसिंहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः ॥२६॥ = । 
| [ अश्ुभप्रतिमारुक्षणम्‌ ] 9 | 
नाधिकाङ्घा न हीनाङ्घाः कलतेव्या देवताः क्चित्‌। 


धातुजां रतजां वापि अगापे वा जलेऽम्बुधौ । ` क | 
यानमारोप्य जीणा छाद्य वश्नादिना नयेत्‌ ॥ ४ ॥ 1/1 
वादित्रः प्रक्षिपेत्तोये गुरये दक्षिणां ददेत्‌ । 
यतप्रमाणा च यहूव्या तन्मानां स्थापयेहिने । ` 
कूपवापीतडागादेर्जाणोदधाि महमफरम्‌ ॥ ९ ॥ 
 शिल्परल्ने च-- दोषे धुते बिम्बं नेव त्याज्यं कदाचन ! 
५: बाहुच्छेदे कश्च्छेदे पादच्छेदे तथेव च ॥ 
तथेव स्फुटिते भिन्ने यस्मिज्नवयवे गते । 
वैरूप्यं जायते यस्य तत्या्यं प्रायशो भवेत्‌ ॥ 
अङ्गुल्यादिपरिच्छेदे बन्धनं शस्यते बुपरैः। ` 
 महादोषसमायुक्ते सान्निध्यं रक्यते यदि। 
तथेव बद्वा संशोध्य प्रायधित्तं समाचरेत्‌ ॥ 


य 


२६ भैरव इत्यादि। भैरवो कारभेरयो वटुकमैरवश्िषुरभेरवश्च महादेवस्य मू्तिविकशेषः, = ` 
` प्रत्यायतनसंस्थितः बास्तुबहिरवारीस्थः शस्यते प्रशस्तो भवति, बहिरावास एव स्थापनीय ` 
इत्यथः । मूखायतने न कायो न स्थापनीयः । नारसिंहो वराहो वा तथा अन्येऽपि ष 1 
भयङ्करा देवता मूष्ायतने न कायाः । तदुक्तं मत्यपुराणे समानातुपूर््यी-- = ` 1 
भैरवः श्ञस्यते खोके प्रत्यायतनसंस्थितः 4 
` ` ` न मूलायततने कायौ भैरवस्तु भयङ्करः ॥ 4. 

|  नारसिहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः ॥ इति । (२९९अ० १४-१९ शलो 


ख  देवतामूर्चिप्रकरणम्‌ 

सवासनं घातयेन्नयना करालवदना तथा । 

अभि पका शिल्पिनं हन्ति छशा चेवाथनाशिनी ॥२९७॥ 

व्क नासातिदुःखाय संदिताङ्गा भयङ्करी । 

चि पिदा दुःखशोकाय आधिपत्यविनाशिनी ॥२८ 

 दुभ्दा हीनवक्ता तु पाणिपादङ्कशा द्था 
` हीनाङ्गा हीनजङ्गा च प्रमोन्मादकरी नृणाम्‌ ॥२६॥ 
 शुष्कवक्ता तु राजानं कटिहीना च या भवेत्‌ । 
 पाणिपादविहीनायां जायते नरको महान्‌ ॥३०॥ ` 

 जद्वाहीना तु या खर्चा शवु-कल्याणकारिणी । 
 पुलमित्रविनाशाय हीना वत्तःस्थलेन या ॥३९॥ 


जात ७८५ तातो १ ५१ [त 


` २७-३१॥। एते पञ्च इरोकाः स्वौत्मना मतूल्यपुराणीय (अ० २९९, १६-२० शो०)-ष्टोक- 
 पञ्चकमनुङकवते । यच्च कचित्‌ कश्चिहु वणंभेदोऽस्ति तन्मात्रं प्रद्यते-आधिपयविनाशिनीः 
(२८ श्लो) इत्यत्र मात्त्ये “अनेत्रा नेत्रनाशिनी" (१८ रको ०) इति पाठः, एवं "पाणिपादविदीनायां ` 
| (३० भ्छी) इत्यत्र शपाणिपादविहीनो यो" ( १९ ` भ्छो० ) इति पाठः । (जङ्हीनदेवता्चाः 
1 (३९१ श्छो० ) इत्यत्र “जह्ाजादुविदहीना चः ( २० शखो० >) इति पाठः । समराङ्गणसूत्रधरि-- 


निहन्ति कारकं रोद्रा दीनरूपा च शिल्पिनम्‌ । 
छशा च्या (धि ? धि) विनाश्चज्च कुयात्‌ कारयितुः सदा ॥ 
६ कृशोदरी ठ दुभिक्षं विरूपा चानपत्यताम्‌ ॥ ( अ० ७७, ७-८ इलो० 
` इत्यन्यदेव फलं तत्तदङ्कविक्ृतायाः प्रतिमायाः प्राह ! तथा च्रहतसंहितायाम्‌- | 
१ | नृपभयमत्यङ्घतायां हीनाङ्ञयामचछल्यता कन्त: । 
शातोदयो क्चुदभयमथंविनाशः कशाङ्ञयास्‌ । ` 
(1 मरणन्तु सक्षतायां शश्चनिपातेन निदिशेत्‌ करतुः ॥ ( अ, ९७, ५-५१ ) 
इति। परमन्र थ्यवस्थानादिभेदेनाप्यञयुभप्रतिमार्षणयुक्तम्‌ । यथा-- ` 


वासावनता पतीं दश्िगविनता हिनस्त्ययु ) | 
भन्धत्वमूदध दृष्ट्या करोति चिन्तामधोुली ष्टिः ॥ ` 
: ॥ ( अ० ९७, ९१-९२ कछो० ) इति | 


शु 


मत्ल्षुराणे मनोरदुतशान्त्यादिषच्छायां मतूस्यवचनम्‌, 


रति मा काष्ठलेपाश्मवण्डचित्रादिरसंग्रहे। . ` 
मानाधिक-परीवाररहिता नेव पूञ्यते ॥३३ 
` अनेत्री नलनाशाय स्वल्पा स्याव्‌ भोगवजिता 
अ्थहृत्‌ प्रतिमोत्ताना चिन्ताहेतुरधोमुखी ॥३४) 
[ छमप्रतिमारक्षणम्‌ ] 
सस्पूर्णावथवा या स्यावायुखक्त्मीप्रदा सदा । 


एवं छल्षणमासावय कर्तव्या देवता बुधेः ॥३५॥ 
[ अथाद्ुतम्‌ | । 


 यानवेरत्पातान्‌ गमैः प्रोवाच तानहं व्ये 
तेषां सङ्क्ेपोऽयं ्रकृतेरन्यत्वसुतपातः ॥ ३६ ॥ 


३२। पीढ्यानेत्यादि । प्रतिमायाः पीटल्य यानस्य परीवारस्य च ध्वंसे नाशने सति 


 कतुरपि यथाक्रमं स्थानवाहनखत्यानां निशितं नाश्ञो भवति। तथा च पीर्ध्वसे स्थाननाह्ञः, ` 
| यानध्वंसे वाहननाशः, परीवारध्वंसे च गत्यनाशो भवतीत्यर्थः । ५. ६ ५ 
३६1 प्रतिमेति। काष्टादिनिमितप्रतिमानां कग्रदे हत्य्थः। मानाधिकैति। पूर्वं ` 
ह प्रतिमाया य म्ानद्युत्त ततोऽधिकपस्मिणा, परीवाररष्िता यस्याः प्रतिमाया यान्तः परीवारा 
श्ाश्््ास्ततोऽल्यपरीवारविरिष्टा, ततश्रानयोः कम॑धारयः ! अथवा मध्यमणिन्यायेन परीवार- ` 
अ  पदल्योभयत्रान्वयः, तथा च मानाधिकपरीवारा परीवाररहिता चेत्यायातम्‌ ; एवञ्न-यस्याः ` 
प्रतिमायाः परीवाराः संख्यातो देष्यौदितश्च यथानिर्िषटपरिमाणाधिकपरिमाणतन्तः, यस्यै 
कान्ततः परीवारा एव न सन्ति, ते उमे अपि नेव पूजयेदित्यर्थः । ¢ 
३९। सम्पूरणावयवेति। तथाच माल्ये ` 


सम्पूर्णादयवा या तु जयुरश्षमीप्रदा खदा । 


एवं रक्षणमरासा् कतन्यः परमेश्वरः ॥ ( अ० २५९१ २१-२२ शो० ) ८ 
इति किञ्िदभिन्नालुपूध्याऽं शोकः । परमेरवरो देवप्रतिमा । ५ 
गर्गैः अन्नः समीपे प्रोवाचेत्यन्वयः ! तथा च 


1 


 मनुजानामपचारादपर्ता देवताः सृजन्त्येतान्‌ । 
तत्‌षरतिघाताय तपः शान्तिं राष्ठ प्रयुञ्जीत ॥ ३८ ॥ 
[ दिन्यादुयुतम्‌ | 
दिव्यं मरहक्ैवेकृतम्‌ 
[भन्तरिशषादुसुतम्‌ ] 
... .** .*-उस्कानिघांतपवनपयििशाः 


अत्र ते वणयिष्यामिं यदुवाच महातपाः 
| अच्रये इ्रद्धगगस्तु सव॑धमंश्तां वरः ॥ (अ० २२९, रश्छो० ) 
इति । तेषाम्‌ अद्भुतानां सङड्क्षपः समासेन संग्रहस्तु प्रकृतेरन्यत्वं स्वमावस्यान्यथाभाव 
यमिति यावत्‌ । ६ 
तथा च श्हतसंहिताविष्रतौ उतपरुमष्टतसमाससंहितायाम्‌- 
यः प्रकृतिविपयासः सवः संक्षेपतः स उत्पातः । ` 
क ध्षितिगगनदिव्यजातो यथोत्तरं गुहतये भवति ॥ इति । | 
| ३७। संसूचयन्तीति। सवाङ्क्षतमिदं शछोकाद्धं कथं परतिन्रियितेति पयाङरेरल्माभिर्मूरे 
 संशोधनप्रयासः परित्यक्तः! परम्गरहाथं॑संवादिप्रमाणयुद्धियते। तथा च इहव हितायां 
.  यथोक्तूर्वादीत्‌ परम्- | 
` ्व॑सुचयन्ति दिन्यान्तरिकिभौमास्त उत्पाताः, (अ० ४९, २ श्लो०)1. 


स ` उपद्रवाः । क्था च गगः-- 

॥ `  अतिलोभादसत्याह्वा नास्तिक्याद्वाव्यधरम॑तः । 
1. नरापचारान्नियतयुपतरगः प्रवत्तते ॥ इति । 1 
ततो दिव्यान्तरिकषिभोमा उत्पाताः सान्‌ उपसर्गान्‌ संसूचयन्ति दति तदविदृतौ ` 


इदानीमुतपातान्‌ विभजन्‌ विवयस्वरूपमाई-दिन्यमिति । ग्रहाणाम्‌ आदित्या 


ध ५ इति प्रकतादढसमाथंकः पाठः । "नराणाम्‌ अपचारेण पापसञ्चयो भवतिं पापसश्चयादुपसगां 2 


चरस्थिरभवं... ... -.* 
[ एषां श्ान्तिनिवत्तंनीयत्वानिवत्तनीयत्वविकल्पः ] 


1 = 


दीनाम्‌ ऋक्षाणाम्‌ भर्वन्यादिनकषत्राणां यह्‌ वृतम्‌ अन्यथाभावस्तद दिन्यम्‌ अद्धूतमिति शेषः । ` 


। अत्र प्रकृतोऽ्युतपातो लिङ्गमेदाह “दिव्येन न सम्बध्यते एवमुत्तर्ापि। यद्वा वैकृतमेवात्र॒ ` 


विशेष्यम्‌ ; अ्हक्षकतं यदु वेकतं तहु दिन्यमित्यर्थः । ` 
आन्तस्छिमाह--उल्केत्यादि । उल्कास्वरूपमाह बृहतसंहितायाम्‌- 


दिवि सुक्तश्वभफरानां पततां रूपाणि यानि तान्युल्काः ( अ० ३३, £ श्ची° ) ईति । ५ 1 
केचित्‌ पुनलाकानां छ्चभाद्युभसूचनाय रोकपालास्तान्यश्लण्येवोल्का इत्याहुः । तथा बोत्पल- 


भट्टतगगः-~ 
| स्वाख्लाणि संखजन्व्येते श्चुभाड्युभनिवेदिनः । 


५  छोकपाहा महत्मानो लोकानां ज्वलितानि तु ॥ इति । 
निर्घात इति । निर्घातमाह बहतसंहिताविदृतो उवपरमहशटतग्गः-- ` 
यदाऽन्तरिक्षे बर्वान्‌ सारतो महताषहतः ! ` ` 
पतत्यधः स निर्घातो भवेदनिरुसम्भवः ॥ ` इति। 1 
पवनो विकृतो वायुः । परिवेश इति । तत्स्वरूपमाह बरहतसंहितायाम्‌- ` 
खम्मूच्छिता रवीन्द्रः किरणाः पवनेन मण्डलीभूताः 
नानाव्गोकतयस्तन्वभ्रे व्योक्नि परिविश्चाः ॥ इति । 


गन्धवंषुरम्‌ आकाशे इश्यमानं पुराति प्रविद्धम्‌ । इन्द्रवापम्‌ आकारे दश्यमानं =` 
० धनुराङृति विहम्‌ । तथा च ब्रहत्ंहितायाम्‌- . 1.4 


सुयंस्यं विविधवर्णाः पवनेन विधद्धिताः कराः सन्ने । 
वियति धनुःसंस्थाना ये इर्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥ इति । 
प्रकारान्तरमाह उतवर्मद्टतकाश्यपः-- ` 
| अनन्तङ्करुजाता ये पत्गाः कासरूपिणः 1 
तेषां निश्वाससम्भूतमिन्दरचापं प्रचक्षते ॥ इति । 


एते यत्‌ तदान्तरिश्चम्‌ अदुतमिति । गन्धव॑पुरन्दोत्यत्र एकं 'पुर्पदं ठेखकप्रमादात्‌ ` | 


पतितमिति प्रतिभाति, पासी । 1 
।  ४०। भोगता --मोममिति । चरस्थिरमवमिषि च्य 


दव ` देवतोभूकरणम्‌ 


 मवतीति ताइ यत्‌ तदु भोमम्‌ । उत्लभहृस्तु बरहवसंहितायाम्‌--श्वराणां वस्तूनां स्थे 


स्थितां चरतवं तदुद्धवम्‌' इत्याह । ` 


भोमनामखयोः शान्तिकमंनिवस्थंत्वमाह--तदिति। तह भौमम्‌ अवं कान्तिभिः शान्ति 


` कमभिराहतं निवारितं सत्‌ शमं शान्तिसुपंति । नाभसम्‌ आन्तरिक्षम्‌ अद्धतं श्ान्तिभिराहत- ` 
 भित्येव, शुत मन्दीभावम्‌ उपेति । भत्रे श्ुतासुपेतीत्यनेन भौमं यथा शास्येन्न तथा ` 


५ | क ंहितायाम्‌ 


 भामसमित्यायाति। 


 थातीस्येके महषयो वदन्ति । 
तथा चोवपलमहदतकाभ्यपः-- | | 
भोमं शान्तिहतं नाशमुपगच्छति मार्दवम्‌ । 
नाभसं न श्चमं याति दिन्यमुतपातदशंनम्‌ ॥ इति । 


अन्न शामीतेत्यपपाटः आदादिकष्य शमधातोरभावात्‌ ।! राम्यतीति पलो ब्रृहत्‌- 


प्रसङ्गादत्न दिव्याचुञुतमधिङ्घत्य सवस्यपुराणे यदुक्तं तदद्वियते-- 
 भ्हृक्वेछृतं दिन्यमान्तरिश्षं निबोध मे । 
उल्कापातो दिशां दाहः परिवेशस्तथेव च ॥ 
 गन्धवंनरार्ेव वृष्टिश्च विहृता तु या | 
 शवमादीनिं रोकेऽस्मिन्नान्तरिषं विनिर्दिशेत्‌ ॥ 
चरत्थिरमवो भोमो मूकम्पश्चापि भूमिजः। 
 जेखदायानां वेङृत्यं भोमं तदपि कीर्मितम्‌ ॥ इति 
1 | (अ० २२९; ६-९ शोर ) ॥ि 
५३। चवं दिव्यस्य शास्यत्वाक्षाम्यत्वे विकल्प्य सम्प्रति स्वमतमाह--दिन्यसपीति । 


1: ६  अन्रापिः सम्भावनायाम्‌ इत्यहं सम्मावयामीत्यथंः । यद्वापिः खयुचये, प्रभूतततदद्यदानेनं केवरं ` 
 “ भोम नाभसन्र शान्तिसुपेतः परं दिव्यमपि शान्तिसुपेतीत्यर्ः त ध 
शद्रायतन इति रिवाख्ये। भूमेगोरदानादि्त्यपपाटः पूर्वं गोमदहीदानल्योक्तत्वात्‌ । यद्रा ` 


८ पूवं स्थानानियमेन प्रभूतगवादिदानन्यवस्था कता, परतश्च स्थानविरोषे अल्पाया अपि भूमे- ॥ 


| सेक्या अपि गोदोनमभिितमिति परीदं रलपदोपादानादद्ध यिति गोरिषि चेकवचनो+ = 


दूनादुवगस्यत “शदरायतने भूमौ गोदोह्यादिःति पाठो बृतसंहितासम्मतः। भूमौ गोदोहश्च 4. 
विना भूमो गोः स्तनं नि पीः निष्पीड्य इम्धोत्सगं' इति शब्दकश्पदभः न 


दिन्थोतपातस्य शान्तिनिवत्येत्वे विकल्पमाह--नेति । दिव्यं न श्नान्तिष्ुपेति न वा श्दुता ४ त 


`  अनिमित्तचलनभङ्ग-खेवाश्रनिपातजल्पनाव्यानि 


लिङ्गादि वेहतं नामेति तदाह--भनिमिततेत्यादिना शिक शैवम्‌ . अचौ देवप्रतिमा आयतनं सिद्धं 
 देवल्थानम्‌ एषाम्‌ अनिमित्तं चखनादिप्रयोजकवाय्वभिवातादिकारणं विनेत्यथंः । चरनं कम्पः, 
< ` निपातः पतनम्‌, जस्पनम्‌ भसम्बदोक्तिः । आचप्रहणाहु वमनं व्रसर्पभञ्ेत्युतपरभहः। एतानि ` 

 जेशस्य राज्ञः देशस्य जनपदस्य च नाशाय भवन्ति! ` ५, 4 


ध [ दबोवपाते रत्तो विशेषः ] 0 
अ त्मभुतकोशवाहनपुरदारपुरोहितेषु रोके च 
पाकमुपयाति देवं परिकल्पितमष्टधा नृपतेः ॥ ४२ ॥ 


[ लिङ्गादिवेकतं तत्कर ] 


रिङ्कार्चायतनानां नाशाय नरेशदेशानाम्‌ ॥ ४३ ॥ 


४ नी नो 


 ४२। अत्र ठैवोतपाते राज्ञः फर्त्य॒व्यापकतामाह--आत्मेति। यद्रा येऽत्र प्रकरणे | 
उक्तास्तेषां राजन्येव फरपाकं इति स्थिते तचघम्बन्धितया के के फएटभागिनः स्युरित्यपे्षायामाह-- ` 
भामेति! कस्योतपातस्य त कीशः फरपाके इत्युपरिष्ाह बध्यते । दृपतेरिति सर्वत्र ` 
` सम्बध्यते तथा च नृपतेरात्मनि शरीरे छते पत्रे कोषे धनागदि वाहनेषु इस्त्यश्वादिषु षरे नगरे ` 
दरिषु साणोड पुरोहिते भावाय कोके प्रजा चेत्यष्टपा अष्प्रकरिग परिकल्पितं देवमदुतं पाकं याति ` 
फलं ददाति । छक जनपदे" इत्युतपरभदः (अ० ४९१ ७ छो० ) । व्यक्तमाह मतस्यघुराणे-- ` ५ 
राः शरीरे छोके च पुरदारे पुरोहिते। = (4 ध 
पाकमायाति पुत्रेषु तथा वे कोषवाहने ॥ ( अ० २२९, १३ श्ो० ) | 


यसव स क य ध 9 1 ध = = सय न < = 
२, सस योव स 
स क स नो 


अत्र देवोतपात एवायं राज्ञः एरविशेष उक्तः, पूर्वोक्तमतत्यषुराणवचने तु एवं विधफरुस्यौतः ॥ 
 पातक्चाधारण्यमिति विशेषः । एतेन प्राङ्तजनविषय उत्पातः प्रातिस्विकफरु इत्यवधेयम्‌ । | 
 ४३। चरस्थिरभवमिति यत्‌ स्थिरस्य चरधर्माक्रान्तिक्षणं भोममदयुतम्‌ उतपरभटव्याख्या- ् १ 
स्वरखात्‌ पूर्मुक्तं तदेव विचियते--भनिमित्तेत्यादिना । अथवान्यदेवेदं पूर्वोक्ते्य उत्पातेभ्यो 


`  चंलनादि्वेपदा्ेः सहेवानिमित्तमियस्यान्वयो न्याय्यस्तथापि सामथ्य न नभ ङ्न पते का 


प 


(त 


रोदने नर्तने हास्ये देवतानां प्रसरणे 
महद्‌ भयं विजानीयात्‌ षण्मासत्रि(सात्तिगुणं परम्‌ ॥४६॥ 
५ यदा सुखन्ति देवताः । 

राजा तदा च प्रियते प्रसूते च धनक्तयम्‌ 


४४ । “नाज्ञाय गरेददेशानामिःत्युक्तम्‌, इदानीं केन कल्य नाश्च इति विषयविभागमाह-- 


|  स्वदेशेत्यादि। स्फोटे भङ्गे स्वदेशध्वंसो मवेत्‌ । अत्र केखकप्रमादाह अन्यस्य किरयाश्नन ` 


भागः पतितः। 


४९ । नत्तेनमिति। उन्मीखनं नेत्रप्रसारणम्‌, निमीकनं नेन्रसङ्कोचः, यद्वा अङ्गानाम्‌ 


1 | आङ्क्नप्रसारणे । क ( 
। ४६। रोदन इति। षण्मासत्रिगुणमिति। शान्तो ङृताया षण्मासात्‌ परं भवं श्रिुणं 
भविदित्यथैः, तथाच “्वण्मासात्‌ न्रिगुणःमिति द्धः पाठः । 


- षतचिन्त्यम्‌,-पएतेषासुतपातानाम्‌ अष्ट॒ मासेष्वतीतेषु फर्पाकश्चवणात्‌ कथं षट्‌ 
` मासेष्वतीतेष्वेव भयानां गुण्यं सम्भवदुक्तिकं स्यात्‌ । तथा च बृहतंहितायाम्‌-- | 


भमासेश्राप्यष्ठामिः सर्वेषामेवं करूपाकः” । इति । (अ० ४९, १४ शो) = ` 


पजर इदमत्र कथित्‌ समाधानम्‌-भन्र सद्धोचदत्या स्व॑शब्दस्य देवतार्चाकृतोत्‌- ` 


। १ पातेतरपरत्वाभ्युपगमात्‌ तथाविधोतपातल्य स्ःरखत्वेन “ण्मासात्‌ त्रिगुणं परमिति सङ्गच्छते! ` 


॥ अन्नद शोकदवयं प्रायेण समानाथंकमिति स्थृणानिखननन्यायेन वा, पूंत्र भयल्य देश- ` 


४७ । भूमज्वालामिति । भूमं ज्वाखाज्त्यथः । ज्वाखा चाग्निशिखा । तदेतत्‌ सर्व॑ ` 


ना 
[ अन्यानि वैतानि] ` ४ 
 भूमि्यंदा नभो याति विशेद्‌ वसुन्धरां नभः। 
श्यन्ते चान्तरा देवास्तथा राजवधो भवेत्‌ ॥४८। 
 देवतायात्राशकटाक्षचक्रयुगकेतुभङ्गपतनानि। = । 
सप्यासनसादनसङ्नच न कशपयुमदाः॥०६॥ == | 


देवताच प्रत्यन्ति वेषन्ते प्रज्वरन्ति व । । 
वमन्त्यस्नि तथा धूमं स्नेहं रकं तथावसाम्‌॥ = | 
आरटन्ति द्दन्त्येताः प्रस्वि्न्ति हसन्ति च । = | 
उत्ति्न्ति निषीदन्ति प्रधावन्ति धमन्तिच ॥ = । 
|  भुञ्ते विष्िषन्ते वा कोशग्रहरणध्वजान्‌ । ॥ 0 
 अवाङ्ुला वे भवन्ति स्थानात्‌ स्थानं श्रमन्ति च ॥ 0 

 पुवमाचा हि इभ्यन्ते विकाराः सहसोस्थिताः । 
 लिष्कायतनविप्रेषु तत्र वासं न रोचयेत्‌ ॥ व 

 रा्लो वा व्यसनं तन्न स च देसो विनर्यति । (अ० २३०, १-९ श्लो) ` 
इति । सहसेति अनिभित्तमित्यर्थः । विरेषस्तु-प्रकृते शिङ्गावायतनानामित्यक्तम्‌ अत्र लिङ्गः ` 
 चौयतनविप्राणामिति। ५ | 
भतरेदमवधेयम्‌-यययं स्थिरस्य चरधरमा्रान्तिर्षणो भोम उत्पातः, यदिवा विशिष्टएव  । 
 कष्डिदुवपातः स्यादुभयथापि विपेष्विति न सच्छे । न हि विप्रः स्थिरो येन तस्य चरधम॑ | 
 नत्त॑नादिकमौतपातिकं भवेत्‌ । विरिष्टोऽपि न सम्भ्ेत्‌ ताकोत्पातस्य कप्यश्रवणात्‌ । तस्मा. = | 
इन्र इृक्षेष्विति पाठे युज्यते न वेति छधीभिश्चिन्तनीयम्‌ । अस्ति हि स्थिराणां बृष्चाणाँ । क| 
चरमस्य नर्त॑नदेः प्रातिरूप उत्पातो श्रहतसंहितादौ निरूपितः । तथा च इतसंहितायां ` | 
` इकषवे्ृतं प्रकृत्य-- द 


"हसने देशध्वंसं रदिते च व्याधिबाहृल्यम्‌ 
धूमस्तल्मिर्‌ जालाथवा भवेन्नपबधायेवः 7 
स॑त तस्खु जलपव्‌ढ वापि जनसंक्षयो विनिः 4. 
॥ 9 ५ (अ० ४९, २९,२९, ३० छो) 
(५ । `इति तत्र तत्र भवौदिषदेव बृक्षाणारपि तत्तद्ेकृते दोष उक्तः । 1 
४९॥। देवतायात्नत्यादि । देवतायात्नायां देवतोदसवे शकटस्य प्रहृतोतूसवनिर्वाहाथं समा 
चक्रमध्यविदण्डल्य च, श्ाकटाक्स्येत्येकं पदं वा, चक्रस्य, युगस्य वा 


(1 ( ४ दययो ¦ | । जककाष्टल्य केतोश्च भङ्म ह्फोरनानिं पतनानि वा। तथा सम्पर्यास तपः र 
यौः अक्षस्थाने बुगस्य युग्थाने चकर्येत्यादिरूपं विपरिवर्तनमित्य्धः, सादनं विहरणं ` 

सहसेव जजंीभावः, सङ्ग आसन्नं गमनपरतिबन्यकीमूतः परस्परसंदकेषः ; यते न देश्य कृपस्य च॒ ` 

1 छ दाः । देवतयात्रेति पाठे बृहतसंहितायाम्‌ ( अ० ४९४ ९ श्र ) । ५ | 


९०। पू लिङ्गार्चायतनानामित्युक्तम्‌, (नतंनं जल्पनं हास्यम्‌? इत्यादिना च देववेङते ` 


1 ५ सामान्यतो (मयं भवेद" इति चोक्तम्‌ । सम्प्रति कस्यार्चाया वेकते कल्यानिष्टमिति विधिष्य 


वक्तमाह-बरविधमेत्यादि। धर्मो देवविशेषः, पितरः प्रसिद्धा भूतजनाः ङत्रचित्‌ लेपसघाः 


क्वियन्ते ; एतेषामचौख वत्‌ प्रोदुभूतं वे्ृतं तद द्विजाती नासनिष्िम्‌ अश्मप्रदम्‌ । 
1 ` यच्च॒ रद्रस्य रोकपारानामिन्द्रादीनां च वेकतं तत्‌ पञ्चू्नां राज्ञो वाहनीभूताना- ` 
 मनिष्टमित्य्थंः। . 


५१} द्विजातीनामित्युक्तम्‌ , तत्रापि पुरोधसां विकशेषमाह--गुविंति । सितः शुक्रः । एतेषु 


नरेन्द्राणां न माङइ्क्किम्‌। 
९२ ! वेदव्यासे वेकतं मन्ज्रिणि, विनायके वेकतं 


यड्‌ वैकृतं तत्‌ पुरोधसामित्यधः । स्कन्दः कार्तिकेयः, विशाखो देवविशेषः ; एतयोर्द्भूतं = 
वैत नेन ५. (0 
1 र ूनाधे सः सेनापतौ भनिष्टजनकस्‌ । = ` 
त्यादि । देव (४ ५4 यहु वेकं तच्चपककमरे, पुवं ऊमारीवनितप्रेषयेष्वपि ` ध ५ 


प्रथमोऽध्यायः धः £ ३ 


उत्पातानां फर्कारः | 

सवेषामेव फरपाकः ॥५४॥ 
[ एतेषां क्षान्तिः ] 

 छलनङुस्तु(सु?)माचलेषनवलेरभ्यच्चयेत्‌ प्रतिमाप्‌ 

 मघुपकेण पुरोधा भच्ये्बखिभिश्च विधिवदुपतिष्ठेत्‌ 
स्थालीपाकं जह्याद्‌ विधिवन्मन्वेश्च तष्िङ्कः ॥ ५६ 

[ श्ान्तिषलम्‌ ] 

विबुधविचा(का?)२ शान्तयः सरार 

`  द्िजविबुधगणाचां गीतनरृलोतसवाश्च । 
 विधिवदबनिपारयें (येः १ ) प्रयुक्ता न तेषां 

` भवति दुरितपाको दक्तिणाभिश्च रुद्धः ॥५७॥ 


९४ । रक्षःपिशाचादि । एवमेवेति । एतदुक्तं भवति-यथा देवङ्कमारादौ प्रोदुभूतं 


वक्त चपह्य कमारादौ अनिष्टजनकम्‌ एवं रश्चःपिश्षाचगुद्यकनागानां पुन्नादावपि प्रोदुभूपं > 1 ॥ | 


चृपस्य पु्रादावनिष्टसाधनमित्यर्थः । | 
मासेश्चाव्यष्टाभिरिति । सवेषामेव वेकृतानाम्‌ अष्टाभिर्मासेः एरुपाको मवतीलयथंः । 


अष्टाभिमसे रित्यपवर्गं तृतीया, तथा चा्टमासाभ्यन्तर एवाद्ुतानि फल्सुपदशयन्तीत्यथेः । एवञ्च | 


` पूष्रं ण्मासात्तिगुणं परम्‌” ( ४७ ) इति यदुक्तं तदपि साधु सङ्धच्छते । मक्ह्यपुराणे- 
भ्नरिभिवंषल्तथा ज्ञेयं छमहद्‌ भयकारकम्‌? ( अ० २२९, शरश्छो० ) | | 
इतिं वर्ष॑न्रयाभ्यन्तरे प्रपाककार उक्तः! अत एवोतपरभटोऽपि “अष्टाभिमसेरिष्त्यघ्य 
सष्टाभिमौसेरतीतेरित्यथमाह ८ बृहतसंहिता, अ० ४५, १४ श्ो० ) । ८ 


 ९९॥। हदानीम्‌ उत्पातानां श्ान्तिमाह--बुु ति। स्नानं स्नानीयं जलम्‌ । त्यहोषित- ` ॥ | | 


 शखयहोपोषितः दिनत्रयं कतोपवास इत्यथः । प्रतिमाम्‌ उतपन्नविकाराम्‌ । 


९६। मधुपकेणेति । स्थारीपाकं चर' तशिङ्ेस्तत्तदेवतानुमापकमंन्त्स्तत्तद्देवताया = | 


` इवनमन्त्रजहुयात्‌ । 


 ९७। श्ञान्तिफलं शान्त्यवभिन्नाह-दइतीति। विबुधविकारे देवङृतोतपाते जाते ` 


देवता-५ 


इः ` ` । दतामूिकरणम्‌ 
दीनां गुविणीनां विरोषत 


सतीत्यथंः, इति पूर्वाक्तप्रकारेण स्तरत्रं साहं शान्तयः, तथा द्विजविव्रुधगणार्चा द्विजदेवगणपूजा 
 गीतनृत्योत्सवाश्च येरवनिपाे; विधिवत्‌ प्रयक्ताल्तेषां दुरितिपाक उतपातजनितानिष्टफलं न भवति, 
दक्षिणाभिः एतवका्याङ्मूतदक्षिगाप्रदानादिभिश्च दद्धो निवारितो भवतीत्यर्थः । 


 एतदन्त उत्पाताध्यायः सवथा व्रहत्संदितीयोतपाताध्यायानुरूपः ८ शहत्संदिता अ० ४९ ) । 
केवलं पञ्चचत्वारिशश्टोकादूनपञ्चाश्छोकान्तोऽ"शस्तत्र न श्यते ! 

९८ । बतूसे इत्यादि । तथा विकृतपाडः शोकोऽयं यथास्य प्रकरणमपि न उविक्तानम्‌ । 

एवमपि द्वारादिपददशंनात्‌ स्िवेश्तविरेषाच डारसम्बन्ध्येवायं शोक इत्यस्माकं प्रतिभा । इश्यते 


न, ० 


हि प्रधानद्भारस्य तेस्तेवधे कत्तरश्युभादिवणनम्‌ । तथा च बृहतषंहितायाम्‌-- ` 
मागंतस्कोणद्ुपस्तम्मश्रमविद्धमञ्युभदं द्वारम्‌ । 
उच्छरायाद द्विगुणमितां त्यक्ता भूमिं न दोषाय ॥ इति । (अ० ५२, ७8 श्षोर) 
| अस्यार्थः-- मार्गः पन्थाः, तख्वृक्षः, कोणोऽखिः, कूपस्तम्भौ प्रसिद्धौ, ध्रमो जलनिर्गमन- 
 प्रदेश्षः। पतैः सम्सुखेद्ररं विदधमछभदम्‌ । कियति दुरे स्थितो वेधने न दु्टफलूदो भवतीत्याह 
 उनच्छरायादिति। यावान्‌ द्वारस्य उच्छ्राय उचत्वं तद्िगुणप्रमाणां भूमिं त्यक्ता बहिः स्थिता 
दोषायेव एते दोषा न भवन्ति इत्युतपरभट्ः । सयमते-- 


वृक्षकणावधःस्थृणकूपविद्धं तथेव च ॥ , 
देवायतनविदधञ्च विधिविद्धं तथेव च । व 
वल्भीकभस्मविद्धञ्च शिरामर्मादिविद्धकम्‌ ॥ इति । (अ० ३०, ३८-३९ शो) 1 
विधिविद्धमिति बरह्मणा विद्धमित्यथः, स च बास्तुमध्यस्थो वा प्रतिमात्मा वा|: 
शिल्परत्ने च- 
मागकुपतरस्तम्भकोणपीडमनश्लोभनम्‌ । 
युल्यद्वारस्य देवानां नराणाञ्च विशेषतः ॥ इति । (पूव अ० २२, २१-२२ शछो०) 
4 पवन््व-- ` 
अक्षे नाभिुखे ङर्याह याघ्राद्ारन्च बास्तुनः । 


1 इति पूर्वादौ कृतशचद्धिः पाटः । उतरा समानम्‌। तथा चायम्थः--वृक्षे अभिमुखे सम्बुख- = ` 


`  चत्तिनि सति, प्रतिमादीनां विशेषतो युविणीनां प्रवेशे गृहे च अभिमुखे सति वास्तुनो यात्रा्मारं 
प्रधानं द्वारं न ङ्यात्‌। प्रविशन्त्यस्मिक्निति प्रवेशो गृहम्‌ । प्रतिमादीनामित्यादिपदादयुक्तानां ` 


प्रथमोऽध्यायः | ३४ ` 


ऋत्लाणि विशोपकाश्च८) एते विरोक्याः प्रतिमाविधाने 
इति श्री्तेत्राव्मजसूज्भ्रन्मण्डनविरयिते बास्तुशा्े देवतामूत्तिप्रकरणे 
शिरापरीक्ञप्रतिमाप्रमाणगुणभवाद्धताधिकासते नाम 
प्रथमोऽध्याय 


स्तस्भादितत्तदवस्तूनां ग्रहणम्‌ । एतच्चातिखाष्सेन यथाक्तानममभ्युद्य॒ समुपस्थापितमस्माभि- 


व्याख्यानम्‌ , निणये तु पाकाः प्रमाणम्‌ ।! शूपमण्डने तु- 
वतसेनाभिमुखे ऊर्याट याच्ना दारच वस्तुनः । 


पवेदाप्रतिमादीनां गुर्विणीनां विशेषतः ।॥ ( अ० १, १५ शो ) 
इति विशेष | 
५९ । नक्चन्रयोनिश्वेखयादि । नश्चत्रयोनिः योनिवंरम्‌ › देवादिकक्षाणि देवनरराक्चषसगणनक्षत्राभि 


विंशोपकाश्च प्रतिमाविधनि देवतामूततिगएनकार इत्यथः, एते नक्षत्रयोन्यादयः, विरोक्या विचार्या 
इत्यथः । अत्र विदोपकाक्ष्वेति कि शयुः पाठः कि वापपाढस्तदपि निर्णेतमसमथेरस्मामिस्तष्णी- ` 


मास्यते । 


नक्तव्योनिबिचारः--क्मकततुः कम॑दिनल्य च नक््योः परस्परं योनिगतराुता नक्नयोनि- ` 


प्रतिमाया जन्मनक्ष्नं ्तेयम्‌ । एवमन्यत्रापि । 


अभ्विन्याः-- 
शतमिषायाः- 
स्वात्याः-- 
हृस्तीयाः- 
पूवंभीद्रपदल्य-- 
धनिष्टायाः-- ` 
भरण्याः-- 

` रेवत्याः-- 

 इतिकायाः-- 

पुष्यायाः-- 


पूर्वाषाडायाः- 


श्रवणायाः -- 
रोष्टिण्याः-- 
 श्गरिरसः-- 


अश्वयोनिः 


99 


महिषयोनिः 


सिहयोनिः 


6, 


हस्तियोनिः 


99 


| । मेषयोनिः 


99 


वानरयोनिः 


११. 


 सपंयोनिः ` 


ॐ 


ज्येष्ठायाः- 


अनुराधायाः-- 
आद्रीयाः- 
मूलायाः- 
उत्तरफल्गुन्याः-- 


उत्तरभाद्रपदस्य-- ` 


चिच्रायाः- 
विश्ाखायथाः- 


अश्लेषायाः- 


युनवंसो १.-~ 


` मधायाः-- 
 पूंदल्युन्याः-- 


अभिजितः-- 


हरिणयोनिः 


99 


 श्वयोनिः 


गोयोनिः ` 


१9 


99 


99. 


` मूषिकयोनिः ` 


उत्तराषाढया ˆ ++: 


व्याघ्रयोनिः 


विडाख्योनिः ४ 


३६ ,, : ॥ि देवतामूत्तिप्रकरणम्‌ 

` गोव्याप्रयोः इस्ि्सिहयोः अरुबमदिषयोः श्वहरिणयोः नङरसरपयोः वानरमेषयोः 
विडल्मूषिकयोः परस्परं वेरम्‌ अन्यदपि लोकाचारतो वेरम्‌ अवगच्छत्‌ । एकयोनिश्रेच्छुभम्‌ , 
मिन्ञयोनिश्रेव्‌ मध्यमम्‌, उक्तरूपगणनया वेरयोनिश्ेदञ्युभं फं भवेत्‌ । इति । 


वडघ्कविवारः-- 
कमंकनतंजन्मरारिमयेध्य कमेदिनरारिश्रेत्‌ षष्ठो बाऽ्टमः स्यात्‌ तदा षडष्टकदोषो भवेत्‌? 
अत द्रमौ राशी त्याज्यो । 
मेषः वषः मिथनः ककटः सिंहः कन्या तुखा बृशिकः धनुः मकरः ऊुम्भः मीनः 

१ र र ५, ५ 8 9 ८... 4.६ १ 
कततुमषराशिः कमेयोग्यो रक्षिः कन्या ठुला वा ; अत्र कनतुजंन्मराशेमषात्‌ कमं दिमस्य 
कन्याराशिः षटसतुरारारिष्डमः, अतः षदष्टकदोषादवपि त्याज्यो इत्यादि । 


 वर्गाष्टकगणनानियमः- | 

रविश्वन्द्रो मङ्गरो बुधः ब्रहस्पतिः शुक्रः शनिखम्नश्वेति वर्गा्टकम्‌ ।  उदुटकगणनाका 
राक्िचक्राष्टकं पथम्‌ विरिख्य तेषां मध्ये यथाक्रमं रव्यादि रश्चान्तं वरगाटकं ख्खित्‌ । जन्म- 
काले रारिचक्रे कथिता ग्रहा खच्च यत्र यत्र राशो वत्तमानास्तषाम्‌ एकेकस्यावस्थितिस्थानाह 
ृथङ्निदिे रारिचक्रा्टके अधोरिखितप्रकारेण रेखा बिन्दुश्च पातयेत्‌ 
प्रथमती रवेवंगाष्टकगणनाभिलापश्वेद्‌ रवि्य॑स्मिन्‌ राला वत्तमानस्तन्न, तस्मादितीय-चतुथ- 
` सप्तमाष्टमनवमदशमेकादशरारिषु एकंकां रेखां पातयेत्‌ । तथा चन्द्रमद्धखादीनां यत्र यत्र श्लाः 


पातयितभ्या उपरि्निरूपितेरङ्ैस्तत्‌ खधीभिरबगन्तव्यम्‌ । 


प्रह्मणां बगाघ्रकरेखाचक्राणि 


सूर्या रेखाः ४८ चन्द्ा्टव्भ रेखाः ४९ | 
रविः १।२४।७८५।९ १०११ = रविः २।६।०।८1१०1११ 
चन्द्रः ३।६।१०।११ चन्द्रः १।२।६।०१०।११ 
मङ्खः १।२।४।७।८।९।१०।११ ` मङ्खः २।२।९।६।९।१०।११ 


बुधः ३।९६।९1 १०११९१२ ` ञुधः ?।३।४।५।७।८।१०१११ 
| यहः ९।६।९।११ ` | गुरः शभगनट्गरहाहर 
क्न | ५ १ | ज्यु ३।४।९।७।९।१०।११ 
८ श्निः १।२1४1७८1९)१०।११ ष ^ र > शनिः ३।५६।११ 
रपः ३।४।६।१०।११।१२ = | सपः ३।६।१०११॥१ 


ऊुजाष्टवगं श्खाः ३९ | 
रविः ५।६।९।११।१ 


रविः ३।५।६।१०।११ 
चन्द्रः ३।६।११ 

द्रः १।२।४।७।८।१०।११ 
चुधः ३।५।६।१ १ 

गुहः ६।१०।११।९२ 

क्छ: ६।८।११।१२ 

शनिः १।४।५७।८।९।१०।११ 
रप्नः १।३।६।१०।११ 


गर्वष्टव्गं रेखाः ९६ 
रविः १।२।३।४।७।९।१०।११ 
चन्द्रः २।५।५७।९।११ 
 मङ्गरः १।२।४।५।८।१०।११ 


। धः १।२।४।९।६।९। १०११ 


हः १।२।२।४।७।८।१०।११ 
शुक्रः २।५।६।९।१०।११ 
शनिः ३।५।६।११ 

लसः १।२।४।५।६।७९।१०।११ 


|  शन्यष्टवगं रेखाः ३९ 
रविः १।२।४।५।८।१०।११ 

चन्द्रः ३।६।११ 

मङ्रः ३।९।६।१०।११।१२ 

बुधः ६।८।९।१०।११।१२ 

गुरः ९।६।११।१२ 

शुकः ६।११।१२ 

शनिः २।५।६।११ 


| प्रः १।२३।०।६।१०।११ ` 


बुधा्टवर्ग श्खाः ३९ 


चन्द्रः २।४।६।८।१०।११ 
ङ्कखः १।२।४।७।८।९।१०।११ 


वधः १।३।५६९।१०।११।१२ 


गुरः ६।८।१९१।१२ 
शुक्रः २।२।२।५।५।८।९।११ ` 
दानिः 
ख्म्मः 

शुक्राष्टवगं सखा; ९२ 
रिः ८ 
चन्द्रः १।२।२३।४।५।८।९।११।१२. 
सङ्गखः २।९।६।९।११।१२ 


छधः ३।५।६।९।१९ | (1. 
गुरः ५।८।९।१०।११ 


खकः १।२।३।४।९।८।९।१०।११ 


शानिः २।४।५।८।९।१०।११ 


खञ्नः १।२।३।५।५८।९।११ 


ष्य 


टघ्नाष्टवगं श्लाः ४९ 


रविः ३।४।६।१०।११।१२ 


चन्द्रः ३।६।१०।११।१२ 
भङ्गरः १।३।६।१०।११ 
बुधः १।२।४।६।८।१०।११ ` 


गुरः १।२।४।९।६।०।९।१०।११ 


शुक्रः १।२।३।४।९।८।९ 
दानिः १।३।४।६।१०।११ 


 पराश्रीयषहोरायां रुप्नर्लाः ४९ 
 , अरन्थान्तरे३७ ` | 


क देवतामूत्तिकरणम्‌ 


उपयु॑तनियमेन स्खापाताड्‌ ग्रहां छदिमछुद्धिव्च निणयेत्‌ ! व्गा्के केनोपायेन ग्रहाणां ` 


छद्वा्चद्धिविचारं फरनिणंयञ्च छुर्यात्‌ तदिदा नीञुच्यते । दशाफलं विचारसाध्यम्‌ , महाषटवर्गा्ट- 
वर्शफरन्तु न तथाविधम्‌, एतदु गणितागतमित्यव्यथम्‌ ; गणना चेदन्नान्ता स्यात्‌ तदष्टवगं- 
निरूपितफरूमवश्यमेव घटत । 
अष्टवगे श्रह्मणं श॒द्धयश्चद्धिषिचारः फटनिणयश्च | 
ग्रस्य ग्रहस्याष्टवगं येषु येषु राशिषु पञ्चभ्यः अष्टं यावत्‌ फररलास्ति्ठन्ति, स ग्रहस्तपु तेषु 
राशिषु कऋमश्षः श्ुभफलवद्धंको भवति । चतस रेखा यदि तिष्टन्ति, तदा समफरप्रदः ; तिखो 


रौ एका वारेला तिष्ठति चेत्‌ कऋसेणाञ्भफर्ल्य वंको भवति । रेखाभावे अर्थादषटदल्यस्व, 


तद्राशौ तु सातिशयमञ्चभं ददाति । अतो यस्य ्रहस्याष्टवर्गं गणयेत्‌ स ग्रहो यस्मिन्‌ गहे स्थास्यति 
तद्गृहे यदि चतखस्तदधिका वा रेवास्तिष्टन्ति तदाऽसो ग्रहः छदः छमफरप्रदश्रेति जानीयात्‌ । 
किञ्च-गृदे यल्मिच्‌ रखाचतुष्टयस्य न्यूनता भवेत्‌ तद्राशिगतथेदङ्ुदस्तथाऽद्युभफर्प्रदश्च ! 
ग्रहगणो वर्गा्टके विशुद्धः सन्‌ यद्यपचयगतो भवेत्‌ ; अर्थाजन्मरार्वां जन्मलग्नाद्ा तृतीय-वष्टदश- 
|  मेकादशस्थानगतः स्याद्‌, अथवा भित्रगृहगतः क्रिवा उच्चस्थानगतो भयरेत्‌, तदासौ प्रहश्रातीव 
| श्ुभदायको भवेत्‌ । किञ्च ग्रहगणोऽश्युद्धो भवय्‌ यथयपचयस्थानगतो भवेत्‌ अर्थात्‌ तृतीयवष्ट- 
 दशमेकादशान्‌ विना अन्यरारिगतः स्यात्‌, शरघररा्ञौ नीचराशौ वाऽवतिष्टते तदातिकषय- 
 मद्युभप्रदौ भवेत्‌) य॒त्र यत्र राश्चो ग्रहा व्गाष्टके छुभदा गोचरे तत्तद्रारिषु आगच्छन्त- 
स्तातक्राटिकश्चुमदा भवन्ति । तत्‌. स्थानं चेजन्मरारितस्तस्य यरहस्य गोचरनिर्िशचुमस्थानं 
भवेत्‌ तदा शयुभफरवद्धेकः स्यात्‌, तस्य राचर्जन्मलघ्नात्‌ प्रश्ठति यो भावस्तेन तद्भावोत्थफलं 
तहभावनिरि्च ्राव्पित्रादीनां तात्कालिकश्चुभसोख्यं कल्पनीयम्‌ । इषटान्तो यथा-- 
रवेर्वगे मिथुनराश्चो फरुरेखाः ड्‌ भवन्ति ; तदवस्थायां रविश्रन्मिधुनरारिस्थः अर्था- 

 दषाढमासे विशेषञ्चुभसुचको भवेत्‌ । यत्‌ कमणि रविशचदधेरावश्यकम्‌ आषाढमासे तत्‌ कर्मा 
` रम्भेण श्चुभफरं निशितम्‌ 
| यावती यावती रेखा ग्रह्मणासश्टवगके । 

तावतीं हविगुणीङ्त्य चाश्टमिः पर्दतिधयेव्‌ ॥ १ ॥ 
 अष्टोपरि भवेद्रेखा अष्टाम्यन्तरबिन्दवः | 

अष्टाभिश्च खमो यत्र समस्तत्र निगद्यते ॥ २ ॥ 


ूर्वाक्तनियमानुसारेण प्रत्येकशश्च यावदरेखापातो भवेत्‌ ता रेखा द्वियुणीक्य 


 ततोऽो वियोजयेत्‌, ततो याबदवलिष्टं भवेत्‌, तावदङ्कं तत्तद्राश्िषु रक्षेत्‌ । यदुयद्वा- 


॥  शिषु द्वियुणितरेलासमषटिरशास्यो न्य॒ना भवेयुः तततद्रारिषु अष्टसंख्यातो यावती न्य॒ना भवेत्‌ ` | 
तावतो बिन्दून्‌ स्थापयेत्‌ यदयद्राशिषु॒शियुणितरेखासमष्टिरौ भवेदुस्तस्मिन्‌ रक्षौ समं ` 
^ खित्‌ 1. ५ 


प्रथमोऽध्यायः `  . , - ३8 
विन्दुपातस्य रेखापातस्य च नियमः 
शल्ये तु बिन्दवश्रा्चौ रेखेके रसविन्द्वः । 
चत्वारो बिन्दवो युगे ह्िचिन्दू शमरेखके ॥ ३ ॥ 
समो रेखाचतुें तु पञ्चके ने्रशेखके ! 
षड्रखाख चतू रेखाः सक्मे रसरेखिकाः ॥ ४ ॥ 
ूवोक्तप्रकरिण द्ियुणितरेलासमष्टिकाष्टो वियोजयेत्‌ । तेन शूल्येऽवरिष्टे विन्द््टकं ` १ 
रक्षेत्‌ । एकरेलायामवरिष्टायां विन्दुषट्कम्‌, रेखाष्रये बिन्दुचतुष्टयम्‌, रेखात्रे चिन्दुद्रयं ` 
रक्षेत्‌ ; शखाचतुष्टये स्थिते समो भवेत्‌ ; रेखापञ्चके रेखाद्रयम्‌, रेखापष्के रेखाचतुषटयम्‌, रतासके 
रेखाषश्कं भवेत्‌ । ० 
इत्थं रेखाविन्दुपातेन फलं विचार्यम्‌ । 


हेखाभिस्तु श्चुमं जेयं विन्दुभिरश्ुमं एरम्‌ । 
 यत्नररेखा न बिन्दुश्च तत्‌ समं परिक्ीत्तितम्‌ ॥ ९ ॥ 


रेखायोगेण बिन्दुयोगेन वा प्रहाणं फलम्‌ 
स्वोचमिघ्रादिवर्गस्थाः केन्क्तदिबल्संयुताः ! 
अनिष्ट्दाः सवं ल्वल्पतिन्दुयुता यदि ॥ ६ १ 


दुष्टस्थानत्थिता ये च ये च नीचारिह्रिगाः। | ५ 
ते सवं श्भदा नित्यमधिचिन्दुयुता यदि ॥ ७ ॥ 0 


दिनेशसुख्यग्रहवगकेषु यदा शनिः शूल्यगृहं प्रयातः । 
करोति पित्रादिकभावजानामतीव रोगारिभियाङलनिं ॥ ८ ॥ 


एतेषामथैः--उचस्थो मि्रादिवगगतः केन्द्रादिस्थो वा बख्वान्‌ ग्रहो वर्गा्टकचक्ते ` 
एकादिस्वल्पविन्दुयुक्तराशिस्थ एकादिस्वल्परखायुक्तराशिस्थो वा चेदनिष्टफर्प्दः। 


वडादिदुःल्थानस्थो नीचराशिनर्वाँरास्यः शचरक्ेत्रनवांशस्थो वा नितरा दुबंखोऽपि ग्रहः बिन्दु- (9 


यक्तरारिस्थो रेखायुक्तरारिस्थो वाचेत्‌ श्चुमष्र्प्रदः । 


र्यादिग्रहाणामष्टव् रेखादीनेऽटशल्ययुक्ते वा राशौ शनिर्गोचरव्रत्या गतश्रेत्‌ तद्राशिनि्ट- ` 1 
भावषरुल्यानिष्टम्‌ , रोगम्‌, शुषद्धिम्‌ , तथा भयाङ्रुत्वादिकम्‌ › तावनिदटव पितध्रात्रा- ` | 1 | 
॥ दीनामपि तद्रपमश्चमं परिकल्पयेत्‌ ।. अवमे रव्यादधग्रहाणां विशेषफरं भ्रन्थबाहुल्यभयादिह ` 4 | 

परित्यक्तं ज्योतिषगरन्ये तदनुसन्धेयम्‌ । | 1 


क | ४ ेदामूरयम्‌ = | 


नाडीगतऋक्त--( नाडीवेध- ) वि 


चरः 
नाड्यस्तिलः ; प्राङ्नाडी, मध्यनाडी, पृष्टनाडी च । 
प्राङ्नाडीस्थनक्षत्रणि- | 
९ ६ ७ १२ १३६ १८ १९ २४ २५ 
अश्विनी, आद्र, पुनवंखः, उत्तरफल्गुनी, इस्ता, ज्येष्ठा, मूलय, शतभिषा, वूवंभाद्रपदच । 
| मध्यनादीस्थनक्षत्राणि-- 
॥ ९ ८ ११ १४ १७ २० २३ | 


भरणी, शगशिराः, पुष्या, पू्ंफल्युनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढा, धनिष्ठा, 
२६ | 
उन्तरभद्रपर्दच्च । ८ 
क पष्ठनाडीत्थनक्षत्राणि- 


॥ ४ ९ १० १९ १६ २१ २२ २७ 
कत्तिका, रोहिणी, अष्ठेषा, मधा, स्वाती, विक्ञाखा, उत्तराषाढा, भ्रवणा, रेवती च 


एकं त्रिनाडीचक्रं विरिल्य तत्र नाडोवेधविचारं इयौत्‌। यदि करतुः कमंदिनस्य च | | 
नक्षन्नमेकनाडीस्थं भवेत्तदा नाडीवेधदोषो भवति । नाडीवेधदोषगते नक्षत्रे प्रतिमाघटनं | 
निषिद्धम्‌ । 


प्रतिप्रववः-- 
एकराक््यादिथोगे ठु नाडीदोषो न दिते । 
कतत: कम॑दिनस्य च सत्येदरादो दोषोऽसौ न स्यात्‌ । इत्यादि । 


 अिनाडीचक्रम्‌ | 


। || मध्यनाडी | पृष्ठनाडी | 


१ ३ 
` ६ ४ 
७ ९ 
१२ | ११ १० 
१३ | १४ ९१ 
१८ | १७ | १६ 
| १९ । २० ` 


` ४ | ५ | ५ |= | |. १8. . 


प्रथमोऽध्यायः = 


देवादिश्पज्ञ( गण- ) विचार : 


गणल्निवरिधः, देवगणः, नरगणः, राक्षसगणश्च । जन्मनक्प्रेण जातकस्य गणो निरूप्यते । तद ५ 


यथा-- 
हस्ता, स्वाती, शगरिराः, अभ्विनी, श्रवणा, पुष्या, रेवती, अनुराधा, पुमरव्॑ठः 1 
एषु जातो देवगणः 


आद्री, रौिणी, उत्तरफल्णुनी, उत्तराषाढा, उत्तरमाद्रपदम्‌, भरणी, पूवंकद्युनी, पूर्वाषाढा ` 


पूवंभाद्पदम्‌ 
एषु जातो नरगणः | 
ज्येष्टा, अश्लेषा, विक्ाखा, मूरा, शतमिषा, धनिष्ठा, कत्तिका, चिन्ना, मघा । 
षु जातो सक्षसगणः 
यस्मिन्‌ नक्षत्रे प्रतिमा निर्मीयते तत्‌ प्रतिमाया जन्मनक्षत्रम्‌ । तेन च नक्षत्रेण प्रतिमाया 


 गणनिरूपणं स्यात्‌ । कम॑कतत्गणेन स प्रतिमागगमिलनदिवसे प्रतिमाधटनं कु्यौत्‌ । मिंरनन्न 


वश््यमाणरीत्या जेयम्‌ । | 
गणञ्युमाञ्चुभक्थनम्‌ 
` स्वजातौ परमा प्रीतिमंध्यमा देवमानुषे । 
दवारे विरोधश्च श्त्युमानुषराक्षसे ॥ इति 


` देवता ` 


द्वितीयोऽध्यायः 
[ माननिणयः | 
लाया रेणु(?) बाखाम्र-लिक्ल-यूका यवो कटः 
करमादशगुणं मानं ज(जि?)नसंख्येः करा(रोऽ) हरेः ॥१ 


~~~ 
ता ५०५०१५५०१००१५ न ५ 


 १। छयेति । एतेषां छाया्द्धुलान्तानां सक्तानां पदार्थानां यथोत्तरं दशगुणं मानरित्यथैः 
त्था चव--छायाया दक्षपुणं रणोरमानम्‌ , रेणोदश्नगुणं बाराग्रल्य केशकोटे्मानम्‌ , ततो दशगुणं 
शिक्षस्य, ततो दशगुणं यूकस्य, ततो दशगुणं यवस्य, ततो दक्लगुणज्चाङुलल्य मानमिति स्पष्टार्थः 
अन्न छायापदाथनिणंयो दुष्करः, कापि तादशार्थकपारादुपलन्धेः । बृहतसंितावाम्‌- 
परमाणुरजोबारायिक्षयूकं यवोऽङलं चेति । 
अश्गुणानि यथोत्तरमदुरमेकं भवति संख्या ॥ (अन ९७, २ श्य) 
इति छायाल्धाने परमाणपर्दमाह । अन्यत्र परमाणुल्वसूपयुक्तम्‌- 
जालान्तरगते भानो यत्‌ सूष्यरं दश्यते रजः । 
| प्रथमं तत्‌ प्रमाणानां परमाणुं परचक्षते ॥ इति । 
 कस्मादन्न छायापदं परमाणुखमानार्थकमिति प्रतीमः । रेणुशरान्यत्र रजःफरेन व्यपदिद्टसप्रस 
= णुकूपः। कथा च शिल्परतपू्व॑भागे मानमधिहत्य-- 
| परमाणुरिति प्रोक्तो योगिनं इष्ियोचरः । 
तरसशेणुर्टमिः स्यात्तेशव परमाणुभिः ॥ 
तदष्टमिस्तु बालाग्रं रक्षा बाटाग्रकाष्टमिः । इति ( अ० २, १-२ श्छोर ) 


(4: एतदपि हत्यन्तरविसुदम्‌ ; "अणुहो परभाण्‌ स्यात्‌ त्रसरेणुस्त्रयः स्षतःः ( स्क-३, अ० ११,. ४ 0 
| शोर ९) इति भागवतीयात्‌ । | 


६ यथ इति यवोद्रम्‌ ; तथा च शब्दकस्पद्रुमश्त-लीलावत्याम्‌- 
| | 'यवोदरेरङ्लमष्टसंल्येहस्तोऽदुरुः षड्गुणितेश्रतुमिः । इति । 


शिल्परलभूवंभागेऽपि ्ववोद्रेः षड्गुणाः इत्युक्तम्‌ । शब्दकल्पद्रुम तिथ्यादितस्व्त- व 


८  काषिकापुराणमपि 
यकानां तण्डुल रेवमङ्खलं वा्टमिभंवेत्‌ । 
अदीवयोजितः ,,. `  "“  ॥# ईत्या्। 


दवितीयाऽभ्यायं  . "42 


कमाहशगुणमिति ! पतचिन्त्यम्‌, पूरवोद्धतद्हततंहितादिवचनेष्वषटमिः परमाणुभी रज | 


इस्याक्क्रिमेणष्टगुणन्ुद्ेशव श्रवणात्‌ । रिरपरलपूवभगे-- ` 

यवोद्रैः षड्गुणेवां स्तभिर्वाऽ्चमादिकम्‌ । 

क्मादषणुणर्बाऽथ मानाङ्रमिति स्तम्‌ ॥ (अ० २, ३ शछो°) 
इति मानविकल्पञुपदकशंयताऽपि तहुमन्थक्कृता दशगुणस्यानुङेखात्‌ । ` एतेनेतन्मतसम्मत्तश्चतुविश्च- 
` त्यङ्रकः करः कमादष्टयुणमानस्वीकत्त मते षडङ्रेनाधिको भवतीति जेयम्‌ । तथा च एकस्मि- 


बरे यवदधयगरधया चतु्िशत्यासङरषु भटचत्वारिदयववरदधिर्ियता, ते चा्टवत्वारिंशह यवाः ` 
षडङ्रम्‌ इति तेन सह मिरनातिकशदङ्कः कये मवति! सत्यपि प्रकारविरोधे नेदमपि 


करमानमप्रमाणम्‌; तथा च शिल्परलपष्चमगे- 
अङ्ककत्नितया युषटिषितस्तिद्रीदशाङ्कलिः 


टुद्रथं हस्तयुषदषटं तच्च किष्छुरिति स्तम्‌ । 

एकेकाङ्रदधयाऽतो भवन्त्यष्टौ कराः स्युटम्‌ ॥ 

प्राजापत्यं धनुमुषटिशरापग्रहमतः परम्‌ । 

प्राच्यां वैदेहकं नान्ना वेुस्यञ्च प्रकी तितम्‌ । 

इत्थमेकोत्तरत्रिशदङ्कान्ताः कराः स्मरताः ॥ ( अ० २, ९-११ छोर ) 
इत्येकश्रिशदङ्करान्तमपि करमाह । तस्मान्मतान्तरमिदम्‌ इति ज्ञेयम्‌। क 

जिनंख्येरिति। जिनाश्रतु्विरातिः, चतुर्विशत्याऽङ्खेः करो इस्त इत्यथः । तथा च 
बरहृत्संहितायास्‌ ( अ० ५७) र श्छो० ) उत्परमभषटटतववनम्‌- 9 
तस्माद्‌ रजः कचाग्रज् शिक्षा यूका यवोऽङ्गकष्‌ । ` 
कऋसादश्णुणं ज्ञेयं जिनसंल्याङ्रुः करः ॥ इति । 


तस्मादिति परमाणोः, तस्येव तत्र प्रकृतत्वात्‌ । अङ्कुरध्य च मानाङुरं मात्राम्‌ इतिद्वौ 


मेदो । अधल्तादु यदुक्तं तन्मानाङ्खम्‌ । मात्राङल्युक्तं शिल्परलपू्ंमागे-- 
तद्धत्तदक्षिणकरमध्यमामध्यपवेणः । | ` 
देध्यं मात्राङ्लं श्रेष्ठं नीचं तद्न्यासक्षभ्मिततम्‌ ॥ इति ( अ० २, ८ शो) 


अस्या्थः--कनुंदंक्षिणह्तस्य सध्यमाङरे्मध्यपवंणो यद देयं तच्छर्ं मातराङख्म्‌ , तस्यैव = ` 
मध्यपवणो विस्तारसम्मित्च कनिष्ठं भात्राङ्रम्‌ इति । अनयोश्च कमभेद षिनियोगमेदमाह ` 


` तत्रब-- 
। मानाङ्रः केवरपेव कुर्यादु देवाख्यादीनि गृहाणि वा चृणामं । 


कण्डादिकानामथ मण्डलानां सवत्र मात्राङ्रमिष्यते बुधः ॥ इति (अ० २,१७शछो०) ५ 


अत्र 'देषाल्यादीनिः इत्यादिपदाहदेवप्रतिमानामपि ग्रहणम्‌ । कादयपशिल्पेऽपि-- ` 
(मानाङ्कुलन्तु वा प्रोक्तं पुरप्रालादमानकम्‌! ( अ० ९०, ३७ छो० ) 
इत्युक्तम्‌ । = 


8& 


छविचच मानाङ्खं प्रतिमापरिमिणेनापि निर्णीयते । तथा च-- 
| “स्वेरङ्रुप्रमाणेद्वीदस विस्तीणंमायतच्च सुखम्‌” ( अ० ९७, ४ छो ) 
 ईइत्यादित्रिहतसंहितावचने '“स्वेरित्यल्य विंवरणप्रसद्धेनोक्तयुतूपरमह --“यल्मात्‌ काषात्‌ 
पावाणादिकाद्ा प्रतिमा क्रियते तरै पीटप्रमाणविवजितं दादशभागविभक्तं इत्वा तत्नेको भागो 
नवधा कायः, सोऽदुरलंक्ञा भवति । यस्मादष्टाधिकमदडुर्शतं प्रतिमाप्रसाणं वक्ष्यति (अर 
९७, ३० श्लो° ) 1 प्रतिमायाः सवैरात्मीयेरङ्रप्रमाणेः'› इत्यलं प्रसङ्कादागतस्थ प्रपञ्चनेन । 
२। तस्येति । अदम्थ॑मपीदं पदमगतिकतया 'अङ्लप्रमाणेनेण्तयस्यंकदेक्तेनाङ्खपदेन सासा- 


माधिकरण्येनान्वीयते ! तथा च तस्य प्रकरान्तल्याडुरुख्य प्रमाणेनेत्य्थः । तत्‌समेति गोरूकसषमा 
इति। द्रवङ्ुख्मानेत्यथेः। द्वास्यामिति कर्यं गोर्काभ्थं वा मागो भवति, अतस्तस्य 
 चतुरङ्रं सानमियथैः । तदुक्तं समराङ्गणसूत्रधार- 


दयङ्खो गोखको त्तेयः करां घा तां प्रचक्षते । 


दै करे गोलको (वाहो १ वाद्व ) भागो मानेन तेन तु ॥ ( भ० ७५, ३ शो 
३। पभिरिति । एतादशेभानिस्तारमानम्‌ एकतालस्य परिमाणं भवतीति शेषः । एवञ्च ` 


। दादक्षभिरड्र र्कल्तारो भवतीत्यथंः । तदुक्तं शुक्रनी तिसा 


स्वस्वमृष्टश्तुथोऽ"े ह्यङ्रं परिकी तित्‌ । 
तदङ्छदरदशशभिभवेत्तारुत्य दीघंता ॥ इति । ( अञ ४, प्र° ४, <२ छोर ) 


इदमश्र विवेवनीयम्‌-द्ादशाङ्रुं तालस्य परिमाणमिति स्थिते दह्यताख्प्रतिमा चिरत्यधिक- ` 
` शत्ताङ्गुरूपरिमाणा भवति। दशतालप्रतिमा च-- ` | 


दश्षताछः स्तो ससो अलिविंरोचनिल्तथा । ` 5 | 
वराहो नारसि्श्च ११ ¢ ( अ० २५९; १-२ छो क 


. | (1 ईत्येनेन मत्स्यपुराणे उक्ता, भन्थक्ृता चोपर्ित्‌- 


द्ञतालेमबेद्रामो बर्विंरोचन(नि ! स्तथा । (॥ ~ 
सिद्धार्व जितेन्द्राश्च उर्ध्वास्ते च प्रकीत्तिताः॥ (अ० २; ९ श्लो) 


7 इत्यनेन वक्ष्यते । एषामङ्ीसंख्याऽ्यक्ता इतसंहितायाम्‌- 


 द्षरथतनयो रामो बरिश्च वैरोचनिः श्वतं विश्षस्‌ । 1 
दादशषाल्या शेषाः प्रबरसमन्यनपरिमाणाः ॥ इति ( भ० ५७, ३० शमे ) 


द्विवीधोऽभ्ययः 4. 


एवञ्च रामादीनां प्रमाणं दश ताङास्ते च विंश्रयधिकं शतसङ्ख्य इत्यायातम्‌ । पतेन-- = ` 


“उत्तमं दशतारु स्याचतुविंशच्छताङ्गुरम्‌ 
( शि० उ० ४ अ २७ श्छो०, कादयप० ९० अ० ७७ श्छ ) 


इति यच्छिर्परल-काश्यपरषिल्पयोरु्तं तच्चिन्त्यम्‌ । पतन्ते ताखादीनसु्तममध्यमाधमभेदेन 


्ेविध्यसुक्तम्‌, तथा च काभ्यपरि्वे पूवोदतादद्धीत्‌ परम्‌- 

मध्यमं दहता स्याह भायुपड्न्त्यङ््ं भवेत्‌ । 

कराधिक्शताङ्भुल्यमधमं दशताखकम्‌ । 

सद्रादशहातं भागं नवतालोत्तमं भवेत्‌ ॥ 

अष्टोत्तरशातांडान्तु मध्यमं नवतारूकम्‌ । 

कन्यसं नवतारं स्याह देधा( स्यष्टेदा >धिकशचवं मवेत्‌ ॥ 

तारं प्रत्येवमेवं तु क्रमाट्‌ वेदाङ्गं हरम्‌ ( अ० ९०, ७७-८० शोर ) 
इत्युक्तम्‌ । शिल्परलोत्तरभागेऽपि यथोक्तायथेकादद्धज्नितयात्‌ परस्‌- 

"ताछ प्र्येवमेवन्धु करमाह वेदादिष्टानितःः (अ० ४, ३८ शलो ) 


इत्युक्तवा स्वेषामेव तालानां बतुश्वतुरङ्गकहाल्या उत्तममध्यमाधमत्वं प्रतिपादिषम्‌। तत्र 


मतल्यषुराणे यदशतालप्रमाणत्वसुक्तं रामादीनां तन्मध्यमं दशतारुमादायेबेखभ्युषगमेन जातेऽपि ` 
कथञ्चित्‌ समाधाने, ब्हतंहितायां द्वादशषान्ये( अ० ५५७, ३० शो त्यादि यदुक्तं तेन॒ 
त्वसामञ्धस्यं दुष्परिद्रमेव । श्रादशहान्ये"त्यादिपरादस्य त्वयम्थः-शेषा अन्याः प्रतिमा 
 द््ाहान्या ह्ादशकद्वादशकहीनत्येन प्रवर्तमन्थूनपरिमाणाः भमवत्ति। विक्षत्यधिकादङ्ल- ` 
रता द्वादजञाङखान्यपास्याष्टाधिकं शतमङ्खनां प्रतिमा प्रधाना भवति । ततोऽपि दवादशक- 4 

` मपाल्य षण्णवत्यङ्कलसमा मध्यमा प्रतिमा, ततोऽपि द्वादशषकमपास्य चतुरशौत्यद्ुरः न्यूनपरिमाणा = ` 
प्रतिमा सवतीत्यथैः, एवमेवोत्पलमङ्राः । एतच्च परिमाणं काश्यपरिल्पादिमते मध्यमनवतालादि- 
सघताखान्तप्रतिमाया इति ज्ञेयम्‌, मध्यमनवतारुस्याष्टाधिकशताङ्रत्वादन्ते सघ्ठताकल्य चतुर- ` | 
` शीत्यङ्गरुत्वाच्च ! परं सक्षभिस्तारदेवप्रतिमाया विधानं नोपरभ्यते, तेः "पिशाचाः सक्षमेन वु" ` (५ 


 (अ० ९०, ८७ श्चो० ) इत्यादिना पिद्षाचानामेव कारयपरिल्पे कर्तव्यतोपदेश्षात्‌। समराङ्गण- | 


 सूत्रवरिऽ्पि- ` ५ 
| देवादीनां शरीरं स्याद्‌ षिल्तरेणाश्मागिकम्‌ । 
त्रिश्दभागायतं चेतद्‌ विदध्याचित्रह्ाश्चवित्‌ ॥ 


इति भागमानेन यत्‌ प्रतिमाया मानसुक्तम्‌ › तेनाऽपि विंशत्यधिकरताङ्ुलमेव प्रतिमायाः परिमाण = | 
। मवति, भागस्य चातुराङ्ल्याभिध्रानात्‌, चहतसंहितायाञ्च देवप्रतिमाया एव चतुरशीत्यङ्ुल- = = ` ॥ 


मानायाः कनीयस्त्वकथनाच 


स लावान 


स 


यः 


र 


[न 


४ | दैवतामूर्तिपरकरणम्‌ 


[ ताख्मानेन मूर्तीनां कतन्यता ] 


1 १ थ त ता ~ ५0० --~ प 4 


` य॒च्च शिल्परल-काश्यपश्िल्पयोः “कमाह्‌ वेदाङ्‌लं हरम्‌” रमाह वेदांशहानितः' इत्यादिना सर्वत्रैव ` 
ताठे चतुरङुलहान्या प्रतिमाया उत्तमादित्वसतिदिष्टम्‌ › तदपि नवताखविश्रान्तमिति प्रतीयते ! नव- 
५ | 2 (१५ क भ ० 
तारुस्येव कण्ठत उन्तमादित्वकथनात्‌ । कियद्धिवां किंविधेवा उत्तमादिभेदभिन्रस्तारुः क्य 
प्रतिमा कायैतयपक्षायामपि त्रिधा भिन्नेनवततालेः प्रतिमाविधानस्थोक्तत्वाहु अषटतारः घुनरेकविधरव 


 तदु्िधानस्यामिषितत्वाज्च । कित्च- यदेवं सवत्र तटे वेदाशहान्योत्तमादिभेदः कल्प्येत 


तदेकताटेऽपि तथात्वप्ाेमध्यममेकतालमष्टाङ्लम्‌ अधमन्चकतालं चतुरङ्धलं भवेदिति पूर्वाक्तम्‌- 
'तदड्लद्रीदशभिमभयेत्तर्स्य दीघंताः 
इति वचनं व्य्थमेच स्यात्‌ । न चेतदयप्युत्तमंकतारूपरमिति कल्पने नार्थक्षतिरिति वाच्यम्‌ , 
ताहृशकस्पने मानाभावात्‌ । न च वैेदशहानितःः इत्यादिवचनयेव तत्र मानमित्यपि वाच्यम्‌ , 
तस्य नषतारूपायंन्तिकरस्वस्वीकारेऽपि क्षस्यभाषादिति दिक्‌ 
४। कीतीति। ताल्घुखमिति तालानां सुखम्‌ आचाचयव एकताल इत्यथः, यत्र तथाभूतं 
| ` कूमयुखं भग्रदित्य्थः। (युकतारन्तु कुंकम्‌' इति काभ्यपिल्पे ( भ० ५०, ८९ टो 0 
` म्ताकात्‌ दुरमा्ृतिष्टरिःरिति शिल्परलोत्तरभागे च ( अञ ए, ९० शो ) अविजञेवेण कूर्मस्येव 
` षिघानादत्राद्धविरेषकट्पना निष्प्रमाणान्तराऽपि युक्तिसदेति कुम सुखःमिति पारार्तरं कलिपतम्‌ । 
तथा हि यदत्र प्रकरणे तारेन प्रसाणमभिषहितं तहु दव्यमभिप्रेस्य, आयामस्तु ्रस्थान्तरादवगम्यते ! 
तथा च समराङ्गणसूत्रधारे दशतालमूत्तिं प्रकृत्य भागमनेनोक्तम्‌-- ` 
¢ देवादीनां शरीरं स्याद्‌ विस्तारेणाष्टमागिकम्‌ । 
त्िंक्षदभागायतं चेतद्‌ विदध्याचित्राष्लवित्‌ ॥ ( अ० ७९, ४-९ श्छ ) 


।  इति। भागक्रतुरद्धरम्‌ ! एवश्च गोरछ्तेः कुमंस्य तालेन देष्यंकथनपेक्षथा दीर्वाकृते- 


 स्तन्युखस्य तदुकतिरयुक्तिबाहुल्यं भजत इति साध्वियं पाठकल्पना । यद्वा--ुमंस्य मुखमिव सुखं 
 यष्येति विग्रहात्‌ ुमवतारी हरिरित्यथ; ूादुतशिल्परलवचनप्रामाण्यादवसेयः 

नच-- ` | | 
(कू्मीवतारिणं देवं कभटाङतिमाखिखित्‌ः ( अ० २५, १२३ श्छ ) 


1 ‡ इति शिल्परललीतरभागीयपद्दश्ंनात्‌ दूरमावतारल्य हरेः सर्वाण्येवाङ्गानि द्मंसद्शानीति कथं सुख- 
मेव दुर्माहृीत्युच्यते इति वाच्यम्‌, अत्र सामात्येन विशेषो रक्षणीयः, तथा च सुखपदमन्नावयव- 


सामान्ये क्षणिकमिति न काविवदुपपत्िः। अत्र मूे बिन्दू अपि ्रामादिकाविति केयम्‌, कसात ` | 


। 


द्वितीयोऽध्यायः ४७ 
कुब्जाश्च पञ्चभिस्तालेरपकविष्टो जनस्तथा । 
उपविष्टाः प्रकतेव्या ब्रह्मविष्णुरिवा वृषः ॥ ५॥ 
करं पञथतालेश्च षट॒तारं स्याद्‌ विनाय 
मध्यमं शूकरं ज्ञेयं दृषभ तथेव हि 
मनुजाः स्तभिस्तारेत्र षभं शूकरन्तथा ॥ ६ ॥ 
अष्टाभिः पावती प्रोक्ता मातरश्च तथेव हि । 


गां लीला महारचमील(ल) मीरा तु सरस्वती ॥॥ = ` 


काटिन्दी चेव सावित्री नदा(नन्दा?) पद्मावती तथा । 
कालयायनी समाख्याता भगवत्यष्टकाख(ताङ))का ॥८॥ 
नवतालेभेवेद विष्णुब्रह्यार्मा देवतास्तथा । 


नि 1 ताति ना ०१७०१०५.०८०००.०५००.०८ 
0 ७५७५ 


कनि प्रत्ययस्यैव स्वारलतिकत्वेन “कीर्मिञुखस्तारमुखोः इति पार्स्येव भाव्यत्वात्‌। = 
, एव मिष्टा्मष्टमिकयेव बिन्दुषिसर्गयोव्यंत्ययस्तत्र तत्र समह्वसन्‌ पास्केः ल्वयं विचायः । सूपमण्डते 0 


तालमधिक्रत्य--राखवक्मेकभागे हौ पक्षी डञ्चराख्लयः' इत्येतत्‌ समानार्थं प्यमाह । 


अत्र किवद्भल्तालेः के के कर्तव्य इत्यत्र शिल्पशास्लकृतां बहवो मतमेदा दृश्यन्ते, ते च प्रमूत- = ` 
स्थानसग्यपेक्षा इति सव॑मनुदत्याष्टतारुत पएकताखान्ता विरोमेन कादयपरिल्पादुद्धियन्तेः 
एतेषामेवाघ्राधिक्येनोपयोगित्वात्‌! अत्र चादक्षप्रा्तमश्युद' पाठमपष्ाय सम्पादकेः कश्यः = 


पाद उद्धियन्ते-~ | 
अषटताठेन सार्यास्तु पिद्ाचाः समेन तु 1 
रखताठेन कन्जास्तु कारयेदेदिकोत्तमः ॥ 
पञ्चतारोक्तमनेन वित्तेशं कारये इधः। 
तन्मध्यसाधमेनेव सर्व॑भूतगणान्‌ कुर ॥ 
 बारन्तु वेदताठेन तनरिताखेनेव कारयेत्‌ । | | 
द्विता किन्नरचेव एकतालन्तु मकम्‌ ॥ इति । (अ> ९०, ८७-८९ श्छो०) 


६। मध्यसमिति । प्रथमाद्धं पञ्चताटकन्तव्यतवेन यः शकर उदः स मध्यम इति क्वः 
नोत्तसो नापि वाऽधमः। एवं तृतीयाद्धं सक्ततारकततव्यत्वेन यो वृषभ उद्ष्टः सोऽपि मध्यम = ` 
मध्यमेततर इति व्याख्येयम्‌, अन्यथा पौनद्क्षयापत्तेः । ` । 


एवेत्यधंः । सषतालकर्तेन्यस्तृतीयशयूकरश्च मध्यमे 
वृषभदूक्रयोः सा्ततालिकत्वकथनं मतान्तरणेति जेयम्‌ । 


स 


त , देवतामूतिप्रकरणम्‌ 


ता हं श्तुदेश प्रोक्ता देत्यन्द्रा मुकुरयंता 


तिथ्या समानतारेश्च भृगुरूपं ४ कारयत 


१०--१२ । एकादशादिपदशान्तास्ताला नान्यत्नोपरम्यन्ते । 
 श्पमण्डने तु- | 
व (करकाः कररदेवाः स्युरत ऊद न कारयेत्‌? । ( अ० १ २३ श्रो ) 
इत्यनेन घोडा तालः क्रदेवानां मानमित्युक्तम्‌ । य कान्यपरिल्पे-- 
 एकादिनवहस्तास्तं नवधा हइस्तमानकम्‌ । 

 ताखदिनषतारान्तं तथा नवविधं भवेत्‌ ॥ (अ० ९०; ३४ श्छो ) # 
५ इति नवताखान्तं पारमानयुक्तं तत्त सामान्यत इति जेयम्‌ । एवच्च सत्यामपि पवाद हस्त- | 
` मानत्य नवधात्वोक्तौ यत्‌ पूवंम्‌-- । 8. 1. 
| दश्लादिकरबृद्धया तु षट्र्तधिशत्‌ प्रतिमाः णथक्‌ । ५५ 
॥ ५. बाणवेद्करान्‌ यावचचतुष्कयां पूजयेत्‌ उधीः ॥ (अ० १, १९ श्ो०) 
इत्युक्तम्‌, तत्यापि विशेषान्तःपातान्नासामञ्चस्यमिति ध्येयम्‌ । कि 
`  १३। इदानी कियतताानां प्रतिमानां कियन्तयङ्गमानानीति वक्ुमादौ सततालग्रतिमाया = ` 
| ध `:  अङ्गमानमाह--सक्षतालमिति । रूपमण्डने तु षट्‌ तालप्रतिमाया अप्यङ्विभाग उक्तः ; तथा ब-- ध 

1 ॥ ५ सुखं ताल्दयं तस्य जटर ततस्लमरं भवेत्‌ । | 1 

५ ५ गुह्यं वेदाङ्लम्‌ उरू स्त जहा च ततूसमा ॥ 


द्वितीयोऽध्यायः ४९ 


वक्त तारश्रमाणच ग्रीवा स्यादङ्टलयम्‌। ` 
साद्धंसतताङ्लं वक्तो मध्यं नवभिरङ्कलेः ॥ १४ ॥ 
ससाद )नाभिमेदमूरू अष्टादश स्प्रताः। 
जान्वद्भललयं प्रोक्तं जहे अष्टादशाह्ले 


पादोत्संधन्तिखि १मालन्तु(स्तु १) मनुजाः सत्तालये (के १)।९५॥ ` 


[ मध्यमसक्तताटेऽवयवमाननिरूपणम्‌ ] 
सषसाद्धं प्रवच्यामि तालं मङ्कल-गुकयोः। 
बुधसोरयोस्तथा ज्ञेयं केशान्त त्रिमा्रकम्‌॥ १६ ॥ 
वक्तः' द्वावशमाघ्रन्तु ग्रीवा चेव त्रिमाच्रत्रि हका । 
 दशमालं भवेद्‌ वन्तो नाभिमेदू' तथोदरम्‌ ॥ १७ ॥ 
अष्टादश भवेदूरू(रुः ?) जानु मालावयं स्परतप्‌ । 


 अष्टदशाङ्लो मन्थी ग्रहाणामङ्टो पदो ॥ ८ ॥ ` 


[ अष्टतारेऽवयवमानम्‌ | 
अष्टतारं प्रवच्यामि देव्याश्चण्डस्य८ण्ड्याश्च १) र भ 
मालात्रयं स्यात्‌ केशान्तं वक्त द्र।दशाङ्लप्‌ ॥ १६ ॥ 
 म्रोवा च अ~य ङ्का कार्या हृदयं नवभिस्तथा । 
मध्यं ह्ादशमालं स्यान्नाभिमेद्‌ नवाडले ॥ २० ॥ 
एकविंशद्‌ भवेदृरू(रः १) जानु चेव गुणाह्ुलम्‌ । 
 जक्ाऽइृलेकविंशलया पादमूलं गुणाह्करम्‌ ॥ २१ ॥ 


भणण १ ०७५० ^ 
[०1 


|  गणाद्लं भवरलनाजु पादुः काय गुणाङ्टः । ५ 
` ` गखतारमिति प्रोक्तम्‌. 1 इति ( अ० ९१, २४-२९ श्छो म. 


शिल्परदलोत्तरमागे च दशादिवतुस्तास्ान्तप्रतिमाया अद्गविभागः प्रदर्शित इति विशेषः| = ` 
१६। सक्षसाद्धमिति मध्यमसक्ततारमिव्य्थः ; ततप्रमाणञ्चेतन्मते नवत्यङरम्‌ , मतान्तरे ध 
। त्वषटाश्षत्यद्रमिति ज्ञेयम्‌ । प्रकरणेऽस्मिन्‌, मान्नामागादिशब्दोऽदुरमानबोधकरः । | 


५० ५५ देवतामूर्सिप्रकः णपु 


[ मध्यमाष्टतालेऽवयवमानम्‌ | 


प्रीवा च अ्य)हला कायां हृदयं नवभिस्तथा । 
योदश भवेन्मध्यं तालेन नाभिमेदके ॥२३॥ 

द्र दृश्जानु चेव लिमालकम्‌ 

ज्वं उररुसमे भक्ते ऽयद्क्टः पाद्‌ एव च ॥२४॥ 


[ नवमताठेऽवयवमानम्‌ | 


 नवतालं पवत्त्यामि बह्याया देवता यथा । 
केशान्त लिमालन्तु कतव्यं देवरूपकम्‌ ॥२५॥ 
 यावन्मानो भवेत्तारो विभजदरविभागकेः। 


1 सु्ं(१२)राम(२)वशा(२०)का(१२)च्धि (४)वसु (<) जेन(२४) 


# युगा(र्हताः(२४) ॥२६॥ ` 
 वेदा(४) वक्तगखो वज्ञो नाभिस्तूदरगुद्यकम्‌ । = 
तथोरू जानुनी जङ्घे चरणो च यथाक्रमे(कमप्‌ ) ॥२७ 
` विस्तरस्तेन(विस्तारः स्तन)गभें च द्वादशाङ्गलमीरितम्‌ 
 तद्वाद्ये वेदवेदांशे कन्ते एकान्तरे ततः ॥२८॥ श 
 सततसताङ्कलो वाहू दीदे) स्थात्‌ षोडशाङकषछो । ह 
` करोऽादशमात्रत्ः१) च विस्तरे(विस्तारो)ऽगे गुणाह्खलः ॥२६॥ ` 
` दीष सूर्याह्लः पाणिविस्तरे प्चमावकः । ` 
नाभिः सू्याह्लो व्यासे कटिः भोक्ता जिनाद्घखा ॥२० 


नाम 


२८--२९। सतनगर्म॑हतनयोरन्तर । ईरितं कथितम्‌ । तद्वाह्ये स्तनगभौद्‌ बहिः कक्षे ` 


9.  कक्षद्रयं बेदतेदीशे अष्टाङ्गखे । तत एकान्तरे एकमान्राव्यवधने वा सक्तसघताङ्गलो विस्तारे एक 


 सषाङ्ुकस्तथा अन्यश्र सक्षादुटः । करमानान्तरमाह--करोऽधदशमात्रः, अग्रो अग्रस्य विल्तारः = ` 
`  शुणाङ्गलः षडङ्गरुः । (1 | न 


0 


द्वितीयोऽध्यायः 


ति श्रीक्तेनात्मजसून्रन्मण्डनविरचिते वास्तुशाख्े रूपावतार देवतामूत्तिप्रकरणे 
प्रतिमातारखुनिणयाधिक्रायो नायर हितीयोष्भ्यायः ॥ २। 


0 0 0 | 


३०। शुनरपि करमानान्तरमाह--दीधं इति । पाणिरद्य सू्ाङलः द्राद्ाुलः, विस्तारे 
पञ्चमाश्रकः पञ्चाङ्लछः। ज्यासे विषति निनाद चतुविंशत्यङ्ख । 
३९--३२ ! उनप्रमाणमाह--मू इति । अ्मूरमेकादश्षङ्गरं स्थादित्यथंः । जहका प्रान्ते 


युङ्ुल चतुरहुला । पादशरदशाङलः, तदू युगाङलः, ककर युगाङुलः! तवृ ह॒ =` 


अष्मान्नकः स्कन्धः कत्तन्यः | 


 ३४॥ अश्र य इत्यभ्याहायैम्‌ , नानाविघरूपमावम्‌ उ दण्डजस्वेदजरावुजाब्यं विभ्वस्य रूपं 
यो जानाति स उखेतवेऽस्तवित्यन्वयः । उं उपरिस्था उदुमिद्‌ इत्यथः, ते च अण्डानि च | 
तेभ्यो जायन्ते इतयूद्ौण्डनाः ; द्वन्द्वात्‌ पूर्व परं वा यत्‌ श्रयते तछ्धभते प्ल्येकमभिसम्बन्धमिति = 


न्यायाहु उदुभिजा अण्डजाश्चत्यथः । 


तृतायोऽध्याथः 
«८८209 @ 
| [ अथ देवतापद्स्थानम्‌ | 
करता षडशकं तच चमेध्वश (वाम दवय श?) व्यपोह्य च ॥१ 
तन्मानमग्रती नीला प्रागुदग्रातत्‌ श्रागुदगगत ?) ) सूक ्‌। 
तद्‌ व्रह्मसू्रमिद्युक्तं तत्‌ सूलं शिवमध्यगम्‌ 


५५ 


2 (>) 


नि 1 न 
| 


१-२! इदानीं देवतापदस्थानं वक्तं रिद्धस्यानोपयोगि व्रह्मसूत्रमाह--तिःसक्षाश इति 
द्वास्याम्‌ । सूत्रसध्यमे वास्तुसध्यभागे ब्रह्मानि तदंशमाश्रिव्येत्यथः, साने द्वारमाने च्रिःसक्तामे 
छते एकर्थिशस्या मागेविमक्ते मागं यन्मानं सवतीत्य्ः › तत्‌ पडंशकं कृत्वा वामं वामतो हं 
व्यपोह्य परित्यज्य, अग्रतो दक्षिणत इत्यथः तत्‌ तादशं मानं द्वयशमिति यावच्‌, नीत्वा अपनीय 
प्रागुदगगतसूत्रकं पष्वंदिग्गतसूत्रम्‌ उत्तरदविगगतसूत्रं वा यहु वत्तते तह बह्यसूत्रमिस्यथः । तथा 
च मयमते-- | करा 

त्रिःसप्त कृते हरि बराह ऽ शे मध्यमे भवेत्‌ | 

करत्वा पडंडकं तच वामे दरंवशं व्यपोह्य च । 

` तद॑शमभ्र' नीत्वा तु प्रागुदग॒गतसूत्रकम्‌ । 

तदु ब्रह्मसूत्रमिन्युक्तं तत्‌ सूत्रं रिवमषध्यमम्‌ ॥ (अ० ३३, ३८-४० श्रो) 
इति । सवघ्यपुराणे तु-्वारमानमेकर्विदत्या विभज्य विभक्तानामेकविरातिभागानामरड ुनस्तिघा 
विभजेत्‌ ; तत्तस्य मागत्रयस्य वामदक्षिणयोर्भागह्यं विहाय मध्यभागे ब्रह्मल्थानं कल्पये- 
` दित्युक्तम्‌। तथा च-- | 
| हारं विभज्य पूखन्तु एकविशतिभागिक्म्‌ । 
ततो मध्यगतं ज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रं प्रकल्पयेत्‌ ॥ 
तस्याद्टन्तु त्रिधा क्रत्वा भागजओ्ोत्तरतस्त्यजत्‌ 
एवं दक्षिणतस्त्यत्तवा ब्रह्मह्थानं प्रकल्पमेद्‌ ॥ ( अ= २६३, ५-६ शोर ) 


इति! ततश्च मयमतीयपाढदरशंनाइ यदस्माभि्वामि दमम्‌" इति पाटः शुद्धत्वेन कल्पितस्तन्मता- ॥। 


॥  न्तरमिति कृत्वेति ज्ञातव्यम्‌ । "वामे चाशम्‌" इति पारुस्त्वक्षरसंवादाभावात्‌ स्वसमानतन्त्रान्तरा- ` । | 
` सम्मतेश्च न गृहीतः। अन्यचच-मतस्यपुराणे ब्रह्मसूत्रस्य दहेयांशयोश्च यन्मानयुक्छम्‌ अत्र च॒ ` 


तेषां तहु्िुणं मानमुक्तमिति दभ्यते! तच "वामे द्मः इति पाठ एवोपपन्न भवति, नतु 


तृतीयोऽध्यायः ` श्ल 


मध्ये य द ब्रह्मणः सूलं तस्य वामे शिवस्य च 
मध्यं वेष्णव सूत्र तत्सूत्र(लं १) सवेद वतम्‌ ॥३॥ ` 
९१ (4) | विल 0)पुरुषं (त आदो ब्रह्मा<न्तगो हरिः 


तत्तस्या च उमा देवी सुखदा सर्वकामदा ॥५॥ 
भाग एकोनप्ाशव्‌ गभाद्धं मितितो भनजेत्‌। ` 
गर्भाशो ब्ह्यसंस्थान(नं १) देवं भागाष्टकं ततः ॥६॥ 


"वामे चाशम्‌? इति पष । तथा हि-मतत्यपुराणोक्तक्रपेण एकर्विशतिधा विभक्तस्य (रस्या 
त्रिधा करते साद्धंत्रयो भागा भवन्ति, एवं प्रकरतग्रन्थोक्तक्रमेण--एकविशरातिधाऽशितत्य द्र्य 


समग्रस्य षड्भिर्विभागेऽपि त एवंसा भवन्ति । ततश्नदधीत्‌ साद्त्रिभागं स्यजतः समगात्‌ सर्ाक- = ` 
त्यागो गगितागमानुगत्या नार्थान्तरकोरिमिरोहतीति, मूले दवलत्यागो मात्‌त्ये चकात्यागो | 


वल्तुगत्था एक एषेति न काचिड विप्रतिपत्तिः । एवं ब्रहमस्थानेऽपि दवयुण्यादि ज्ञेयम्‌ । 


तत्‌ सूत्रमिति । तह बह्यसूत्रम्‌ , शिवमध्यगम्‌--शिवो मध्यगो यस्व तादृशम्‌, तन्मध्ये ध. 


` रिङ्क' स्थापयेदित्य्थः, वक्ष्यति च स्वयमेव श्र्शे लिङ्घमेश्वरम्‌? (९४ धर० ८ शो०) इति 


३। मध्य इति । मध्ये यदु ब्रह्मणः सूत्रं पूषसुक्तम्‌ , तस्थ वामे वामभागे व्यपोहितदवंयशे 1 
इत्यर्थः, शिवस्य सूत्रं मेद्‌ , तन्मध्ये दक्षिणे इत्यथः, वंष्णवं सूत्रं भवेत्‌; तत्‌ सूत्र सावंदेवतं 


` सर्वदेवतास्थानम्‌ । वक्ष्यति च-- "देवांश ब्रह्मविष्ण्वंशाः सवं देवाश्च' (७ शो०) इति । 


४। मध्य इति ! त्रेषुरुषे ब्रहमविष्णुरदाणामाश्रयभूते सूत्रे, द्वा त्रिष इख्वेषु मध्ये, द्‌- | 


 स्ततूसूच्रस्य मध्ये भवेत्‌, आदौ ब्रह्मा भवेत्‌ , इरिश्रान्तगो भतरेत्‌ । 


जमेगेति । एवंक्रमेण वर्तमाना पते सौल्यदा भवन्ति, विपरीताश्च भयमावहन्तीत्य्थः। ` 


तथा च॑ सम॑राङ्गणसून्रघारे-- 
स्थापयेत्‌ ( पुरषनत्रया ? ) शि(वा!ं) सध्ये निवेशयेत्‌ । 
णं दक्षिणेनाल्य वामतः पुरबोत्तसम्‌ ॥ 


५ अन्यथा स्थापनदिषा प्रत्यवायो महान्‌ मवेत्‌ । ( भ० ७०, १४१-१४२ शो०) = ` 
इति! अस्फुटा्थाऽपीयमदध्रयी प्रङ्ृतोपयोगिनीत्यत्र नास्ति नः स्तोकोऽपि संशयः । ` 1 ४ 


| दर्यो 


५} र्द इत्यादि | खण्डितत्वादु दुय 


ऽस्याथंः । ` 


६-८ 1 गभ॑मानेन देवानां ल्थानमाह--भाग इति \ अत्र च मागं इत्युवितोऽपि पाठे ` ५ 


न 


4 


म 


ताता मा न 


भजेदिति क्रिया निष्टेकत्वनच्यपेश्चया न छतः, आमूलं श्ोधितश्न वेरस्यमावेदित्यवधयभ्‌ । मितितो 
सानेन एकोनपन्नाश्चद भागो गर्भाद्ध नेत्‌, गमाद्धम्‌ एकोनपन्चाशता मागविभनदित्यधंः । 
तत्र गर्भा मध्यम एकांशो ब्रह्मसंस्थानं बरमशिः, ततोऽष्टो भागा देवानाम्‌, षोडश मागा 
मानुषाणाम्‌ , चतुविशतिभागाः पिक्षाचानामिति समदिता एकोनपन्चारदु भागाः ! 

िङ्खस्य प्राधान्यात्‌ पश्रातिरदैशममिप्रेत्य॒बरदमाशमपषामेव देवांदामाह--देवांश इति । 
बरह्मविष्ण्वंशषास्तत्परीवाराः सवे देवाश्च देवाश स्थाप्याः । अत्र सवं देवाश्नः इत्युक्तत्वाद्वध्य- 
माणे भूतछरादय इत्यत्र खरपद देवयोनिपरम्‌, तथा च ये तावदतनोक्तास्ते तदित च देवयोनय 


इत्यथः । मानुषे अशे मातरः स्थाप्याः, पैशाचकेऽ शे यक्षगन्धर्वादयः स्थाप्या इत्यथः 


ब्रह्मश इति । रेष्वरं ङ्ग हिवलिषङ्खम्‌, एतदुपरक्षणं प्रतिष्टाप्यदेवता्चीमान्रमित्यथंः | 
तथा चाऽऽनेये-- 
पिण्डिकात्थापनाथन्तु गभाीकारन्तु सकचा । 
विभजेद्‌ ब्रह्यभगे त प्रतिमां स्थापयेह्‌ बुधः ॥ 
५  देवमाचरुषेश्षाचमणेषु न कदाचन । ( अ० ६०, १-२ शछो० ) 
` ईत्यविक्ेषेण ब्रह्मभागे प्रतिमास्थापनं देवादिभागानान्न ततकमंणि निन्दनीयत्वदुक्तस्‌ । अत्र द 


| देवादि कस्य कियन्तो भागा इति न विक्षिष्योक्तम्‌ । यदि च सधे?त्यस्य वीप्साथत्वमङ्गीहृत्य 
` पकोनपन्नात्रदित्यथंरभाय (सक्षसपभेःति व्याक्रियित,ः तदा प्रङृत्रन्थानुगृहीता विभागरीति- 
 स्तत्रा्याद्रणीया स्यादिति विभावनीयम्‌ । इति देवक्तापदस्थानन्याख्या । ` 
९। देवानां द्टिस्थानं वत ्ारविभागमाह-द्वारादय इति ! सत्राऽऽदिपदग्राह्य" किमिति 
| जानाति कत्रभवान्‌ सूत्न्मण्डन एव । चतुःषषटिविभागेषु मध्ये विषमेषु मगेषु हसो दषवः ञ्युभाः। ` 


4 


धाप्या उ(न्यु एदुम्बरादृदर शिवलिङ्गानि धीमत्‌ 
पथविंशे सुखं लिङ्गं देऽ(दच ?)धिके जर्शायिन 
धनदस्य द्वथाधिक्ये मातृणां तहुथाधिके ॥१९ 
(य ^त्ाणां टक अयश पथ्रिंशे बराहदक्‌ । 
सप्तविंश उमेशस्य वोद्धस्य तहयाधिके ॥१२॥ ` 
एकाधिचलारिशे त॒ स रकया बरह्मणो इशः । 
दुर्वाससो दयाधिक्ये नारदागस्त्ययोरपि ॥१३॥ 
पथवेदपदांरो तु खच्मीनारायणस्थ च । 
दथाधिक्ये विधेधांतुः सरस्वत्या दयाधिके ॥१९॥ 
सारदांशे गणेशस्य द यधिकेऽजाक्तनस्य च । 
 इरसिद्धिखिपांशे कर्तव्या सवेकामदः (दा ?) ॥१५॥ 
 उद्धांरचाटषि्स्थानं ब्रह्मविष्णुजिनाकयः 
 पथपञ्चाशन्नागे स्याद्रोद्री तस्माहयाधिके ॥ १६॥ 


~ ~~~ ~ -----------------~----- ज त ~+ भ 


१० । शिवशिङ्कषष्िल्थानमाह-त्रयो्विक्नतीत्यादि । एकादिन्रयोविशतिपयन्तं विषमां- 
दके एक-त्रि-पञ्च-सपेत्याधयुग्मांशे, उदुम्बराह्‌ देहल्या उदं शिवरिङ्गानि स्थाप्यानि, यथा तत्तद- ` ४ | 


युग्मांशे लिङ्ञानां हृष्टिः स्यात्तथा तानि स्थापयेदिल्यथंः । 


११। सलं लिङ्गमिति छिविक्ञेषः। द्वयधिके इति सप्तविंशे । द्वथाधिके उन्न । ५ 1. 


तद्द्वयाधिक इत्येकत्निशे । | 
 १२॥ तदुद्याधिके उनचत्वाश्ि। 


१३। एकाधिचत्वारशे इत्येकचत्वारिशे । इयाधिक्ये इति निचत्वारिशे । 

 १४॥। पञ्चवेदपदँसषे पञ्चचत्वारिकशांशे । ह | ० 
` १५॥ सारांश इति । सारदा दुर्गा रक्चणया ततपीर््यानानि, तन्मिते अं एकपत्वाशांस = 9 
इयथः! निपजचाश इति निपन्चाशरो, अयन्वांशोऽ्नासनडरतिद्ोः साधाश्य इति जेयम्‌; = | 
शवधिकेऽज्नासनल्य' इत्यनेन त्रिपञ्चाशांशेऽजासनस्य दटेदक्तत्वात्‌ । 1 


ठृतीयोऽभ्यायः + 


; ` देवतामूत्तिप्रकरणम्‌ ` 


दिक्पाला खोकपालाश्च रहा मातृगण(णा)स्तथा ॥२२॥ 


नान ५०१०५०५५ ०१५०५११. ५ ११५... ०५०५.८१०१५१८०१० 


 १७। मैरवीति भैरवस्य दषटिः । पदमिति । तदूढ्तः त्रिषव्य शान्‌ परतः दलं पदं इषि- 
स्थानं भवति, विषमद्वासंशस्य श्निष्ष्व्य श्र एव निःचेषित्तत्वात्‌ । 


॥ ता ०००५११५५ 


१८। लिङ्ग्र इति। लिङ्ञमरे दिवलिदङ्घाग्रं अ्चौस्पेन प्रतिमाष्येण दैवता न स्थाप्याः । 
एतच्च, शश्िवस्याप्रे शिवं कुयात्‌ इति वक्ष्यमागविषेसवादकम्‌, टिपर कशिवप्रतिमप्सपि न 
कुर्यादित्यर्थः । एवञ्च शिवल्याभ्रे शितं ऊर्यादित्यत्यायमथः--्िवल्य लिङ्घ्याप्रे शिवं क्िव- 
 छिङ्गम्‌ , शिवस्य प्रतिमाया अग्रे च शिवप्रतिमां यादिति ॥ि 

प्रभान्ति! शिज्घाप्रे सर्बरूपेण देवताः इताश्वेत्‌ प्रभानष्टा नष्टप्रभा भवन्ति । अन्न इष्टान्त- 
माह--नभोगेति । यथा दिवाष्टरे उदिते नभोगा नमःस्थास्तारा नषटप्रभा भवन्ति सद्दिप्य्थं 
०--२१। पूर्वं व्रह्माणं ब्रह्यणोऽप्रतःः इति °विष्णो विष्णु! जिने जेनम्‌ः इ्युक्तम्‌, इदानी 


तद्पवादमाह--ये यल्यापीति ब्रह्विष्मोरिति च । यत्य देवस्य ये हितावहम हितकर 


` भवन्ति तेऽपि तदग्रतः स्थाप्या इत्यर्थः । श | 
बहत्यादि। एकनामिः सनाभिः सपिण्डस्ुल्यो वा, ताच्छे जिने सम्युलवत्तिनीत्यथः, 
दोषो न विद्यते, ब्रह्मणो विष्णोश्नागरे स्थापितो जिनो दोषाय न भवतीत्यर्थः एवञ्च जिनस्या- ` 


प्यगरब्रह्मणि विष्णौ वा स्थापिते दोषो न भवतीति रम्यते न्यायसाम्यात्‌} 


तृतीयोऽध्यायः ५७ ` 
यच पुंराधं न प्रोहति ॥२३॥ 
 [देवतास्थापने दिङ्निर्णयः । ह 


नगराभिमुखाः श्रेष्ठा मध्ये बाह्ये च देवताः 
शिवन्रह्मजना विष्णुः सवांशाभिमुखाः शुभाः ॥२५॥ 
॥ गणेशो भे रवश्चण्डी नकुरीशो ग्रहास्तथ 
भूताया धनदाश्वेव दक्लिणास्याः शुभाः स 
प्रातणां सदनं कार्य द्लिणोत्तरदिङस 
हनमान्‌ वानरशे्टो नेक ठ ६ र ॥२५७॥ 


क ममत जमाकर 


२३। एतं इति । डशटिेधविवनिता इति ब्रह्मविष्णादीनां परल्परह्िधेन हीनाः, क्षिव- 
इशििधेन वा । “ष्ियातहितं यच्च" इत्यत्र “हष्टिपातहिता यन्न" इति स्यात्‌ । तथा सतियत्न 
देवा दष्टिपातवशाइ दहितास्तन्न स्थाने पुरां नगरस्य पापम्‌ अभङ्रूमित्यथंः, न प्ररोहति 
न प्रोद्धवत्तीत्यथः | | | 

५॥ देवानां मुखं पूरवापराष्यं पूंदिकस्थं पश्चिमदिकस्थं वा इयदिति शेषः। दष्षिणो- 
त्तरं॑दश्षिणोत्तरदि्स्थं न दुर्यात्‌। अचर पूर्वादिशब्दो दिष्य लाक्षणिकः! ब्रहेति । एतच 
विेषाभिधानं मतान्तर इति चेयम्‌ । मतघ्यपुरागे पूर्वात्तरसुखल्वल्योकत्सत्वात्‌ । तथा च-- ` 
| वाषुेवादिप्रतिमारुक्षण प्रवदामिते। ` धा | 6 

प्रा्ादस्योत्तर पू्मुखीं वा चोत्तराननाम्‌॥ इति (अ० ७४, १ श्लो) | 

यथा तथा वा भवतु सर्वधा विस्रोऽयं श्लोकः । अस्य प्रहकृतपारोऽ्नुसन्धेयः। == | 
 २९॥ नगेति। मध्ये वास्तुमध्ये, बाह्ये वास्तुबहिभागे च प्रतिष्ठाप्या दैवता नगराभि- = ` 
 जुखाः प्रशल्यन्ते । पू्वापरास्यमिति यदुक्तं तत्र मतान्तरं दर्शयति-शिषेत्यादि। सवोशामि- | 
` जलः स्ंदिसुलाः। अन्न पूर्वं पू्वपराङ्ुलत्वकथनादु बरहमविष्णुशिवग्रहणं मतान्तर्ोत- = । 
नार्थम्‌, जिनग्रहन्तु न तथा, पूरव॑मनुदधेखेन कस्मिन्नपि मते तस्य सर्वाश्चाभियुखत्वल्वप्राप्तः ` | 
 विधित्वाव्याघातात्‌। 1 

२७॥। मातणामिति। पतेन मातरो दक्षिणदिङ्मुखा उनत्तरदिङ्युखा वा कायां इति ` 4 

देवता-न = 


वृताः ॥२६॥ 


दैवतामसि्रकरणम्‌ 
देवा दैत्या मानुषाद्याश्च सवं । 
ह्रात्मानं व्यापकं खष्िकारं 
स्थायी इष्टा विश्वकमींश(मां सोवन्याः(वन्यः१) ॥२८॥ 


इति श्वीक्तेत्राव्मजलूनश्वन्मण्डनविरचिते बास्तुशाखे देवतामूतिप्रकरणे 
प्रतिमापदस्थानद्रशिस्थानाधिकासे नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ 


दति । न केवरं नेक ताघ्यः स्वन्तरारूदिगास्योऽपीत्यर्थः । 
` दुष्करोऽ्य पाठोद्धारोऽधंग्रहश्च । 


फरितम्‌ । हनुमान्‌ इति । नेऋ^ताघ्य इति सतान्तरेणोक्तम्‌ । स्वमतमाह--विदिङ्घुख 


चतुर्थोऽध्यायः 


अन्तसूलं पुस्तकथ कमण्डलुवरान्वित 
विभ्वक्मां चतुरहस्तखिनेत्रश्वन्दशेखरः ॥ १॥ 
इति विश्वकर्मां | 
 ऋग्वेदादिप्रभेदोक्ता( देन ? ) कृतावियुगभेदतः 
विप्रादिवणभेदेन चतुवेक्लं चतुभंजप्‌ ॥ २॥ ` 


अक्ञसूलं करे वक्तं गुचिस्तस्या ( स्थो ? दतः स्थिता। ` 
स्थाद्‌ वामे पुस्तकं हस्ते तस्या(स्यो द च कमण्डलुः ॥३ 
कमरासननामानं (माऽयं १ ) सवेवणं हित्षदः। ` 
कतकारापकेः) साद्धं रोहितः कमरसनः॥४॥ 
इति कमलासनः! 
 १। अयमध्यायो ब्रह्मादीनां देवानामावुधवणेवाहनादिनिणेयाथ प्रवृत्त इति ज्ञायते | 
एतहुधल्थङ्कत्‌दरत्यन्तयद्‌ ख्पमण्डनात्‌ । . तथा च~ 0 ¦ क 
बरह्मादीनाचच देवानां देवीनाच्च यथाक्रमम्‌! = | ॥ 
आयुधानि तथा वर्णं वाहनं कथयाम्यथ ॥ (ति भ०२,९कछो०) | 
अस्य गन्थस्य शिर्पशास्रत्वात्‌ ततछनतत्येनाभ्यर्दितल्याऽ्दौ विश्वकमंणो रूपं निदिशति-अक्ष- ` | 
` सूत्रमिति । अस्मदुपलन्येषु शिल्पशचेषु ऋते रूपमण्डनण्ते च प्ङृतग्न्थं न विश्वकरम॑णो 
रूपयुपनिबद्धयुपलन्धम्‌ । रूपमण्डने एनः किचिद्‌ विरक्षणमेव रक्षणमल्माई ग्रन्थात्‌ । .तथा-व-- | 
विश्वकर्मा चतुर्वाहुरक्चषमाराच्च पुष्तकम्‌ । 2 

 कम्बां (कम्ब १ ) कमण्डलु धत्ते रिनेत्नो हंसवाहनः ॥ इति । 
व | | 1. (० २,.१० शोर.) र| 
 २-४। एकस्यैव ब्रह्मो नामभेदेन चत्वारि रूपाणि निरूपयिष्यद्ादौ कमदधस्लनं, ॥6 तं । 


ई०.. ` ` दैवतामूर्तिपरकरणमं 


तस्य चतु्षहुत्वे चतुमंखत्मे च देतुप्रदर्शनपूवंकं स्वरूपमाह --बरगूषेदादीति । चहगादयश्चत्वारो 
वेदाः इतादयश्चत्वारि युगानि ; ब्राह्मणादयश्चल्वारो वणाशरेति यथासम्मवं ततस्तत त्वतत्‌- 
कन्त त्वादिश्पेण ब्रह्मणोऽपि चत्वारि श्ुखानि चत्वारो बाहवश्रेत्यर्थः । तत्न कतं सस्थयुगम्‌ $ 
करे दक्षे इति दक्षाधःके, ऊद्र'त इति दक्षो तः, एवं वामेऽपि। द्ितीयकमलादनयपदं 
धिक्ोषणपरम्‌ । 


द्या कमण्डलुधरः कर्तन्यः स चतुसंखः 
हसाखूढः कचित्‌ कायः चिच्च कमलासनः ॥ 
वर्णतः पद्मगभोभश्रतु्बाुः शयमेक्षणः । 
कमण्डलु" वामकरे सवं इस्ते तु दक्षिणे । 
धामे दण्डधरं तद्त्‌ खवञ्वापि प्रदशयेत्‌ । 
= सुनिमिर्दवगन्धवेः स्तूयमानं समन्ततः ॥ 
कुर्वाणमिव रोकास्त्रीन्‌ श्यु्धाम्बरधरं विथु । 
 शरगचमंधरञ्ापि दिव्ययन्लोपवीतिनम्‌ ॥ 
आज्यस्थारीं न्यसेत्‌ पाश्वं वर्दाश्च चतुरः पुनः| 
वामपाश्वंऽघ्य सावित्रीं दक्षिणे च सरस्वतीम्‌ ॥ 
शप्र च कषयह्तद्वत्‌ कार्याः पेतामहे पदे ।! इति । 


( अ० २६०, ४०-४९ श्छ ) 


तमराक्चणसूत्रधार च-- 
बह्मानलाचि प्रतिमः क्तव्यः उमष्ा्तिः 
स्थलाङ्धः श्वेतपुष्पश्च श्वेतवे्टनवेषटितः । 
 कष्णाजिनोत्तरीयश्च वेतवासाश्वतुमखः ॥ 
दण्डः कमण्डलुश्ास्य कन्तन्यो वामहस्तयो | 
 अक्षसृत्रधरस्त(द्वा ? दह) मौन्ज्या मेखलया ततः ॥ इति । 
| | | (अन ७७, २-एश्छो०) 


क्षिल्परत्नीत्तरभागेऽपि ( भ० २५९; १२३-१२७ श्रो ) व ह्मणो ह | 
अिखितम्‌ । परं प्रहृतगन्थ इव छत्रापि बरहमणशचतुमेदभिक्त्वं न इश्यते । कमलासनः कस्मिन्‌ ` 
युगे छलदायक इति नोपरभ्यते । विरिचिब्रह्माणो छते छलदायको, पितामहस्त्रेतायाम्‌ । तत्र ` 


0)  पारितिभ्याहु भवतु कमलासनः कलो वा द्वापरे वा, न तेनैकेन युगदयविनां जनानां छं 
 श्क्यलम्पादनमिति छधीभिशिन्तनीयम्‌ | 


 चलुथोऽन्यायः ` ५.६. 


* | 


कम्‌ लशा शुचिवं पुस्तकं तथा । 
पितामहस्य स्यान्मृत्तिखेतायां सुखदायिनी ॥ ६ । 


पुस्तकं चाक्षसूल् शुचिश्वेव कमण्डलुः, 
ब्रह्मणश्च भवन्मृकत्तिः कृते स्यात्‌ सुखदायिनी ॥ ७। 
इति ब्रह्मा ! 
अन्तसूत्र पुस्तकञच धत्तं प्य कमण्डलुम्‌ । 
चतुवक्ता तु साविध्री श्रोविथाणां ग्रहे स्थिता ॥ ८ ॥ 
इति सावि । 
ऋग्वेदः श्येतंवणेः स्याद्‌ द्विभुजो रासभाननः । ५ 
अन्तमाखाम्बुपाले च पि (धि ?) तश्चाध्ययने रतः॥६॥ 
इति ऋगवेद्‌ः। ` | 
अजास्य८ ?) पीतवणः स्याद्‌ यज्वदोऽक्तसूत्रधूक। 
वामे चाङ्कशपाणिस्तु भूतिदो मङ्भलपरदः ॥ १० ॥ 


इति युवद । 
५। विरिञ्िमाह--अक्सूद्रमिति। श्रतिवैदः, इतरत्र र्षणन्रये श्चचि'रिति पाठो | 
हश्यते तन्नापि श्युतिरिति भवेन्न वेति विचारणीयम्‌ । चिरिः । कते सत्ययुगे । इहान्यत्न 


इति पितामहः! ` 


च व्ह्मणो क्षणद्भये अक्षसूत्रादिप्रथमान्तपदएनामन्वयो दुरूपपाद्‌ एव । इञखखञ्च--सक्षसूत्रादीना- ` ८ | 


 सुहिशपरतामघ्नस्वीकारेण तत्तदविशिष्टा मूत्तिरित्यध्याहारजन्यम्‌ । 


9, €| शआरत्रियाणाभिति-- ` 


व ( ` (जन्मना ब्राह्मणो हथः संस्कारे द्विज उच्यते। | ह 
“ ` शिचया याति विप्रत्वं धिभिः ्रोवियञ्च्यते॥#  . ` 


1 ४ _इत्युक्तर्णानां वेदविदाम्‌ । 


९ । अक्षमारेत्यादि । अक्षमालाम्‌ अम्शुपान्नञ्च श्रित इत्यथः । 


पुरषाकारगम्भीराः सकूची ( चां ? ) सुकुरोज्ञ्वलाः॥ १६ 


५ शास्त्रान्तरे कथितं गणदेवमित्य्थः । भिया देवीत्यभेहे वृतीया श्रीदेवीत्यथः । 


 नाह-त्रह्मग इति । तत्राऽऽदौ सव॑साधारणं विरोषणत्रयमाह--पुरषेत्यादि । सद्वा इति । कूर्च 


टं | ।  कवतामरि्रणम्‌ 
त्‌पलदल्ाभासः सामवेदो हयाननः 


र अन्तमाखान्वितो दन्ते वामे कम्बुधरः स्श्रतः ॥ ११ 
इति सामवेदः | 


अथवंणाभिधो वेदो धवरो मकंटाननः। 
अक्तसूलथ खटाङ्गं विभ्राणो विजयभिये ॥ १२ । 
दटर्यथबणः | 
 तरलयशा' सितं रम्यं प्रगवक्त' जटाधरम्‌ । 
अक्तसृलं बिशूख्च विश्राणं तं (तत्‌ ?) त्रिलोचनम्‌ ।॥१३ 
इति न्र्यशास्तम्‌ 
| [| अथ ब्रह्मायतनेऽस्यदेवतापदम्‌ ] | 
आमन † तु गणं प्रोक्तं मातृस्थानच् दज्िणे | 
त्ये तु सहखान्तं वारुण्यां जटशायिनप्‌ ॥ १४ 
वायव्ये पर्वतीरुदो हा ( ग्रहा १ ) श्वेवोत्तर स्षृताः । 
ईशाने च भ्निया देवी प्ाच्यान्तु धरणीधरः ॥ १५ 
1 ध [ अथ ब्रह्मणोऽशो प्रतीह्यराः ] 
ब्रह्मणे ( णोऽ १ ` प्रतीहाराः कथयिष्याम्यनुक्रमात्‌ । 


1 ० 


१४-१९। अत्र द्वितीयान्तानां पदानां कर्पयेदित्यघ्याहतक्निययाऽन्वयः, गणं प्रोक्तमिति 


१६। पं ब्रहणश्चतुरो मदान्‌ दलयन्पि साम्प्रतं बरहमत्वेनेक्यं परिकल्पयन्‌ अष्टौ प्रतीहारा- ` 


1 शब्दो नानाधंः। ततर भ्मशव इत्येकोऽथेः, नासङ्कतानि हि प्रयसः पितामहस्य प्रतीहाराणाम्‌ | 
`  अतिरम्बीनि भ्मश्रूणि । इशसुष्टिरिति द्वितीयः, ततस्वसूपञ्च-- = ` | 


चतुर्थोऽध्यायः ६३ 


पद्यं सट (खु ?चाऽ्षरं ठंश (दंशं ¢ सप्तनामा तु वामतः 
सव्यापसन्ययोगेन कमण्डलुश्च (८ च ! ) धमकः ॥ १७ 
अक्तपद्मवामदण्डकमलश्च (ख ‰) महतोद्धवः (मतोद्धवः १) । 
दण्डागमचछ्रवाक्कारं (छचा कारं ) जयश्च सर्वकामदः ॥१८॥ 


भ ११०८०११. 


०११९११११ ०१५५५५० ० 


 इत्युक्तरक्षणम्‌ । नायुक्त्च॒वेदसम्तवे दिकघठुरीणस्य दुदिणस्य प्रतीहाराणामपि वेदोक्तकम- ` 
निचोहसादायकार्थं इकयुिधारणम्‌ । तूलिकिति वृतीयोऽ्ः। चसा च वुषश्रवणसोमभिर्वा 
खरकेदो्वा तन्तुभिवां वषिता उदटुम्बराङ्राकारा वटाङ्राकारा प्ठक्षसूचीनिभा तेति शिल्प | 


शाल्त्राद्नगम्यते । तथा च समराङ्गणसत्रपदि--भ० ७३1 १९.१६, १८ १९ श्लो । 


दुवकं धारयेद्धीमान्‌ बुषश्रवणरोममिः ॥ 
"वर्करा विधातव्यः खरकेरोरथापि वा ॥ 
 तन्तुतः कुचकः श्रेष्ठौ विरेखाकमंणि स्वतः | 
"भो वराद्कराकारस्ततोऽश्त्थाद्राङ्कतिः ॥' ( संशोधितः पाठः ) 
॥ छश्वसूचीनिभध्वान्यः ऋ न ऋ क| ` 
उडम्बरादराकारः # # ऋ क + 1 


इति शुचे विषथं णं नमुपरभ्यते । नानुचितञ्च विरवखजः प्रतीहमयणाम्‌ भडनोपयोभिन्या- ` 
तुर्क हणम्‌, प्रभोः परतीहाराच्चुजीविनामपि प्रुतम्मतमशमूषादीनां रोकः साचखतशवाजु- 
रीरुयितव्यत्वात्‌। एतेऽथा दिगदर्शना्थमस्माभिर्पश्चि्ठाः अन्थतराथग्रहणपर्हिरयोस्तु धियः 
परसागम्‌ । इदुमन्रावधेयम्‌--यदि नाम कूं घायंवस्तुविशेषः स्यात्तदा परतः प्रोक्तैः प्रहरणादिभि- 


व्याद्रतनाहुभिरेतः क नाम तदु धमेमिति दमच्र्थक एव कुर्वशन्दोऽत्र शिः स्यात्‌ । 


१७। एवं॑तेषां साधारणीमाङृतिमभिधाय इदानीं तेषां प्रातिष्विकं रक्षणमाह-- ` 
 पश्चमित्यादि। त एते सवं एव चतुर्हस्ता सव्थापक्षन्ययोरूदधःकरमेण यथोक्तपहरणादिधारिणो ` 
ब्रह्मणः सव्येऽपसथ्ये च चलुश्रतुःकरमेणावस्थिताः। तत्र वे प्रथमतः सप्तनामा वामदक्षिगयो- ` 
हस्तयो पद्मम्‌, सुचाम्‌, अक्षरम्‌, वेदम्‌, दंशम्‌ दधान इति शेषः । एवं सर्वत्र द्वितीयान्तानां ` 

दधान इति क्रिययाऽन्वयः । तत्र खचा खक्‌, दंशोऽच्चविशेषः । 00 

इति, कपण्डल््च दधानो धम॑कनामा द्वितीय इत्यथैः । अत्र कमण्डल्रिति पूरवोक्तवतुष्या- ` 
 तिरिकततवेन वा पकडान्यपरकल्पनविधया वा निदिष्टमिति न ज्ञायते । 


 १८। अक्पन्नवामद्ण्डकमर्रेत्यस्य प्रहृत पालेऽुसन्धेयः । पम कमलब्रेत्येकल्यैव ` 


्विवीयमाह--कमण्डल् धमक 


ह  देवतामतकरण्‌ 
वेट दण्डं विजयो भवेत्‌ ( दघत्‌ 0 ) 5: 


अधोहस्तापसव्येन खडगयुग्‌ यज्ञभद्रकः ॥ १६ 
 अल्षपाशाङ्श(शान्‌ ?दण्डभयश्च (दण्डं भवश्च ?) सवकामदः । 
 दण्डङ्कशपाशरोत्‌पलनिभवः (वलं षिभवः ?) सवेशान्तिदः ॥२०॥ 
[ अथ द्वाद सूथमूत्तयः | 
श्रृणु वतस्त प्रवत्थामि सूयभेदां् ते जय। 
यावत्‌प्रकाशकः सूयां यावन्मृत्तिभिरीरितः ॥ २१॥ 


वस्तुनो द्विश्छेखः समुपलभ्यते । "वामः इति पदमप्यनन्वयि । अत्र "प्रियोहुमव' इति पगे 
` शपमण्डने ( स्प--अ० २,१९ श्छो० ) । ` 


ताम ०००५ 


२० । तदैवं धामतश्रत्वारः सक्त-घमंक-मतोहमव-जयनामानो ब्रह्मणः व्रतीहाराः, दक्षिणत 
छत्वारो विजय-यज्ञमद्रक-मव-विभवनामानश्च निर्दिष्टाः । 


२१। द्दानीं हाद सूयमूत्तीराह--श्रण्विति । जय इति वततेत्यनेनो दिष्टस्य सम्बोध्यल्य 
नाम । यद्वा जय सरवोतकषेण व्तसपरेत्यर्थ॑ः । ते व्रवक्ष्यामीत्यन्वयः | 


यावदिति समस्तवस्तुप्रकाश्क इत्यर्थः| यावन्भूत्तिमिरीरितः कथिवल्तावतीमर्तीश्र 
प्रषक््यामीत्य्थः। सर्वां एवेता मूत्तयश्तुर्बादव इषि न्तायते धार्यद्रन्याणामाधिक्यदशंनात्‌ ; 
८ तथा ~ ^ त | 
| ८ ‡ | इत्यः १ 2 | | 
 पपद्मद्रयामयवरान्‌ दधतं करान्जेःः इत्यत्यत्र करान्जेरिष्त्यनेन दोष्णां द्वाधिकत्वराभाच्च । 
अन्न पूष्णो मूतिरद्विभुना केवरपद््यरान्छिता च, वेन्णवी मूतिरपि दविकरा, परं तस्या दक्षिणकरे 
 चक्रमि्रत्र पद्यमिति विशेषः तदितरत्र सर्वासामेव मूर्तीनां करये नीरजङ्वयमन्ययोश्च 
` यथोक्तद्रन्याणीति । अ्िषुराणेऽपि-- । 


0  गभ्वरदा ह्वान्जिनः सवं दिक्पाराश्चकर कमात्‌ ।* ( अ० ९१.२३ शो ) इति । 


सतक्ठादवे सेकचक्रे श्ये सुयो हिपशचधक्‌ । | 
मसीमाजनटेखन्यो विध्रव्‌ + >* ५॥ (अ०९१,१ को) ` 


। इयनेन च तन्मूतीना चतुबाडुतवस्य सूचितत्वात्‌ । एतेन काश्यपरिल्पे-- ` 


द्विभुजा पश्चहस्ताश्च रक्तपद्यासने स्थिताः । ` २ 
रक्तमण्डरुसयुक्ताः करण्डमुङधटान्विताः ॥ ( अ० ४८,७९-८० शलो ) 


इति यद्‌ कवं भस्करमीनायुतं तन्मलान्तरपर्वनमिति हृत्वा सोढव्यम्‌ | 


चतुर्थोऽध्यायः ` ४ 


सपदमो पाणिवलमो (पवो १) ॥२९॥ ` 


सा श  रोद्री ज्ञातव्या प्रधाना पञ्चभूषिता 
चकर तु द्लिणे यस्था वाः गो 
ता वारुणी भवेन्मूत्तिः द्मन्य्मकरदया ॥२६॥ 
कमण्डलुः द(लुदं (क्िणतोऽतमाल तः। 


स्तु दक्षिणे शूरं वामहस्ते सुदशेनम्‌ । र 

त. समास्यति पल्नहुस्ता यमय व ॥२८॥ ५ 

२२। उपरिथचतधिशश्छोके सञुदि्ाना भात्करमू्तीनामयुकतेण रक्षणानि वक्तं प्रथमा- ` । | 

माह--दक्षिण इति । यस्या दयध्याहारः । यस्या दक्षिणे केरे पौष्करी कमर्चटिता माला, ` 

वामे करे कमण्डलुर्वतत इत्यर्थः । इमौ च करावदधीविति चेयम्‌, उद क्रमेणेव धारणीयद्व्याणां = 

` कथनौचित्यात्‌ । पश्ास्वां शोभितकराविति वामदक्षिणयोरधःकरावित्यंः। एवमुत्तरत्रापि 

` क्तेयम्‌। "द्याभ्यां शलोभितकरेत्युवितः पाठः। | ५.4 

 खधातेति । भच्र ्डधातेश्ति वा श्डधामेःति वा पडो भवतु, उभयथाऽपि दोषानुषङ्गो ` ध: | 

`  इुष्परिदर एव, उदेश्छोके शवातिःति पाटस्योपट्पेः । अत्र ्रूमः--'धाते'त्येव पाठो ज्यायान्‌ 

` परिगणनश्ठोकस्थितधातरब्दसाम्यात्‌ ; छन्दोभङ्गदोषोतसारणाय चीपपदं प्क्िघ्षमिति ; तदेतत्‌ द ५ ( | 

 उरभमेव प्राचीनग्रन्थकृतां ृतिष्विति। ` ध 
२३। दक्षिणे सोम इति, सोमः सोमरसोऽतं वा । | 


8 दैबतामून्तपरकरणम्‌ 


छ दक्षिणे हस्ते वामे होमज (रीटकम्‌ १ कञ्जः ॥ 
 मूत्तिस्सवा्ी भवेद्‌ वत्‌स पद्मसद्धकरद्वया ॥ ३२ । 
 सुदशैना(न ?) करा सव्ये पद्महस्ता तु वामतः । 
एषा सा द्वादशी मृत्तिविष्णोरमिततेजसः ॥ ३३ । 
धाता मित्रोऽ्येमा रुदो वरुणः सूयं एव च । 
भगो विधस्वान्‌ पूषा च सविता त्वटविष्णुको 
इति इादश सूर्यमूत्तेयः । 


1 


२९। सा विश्वमूर्तिरिति, बेवस्वती मूतिरित्यथंः ; उदेश्दरोके तथा पाठात्‌ । ` 
३४ । उक्तक्वणानां द्वादशमृततीनां सं्रहरलोकमाह--घातेति। दूरविभिन्नान्येव सूर- 


 नामान्युपलस्यन्ते काभ्यपरिल्पे। तथा च-- 


४  आ्नेयषुराणे पुनः-- | 


विकत्त॑नो विवस्वांश्च मात्तण्डो भास्करो रविः । 

रोकपारः प्रकाश्चश्च रोकसाक्षी लिविक्रमः ॥ 

आदित्यश्च तथा सूयः अंद्ुमाी दिवाकरः । 

एते वे द्वादक्लाऽऽदित्या उत्तरादिक्रमात्‌ स्थिताः ॥ इति । 
| ( अ० ४८,८१-८३ श्छो° ) 


। वरणः सूयेनामा च सहलरंखस्तथाऽपरः । | 
धाता तपनसंश्च सविताऽथ गभष्तिकः ॥ ` 
 रविश्ववाथ पर्जन्यस्त्वष्टा मित्रोऽथ विष्णुकः । ` 


मेयादिराचिसंस्थाश्र मागोविकरािकान्तकाः ॥ (अ० ५१९६ न्छो०) 


चतुर्थोऽध्यायः ् ६७ 


[अथ सूरयायतनम्‌ ] 


मेण पूज्यन्ते (१18२ | 
ऋ त्ये गाहु॑स्थानं शुक्रस्थान पश्चिमे ॥ ३६ ॥ 


२५७ ॥ 


इति धातृ-सविव्‌-स्व्-वरण-सूय॑-मित्र-विष्णूलां सप्तानां साम्येन, भग-तपन-गभस्हिक.रवि- =` 


पजंन्यानां पञ्चानाञ्च भिन्नतया नामान्युपरम्यन्ते । 


३९॥ सुेस्यायतने वक्तव्ये प्रसङ्गा्तदचंनायाः सवदेवाचनयुलत्वं वु सममिन्याहताना- 1 
 भन्येषासपि तथात्वभाइ-- सूयं इति । अयुक्रमेण पूज्यन्ते चेद ॒ पते अर्चने सवदेवपूजाविधौ 


पारदाः स्युः, सवं देवपूजास्वेवाऽऽदावेते पूजनीया इत्यथः । तथा च सतिः-- 
|  बणेशच्च दिनेशञ्च वहि विष्णुं शिवं शिवाम्‌ । | 
| पूजयेहेवषट्कश्च ततः पूजां घमाचरत्‌ ॥ इति । 
भत्र च वहि निहवानेन म्न्थक्ता अपक्रमन्‌ कऋमोऽपि नारक्षीति विभावनीयम्‌ । 
तन्त्रान्तद-- | ध 
आदित्यं गणनाथच्च देवीं इदं यथाक्रमम्‌ । 
नारायणं विषयदवाख्यमन्ते च इख्देवताः ॥ ` 


इति प्रङ्ृतश्छोकवदेव पञ्चदेवाच॑नं विष्ठितम्‌, तत्राप्यस्ति क्रम विपयेय दति नवीनोऽयं पूजापर्यायः। | 
३६-३७। आयतने ग्रहसंस्थानमाह--आघ्नेय इति । न-गुर-राहु-खक-केषु-डध-क्षनि- ० 


नदराः कऋपेणाऽऽ्नेयत देष्ट्री यावत्‌ स्थाप्या इत्यथः । तथा च स्पसण्डने-- ` 
| सूयंस्याऽऽ्यतने स्थाप्या बह्विकोगादितः करत्‌ । 


ष कुजो जीवल्तमः शक्रः केतवो ज्ञः शनिः शी ॥ (अ० २०२५ शछो०) # ॥ 
~ दति ॥ तमो राहुः, जो बुधः । एवन्न- ईशाने च शनिः स्थाप्यः दयनन्तर स्खखनघ्थाने-- ५ : | 


` प्प्राच्यां स्थाप्यः इत्यक्षरवतुषटयं च्रटितं स्यादित्यचुमीयते । 


प 


१ हत . ४  दैवतामु्तिप्रकरणप्‌ 


1. भवितुं प्रहता कमोत्कपास्थां सवेतरकमेवाथ प्रतिपादयतीति इ्यते । किमन्र तातूपयमिति ` 
प्रय दे देवयुख्यास्तेषामायतनेषु त एव विभक्तविभागेनावस्थिताः फरदायका ्युःतत्रापि | 
।  चस्याथतनं तस्य प्राङ्निदशाधेमयसचम इत्येवारमाकं प्रतिवचनविभवः । 
` श्रीकणत्यादिशलोकस्य तु दुष्करः पालोदधारः। प्रथमे पादे एवं दर्थः स्थित स्व 


प्रदक्षिणे" इत्यत्र शविशश्व परक्षिणात्‌' इति पाठः ङ्यः । तथा चेते परदि्ेन दवौ दौ इत्वा == =` 


ह | | अथ सूयप्रतीहाराः | 

 स्ैकदन्ताच्युतशक्तिरुदरा विघ्रेशशक्तीश्वरविष्णुसूर्या 

 श्रीनाथविघ्ेशभगास्विकेश८ः)) चण्डीशटेरम्बपतङ्गक्ृष्णा(}) ॥३८ 
 श्रीकण्ठसूर्था रुदस्थाम्बिकाज८)) वदज्िणमध्यादिदिन्ञु पूञ्याः। 
 खस्थानगाः स्वमनोरथांस्ते यान्ति विघ्नातिपरसंस्थाः८) ॥ ३६ 

दण्डी च पिङ्लश्चेव आनन्दश्वान्तकस्तथा । 

चि्ो विचित्रो ज्ञातव्यः किरणान्ञः सुखोचनः ॥ ४० 

सवे च पुरुषाकाराः कत्तैवयाः शान्तिमिच्छता । 

चतुद्र रेषु च स्थाप्या दिशाथेव प्रदल्लिणे ॥ ४१ ॥ 


ह तमक ००८०७ ५५ 
भ ~न 
ति माज -१ १ प 


 छन्लानाथमधः सूर्यायतनं चित्रारूढमुपत्थाप्यते-- | 


पू चधृर्द्रः | 
दण्डी, पिङ्कः 


२८-३९॥। प्चपादीयं प्चानां सूर्येकद्न्ताच्युतशक्तिरदाणां करम देकेकप्राथम्येन निर्दैशमनु- 


| शरीकण्ठसूयभसुखाम्बिकाजाःः इति । वचलुरथपादन्तु दुरूढमेव । । ॥ १ ॥ 
४०-४१। दण्ड्यादयोऽोद्वारदेवताः पूादिदवारकमेण द्विशः संल्थाप्याः । एवच्च दिाचरेव ` 


चतुर्थोऽध्यायः न 0 


प्रतजेन्यृध्वेकिरणं ताश्रचूडं वण्डायुषप्‌ । 
दण्डो वामविभागे तु पिङ्गलः स्यादतः श्रणु ॥ ४२ ॥ 

(किरणस्थाने 0 किरणे तु) यदा शक्तिः किरणं ताभ 
तजंनीदण्डपूवेच पिङ्गलः पू्दत्तिणे ॥ ४३॥ ` 

तजनी द्वो वक्तानां 0) दण्डेनानन्दकः स्मरतः! 
तजेनीदण्डापसतव्यं सव्यवेदान्तकाशुभाः ॥ ४४ ॥ 
तर्जना द्वोपमनी दण्डं द्ण्डन्ते चित्रका भवेत्‌ 
तजेनीदण्डापसव्यं स भवेतद्विचित्रकः ॥ ४५ ॥ 
तजनी दो किरणं (१) दण्डान्तकिरणोदभवे । ` 
तजेनीदण्डापसव्ये क्तव्यः स सुखोचनः ॥ ४६ 


| [चन्द्रः | 
 चन्द्रिले विधातव्यः श्वेतः श्वेताम्बरात्रतः 


 दशभ्वेताभ्वसंयुक्त आरूढः स्यन्दने शुभः ॥ ४७॥ 
 द्विसुजो दक्तिणे पाणो गदां बिध्रद्‌ यथादरम्‌। ` 
 वामस्त॒ वरदो हस्त इति चन्द्रो निरूप्यते ॥ ४८ ॥ 


ध [भौमः] 
धरापुच्रस्य वद्यामि छल्लणं चित्रकर्मणि । 


 चतुभजो मेषगमश्चाङ्भरसदहशव्यतिः ॥ ४६ ॥ 


|  चतुद्रीरषु संस्थाप्या इत्यथः । 'चतुद्रीरेषु संस्थाप्या विशशरेते प्रदक्षिणम्‌” इति रूपमण्डने ( भ० ॥ ८ 


म, द्को० ३० >) पाहः । | | 
 ४२-४६ । पञ्चरछोकष्या तेषां दण्ड्यादीनामायुघानि पूर्वाद््ियाः प्रादक्षिण्येन स्थितेः = | 


 प्रकारश्चाऽऽह-प्रतजन्युदध करिरणमिति । पाव्वेकल्यादकल्येनाप्यल्य यथाययम्थाविष्कारे नेदं | 


सडक! 


` दुष्परिष्काय यत्‌ प्रतजेस्यादीनि अवयवसूषरूपेण वा आयुघल्वरूपेण वा दण्ड्यादीन्‌ प्रतीहारान्‌ = | 


॥ विरिषन्तीति । तत्र पहरि दण्डिनो दक्षिणे पिङ्गलकः, दक्षिणद्वारे भानन्दस्य दक्षिणे चण्डकः, = | 
| पश्चिमद्ररि चित्रघ्य दक्षिणे विचित्रः, उत्तरे किरणाक्षघ्य दक्षिणे खछोचन इति पूोक्तप्रदक्षिण- 0 


४९-९० । अद्गारसद्शययुतिरिति जवर्द्गारगोरवपुरित्यथंः, तन्त्ान्तरऽस्य छोहितवणत्व- = | 


 शौरितिः त 


ड ` 


[ इदस्यति-छक ] 
वगुरुलैस्यः शुभ्रश्च भृगुनन्दनः । 
 चतुभिर्वाहुमि॑क्तथिलकर्मविशारदैः॥ ५३ ॥ 
वरदो सान्तसृतो च कमण्डलुधरो तथा 


दण्डिनो च तथा बाहू विभ्राणो परिकल्पयेत्‌ ॥ ५४ 


ललम्यमातं (शोरि तिलसमाभासं ) एारूदं 
णसंयुक्तं चापशूलधरं छिखेत्‌ ॥ ५५ । 


५  ह्योक्तत्वात्‌। द््गमिति, इधो शक्षभूलम्‌ । हस्तमिति अधोषहत्तम्‌ । यद्वा इुल्लपदेनात्र 


॥ ध श्ष्ठणयाऽोदेशो ग्राह्यः, दक्षिणाधोहस्तं वरदं परिकल्पयेदित्यथेः । पुरुतकं हस्तम्‌! इति शिल्परत्ै, ` 
शुद्र इति तद्धरं" इति ततपादरिप्पण्यां पाठान्तराणि इर्यन्ते । (शिल्प० उ० २९४४ श्ो०)1 = | 


अयं शक्तिवराभयगदाधारीति शब्दकस्पद्रुमदतग्रहयागतत्त्व॑रजातकादयंः । 1 
९२-९४। तुल्थबाहुत्वातुल्थप्रहरणत्वाच शदस्पतिष्चकरो तन्श्रेणाऽऽ्े-पीतं इत्थादि। 


। करदावित्यादि ्िवचनन्तूमयािश्षया, एवं “बा इत्यत्रापि । परमा्॑तस्त्वनयोः प्रत्येकं चत्वारो ५ 
| बाहेवश्नत्वारि चाऽ्युघानीति ज्ञातन्यम्‌ । एवल्रं बरोऽ्षसूत्र कमण्डलदेण्डशेति बहस्पतेस्तान्येव च॑ 1 


चतुर्थोऽध्यायः ` 1. 9 ध 
[ राः | 
सहसनगत राहु करावदन रिखेत्‌ । 
वरदं खटगसंयुक्तं खेटशूलधरं छिखेत्‌ ॥ ५६ 
| [ केतवः ] 
प्रा दिबाहवः सव वरदाश्च गदाधरः 
ग्रपृष्ठसमारूढा लेखनीयास्तु केतवः ॥ ५७॥ ` 
[ प्रहमूर्तौः साधारणविधिः] ` 1 
(य १ मोहाः किरीटिनः कुर्यान्‌ (कार्यां?) नवतारप्रमाणकाः । 
 रलकुण्डरकेय॒रहाराभरणभूषिताः॥ ५८ ॥ श 
इति नवग्रहाः । 


वरदं वजाङ्कश् कमण्डलुविधुत्‌करप्‌ । 

| गजारूढं सहखान्तमिन्द्रं पूवदिशि स्थितप्‌ ॥ ५६॥ 
` - [श्निः]. 

वरदं शक्तिहस्तख भ्रणालओ कमण्डलुप्‌ । 


 प्रकरणाह्‌ रह" इत्येव पाठः समीचीनतयाऽल्मामिर्मिधारितः। किञ्च यत्न “गृधाः इति पाड 


इत्यनेन विहङ्धविशेषस्य गृध्रस्य द्वितालकत्वस्येव युक्तत्वात्‌ । 


 पतिदर्टन्या । 0 
| : वरदः शक्तिहस्तश्च सष्णारुकमण्डटुः । 
ज्वारपुञ्चनिभो देवो मेषारूढो र ढ 


_ ज्वालापुञ्जनिभं रूपं ( देवं १) मेषारूढं हुताशनम्‌ ॥६०॥ ` 
` ५८॥ अच्र श्ृ्राःः इति शिल्परत्ने ( शिल्प उ०२९।१५७ ० » पाठः । बद्य्यन् 4 | 
 एकाक्षरविपरिणामरम्या पा्डद्धिः शया श्रहाशेत्युमयमेव युगद़बु्ावाविभावयति, तथाऽपि ` | 


स्यात्तदा 'नचतारुप्रमाणकाः” इत्यजुपपनञ' भवेत्‌, दास्यां प्रोक्ता विहङ्गमाः" (रअ० ष्ठो ) = | 
९९ वन्ना्कशमित्यर्त्यथःऽत्‌ । एवम्भूतम्‌ इन्द्रं वित्रविशारदाशित्रे इरयुरित्यध्याइरिण ` | 
| दवितीयान्तपदानामन्वय । प्रथाथ द्वितीया 1 रेखकप्रमादादु निन्द्रोरकष्त्ररिति वेति सातन्यम्‌ । | ॥ ॑ । । ॥ ध न | 


 ६०। वरदमित्यादि । णाच कमण्डलुमिति दधानमिति बषः, चित्रे यंसित्यिव । ` ५ | 
एवमुत्तरत्रापि यथासम्भवं दधानम्‌ , दधानो वा, इर्यः क्रियेत वेत्याचध्याह्मरेण वाक्यानामन्वयोप- 6 


 इताश्चनः ॥ इति सूपमण्डने (रभ० ३शछो०) 1 ` ५ ॥ 


1 ७२  देवतामूतिप्रकरणम्‌ 


. : [ यमः | 
लेखनीं पुस्तकं हस्ते कुट दण्डमेव च । 
महामहिषमारूढः कृष्णाङ्श्च यमो भवेत्‌ ॥ ६१। 
|  [निक्दतिः] 
का(कन्तंका ?)वेरिमस्तकम्‌ । 


वटगखेटकहस्तथ क 


`  दंशाकराखास्यं कुर्याच्‌ श्रानरूप (श्वानारूढथ!) नेक तम्‌॥६२॥ ` 
[वरणः] | 
वरदं पाशपद्य् कमण्डलुन्तथा करे । 

मकरा(नक्रा)रूढय कर्तव्यं वरुणं पश्चिमादिशि ॥ ६३ 


[ बुः] ह 
वरं ध्वजपताकथ कमण्डलुन्तथा करे । न 
| 
गजारूढं कर्तव्यं सोभ्यायां धनदं दिशि ॥ ६५ 
 ६२। धारारूढमिति शरारुढमिलं + अमतः श्वानकब्दोऽपि इुराथकः । ` भय खरारूढ 

` इति काछिकापुराणम्‌ ( अ० ७९, ६१ छ@ो० ) । वदषट्कराख्वदनः श्वानारूढश्च राक्षसः" ( सूप ` 
 २अ०) इति छपण्डे पाठः। श्रावारूढम्‌' इति कारयपरिल्ये ( ४८।४७ ) पाठः । एवज । 
1 इ यद्यपि यथाकामं “खराखूढ' श्शवारूढग्योरन्यतमः पाडः श्ुद्त्थेनोपादातं शक्यते तथाऽपि साम्य कि | | 


स्याट्‌ रूपमण्डनपाऽसाम्याच बन्धनीमध्यस्थपाॐ एव श्ुदत्वेन निणीतः । 


| | ६३। ननक्रारूढः स कर्तव्यो वरणः पश्चिमाभध्रितःः (रूप० २ अ०) इति रूपमण्डने पाटः । 1 
` यपि यादस्त्वाविरेषेण मकरो नक्ररेतयुभाषेव वरणस्य वाहनीभावे स्वरूपयोग्यौ तथाऽपि ` 1 
`  छन्दोऽलुकुरुत्वेनान्यत्रोपरन्येश्च नक्र इत्येव पाऽः श्युद्रसेन कल्पितः । वरणो हंसारूढ इति ` 
जलाश्चयतत्त्वएतहयशी॑पञ्चरा्म्‌ । | । ; 
६४ । चद्यपि तरोः इत्यत्र भर्टु' इति पाठ्कल्पनम्‌ एकान्ततः कर्थनेव, तथाऽप्यथ- = ` 
| वैशयौदनन्यगत्या तथा पाऽः कसिपितः । निपुणः शब्द्म्यमुबध्य पागन्तरमयुखन्धातव्यम्‌ । 


इति दश दिक्पालाः। ` 


यस्माद्‌ बरह्मा वेदविद्याः समस्ता ` 

आदिदाद्याः खेचरा पिष्ट्यच्रम्‌। = 
दिक्पाखायं व्यक्तरूप जातं = 
 (बन्धेषन्यो) षिष्णुविश्वश्ठक्‌ पाट(कस्यः१ कोऽसो) ॥६७॥ ` | 


इति न्तेत्ा(धवएतम)जसूरथुन्मण्डनविरचिते वस्तुशाख्े देवतामूसिप्रक्षरणे 
रूपावतारे ब्रह्म-सूये-नवप्रह-दशदिकपाराधिकार- 
 श्तुर्थोऽभ्यायः ॥ ७॥ ध 


| 


६8 । मन्त्रिकोणके इति देवमन्व्रिणो बृहस्पतेः कोणे ईशानदिशीत्यः । 1 
 ६७। यल्मादु व्रक्मादिभ्यक्तरूपान्तं जगन्नातम्‌ असो विधस्क्‌ पारकश्च ` विष्णु्वन् | 
इत्यन्वयः । खेचरा ग्रहाः, धिष्व्यचक्रं नक्चत्रमण्डरम्‌ , व्यक्तस्पं भूतलम्‌ । 


चमेकरद्रजकानाथे नटस्य वरटस्य च ॥ ३ 

` मेदभि्टकिरातानां हृषीकेशः सुखाषहः ¦ 

` कुम्भकारवणिग्वेभ्यचाकिकाणां ध्वजस्य च ॥ ६ ॥ 

सर्वासां प्रक्रतीनाच पद्मनाभः सुखप्रदः! ` 

` दामोदरः सोख्यकरो बरह्मचा्येकदण्डिनोः ॥ ५ । 
हरिं हिरण्यगर्भ नारसिंहमतः परम्‌। 
 वामनथ वराह सर्ववर्णेषु सोख्यदप्‌ ॥ ६ ॥ 


प थातो तोति जन ०००१५ 


५ २। एतेन मधुसूदनो वचिष्णुश्वाविरैषेण कषत्रियाणां वेर्यानान्न शुभदाषित्यायाति। 
। |  सूपमरण्डने पुनरन्यथेव ह्यते। तथाच-- ` 
१ मधुसूदनविष्णू च क्षत्रियाणां करुप्रदो । ` 


त्रिविक्रमो वामनश्च वेभ्याना(मचयच्छुभा † मच॑ने शमौ) ॥ (अ०३) ध 


 इति। एष एव च पाटो युक इति प्रतिभाति । 


३। बूदाणाननेति चकारा ब्रह्षत्रविक्ामपि उलप्रेत्यनुमीयते। सूपमण्डने ` पुनः = 


श्वा सौल्यदायिनीःति पाठः । 


(८ . |  ४। मेदो म्लेच्छनातिविशेषः, ध्वजः शोण्डिकः। अनर द्वितीया छम्भकारवबणिक- ५ # 
| वेश्यचाङ्गिकष्वजिनामपिः इति छखबोध्यः पाठो रूपमण्डने । एवशचैतन्मते वैश्यानां मधुसूदन- ` 


| विष्णुहषीकेशा, सूपमण्डनमत प्निविकरमवामनहपीकेरः इुलावह इति स्थितम्‌ । 


= पञ्चमप््यावः "4 


[ अवस्थाभेदेन मूर्तीनां याह्याय्राक्यत्व 
इ्भध्रा या मूत्तिः २ | 


नखाभरणमालाख्रेभ॑श्रां तां न विसजयेत्‌ ॥ ७ ॥ 
| [ विष्णोश्चतुविक्षतिमूत्तयः | क 


सङ्कषंणो ग-शं-पा-चं ८?) दामोदरः प-्श-ग-च (: ?) ॥ ८ 

वासुदेवो ग-शं-च पे ८?) प्रद्यम्नश्चक-शं-ग-पः 
 विष्णुगेदा-प-शं-चकी माधवो ग-च-रह्क-पेः ॥ & ॥ 
 अनुरुद्धश्च-गं-शं-पः पुरुषोत्तमश्च-पा-श-गेः। 

अधोक्लजः प-गा-शं-चो जनार्दनः प-चं-श-गः॥१०॥ ` 
 गोविन्दथक्र-गा-पा-(शं १ शः) त्रिविक्रमः प-गं-च-श८ ?) । 
श्रीधरः पद्म-च॑-गा-(शं ? शः) हृषीकेशो ग-चं-प-शोः ॥ ११ ॥ 


` नृसिंहश्च-प-गं-श(ख १ भ्व) अच्युतो ग-प-चक्र-(शम्‌!शः)। 


वामनः शं-च-ग॑-पद्मर्नारायणः श-प१-ग-(च : ¢) ॥ १२॥ 
 पद्यनाभः श-प-चां-ग उग्रः शं-ग-दा-च-पेः | 


| हरि श-च-ग-पः पृञ्यः कृष्णः श-ग-प-चक्रभृत्‌ ॥ १३ ॥ 


इति चतुविंशतिमूत्तयः। 


मनात 


त न भः 0 ४५५ 011 


७॥। या स्थाप्या मृत्तिरङ्प्रत्यङ्गमन्मा तामिति योजना 1 विदोषः प्रथमे ( प° २२ ) दष््यः । 
८--१२ 1 आत्रयोदश््छोकमनयां षट्श्छोक्या विष्णोश्तुविश्चति मूर्तीः सह नान्ना सह 


 चाऽ्युयेनामिदधानः सकषषलुद्धधा आयुधानां पूण नामानुपादाय प्रतीकरूपेणाचाक्षरमत्रेण तान्या- ॥ 
भुतानि प्रतिपादयतीति रहस्यमत्र विभावनीयम्‌ । अन्न छृतडद्धिषु पेषु प्रथमान्तानामायुघ- = ` 
पदानामादुधिसामानाधिकरण्यम्‌ अस्त्ययैऽतप्स्ययात्‌। इतेष च विरोषणत्वात्ततीयेति द्रव्यम्‌| = ` 

 (्ुचूदनः इत्यननातप्रस्ययान्तेन सह कमधारयः । तत्र तत्र बिन्दव आकारार्च छन्दपारन- = ` 
 धतत्रता भपि बहुत्नाकारणङ्ृतप्रमाण इति विषीदामः । तत्र वास्येव प्रन्थकःतुगरन्थान्ते स्पमण्डने = 
| आसामेव चठुचिशतिमूरतीनाुेखोऽविकटेनाऽधयुधनाश्चा वत्ते । तदरिनाञ्चेतानि प्धानि 
छनोधानि स्युरिति खूपमण्डनीयपद्यान्थत्रोद्वयन्ते । तथा च रूपमण्डने वृतीयाध्याये-~ ` ८. | 


केशवः (पदमशङ्कश्च १ प-च-शं -गश्च)मधुसूदन-८च शं -प-(गाः गः) 


` कग 


 बाखदेवो गदारद्भवक्रपश्मधरो मतः । ` | 
केदाचः कमर कम्बु धत्ते चक्र( फ)गदामपि ॥७१॥. 
नारायणः कम्डुपद्यगदाचक्रधरो भवेत्‌ । | 
माधवस्तु गदां चक्र' शङ्क बहति पटलम्‌ ॥ ८ ॥ 
पुरषोत्तमस्तु चक्र' पद्म ` शद" गदां दधत्‌ । 
मधोक्षजः सरोषं गदां शङ्क छदशंनम्‌ ॥ ९ ॥ 
सड्षंणो गदा-कम्बु-षर्सीष्ह-चक्रग्यत्‌ 
गोविन्दौ धरते चक्र' गदां प्चज्च कम्ञुना ॥ १० ॥ 
विष्णुः कौमोदकीं पञ्च पाञ्चजन्यं खदम्‌ । 
मधुसूदनस्त्‌ चक्रं शङ्क सरसिज" गदाम्‌ ॥ ११॥ ` 
भच्युतस्त॒ गदापञ्चयक्रशद्सखेः समन्वितः । | 
उपेन्द्रो बहते चहु गदां चक्रं शेशयम्‌ ।॥ १२ ॥ 
प्रयन्नशच शह्कवक्रदास्मोजल्लानि पाणिभिः! 
` च्रिषिक्रमस्न्रु गदाचक्रदाह्ान्‌ बिभति थः ॥ १३ ॥ 
 नरंसिष्स्तु चक्रान्जगदाकम्बुविराजितः। ` 
 जनादेनोऽम्ुजः चक्र कम्ब कौमोदकीं दधो ।॥ १५॥ 
 धामनस्तु श्चक्तगदापद्मरूसवकरः | 
श्रीधरो वारिज चक्रं गदाश्च" दधाति च ॥ १५ ॥ 
अनिश रसचक्रगदाशद्भमरधिन्दवान्‌ । 
 हषीकेशो गदां चक्र" पञ्चशहम च धारथन्‌ ॥ १६ ॥ 
पद्मनाभः पाञ्चजन्यं पद्च' चक्र गंदामपि । 
 हामोदरोऽग्बज' शङ्क" गदां धते छदशेनम्‌ ॥ १७ ॥ | | 
 हरिधारयते कम्बुं चक्र पद्य" तथा गदाम्‌ । 
कृष्णः करेः पाञ्चजन्यं गदां प्म" खदर्ञ॑नम्‌ ॥ १८ ॥ 
एताः छमूत्तयो जेया दक्षिणाधःकर-कमात्‌ । इति । 


हदमन्रावभेयम्‌-रूपमण्डने अन्येषामिव केशवमधुसूदनयोरपि चत्वारि चत्वा्थयुघानि ` 
| निर्दिष्टानि, भत्र तु केशवस्य पद्श्वाविति दे, मधुसुदनस्य पुनः शद्पश्चगदा इति त्रीण्यादुधानि ` | 
द्यन्ते! तत्र च सम्भवन्स्यामपि केदावल्य द्रैवाहन्यामाकृतो, मधुसूदनस्य त्रेबाहवं रूपन्त्व- 
|  नाकणितचरमिति छन्दोदोषभविगणस्येव बन्धन्यन्तश्कारः परकिपतोऽस्माभिरितिकेयम्‌। = ` 
| शूषमण्डने त्रैविक्रमं स्पं प्रबाहवं इभ्यतेः इष पुनश्रातबोहवमिति। कतरत्‌ पुनरनयो- = ` 
 धुं्तरमिति नावधारयामः। भ हयस्ति निममो यत्‌ त्रयोऽस्य पादा ईति बाुभिरपिक्निभिरेव  । 


॥ ८ 


॥॥ 


` पञ्चमोऽध्यायः ` ॐ 


| ( प्रीक्तानामायुघानां स्यासक्रमः 1 
` अधरं दक्लिणे हस्तमारभ्य खषटि(माग्रतः ? मार्गतः) 
चतुविशतिमूर्तीनां स्वै(वेना ? वेवा)युधक्रमः ॥ १४ । 


[ अथ शाख्पामशिखापरीक्चा ] 
[ आङृतितो ग्राह्यशिखारश्षणम्‌ ] 


नागभोगसमा युक्ता शिखा सूच्मा च या भवेत्‌ । 
पूजनीया प्रयलेन स्थिरा ल्लिग्धा च वत्तेखा ॥ १५ ॥ 


मान्यमिति, न चापि वचतु्भिस्ताश्शमूत्येन्तरादर्लनात्‌। भ्यते हि प्रायेणारोकिकमूर्त 
प्रतिपादं दवो द्रौ बाहू इति, यथा हिवविष्णुचतुराननादीनाम्‌ । त्रिपादत्वे च-- 
“उ्वरस्त्रिपादस्तरिक्ियः षड्थुजो नवरोचनः 1? 


इत्था दिस्षटतो ज्वरा्रादीनां पट्वरणत्वम्‌ । यद्यपि इुराणादौ श्रयन्ते राणादीनामतिषादा = ` 
बाहवः परं न श्रयन्तेऽतिबाहवश्ररणाः । समबाह्वं द्विपदादौ इष्टमपि न त्रिपादादौ युक्तमिति ` 
विभावयामः । भल्तरन्यासक्रमविघायकश्टोकदशंनादपि चतुबाडुत्वमेवेषा प्रतीयते इति दि। 

१४! प्रोक्तानामाुधानां विन्यासक्रममाह--अधरमित्यादि । चतुत्राहुमू्तीनां दक्षिणाधो- 
` इस्तमारभ्य खष्टिमागंतः स्वभावक्रमेणाऽञ्युधक्ररो जातव्य इत्यथः । स्वमावक्रमश् आदौ ^ 
दक्षिणाधोहस्तस्ततो दक्षिणोर्वहह्तस्ततो वामाधोहस्तोऽन्तततश्र वामोध्वंहस्त इति । तथा = ` 

फकरेशवः पचदागश्चेति केशवस्य दक्षिणाधोहस्ते पञ्चम्‌, दक्षिणोध्वं चक्रम्‌, बामाधःशङ्कः, . ` 


वासोध्वें गदेति जेयम्‌ , एवं सव॑न । 


१९॥ आ पञ्चदशश्छोकात्‌ श्रिषष्श्छोकं यावदष्टाचत्वारिशता श्लोकः श्ाखग्रामशिकाया रक्षणं | | 1 | 
दोषुणौ ग्ाह्ाग्राद्ते परस्परमेदाश्च निरूपितानि । श्ास्त्रान्तरप्रसिद्धान्यमूनि वस्तूनि कविदवि- ` 
कलपद्योदधपिण कविदक्चरमान्रपरिवर्तनेन, कचित्‌ पद्परिवक्तनेन, कविहु भाषापरिव्तनतोऽथमात्रा- 
दानेन चायं मन्थकारो यथायथमाजहार । एते च विषयाः प्रयोगपारिजातमत्स्यसुक्तादो स्छन्दाध्चि- 
बरहम-्हमवेवतत-वाराहादिमहापुराणेषुचोपरभ्यन्त इति वीरमित्रोदयप्राणतोषणीरिलाचक्राथ- 
बोधिन्यादिशंग्रन्थादिभ्यो जायते । जिक्ताछमिस्तत्र तत्राऽऽकरे संगरे वा दर्व्यम्‌ । म युक्तं पुनरथं- 


शास्त्रं व्याचिख्याछमिधंमंशास्त्रविषयमवलम्न्य विरेषेणाऽऽखोचयितुम्‌ इति ततो विरमामः। ` 


नागभोगसमेति फणिफणाङृतिविरिष्टा, युक्ता उधरिता । न दुनर्नागमोगसमायुकतत्येक- = | 
वचम्‌ । (नागभोगखमाकारेऽति श्पमण्डने, “छत्राकारे'त्यन्यत्र च पाटः । स्थिरेति, भासमे यथा = ` 


स्थिरतया वत्तत तथाऽधश्चिपिदेत्यथः । तथाऽपि वत्तुला उभ्वंभागे गोरङ्घतिः | 


सतय 


3 [ प्रमाणतो ग्राह्वशिललक्षणम्‌ | 

तस्य मेवं सदा ष्मः धिया सह वस्तस्य] ) १६ ॥ 
यथा यथा शिला सृच्मा तथा तथा महत्‌ फलम्‌ । ` 

 तस्पात्ता पूजय ध्मकासाथमुक्तये ॥ १७ 


[ त्याज्यक्षिछारुक्षणम्‌ ] 


` कपिला कर्वरा भन्न रुक्त निद्राकुटा च या । 


 (रेषाङ्कषा!रेखाकुखा)ऽस्थिय ध्थुखा बहुचक्रकचक्रका ॥ १८॥ 

 ब्रहन्मुती बृषचक्रा बद्धवक्रा च (चायुनः १ या पुनः) । 
 बद्धचक्राऽ्थ(नामा? वा या) स्थाद्‌ भिन्नचक्रा त्धोयुखी ॥९६॥ 
` दग्धा (सुरताघुरक्ता) चापृञ्या निषण्णा (पातिएषंक्ति) चक्रिका। 


५ पूजयेद्‌ यः प्रमादेन दःखमेव खभेत्‌ सदा ॥ २० ॥ 


[ तच्च प्रतिप्रसवः 1 


खण्डिता स्फुटिता भिन्ना पाश्वभिन्ना विभेदिक्षा। 
शारिख)प्रामसमुदभूता शिखा दोषवा न हि ॥ २९॥ 


७ 0 +~ 
न - भ न 


9 > 


५ १८ । शछोकन्यं प्रागतोषगीतस्कन्दपुराणे किञचिद्विकलमुपरम्थते! तन्न यथा पाठान्तरं ` 
श तथा श्रोकमध्ये बन्धनोचिह्वान्तयंथासम्भवं सन्निवेशितम्‌ । | 


रक्ेति--अविराच्छुष्करतां याति यस्यां खििन्तु चन्दनम्‌ । सा र्केतिः रिष्लाचक्रार्थंबोधिनी 


 छतप्रयोगपारिजातोक्तरक्षणेत्यथेः ! अस्थिति आने ल्थिरतयाऽवत्तमाना 1 बहवक्रेति ` 
। प्रमाणाधिकचक्रशाछिनी, यस्याः शिलाया यावन्ति चक्राणि प्रमाणतः प्रकषानि ततोऽधिकचकरेति 
1 1 £. यावत्‌ । एकचक्रेति एकं चक्रकं यस्था सा, यस्या एकमपि चक्र क्षं तादश्ीत्यथंः । अन्यथ 
। | जकचक्राया गराह्यत्वश्रवगात्‌। | 4. 


 चन्ान्तगंतच्क्रा, 


१९॥। बद्धचक्ेत्यत्र रप्चक्रेति पाठः पुराणे । तत्रापि नास्यर्थान्तरम्‌ । दृहचक्रेति ` 


` भ्वक्रेणाऽऽवृतचक्ना च बह्व प्रकीर्तिताः 


ध ५ इति श्िङाचेक्राथबोधिनीरतप्रयोगपारिजातस्मरणात्‌ । 


ध र ५ २१.६५ अत्र प्राणतोषण्यां सफुटितादिवजनीयशिरलश्षणमभिधायं-- त | ( ५ ध त 2. क न 


[ वर्णभेदात्‌ सरमेदनिरूपणम्‌ ] 
करी स्रा ष्णा कं ५ दा रि 


[ वणभेदात्‌ संज्ञाभेदः ] | 
संहन्तु वामनं (चात ? पीत) सन्निभम्‌ 
वासुदेवं सितं जञेयं र्तं सङ्कषेणं स्मृतम्‌ ॥ २३ 


दामोदर नीलाभमनिरुद्धं तथेव च । 


भ्यामं नारायणं (तैलं ज्ञेयं) वेष्णवं कष्ण (कषे १ वणकः 


बहुवणमनन्ताख्यं (श्रीश )धरं पीतमुच्यते ॥ २४ । 


| [ चक्रप्रसाणम्‌ ] 
बु्रसूत्रेश्टमो भाग उत्तमं चक्ररन्ञणप्‌। 
मध्यम चतुर्भागः कनीयस्तु लिभागि(कःकप्‌ ) ॥ २५॥ 


तोतो ५००५० ००५५ 
[० तातन भ् न 


“यत्त बरह्मपुरागे-- खण्डितं स्फुरितं भग्नं पाश्व॑भिन्न' विसेदितम्‌ । 
 श्ाठग्रामर्िरभूतं किञ्चिदोषावदहं न हि॥ ` 
इति वचनं ततस्वीयेष्टवक्रस्पतिपरम्‌ । भत एव स्कन्दपुराणे-- 
| खण्डितं स्पुटितं भग्नं शाख्पराये न दोषदम्‌ । 
दृ यस्य तु या मूत्तिः स ता यत्नेन पूजयेत्‌ । ८ 
संपूर्य फरमाप्नोति इड रोके परत्र च ॥ इति हद्रवाक्ष्यम्‌ । = 


इत्युक्तम्‌ । ` ध ध 
 २२। स्वेताश्यामयोविरेषपरमाह शिराचक्राधंबोधिनीतप्रयोगवार्निति-- = 
` श्ुशिदधिपरदा यामा श्वेता सारिवकदापिनी ।' इति 


२३} इदानीं वणंक्रमेण केषाञ्चन चक्राणां रक्षणानि निर्दिशति-कपिरूमित्यादि । 
 लारसिहादिपदे तस्येदमित्यण्‌ । नरसिषठचक्रमित्यथः। एवं वामनादिषु । 


२५॥ इदानीं चक्रप्रमाणमादेकेन-घ्तसूत् इति । चृतसत्रा्टमो मागः इत्यतिरोहिता्थः = ` 


पाहः] यल्य चक्रप्यं यहु बृत्तमानं तस्या्टमाशमितं चक्रम्‌ उत्तमम्‌, चतुरंशमितं मध्यमम्‌ , 


ऋ्यंछमितमधममित्यथः। एतेन यथासोस्थमेव चक्राणां शरेष्ठ्यमित्यायातम्‌ । यथोक्तम्‌-- ` ` ् ५ 


 त्राप्यामलकीम(ना सूष्धमा चातीव या भवेत्‌ ( ९।१६ शको° ) इति । 


ऽध्यायः | ल..." §£ 


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(1 ० देवतामूततिप्रकरणम्‌ ` 


अथ चक्र[षिगेष]खक्षणानिं | क 
श | [ तत्र वाखदेवः | 
द्वारदेशे समे चक्रे दश्यते नान्त (रायिके ! रीयके) 
वासुदेवः स विन्ञेयः शुङ्धाभः स्यां(चा?)तितेजसा ॥ २६ ॥ 
८ | ` {खड्गः | व 
` ्लोचक्रावेकलमनो द चके एकलगने) तु पूवेभागवस्तु पुष्क(खुलम्‌)। ` 
`  सङकर्षणाख्यो विज्ञेयो रक्ता(भि ? भ)श्वातितेजसा ॥ २७ ॥ ` 
1 [ परय्नः | ध 
 प्रदयम्नः सृच्मचक्रस्तु पीतदीपिस्तथंव च । 
सुषिरं छिद्रबहुटं दीधांकारन्तु यद्‌ भवेत्‌ ॥ २८ ॥ 
| [ अनिश्ढः ] 
 अनिरुदवस्तु नीखाभो वत्तेलश्चातिशोभनः 
ष्यायां?रेखाणाँ) लितयं (हार! दार) एष्ठं पद्येन खाग्ितप 
1 [ एतेषां पूजाधिकारिः ] 
` ब्राह्मणेर्वासुदेवस्तु नृपैः सङ्क्षणस्तथा । 
 प्रयुम्नः पूज्यते वेभ्येरनिरुद्स्तु शूद्रकः ॥ ३० ॥ 
` चारो ब्राह्मणेः पृज्याश्नयो राजन्यजातिभिः 
वेश्येदरविव संपूज्यो तथेकः शुद्रजातिभिः ॥ ३१॥ 


| २६। चक्रमेदान्‌ विवक्ुर्वाखेवमाह--द्वारदेश् इति। नान्तरीयके इति चक्यं परस्पर 
 .  छ्नमियथंः। अतितेजतेति विशेषणे तृतीया, भतितेज उपरूक्चित इत्यर्थः । , 
।  . २७। टे चक्रे अग्ररघ्ने तु पूंमागे च पुष्करम्‌ । सट्कषेणाख्यो वितेयो रक्ताभश्रातिश्लोभनः॥ ` 
इति प्राणतोषणी । पुष्करमिति र-र्योरमेशत्‌ युष्करमिति जेयम्‌, पुष्करमाकालं च्िमित्येः । = ` 
२९॥ एता द्विवक्रा इति प्राणतोषणीतो ज्ञायते । 1 

३० । एवं चत्वारि चक्राणि निरुप्य प्रसङ्धाततेषां पूजाधिकारिण आह--ब्राह्मणेरिति इभ्याम्‌ । 

३९ । अत्रत्योऽयं शोकः; ॥ 4 

 " . शाख्प्रामाः समाः पूज्या विषमा न कदाचन । समेषु न दयं पूज्यं विषमेष्वैक एवषहि॥ 
| इति स्त्यन्तर्टतवचनस्यापवादविधया देमाद्राबुक्त इति वीरमित्रोदयान्‌ ज्ञायते। अत्रचायं 
`  बा्ेवादिपूजाप्रकारः-- ` | 0 


` पृश्चमौऽध्यायः _ ४ = 


~ ४ ~ 


[ ्िवक्रर्ध्मीनाराचणः ] ` 


सूदन आख्यातः शलहा 1 परिकीसितः॥ 1३३ ॥ ~ 
[ दामोदरः ] १, 


= व 


 व्ाहमेवौखैवः पूज्यते दस्ययमेषामस्नायारणोऽधिकारः वणं गुसत्वादिततरवरणसाधारण' वकरषरूनन- = । 
मप्यविशम्‌। एवं च्पैः सदधपंणः पूल्यते दति, भयमेषां कषत्रियाणां ब्राह्मतधारणो | 
५ वन्यशूट्यवेश्षयाऽसाधारणोऽचिक्छारः ततश्च तैः सटू्वणप्यम्नाभिसद्ा पूजनीयाः । प्रयस्मः | ॥ ५ ५ 
पूर्यते वेश्ेरिरयेषां श्माघ्रपिक्षयाऽसाधारणो व्राह्मणकषत्रियसाधारणोऽपिकारः । पवन्न वैश्यैः = 
1 प्रयम्नानिशधौ पूजनीयो । भनिददरस्वु श्दकरित्यथमेषां सवंसाघारणेऽधिक्ारः । तथाव--- ५ 
| = श्ैरेक एवानिरुढः पूजनीय इति परितो (1 
| परंन हि चेहीना व्ोततमानां इतिमादृदीरननति न क्रवाछेवः ल्यः, न ठु वेश्येवीखेव- = | 
। |  सद््णौ, न च शष वाखदेवसङ्गपंणप्रद्म्ना इति । तदैवाहयो्रदलोके--चत्वार इत्यादीति! = | 
|  ३७-३८। एकवक्रे विशेषमाह-श्ुद्ध इति । एकचक्रस्य -छु्कादयः पञ्च सं्नाः ` | 

देव्ता । र ॥ 1 | 


४ बन्‌ ५ देवतामुतिपक्षरणम्‌ 
क [ बणेक्रमेण तेषां नामानि | 


| | [ थथाक्रममेतेवां दरम्‌ |] 

मो्तं मृत्य विवादश्च वारिद्रचमटनं तथा ॥ ३८ ॥ 

१ 0 हिचे चक्निबन्धनो विशेषः | 
चक्रे तु मध्यदेशे स्यात्‌(छखा ! ता)माख्यामि रमे शरण 

` परमेष्टचजितक्रोधस्तथा नारायणोऽन्तकः ॥ ३६ । 

 अनन्तश्वदिति ? ति वि-)क्ञेयो नानामूर्िस्तु यो भवेत्‌! 


[ यथाक्रममेतेषां फलम्‌ 1 


राज्यं सद्युः धनथेव हानिच वाञ्छिताथंकप्‌ ॥ ४० ॥ 


ता ०५७७०५५ 


स्युरित्यन्वयः । व्र सहाः स्युधेःति स्यात्‌ । यथाक्रमम्‌ इत्यस्य परतरान्वयः । श्विवणं इति ` 


वतङिचिहुवणंदयवानित्य्ंः, वहुवणमाग्‌ इत्यत्र च द्वययिक-यत्‌किन्निदवणंवानिति । यथाकम- 


` मिल्यल्वर्थत्तु-श्द्वः पुण्डरीकः, रक्तः प्ररुप्बहः, कृष्णो रामः, द्विव वेङण्डः, बहवणभागे = । 


 विष्वरकूसेन इति। एतेषामर्चनाफर्माह--एशर्च्चास्येति । यथाक्रममित्येव । तथाच 


| पुण्डरीकाक्षाचने फर मोक्षः। एवं प्रम्बघ्ाय्चने ष्सयादयः । "अटनमि'तयनत्र अजनि 
(पुराणे. पाडः । | 


३९-४०। द्विवकरे विशेषमाह-चक्रे ल्विति। हिचक्राणां चक्रे यदि मध्यदेशे स्यातं ` 
तदा तेषां परमेष्यादिसंहा भवतिः करच्च राज्यादिकमिति वर्तंखाधैः ! नानामूिरित्यनन्त | 


। इत्यस्य विशेषणम्‌ । राज्यमित्यादिद्टितीयान्तपदानां ददातीत्यध्याहतक्रिययाऽन्वयो द्रष्टव्यः । .( 
भ्रेदं विवेक्तः धरम्‌--प्राणतोषणीश्टतपद्यएुराणे 'वणचक्रादिभेदेन तानि नामानिचे शचणुः इत्युपक्रम्य, ८ 4 


॥ छ (1 | | द्धो रक्तस्तथा पीत' इत्यादिसक्षत्िंशररोकादारभ्य राज्यं ए युम्‌ इत्या दिचत्वारिश- ५८ | 
५ लोकान्तो भाग कचित्‌ क्षिञ्चिददशल्य योगविप्रयोगास्यामविकलो वत्तते । परं तत्न वण तश्चक्रतश्च ६. 


। भिन्नतया द्विविधानामप्यमूषां शार्प्रामशिकानां राज्यं द्यं विवादन्चेशत्यायेकमेव कलं निणीत- ` 


| वमाह कात्वाऽचग्रनरःः इत्यंमधिकं वतते । तदनयो्णंमिन्नवक्रभिन्नयोः शाख््रामशचिखा- ` 


(1 व्गयोयुतफरताऽयुतसरूता वेति स्मा्त॑धुरीणा एव समादुधत्वितिं | 


` पथमोऽ्यायः न नै 
 [च्नन्तराणि] 1 
तक(पद्यान्तिका ! चक्रान्विता) या तु दक्षिणा १ 
` ?णावततं ) संस्थिता। ` 
च भोगमोक्ञप्रवा शुभा ॥ ४१॥ 
चक्रेण कम्बुना या च (पद्यनादि य शङ्िता? ` 
पद्येन गदयाऽङ्किता ) 
तल श्रीः प्यहं तिषठ त्‌ (सत्त १ सर्व)सम्पदमादिरत्‌ 
 लाज्छनेन विना (यस्य १ या स्यात्‌ ) प्रशस्ता तु न 


सा स्छरता ॥ २॥ 


[ हरिः ] | 
चक्रं वा केवलं यल पद्यं वा(व्य्थं यद्‌ १ प्यथवा) गदा। 
खाङ्कलं बनमाखा च हरिलच्म्या (स हि ? सह) स्थितः॥४३ ` 
[ एततपूाफटम्‌ ] 1 
तस्मिन्‌ णहे न दारिद्रय न शोको रोग भयपर्‌। = 

न चोराधिभयं तस्य ग्रहे रोगेन बाध्यते। 
अन्ते मोतो भवेत्तस्य पूजनादेव नित्यशः ॥ ४४ ॥ ` 
` विकटस्य तु किक्ता च्रसिंहसुखला्छना । 1 
 पाशाङ्कशगदाचक्रा्ये ! ण्ये)षामङ् न लाञ्छिता॥ ४५॥ ` 
नारसिंही भवेन्सुद्रा भोगमोत्तप्रदायिका। ६. क 
` दशैनान्नभ्यते पापं ब्रह्महत्यां उ्यपोहति ॥ ४६ ॥ 1 


तान 


४१-४२। चा शिला एकचक्रान्वित 1, दक्षिणावत्तसंस्थिता चतुखंन्छनसंयु्ता चसा | 


। भोगमो्षप्रेसयन्बयः चुरौन्छनेत्यस्य विवरणं कऋरेणेत्यादि । = ` 


ेवतामत्तिकरणम्‌ 
[ कपिलनृसिंहः | 


उ्यमुरि सुक्तदो नत्र सशयः ॥५२॥ 


7 ४७ । अयं कपिलिवणं इति पद्यपुरणम्‌ । तथाब-- ` 


कपिशो नर्धिहस्तु प्रथचको मह्मघरुखः। 
१ ब्रह्मधर्थग पूल्योऽषौ त्रिबिन्दुः पञ्चवरिन्डुकः ॥ दृति 
 ४९-९०॥ अयमङ्ुलाकार दत्यध्चिप्चादिषु ! = जयदुत्वन्चुभाषक्तो ननः? इत्यत्र ` 


। | श्वक्रभ्वजघमाघुक्तो नरः" इति स्यात्‌। एवच्च "नः पापात्‌ प्रघुष्पतेः इत्येततद्ूनठो नर इत्यथैः । ` 
९२ अत्र क्रमभङ्गः सम्मव्यते । इयग्रीवात्‌ परयेवातह्यं स्थानं निदेषटं युज्यते! द्यते ` | 


पञ्चमोऽध्यायः ` ० : क 


५.५ स्याचक्ं परमशोभनम्‌ 


नानाब्द्धिकस्थेतदन्नाथं चा्षयं भवेत्‌ ॥ ५६ ॥ 
ष [जाम्याः] 
चक्रमध्ये तु हभ्येत परशुः रामरूपकम्‌ 


। [ कोशल्यानन्दनः ] 
` चक्रेण दृश्यते ब्रह्मन्‌ बाणकामेकभृत्‌ प्सुः । 
कोशस्यानन्दनो रामः (सीत 


क्तत तोतो ततता णमा र५११११५१५१५१ ० ८ प 


[ वामनः 1 


१ 


 भञ्येतेव । अभिम॑तश्च ऋमो भ्रन्थकर्तृरिति ष्यते, कथमन्यथा पूरव भृसिषदवयं निरप्यापि ` 0 
युनवराहानन्तरं नृसिं निरूपयेत्‌ । (1 श 0 
९५ ॥ एकराजकमिति राज्यमित्यस्यं विरोषणम्‌ , पुकच्छतं राज्यं सात्राज्यमिस्ययैः । == 
 ६९॥ नारिंहद्कितभिति नरसिंहाङृतिचिद्धेन चिहितमिंत्यथः । 0 ४ 
८.6 ९७॥ न्तल्नामद््यं चक्रं स्याद यजमानोऽपराङूसुखः' इति स्यात्‌ । तावं चक्ररचंयन्‌ = ` 
| जनः क्वचिदपि विषगरऽ्ृतङ्ृस्यो न भवतीति तदर्थः । 1 1 
९८ । कौदालयानन्दनरामरक्षणमाह--कक्रेणेति । एतदश्चण' शिराचक्रबोधिनी- ` ८ (८ 
"पवार | १ ५८ ^ 


तायाः तृतीयः) परिकीतितः॥५८ ` 


4 वैवतमकरणम्‌ 
^ [ इडः | 
तेन युक्तास्त्‌ दभ्यन्ते पाषाणधृतरूपिणः। 


र | [ कल्की | 
 (खडगा ! खडग्या)सनसमारूढः इगधातृखरूपवान ्‌ 


उभौ वक्रौ तु तत्नस्थौ स भवेत्‌ पुरुषोत्तमः ॥ ६० 


~ ~= क ~ "न~ 
ता न 0 म 


चक्रोध्वं इश्यते थत्य तूण शाङ्खं धनुः शरः (१) । ` 
कौश्यल्यानन्दनो रामघ्तृतीयः परिकी त्तिः ॥ इति ` 


वतीय इति पूं शमो रामश्च रामशरेःल्युपक्रमादयं रक्षणक्रमेण वृतीय इत्यथः । अयं द्विचक 
 अनेनांगतोऽपीदं रक्षण" न संवदतीति प्रयक्चमेव सवषाम्‌ । यच्च-- 


ह्ारह्ये चतुश्चको वामपश्रेकचक्रवान्‌ । 
बाणतूणीरचापाद्यः सीतारामः खगन्वित्तः ॥ 


इति शिलाचक्राथबोधिनीषतव्रहमाण्डपुराणे पञ्चचक्रवम सीतारामण्श्चणः ततोऽपीदं दूरवत्तीस्य- = ` 
(य  प्यतिरोषहितम्‌ । यच्चापि तन्न तत्र षुराणे राम रामचन्द्रादिरक्षणघुपर्भ्यते तस्मादपीदं भिवत ` 
इति नवीनमिदं क्षणं कस्यापि । चयन्तु कोशल्यानन्दनपदमुपजीन्य सीतायाः इत्यत्र धृतीयः = 
| | 0 इति विपरिवस्यं नामकल्पनं कतम्‌ । इदमन्न ातव्यम्‌-रिकाचक्राथबोधिन्थाम्‌-- 


 प्पीतः परञ्चुकोदण्डलाङ्खेन उरुक्षितः । 
रामो रामश्च रामश्च स्यो एरत्युहरः कमाद्‌ ॥* 


1 ध | 4 इत्यभिधाय थेवं रक्षणानि निरूपितानि । अत एवं कोशल्यानन्दनरामरक्षण निरपणप्रस्ताये 


तृतीयः इत्युक्तम्‌ । अत्र तु बरूरामलक्षणं नेव रुशष्यते ; तदयं मुदाकरप्रमादो वा स्याह 


 ्रत्थकारप्रमादो वेति उधीभिनिणयम्‌ । ` 


 ५९। इद्धरक्षणमाह -तेनेति । शिलाचक्रार्थनोधिनीषते वाराहे-- ` 

५ ` इयरन्प्रद्मयोपेतामन्तश्चक्रद्यान्विताभ्‌ । = | 
शिरःपुच्छोध्वंचच्च पाहवंयो्वाऽपि इश्यते । 
नानावणमयीञ्चापि इद्धमूतति प्रचश्चते ॥ ध 


ध ८ 1 4 इतिं हविवक्रहुदरक्षणम्‌, पदमपुराणे च~; ` 


अनुगह्रलंयुक्तं चक्रही नं यथा भवेत्‌ । 
निवीतबुद्रसंहः स्याहदाति परमं पदम्‌ ॥ 


| ५ प ध ` इत्यचक्रञुदधरक्षणञ्च नतस्य तुल्ये इति द्व्य्‌ । "पाषाणधतरूपिणः' इत्यल्यार्थं प्रकृतपा्ं वा व क 
ध १ न विद्यः । | | 


९०। अत्र स मवेत्‌ बुर्भोत्तमः' इति स तेऽपि, पूर्वं इरषोचमस्य लक्षणं छिखितमिति ` । ष 


पञ्चमोऽध्यायः =$. 


[ चकव्रतिशनिषेधः ] 


ध थ, ) ब्रह्मादयो देवाः स्वेभूतानि के 


१ कम नास्त्यतः) ॥ ६१। 
[ श्िटाचक्रविंक्रयादिनिषेधः ] 


शालि १ ट)्रामशिलाया यश्चकसुदधाटयेन्नर 
विक्रेता चानुमन्ता च यः परी्यानुमोदयेत्‌ । 
सवं ते नरकं यान्ति यावदामूतसंछवम्‌ ॥ ६२ ॥ 
 [िखप्रकषंसा ] | 


शा८लि! र)ग्रामशिलामे तु यो (जहति! जहोति) हताशनप्‌। ` 


एकाहतिहेता सम्यक्‌ कल्पकोरिगुणोत्तया । 
एतस्मिन्‌ पूजिते देवे व्रोखोकयं पूजितं भवेत्‌ ॥ ६३ ॥ 


इति शालग्रामरिरपसैत्ता^ ` 

| [ मृत्तिविशेषाः ] | 
तादयो मरकतप्रख्यः कोशिकाकारनासिकः। 
चतुभजस्तु कत्तव्यो धृत्तनेवसुखस्तथा ॥ ६४ ॥ 


7 1 ० ~ 0 १.१.१५१ 


रक्षित इहापि द्विचक्र एव रुध्यते इति नंकस्येदं रक्षणं भवितुमहंतीति । 
खड्गी इति खड्गाकारर्लावानित्यथंः । शिखाच्राथंबोधिन्याम्‌-- 
अतिरक्त सृकष्मविषं स्पष्टचक्रं स्थिरासनम्‌ । 
( कपाला १ पाणा ) कृतिर्चे ढै इरस्योपरि प्ष्ठकै । ` 


| म्ङेच्छनाश्ची भवेत्‌ कल्की कलिकल्मषनारनः ॥ इति द्विवक्रकस्किरक्षणम्‌ । , ` . 
। प्रकृतग्रस्थे आक्षनघमारूड इति स्थिरासन इत्यस्प्रानुवादः । 'खड्गधघातृस्वरूपवान्‌" इतिं (६ [| 
ठ मू्य॑मिप्रपरेणेति विभावयामः, कल्फिनः खडगधघारित्वस्य पुराणादौ प्रसिदत्वात्‌। = 
६२ । चक््दधाटथेदिति संवतचक्रं प्रकाशीङ्यौदित्यथः । पुराणे तु भूल्यञुदावयेदिन्ति पटः । = 
 * इयं शलगामशिलापरौचा अप्रासङ्गिकीष प्रतिभाति। दपमण्डनेऽपीयमशतो वर्तते । शिष्परत्रः 
काश्यपशिल्य-समगाङ्गणसूवधारादौ तु नामतोऽपि नौप्रलभ्यते। न युक्तं भिदिनासुपकाराथ ग्रयनिमौषु" | 


्रहत्तसाऽऽजानिकं चक्र विशेषण लचयितुमिति । 


०५१०१. १५ 


अयं दशावतारोपक्रम इति च कल्किरश्षगेतरेदमिति निश्रीयते। न च सत्यपि पृहषो्तम- 
रक्षणे चक्रमेदेनायमन्योऽपि पुरूषोत्तमो रश्यत इति वाच्यम्‌, पू्त्रापि ह्विवक्रपुषोत्तम एव॒ 


म = दैवतामूरिप्रकर्णम्‌ 


 नवतालः भ्र क्तञ्या गरुड 
 पाद्‌( न  करटि८?) य॑ 


 किथि्टम्बोदरः कार्यः 


मू ॥ ६८ ॥ 
4 इति पन्नगाशनः । 
 उष्टवाहो्रेमतेरायुधानि वदाम्यहम्‌ । 
नन्दकश्च गदा बाणः पद्यं दक्तिणवाहूषु । 
` शङ्खो धुस्तथा चक्रं खेटकं वामवाहुषु ॥ ६६ ॥ 
 लिविक्रमो विहश्च दशतारो प्रकीर्तितो । 
वामनः सपततालस्तु विप्रमूत्तिः कचिद्‌ भवेत्‌ ॥ ७० 


१ १११००५०५ म ५१०९१५७०. ५११११०५, 


। |  ६९॥ प्रभासंस्यानसौवगं इति प्रमासंस्थानाम्यां कान्तिदारीराम्यां सौवणेः छवणंमय 
इव प्रतिभासलमानः। "करूपिन विवजितः इत्यत्र कटपेनं विभूषितः इति रूपमण्डने 
(४७) पः । यद्यपि कपो मूषे वर्हः इति कोषान्मयूरपिच्छ एव कलापदह्दौ वतते. 


` तथाऽपि पक्षमात्रार्थं एवात्र प्रयुक्तः । मूषणार्थस्तु न प्रसज्वते। मविवनितःः ग्विभूवितःः 


इत्यनयोः कतरच्छष्यते दति नावधारयामः। 


६६॥ द्विघेह वाहनानि विविच्यन्ते, एकं स्थितयोः प्रविमायाः, अपरसुपविश्षवाः । द्वितीय 


मविपुनद्ट्धा भिचते, एकमेकष्मिन्नेव पादवं छम्विततचरणाथाः, द्वितीयन्चोभयोरेव पादर्वयो म्बित- 

 ,  चरणायाः । सङ्रने्‌ पुनश्मीण्येव वाहनानीति । तत्र स्थिताया अर्वाया वाहनस्य दृष्टिः पादं यावत्‌, 
 शएुकपार्वंलम्नित्तचर्णाया जानु यावत्‌, उभयत्तौ छस्वितवेरणायाः कटिं यावदिति विपरिकः 
तदेतदाह ग्रन्थकारः पादमिति। अचर पादपेन गुम्फपर्थन्तो मागो र्यते विभागसामथ्यात्‌ 


 ६७। कुभमपूणचेषयत्र 'पूणंङ्कप्मचचे त्युचितः पाशे सयसण्डने । 


|  ६८॥ बहुश्च मगवान्‌ दति यदुवंकीयो मगवाद्‌ श्रीङ्कष्ण द्यः । 


` भ्यादवो भगवान्‌ पृष्ठे छत्रकुम्मधरो हरिः, इति शूपमण्डने विस्रः पाडः । = 


। ~ ५०॥ अन्न मर्स्ययुरणम्‌-- , ` 


दकता सभरतो रामो अदिवरोचनिस्तथा 


वाराहो नरसिंहश्च सक्ततारुस्तु वामनः ॥ इति (२९९ अ० १२ श्रो) ` 


पश्चमौऽध्यायः क = 
कृष्णाजिनोपवीतः स्याच्छली (कृत ! धृतोकमण्डलुः। 
कुण्डली शिखया युक्तः कुञ्जाकारो मनोहरः ॥ ५१। 


इति वामनः । 


समस्तु हिज रम्यः शरवापधरः प्रभः । 
इति रमः।, 
(महा ? नूवराहं प्रवत्यामि शुकरस्येन शोभनप्‌। ` 
गदापद्यधरं धात्रीं दंाग्रेण ससुद्धुताम्‌ ॥ ७२ ॥ 
विन्रा(णा ? ण) कृषं रे वामे विस्मयोत्‌फुष्लोचनः 
नीरोत्षलधरां देवीसुपरिषटात्‌ प्रक्पयेत्‌ ॥ ७३ 
4. :  दल्िणं कटिरसंस्थथ बाहू तस्य प्रकर्पयेत्‌ ! 


 ७९। शेष इति । शविताञ्चछिरिल्यनेन नेदं स्वतन्त्रस्य होषल्य शक्षणमपि तु नृवराहङ्ग- = ` 
तया तद्र कतंव्यस्येस्यायाति । अन्यथा वृवराहरक्षणमभिधायान्तरा शेषः रुक्षयत 
पुनन्‌ वराष्टग्रकारान्तरकथनमनुपपन्नं स्यात्‌ । शिल्परल्ने क्ोषलक्षणमपहायेव दृवराहस्य रश्षणद्ितयं 
छिखितं इश्यते ( श्षिल्प० ० २५ अ० ११२-११६ शछो० ) । 
 मतल्यपुराणे पुनः किञ्चिद्‌ विलश्चणमेव रृवराहरश्चषणमिति तदत्र प्रदश्य॑ते-- 
महावराहं वक्ष्यामि पद्महस्तं गदाधरम्‌ ॥ 
तीर्णदंषप्रघोणाल्वं मेदिनीवामद्धपरम्‌ । 
दषटाप्रंगोद्धतां दान्तं घरणीयुतपलान्विताम्‌ ४ 
विस्रयोतूपफुष्छनयनासुपरिव्‌ प्रकल्पयेत्‌ । | 
` इष्षिणं कटि(इस्त १ संस्थ)च्च करं तस्याः प्रकल्पयेत्‌ ॥ 
` क्मोपरि तथा पादमेकं नणेन्द्रमू्धनि। | 
संस्तूयमानं रोकेशेः समन्तात्‌ परिकल्पयेत्‌ ॥ इति । 1 
५, ( मतस्य० २६० अ० २८-३१ रछो* )। 


^ क |  देवतामरि्रकरणम्‌ 


[ प्रकारान्तरम्‌ 1 
` अथवा शूकराकारं महाकायं कविष्टिखेत्‌ 
 तीच््णद्ोग्रधोणास्यं स्तव्धकणाध्वयोमकप्‌ ॥ ७६ ॥ 
। इति नरवराहः । व 
 नरसिंहाङृतिं व्ये रोदसिंहसुखेक्लणाप्‌ । त 
 भ्रुजा्टकतमायुक्तां ध्वजपीनसटाधिताप्‌ ॥७७॥ 
हिरण्यकशिपु देत्यं दारयन्ती नखाङ्करेः 
 उरोरुपरि विन्य(स्त {स्य)खडगखेटकधा(रणा ! रिणेम्‌ 
| (तथा. 0 तस्य (न्त्रमाडख निष्छरष्यं बाहूयुग्मेन पिश्र र य| 
आकारं पुरु(षाकस्ये ! षस्येव)धारयन्तीं मनोहरम ॥ 
 मध्यस्थिताभ्यां बाह्यां दक्िणे चक्रपङ्कजे 
कौमोदकीं तथा शङ्खं बाहुभ्यामिति(नामतः वामः 
अधःस्थिताभ्यां बाहुभ्यां दारयन्तीं श्रकल्पं 


येत्‌ । 
 उध्वंस्थिताभ्यां बाहुभ्यामन्तमालां तु विश्रतीम्‌ ॥ ८१ 
नीरोत॒पलदलच्छायां चचम्पकसप्रभाम्‌ 


त्तकाजनसङ्काशां बालाकंसह(शां शी) लिखेत्‌ । 


नण तामा माजन 


५६। शस्कन्यकणो््वरोमकम्‌, त्यत कन्धकरणोधवरोमकम्‌, इति शिलपरते (रद अम 
११६ छो° ) पाडः । 0 
 ५७। रोद्सिहयुतेक्षणामिति मीषणसिंहयुखनेतरतुसययुलनेव्ाम्‌ । भौद्रपिङ्गयुचे्षणाम्‌ इति =` 


|  शिस्परत्नपाद्रीकाषतं पाञन्तरम्‌ । ध्वजपीनसटाभ्रिताम्‌ इति ध्वजल्थरकेररधारिणीमू । = ` 
श्तम्मपीनः इति शि्परत्ने, ^स्तन्धपीन' इति ततपादटीका्ां पाडः । 


७९। आकारमिति, खुखदेधस्तात्‌ पुटषाङ्तिवदाृतिमिस्यथः। रिल्यरत्ने इदमर्थ 


॥ | | ८ नास्ति । ( शिष्प० ॐ० २५ अ० ११७-१२० शछो° 0 


` ८१।. भत्र दरणान्त्रमाराधारणयोरयुवादो बाहुविरेषनियमार्थः । शिल्परत्ने अयमपि 


९२। अन्न वीरो गोल परेतयादिविशेषणत्रयं पक्षान्तरथोतकम्‌ । “अथवा चस्पकप्रमामू = ` 


, 


कमेष्यायः = 1 


[ प्रकारान्तरम्‌ 1 

आसीनं द्िभुजं देवं प्रसन्नवदनेक्षण । 
स्फटिकसङ्काशं चतुर्बाहुमथापि वा ॥८३। 
द्ाजानुरम्वित बाहू कन्तंउयो तत्र दक्लिणे 

समीपे कल्पयेखकरं वामे शेषं समीपतः ॥ ८४ ॥ 

ऊध्वेस्थिताभ्यां बाहुभ्यां दक्षिणे पङ्कजं न्यसेत्‌ । 

वामे बाहो गदा रम्या(लिनात्‌ भ ? छिखेचिल) 

विशार८दः ? दः) ॥ ८५ 

` इति नरसिंहः । 


जटखमध्यगतः कायः शेषः पन्नगदशेनः 
फ़णाम्बुजमहारल `` शिरो(धतः ? धरः) ॥ ८६ 


इति लिह्परत्ने ( उत्त₹० २९ अ० १२० शो० ) पाष्ठः । पुराणे तु वणंकान्त्यादिविषये किमपि 
नोक्तम्‌ । विशेषतस्तु तत्राऽऽ्नुषङ्धिकं मूच्येन्तरमपि कल्पितं इयते । तथा च मावक्स्ये-- 
नारसिहन्तु कतंन्यं भुजाष्टकसमन्वितम्‌ ॥ ` | 
रोद सिहा(खनं १ ननं ) तहवदिदासियुखेक्षणम्‌ । 
 ल्पन्यपीनसशाकणं दारथन्तं दितेः छतस्‌ ॥ 
 विनि्गतान्त्रनाल्च्च दानवं परिकल्पयेत्‌ । 
 ( मसन्तं १ मषन्तं ) रुधिरं घोरं ध्रङ्टीवदनेश्षणम्‌ ॥ 
युध्यमानश्च कतेभ्यः कचित्‌ करणबन्धनेः । 
परिधान्तेन दैत्येन तज्यंमानो सहसः ॥ 
दैत्यं प्रदेशंयेत्तत्न खडगखेटकधारिणम्‌ । ५ 
स्तूयमानं तथा विष्णु ' दक्षयेदमशधिपेः ॥ इति ` 


,  (स्ष्मन्दह्-रष्ो)। = 
 ८३-८९। विशेष्यानुद्ध लात्‌ कल्य लक्षिकेयं शोकत्रयीति म प्रतिपथामषे । नेयं नरसिं्ट- | 


छश्णत्येनोपलभ्यते शिल्परत्ने । खिवेचिन्रविक्षारद्‌ इत्यत्र वाक्याथंः कम । 


` ८६। भवं पूवं( ७९ शो० )खक्षिताच्छेवाद्विक्िष्यते । अत पुव पन्नगद्श्चन इत्युक्मर्‌ । ` | | | | | 
॥ (णास्बजमहारत्ने- = ` 


गतत्वेनाच्ययं ` धिश्षिष्यते शिष्यते 
( ३य^खभ्ड० ) तथा वा |` , ध 


पन्नगदशेन इति सपांृतिरिस्य्ैः । जलमध्यगततव 
त्यनन्तः शुनिरीकष*ति पतितं स्यात्‌ › विष्णुधमोत्तर 


न 


1 यकम 


` सन्तानमः तथा चेवापरो भवेत्‌ ॥ ८९ 
` नाभीसर(सःसि)सम्भूते कमले तस्य याद(वः १ व) 


(नीर? नाल )रस्नो च कत्तव्य पद्मस्य युक भ। ॥६०॥ 


वे कुण्ट् प्रवच्यामि (धृष्!साष्टोबाहु म 


` ताच्यीसनथतुवक्त्‌ कर्तव्यं शान्तिमिच्छता ॥ ६१॥ 
गदाखडगो बाणच(को ? के) दक्िणाञ्जचतुषटयम्‌ । $ 
 शह्खलेटधनुःपदयं (वामदं्ाएवामे दधथाच्‌)चतुष्टयम्‌ ॥ ६२ 


अग्रतः पुरुषाकारं नार 


1 पितोता ७ 


4 ९० । विंष्णधमोत्तरे ( खे० ३, अ० ८१ ) पद्मनाभीयत्वेनेदं रुक्चणञ्ुपरम्यते, च्यादवः 


 श्रपरं ख्रीमुखाकारं बाराहास्यं तथोत्तरप्‌ ॥ ६३ । 
४ इति वैकुण्डः। 


ति ता ००११००५, 


1 इति सत्र बोद्धन्यल्य भगवतः सम्ब्रोधनमिहाविकशशुद्धितमिति कान्यम्‌ । 


९१। शान्तिमिच्छता कर्तन्यमश्टबाहु' वेङण्टं प्रवकष्यामीत्यन्वयो व्याहूरणसंस्कारायातः । 

गवङुण्ठच्च प्रव्यामि सोऽ्टबाहुमंहाबर ध 
५ ॥  सा्यासनश्चतर्व्ूः कतन्यः श्रान्तिमिच्छता ॥* = 

| ५ इति शूपमण्डने ( ३ अ० ९२ कको० ) । 


९३। अग्रत इति । पतच वेकुण्ठल्यं चलुणामाननानां विवरणम्‌ । तत्र अग्रत इति ` 


अग्रव सुखं परषाकारं परषसुलतुरयम्‌, दकिणं युख' नारिं नरसिंहयुखतुल्यं सिंशस्यवदिति 
भावत्‌. नरलिंहल्क्षणे 'रोद्रसिंदसुसेक्षणाम्‌? ( ७७ श्छो० ) इत्युक्तेः । अपरमिति पश्चान्युल- ` ५ 


। भित्रथः। वाराहास्यमिति ऋकू राननम्‌ । 


य 


पञ्चमोऽध्यायः ६ ३&- ` 


तस्य चानुकरमं वये (विश्व ! जल (क 


यु ? कयु )तपु 
पताक ?)शङ्खो च हलं वजमङ्कशसायको । 
चक्रं तुङ्गश्च षरदो दक्लिणेषु करेषु च ॥ ६५॥ 


पताकं ? का) दण्डपा(शच ? शो च) गदाशाङ्गविधरतकरम्‌ । | | | | 
पद्म( {शू खो १ जी) च कुसुदमन्तमाला तयेव च ॥ ६६॥ ` 


योगसुद्रा करयं ? इन्दे) वेनतेयोपरि स्थितप्र्‌। 
नर्च नारसिहञ्च (ततीय!खीसुखं) शूकराननम्‌ ॥ ६७ ॥ 
| व इति विश्वरूपः । _ 
प्ननन्तानन्तरूपथ यस्माद विभ्वं 7 श्व)समुद्ध(वम्‌ ? वः) । 


अनन्तशक्ति(मा ! सै)की्णमनन्तं ? न्त)) रूपसंयुतप्‌ ॥६८ ` 


संयुतं ढादशयुजेश्चतुवक्तमहोतसवम्‌ । 


सुपर्णकैतोतराखं!स्कन्धमारूद) कर्तव्यं सर्वकामदम्‌ ॥६६॥ ` 


लाता मा ५५ 


९४ । यदपि श्वि्षत्था हस्तकेयुतम्‌ः इत्येव समीचीनः पाठः,  तथाऽ्ष्यक्षरसाम्यमयुकद्य = ` 
“विशद्धिरिति कृतम्‌ । भूरिप्रयोगश्रायं विंशष्च्छब्दसित्रशदादिक्षन्देवत्‌ पुराणादिषु, वंचनविपयंयोऽपि 
 नगण्य एवेवंविधनिबन्धेष्‌ । 'विं्चत्या हस्तकयु क्तो विर्वरूपश्चतुसु खः” इति रूपमण्डने पाटः । | 
|  ९७॥ नरञ्नेति। यथाश्रतपि तु विश्वरूपस््िविध इत्यायाति । अत्न च विश्वल्पल्य = ` 
 भ्ुखसङल्यादसंनात्‌ सम्मवदपि तत्य त्रैरूप्यं तन्त्रान्तरविरोधीति कृत्वा परिहितम्‌ , पाठान्तरञ्व क | 


कल्पितम्‌ । भत एव सूपमण्डने-- . ` 


विंशत्या हस्तकयुं्तो विश्वरूपश्तुसंखः। 
पताका हरशद्कौ च वन्नाङ्ङुशन्तरास्तथा ॥ 
चक्रञ्च बीजपूरञ्च वरो दक्षिणबाटुषु 
पताका दण्डपादो च गदाज्ञाज्लंतपलानि च ॥ 
` श्ङ्धी मषलमक्ष्न क्रमात्‌ स्थुबामबाहूषु । 


= ल 


गव! 


 गदाखड(गं ! गो) तथा चक्र कं वजार (क ॥ शौ 
शङ्कखेटौ धनुः पदां दण्डपाशावनन्तकः ॥ १०० 
नरं तथा नारसिंहं (ततीयचीमुखं) शूकराननप्‌ । 


 तेजःपुज्जोदभवं कायमनन्तं नाम नामतः ॥ १०१ 
इत्यनन्तः | 


लैलोक्यमोहनं वच््ये संसारमोहकारकम्‌ । 
` षोडशे युजास्तस्य ताक््यारूढं महावटम्‌ ॥ १०२ ॥ 
गदाचकराङ्कशान्येव बाणशक्तिसदर्शनम्‌। ` 
वरदं करसुद्धृत्य शचा वे दच्ति(णस्त!णे त)था ॥ १०३ । 
मुद्गरः पाशशाङ्ख तु शङ्क८) पद्मकमण्ड(लु ? लू) । 
श्वी च वामहस्ते स्याद्‌ योगमुद्रा करद(यप्‌ ? ये) ॥१०४॥ 
नरथ नारसिंहाख्यं शूकरं कपिङाननप्‌ । 


हिशक्तयषटशक्तियुतं कुर्यात बररोक्यमोहनम्‌ ॥ १०५॥ 
इति भैलोक्यमौहनः । 


नि पि 101 


हृत्तद्ये योगमुद्रा बेनतेयोपरि स्थित | 
क्रमान्नरमृखिंहखरीवराहमुषखवन्पुखः ॥ ( ३ अ० ९५-९८ शको० ) 


| | 1 ५ इत्यस्य विश्वरूपस्य चतुमखत्वं वदुण्टवत्‌ प्रकारमेदभ्च प्रतिपादयति । भूरे तुङ्गरित्यन्न 
 छङ्कमिति स्यात्‌, नामेकदेशे नाम इति मातुद्गमित्यर्थः । ` 


१०१॥ अत्रापि विभ्वसूपवदु व्यवस्था । यद्वा उभयत्रापि वृतीयमिन्ति शख्ीयुखमित्त्य- 


| | स्यादुकषणाथम्‌ , एवज्न शीलम्‌, इति बन्धनीमध्ये पाशन्तरकल्यनं लाभम्‌ । रूपमण्डने ` 
खस्य विवरणं नास्ति । शूपमण्डनेऽनन्तरक्षणम्‌-( ३ अ० ५८.९९ को० ) = ` | 


अनन्तोऽनन्तरूपल्तु इस्तेदौदक्चभियुतः । | 
अनन्तशक्तिसंबीतो गश्डल्थश्चतुमखः ॥ == ` 
दक्षिणे तु गदाखड्गो चक्र' वलाङ्धशे श्वरः । 
| श्भुः खेट धनुः पद्म दण्डपाद्लौ च वामतः ॥ इति 
१०२-१०९ । अन्न ्रेरोक्यमोहन्य षोडशाः 


~ योगमुद्ेति वनराः । शरद्धी योगेन.पवंतसभिधन्त ५ वते । 


डानां थुंजानां चतुश्च यथोक्तास्यस्त्राणि कषये (1 | 


पञ्चमोऽध्यायः ५ ९४: 


ई ने स्थापयेद्‌ विष्ण॒माग्नेय्या्च जनार्दनम्‌ 
छ स्ये पद्मनाभ वायव्यां माधवं तथा ॥ १०७ 

केशवं मध्यतः स्थाप्यमथवा वासुदे( वं करम्‌ ! वकम | 
सङ्क्षणप्रथम्नो चानिरुद्धथ यथाक्रमम्‌ ॥ १०८ ॥ ` 
जलशायी तथा षोक्तो दशाषतारसयुतः 


शूकरश्चा्रतः स्थाप्यः सवेदेवमयः शुभः ॥ १०६ । 
इति विष्णायतनम्‌ । 


प्रतीहारांस्ततो वच्ये श्रो चतुषं दिज्ञु च । 
 तस्यानुकमरूपश्च छन्तयेद्‌ यस्य याटशप्र्‌ ॥ ११० ॥ 
` बाभनाकाररू(प ? पा)श्च कत्तेव्याः सर्वतः शुभाः 
 तज॑नीशङ्कवकरं चेदं प्राग्‌ दक्षिणक्रमात्‌ ॥ १११ ॥ 
(द ? चोण्डाभिधानकः प्रो(्ता शल्ला ? क्तोऽस्या)पसव्ये 
४ प्रचण्डकः। ` 
वामे चण्डः प्रकर्तव्यः प्रचण्डो दक्षिणे तथा ॥ १९१२ ॥ 


मा था ताजा ००५८०. 


 १०६। गोविन्दः पश्चिमे स्थाप्यः इति रूपमण्डने ( ३ अ० ६३ शो ) पाटः । 
१०८ । केशवो मध्यतः स्थाप्यो वाखेवोऽथवा बुधैः । ` 8 
` संड्षंणो वा प्रचुशोऽनिरुढो वा यथाविधि ॥* इति रूपमण्डने पाठः । 


 ११९०। यत्य प्रतीहारस्य यादशमनुक्रमरूपं भवेत्‌ , तस्य॒ तादरामनुकरमसूपं रक्षयेत्‌, 1 
व्यमाणरक्षणत इत्यथः । अनुक्रमः हस्तेषु वामदृक्षिणादिक्रिमेण उदधौचःकमेण बाज्ञाणां ४ ४ १ 
 स्निवेशपरिपाटी । रूपम्‌ आहृतिः । | | + 
(५ १११। (तजनी शङ्खचक्र च दण्डं प्राग्‌ दक्षिणक्रमात्‌' इति स्थात्‌ । एवमेव रूपमण्डने ` न 
“रदः (३ अ० ६८ शो० >) । ५ | 1 
| | ११२॥ 'भषस्ये प्रनण्डक इतयुकयैव सन्ये चण्डक दति भ्यते ; एवच्च वामे चण्ड = 
1 ` इत्याचुवाद्कमद् इखाथम्‌ । बद्वा, सन्यशन्दस्य वामदक्षिणोभयवाचित्वेन अपसन्यज्ब्दूस्यापि = ` | 


य न त = स न --- स ल ~ 


1 | 0 4. देवतामूत्तिष्रकरणम्‌ 


य 0 णा) 
११९ 
[| 


सत्तः प्रमाणगणनां गरुडध्वजस्य ` 
 ब्रह्मादयोऽमरगणा न हि ते समथां 
विश्वस्य पारनविधो बहुधाप्रकारं 
 स्पाणि यस्य विचरन्ति स पात विष्णुः ॥ ११६ ॥ 
इति विष्णप्रतीह्याराः। 


इति ्तेवारमजघू्भृन्मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे देवतामृ्तिप्रकरणे 
विष्णशाल्ग्रामशिलपरीन्नादिभेद्ाधिक्षासे नाम 
पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥ ` 


मममत नतानि जा ००५५००८००५ 


` तथात्वाचण्डो वा दक्षिणे प्रचण्डो वेति भ्रमः शिष्याणां मा भूदित्यसन्दिग्धार्थमुत्तराडमिति 


 क्ञादव्यम्‌ । 


१९३। विछोमेः पश्चगदथयोरिति ; जयत्य वामोध्वरादिहस्तेष्‌ कमात्‌ पञ्च खड्गः सेरकं 


1 गदा चेत्यादुधानीपति पूरवाधस्याथंः । ततश्चषामायुधानां पञ्चगदयोवरोम्येन विजयत्याऽऽ्युधं भवेत्‌ ` 
| इत्युत्तराधस्याथः वेलोम्यज्च पूरं गदायाः पश्चाच पञ्चस्य सन्निरशादिति ज्ञेयम्‌ । एवच्च “विरोमे 
` पञ्चगद्योविजयो जयदक्षिणेः इत्येषो चितः पाठः । | 


 ९४-१९५॥ अनयोरपि गदाया एव सन्यापसव्ययोगेन उपवस्थेति द्षवयम्‌ । ` 


षष्ठोऽध्यायः 
शुद्धाम्बरधरं देवं शुङ्कमात्यायुलेषनम्‌। ` 
 जटाभारसमायुक्त' बालेन्दुङ्कतशेखरम्‌ ॥ १। 
विलोचनं सोम्यमुखं कुण्डलास्यमलङ्कतम्‌ । 
दिव्यदेहं महाकायं नवयोवनमण्डितप्‌ । 
महाज महोत्साहं वरदाभयपाणिनप्‌॥ २॥ 
इति सयीज्ञातः | 


तास जोरि ११५१८१११ ००००५८५.०५.-० 


१-२। पञ्चमाध्याये वेष्णवे अरोषविरेषा विष्णुसूतीरभिधाय श्िलिपक्रियाऽविषयमपि 
शिलाचक्रं प्रसङ्गतो लक्षयित्वा षषटेऽध्यायेऽबक्षरप्रापं शेवं रक्षयन्‌ भाद सथ्योजातमाह-- ८ 
छक्वाम्बरधरमिति । इतः प्रति ्ितीयान्तानां पदानां 'यौदि'ति वा "कारयेदिति वाश्या- =` | 

 इतक्षिययाऽन्वयः काथः । सबागरेता मूर्तयः शिल्परले ध्येयत्थेन निरूपिताः । तन्मतमनु्द्भस्त॒ = ध 
श्यापेदि'त्यध्याहतन्निययाऽस्वयः समाधेयः । प्रथमाघोरव्यतिरिक्ताड सदारिवान्तास्वाइ मूर्सिषु ध ध | | 


अघ्या इदं रक्षमभित्यत्र पुष्पिकेव केवष्ट प्रमाणम्‌ । ४ 
धिल्परकले-खधोजातवामदेवाघोरततपुद्बाणां समाक्षतः श्रोकद्रयेन वणनसुपरभ्यते । तथाव 
तन्न अथ सद्योजातादिमूर्तयः' इत्युपक्रम्य-- 
सयो वेदाक्षमाराभयवरदकरः इन्दमन्दारगोरो 
वामः काश्मीरवर्णाऽभयवरद्परश्वक्षमारो विखासी । 
` अक्षलग्वेद्पालाङ्शडमस्कलयाङ्गदरूान्‌ कपालं 
 शिश्राणो मीमर्द्रोऽञ्जनरविरतनुरभीतिदश्राप्यघोरः ॥ 
` विदयदुवर्णोऽथ वेदामयवरवङकुधरान्‌ दधत्‌ पूरषाल्यः ` 
प्रोक्ताः सव त्रिनेत्रा वि्टतमुखवतष्काश्चतुबीहवश्च। 
 सुक्तागोरोऽमयेशथिककरकमलोऽधोरतः पञ्चवक्त्‌- ` 
स्स्वीशो ध्येयोऽग्बुजन्मोद्धवमुररिषुर्दरेश्वराः स्युः शिषान्ाः ॥ 


। स । 1 ( क्षि° उ० २३ अ० २०२-२०६३ छो° | 
इत्युपनिवद्म्‌ । पएतेनेतन्मते भधोरोऽटयुनः रिष्टाश्चुबाहव इत्यायाति । प्रकृते विप्रचद- = ` 
आयुधानुमितमितरेषां द्विकरत्वन्तु ` ८ 


मनेष्वप्यायुधनामष्ठ संवंदत्येवाघोरस्याष्टयुजत्वम्‌ षः ¦ | । 
स्ाकरमवकरो वेति विद्रइभिविभावनीयम्‌ । 


देवता--१२३ 


॥ 


 योनिशं ¢) कटिसूत्र इथिकामालिका गले 
` नीरोतपलदलम्याममतसीपुष्यसन्चिमम्‌ 

पिङ्गर पिङ्घनरिलं शशाङ्ककृतरोखरम्‌॥ ८ 

तक्तकं पुटिकथेवं पादौ च नूपुर कृतो) 
अधरस्य स्वरूपषन्तु कालरूपमिवापरम्‌ ॥ & । 


महावीयं महोत्साहम छवाहु महाबलम्‌ 
वासयन्त रिपुबलं निवेशो यत्र भूतले १० ॥ 


ताता 


६॥. 'दष्टकरादटबदनम्‌ इत्येवं छते छन्दोह्ानि युनहक्तिश्च परिहृते भवतः । र्डमारैति, १ 


7 र रुण्डं कबन्धः, 'कषत्धो रुण्डमुच्यतेः दति हारावरी । 


७। योनिश्चमिति इरहा्थस्यास्य पदस्य पायान्तरमनुलन्पेयम्‌ । वृश्चिकेति दीर्घत्वं 0 ५ 


| छन्दःसौन्दयाथम्‌। ` 


८ । अतस्ीति घुमापुष्पं नीलवणम्‌ । ध ८ | 1 
९ । तक्षकमिति । अन्न "तक्षकः पुष्िकश्चैव पादयोर्न पुरौ ङतो" इति इश्िष्ार्थकः सम्माव्य- ` 


मानः पाटः। पुटक इति सपविरोषल्य नाम, तक्षकः प्रसिद्धः । 


| जयन्तम! ` 


१०। निवेशो यत्र भूतले इति । यत भूमागे देवस्य निवेशः स्थितिल्तत्र रिषं ` 


 अहदभाखकपाटं च कण्टभ्रीवासुशोभित 
। चतुभज महाबाहु शूलपङ्कजधरतकरम्‌ । 
|  दिव्यरूपधरं देवं वरदाभयपाणिकः 


।  पस्तकाभयहस्तश्च वरदाक्तं दिलोचः 


पीताम्बरधरं देवं पीतयज्ञोपवीतिनप्‌ । ¢ । 
६ करे वामे अत्ञसूलच वा कि ॥१३॥ ` 


मातुल ((२॥) खः 

_ इति तत्पुरः । 
शद्धस्फटि कसङ्गार जटाचन्द्रवि भू। षितप्र्‌। 
श्यत दन्ते लिशूकश्च वामहस्ते कपालिनप्‌ ॥ १९ 


इतीशः। 


कंपालमायिनं श्वेतं शशाङ्ककृतरोखरम्‌ 

उयाघचमेधरं भद्रं नागेन्द्रास्तनभूषितप्‌ ॥ १५ ॥ 
त्रिशूलं चान्ञसूलश् कारयेदक्निणे करे! ` 
कपालं कुण्डिका पाश योगमुद्रा करये ॥ १६ 


र्कवक्त विने च शशाङ्कृतशेखरम्‌ 


॥ १७ 


कृप्‌ ॥ १८ ॥ 


लेपाणिपादक्‌ । 


मर्‌ ॥ १६ ॥ 
` इति किरणान्ञः। 


तुभेजं महाबाहू 


१६। कण्डिका कमण्डलुः। योगसुदा सुद्राविशेषः। तत्स्वरूपं श्रीतत्वचिन्तामणो = 
गोडराग्रारे द्टन्यम्‌ । (८ 


१९। वरदाक्षमिति वराक्षसूत्नकरमित्यथः। 


इति शत्युभ्जयः। ` 


इति वव 


सा 


 खड्गचापशिरःखेटं शशाङ्ककृतशेखर ॥ २२ 


~ अन्तत तथा वामे महादेवसुमाचितम्‌ । 
सदढमेकादशं प्रोक्तं महदेभ्वयेकारकम्‌ ॥ २४ ॥ 


 पद्मासनशिवच्छायां योगाक्तनकरद्यप 

`  प्वक्तू(भ? मवं शक्तिशूरुखटूाङ्गधृत्करम्‌ 
 सजङ्गमन्तसूलं च उमर मतु ! लु)गकम्‌। ` क 
 ईइष्छाज्ञानं(कलाविलय ! क्रिया चेति) विनत ज्ञानतार्णवप्‌॥२६॥ ` 


८ ध । | अद्धंनारीभ्वर व उमादेहाधधारिणप्‌ ~ 
व्यालका वामकणं तु द्लिणे कुण्डलं स्थितम्‌ | 


इति श्रीकण्डमूतति 
णो च संपृणं चामृतं च रसं पिवत्‌ ॥ २३ । 


इति महादेवः । 


॥२५॥ 


इति सदाशिव 


` . सङटाम्रे च माणिक्यं जटाभारं स्वदक्षिणे ॥ २८ ॥ 


त 
णि ~ धि 
५ ५ मा १५१ 


२८। व्यालकेति यथा्रतपषठे शाब्दक्मादार्थक्रमस्य बरवत्वादु दक्षिणे कणं व्यर्का = ` 


। वैणोयः वि > ५ १०६ 
धे तस्य(्रयो श) (0) किया रूप) सव रण पित्र । ` 
रुषं दल्निणे भागे कपारकटिमेखला ॥ २९६ ॥ 


इत्यदनायेष्व(रोश्ः) | ` 


उमामहेश्वरं व्य उमया सह शङ्करम्‌। = ` 
मातुल!) विशूटश्च विभ्र(ते?तं) द्तिणे करे ॥ २१। 
अध(स्तब्दषमं ! स्ताहषभ) कुर्यात्‌ कुमार गणेभ्वरम्‌ । 
भृङ्किरीटं तथा कुर्याननियमान्नत्यसं(स्थिता!स्थितप्‌ ) ॥३२॥ 
। इत्युमामहेभ्वो। 
छकष्णशङ्कर(ततोएमतो) वक्त्ये कृष्णा(थनस्तु? द्वन तु) संयुतम्‌। = 
। ष्णां मुकुटं कु्याज्जटाभार्च दक्षिणे ॥ ३३ ॥ १ 
कुण्डलं द्लिणे भागे वामे मकरकुण्डठम्‌ । 
 अच्षमाला त्रिशूल चक्रं वं शह्मेव च ॥ ३४ ॥ 
^ ४. (इत्य!इति) इष्णशङ्करः । १ 
पद्मशक्तिखेटशष्कं मृतति८)) स्यात्‌ कष्ण(तात्तिकःकात्तिकी)। 
| (इत्यए्ति) छृष्णकातिक्ेयः। ` | 
= पद्मशहुध्वजाचिह' ताच्यर्ू (ढो?) गरुध्व(जः7जप्‌)॥३५॥ = | 


णामा सिनतोिणणायानभााज्िाााणाााामि्माि 


क क क म 


क द - 


 ष्वा्किं दक्षिणे कणं वामे ण्डरमादिशेत्‌ः ध ् 
४ (सतस्य र६०अन्दष्ो०) 
` ईति मतस्यषुराणीयपदयादधंमपि अलुपराहकयक्े पदं निदधाति । एतेन- कणं व तालपत्रकमिन्ति == । 
 पू््॑छोकीयपादं सम्पातायातमिति सम्भाव्यते । श्यारकाः इत्यत्र “बारिकि'ति कल््यमान- = | 
ष पाठे बालिका कणंभूषणम्‌ , ततश्च वामके ताख्पत्र बारिक्रा चेति कणंभूषणद्यम्‌ । णव = ` 
 शब्दक्रमेणेवा्थां भवति । क 0 . 1 १ 
३२ । शद्धिरीट इति शिवानुच॑रल्य नाम । < 


| ७ दैवताूकपणम 


५ शिवना रायणं वच्य अपनो १ ह 


 बाहूदय् ृष्ण(चस्य) माणकेयूरभूषितम्‌ 
 चक्रस्थाने गदतवाऽ पिपा गणो व दद्यादधस्तने 
` शेषं वा दद्तिणे दात्‌ कव्य्धं भूषणोऽवलम्‌ 


{ठ्‌ ध = < भिार(मध दु्क्रुत्‌ तह \- च्तृण < ॥ ९ 
 भुजङ्कहाखलयं वरदं दक्तिणं करम्‌ 
द्वितीयं चापि कुर्वीत त्रिशूवस्थारिणप्‌ ॥ ४० ॥ 


व्यालोषवीतसंयुक्तं कलय शृतां कृत्तिवाससम्‌ । 


मणिरलेश्च संयुक्त पादं नागविभूषतम्‌ ॥ ४१ 
` इति शिवनारायणः। 

(1 समारूढं तनु(त्येक सिनम्‌ ध, 
1 षट्(वक्तख !? भुज) चतुव॑क्त्‌ सवेरल्षणसयतप्‌ ॥४२॥ 


3 अन्तसूत्रं विशूख् गदाश्ैव तु दक्तिणे ¦ 


+ 1 


कमण्डलु खटा चकर वामभुजे तथा ॥ ४३ । 1 
इति ह(रष्रिष्टस(पीश्पिःतामहः। 


माण 


०५७११५११ 


३८। शेषं घा दक्षिणे द्यादिश्त्यत्र श्राह चैवोत्तरे दयादिति मवस्यषुराणे 


| ` (२६० अ०, २४ श्लो) पाटः। 1 


1. । ४२1 द्वाचत्वारिशि्ोकारिचत्वारिश्टोकं यावदेकं हरिहरपितामहर््षणम्‌, पुनश्वतु- ` | 
| श्रत्वारिचटोकात्‌ षट्चत्वारिद्टोकं यावदन्थह इरि्टरपितामहरक्षणमिति ; किमभिखन्धान- 4 
` भूयं दक्षणद्ववीति नावधारथामः। न चेका पुष्पिकेव खदुष्पायतामिति वाच्य्‌ ; उभयो- ` 


` षष्ठोऽभ्यायः १० 


शङ्खचक्रधरो हरिम चेव तु संस्थितः 
एव त विधेय धं सवेकामपरपदप्र्‌ ॥ ४६ 
इति (सृयशेहरिहरपितायह 


सर्वामि मरणसु सवेकामफटप्र्दप्‌ ॥ ४८ ॥ ५ 
इति चन्ाङ्पितामहः। 
लेखिहन्तं द॑ं्ाकरालं चण्डभेरवसुत्तमप्‌। = 
एकवक्त्‌' शूलहस्तं खडगशक्तिशराङ्कशम्‌ ॥ ४६ ॥ ` 
वरदं दक्तिणेज्ञेयं खटाह्गंखेटकं तथा। 
चां तथाऽभयं चेव कपाटं बामहस्तके ॥ ५० ॥ 


कमनतम ताता निति तत तेम 
जिमि पातिता तोति ततिति ज तान १ 


 कुक्षणयोर्भिन्नतयेकस्य वस्तुनः प्रतिपादकत्वालुपयत्तेः। तस्माद दवितीयहरिहरपितामहरश्चणे 
 गदिवाकरपददश्चनात्‌ सुथंहरिदरपितामहस्येदं लक्षणमिति निश्चिनुमः । (तयुत्रयनिवासिनमि'^ति 


सम्भाव्यमाने पे एतेषां एयङ्मूततंयः कर्तव्या इत्यथः। =` | 
. । ४४ । वचतुवक्तमिति दवितीयान्तपदानामन्वयी हुघटः । चतुष्केकनिवासिनशधिति एकल्मिन्‌ | : ति | 
`  चलुष्कोणे स्थाने चतुष्कोणवत्यासने वा समासीनम्‌ । ऋदाुलगत इति, द्रस्य दक्षिणे, ` | 
 हेरेवामे, पितामहस्य पश्चिमे सन्चिवेशद््रौनादयं पूदिकस्थ ईइत्यायाति, कवित्तद्योतकमिदं ^ 


पदं स्यादनर्थक्ं वेति छखधीभि्भान्यम्‌ । | 1 
 ४६। द्वितीयाद्‌ "दवंविधोऽयं कत्यः सर्वकासफर्प्रदः” इति स्यात्‌ । 
४७-४८ । चन्द्राहपितामशोऽ्नुघन्धेयस्वर्पः । ` | 


या 


~ नर 


| रे प्रा्ञश्चग्डम ्‌॥ ५९१ 
त | ` इति चण्डमखः। 
र विस्पाकतसत ; खड्गं शूलं उमर्मङ्कश्म्‌। 
= सर्षं चक्रं गदामन्तसूत्रं विभ्रत्‌ कराष्टके ॥ ५२ । 


खेटं खटाद्कशक्ति(श्ष!ख) परशुतजेनीषटम्‌ 
 घण्टाकपाल(क्तो१को) चेति (वामार्पावामोरध्वा)दिकरा्टके ॥५३ 


इति विरूपान्ञः । 


 स्यम्बकोऽपि दधचक्रं डमरं (सदर १ मुद्गरं) शरम्‌! 
शूखाङ्कशाहिजाप्यथ दन्तोध्वादिकरा्टके ॥ ५९ ॥ 


दादरा तमनो १ नी) च्‌ 


` परशुं पटं चेव वामोद्धादिक्रमेण वे ॥ ५५॥ 


इति अधम्बकः । 


कायो हरिहर(स्याश्वा)पि द्तिणाद्धं सदाशिवः 
 वामाद्धं च हृषीकेशः भ्वेतनीखाक्(तिःती) कमात्‌ ॥ ५६ ॥ 
वरे त्रिशू(लल) चक्राव्जधारिणो बाहवः कमात्‌ । 
दक्षिणे बृष(भेभः) पाश्वे वामे विहगराडिति ॥ ५७॥ ` 


` इति हरि-हरमूत्तिः। 


| छ(्णाष्णोशङ्करसयोगाद्‌ दवालिंशदमेद-(मर्जयः ! मूर्तयः) 
(1 नोदिता मन्थवाहस्यान्‌ ज्ञेयादियाणेवा)) बुधः ॥ ५८ ॥ 


नि 


९४-९९ । अहिजाप्यमिति अहिः सपः जाप्यं जपलाधनमक्षसूत्रमिति यावत्‌ । गदा- ` 
खदाङतिं । पानं दृक्पालम्‌ । एतेनायं षोडरभुन इति सिद्धम्‌ । पूर्खोक्तो. विष्पक्षोऽपि = ` 


¢. | ॥ त \ तत॑ः पुनः ६० 


सत 


९९ । भथ टलिद्खान्याह--अष्टरोद्ानीति । पएतेऽ्टौ धातव एवाष्टरोहनान्नाऽभिधीयन्ते ` 
छोहशब्दस्य धातुप्यायेऽन्तःपातात्‌ । तन्न॒ वद्धं रङ्गापरनामा धाठुविशेषः, नागं सीसकम्‌। = ` 
रिङ्घफखान्युक्तानि रूपमण्डने ( अ० ४, श्लो० ३७-४१ )। 


ल्थिररक्ष्मीप्रदं हेमं राजतश्चेव राज्यदम्‌ । 
प्रजावदधिकरं तान्न" बाङ्मायुविवधंनम्‌ ॥ 


॥  वि्षकारकःं कल्यं पित्तलं सुक्तिसुक्तिदम्‌ । ` 
| सीसकच्च शङृषिङकम्‌ आयसं रिपुनादानम्‌ ॥ = 
अष्टरोष्टमयं छि ऊु्टसेगक्षयापहम्‌ । 


भ्रिखोहसम्भवं लिङ्मन्त्थानप्रविदधिदम्‌॥ 
आयुष्यं हीरकं रद्धं भोगदं मोक्तिकोटुभवम्‌ । 
छखह्त्‌ पुष्यरागो वेदूयं श्रमदंनम्‌ ॥ 
श्रीप्रदं पद्यरागज्च इन्द्रनीरं यद्षःप्रदम्‌ । 
रिङ्खं मणिमयं वुष्ट्ये स्फाटिकं सवंकागदम्‌ ॥ इति । 


` मेदस्थाऽऽवक्यकत्वेनास्योपरश्चणपरत्वं व्याल्येयम्‌ । 


८ शिल्पे भङ्टीनां इृधेस्तारतम्यतो ोहटिङ्गस्य द्रेविध्यञुक्तम्‌। तथाच- 
देवता-१४ 


षष्ठोऽध्यायः | १०४ 


शिल्परत्नेऽपि प्रायेणेवमेव फलानि । ( शिल्प उत्तरभाग० अ० १, इर ३८४१ )। = 
६०। एकाङ्लादिति। धापुमयारि लिङ्गानि एकाङ्खादारम्य यावदषटङ्खख्युन्नतानि ` 
ल्युः 1 एवज्चा्टौ शिङ्गानि भवेयुः, ततः पुनरदेकस्याङुरल्या्टौ शिङ्गानि' भवेदुः, स्वणं- = ` 
 रौप्यादिगदेनेत्यर्थः, इति व्युतक्रमेग व्याख्येयम्‌ । तथा च एकाङ्गखादष्टाङ्गखान्तानि स्वणं- ` 7 
 शिङ्गान्यष्टौ, एवं राजतानि एवं तान्नाणीत्यादि। यद्वा एकैकस्य अङ्गुस्या्ौ लिङ्गानीति ` 
` वक््यमाणमनोहरादिसंामेदैनेत्यधेः, तथाच एकाङ्खादषटङ्खान्तानि मनोहरलिङ्गान्यौ एवं 
| श्रीमुखलिद्ानीत्यादि । भत्र च पक्षे अविरोषादु वश्यमागेषु ोरुदारवादिषिद्धेष्वप्येवं ५ 


यहा, तृतीयपादे एकेकल्याङल्यस्यद्धर्याः इति ङत्छद्धिः पाडः । ऋद्धिरिति 0 
` नार्थान्तरम्‌ ¦ -तथाच. ` एकाड्खादारभ्य एककल्यादख्स्य बद्धा रिान्यषटो भवन्ति । । | व 


~ दः  देवतामूसिप्करणम्‌ 
५५८ [ धातुरिङ्धनामानि ] 


- (४ ब ( ६सुवख्राख्य (अश्रीपु ज न न्दतः 
[ धावुिङ्ं विकेषः ! 


छ [ रललिद्गम्‌। 
` कर्तव्यं धातुखिङ्गस्य भ्रमाणेन हि रलजप्‌ ॥६२ 
 : इति धातुरल्ललिङ्घानि । 


^ काभ ००८५ 


अष्टाङ्ुरं समारभ्य ( हिद १ चाद्य )ङुविवधेनात्‌ । 
लोष्टानि नव लिङ्लानि शिहस्तान्तानि कारयेत्‌ ॥ 
तथास्शाङ्ल्मारभ्य दवद्ङरविवधनात्‌ । { 
त्िहस्ताम्तानि शिङ्गानि प्रयसा भवन्ति हि ॥ 

 ( उत्तसमाग० २ अ० ९४-९९ शै ) 


५ ध रिङ्गानीत्युक्तम्‌ | मानन्तूुभयन्रवाशङ्खत आरन्धम्‌ । रूपमण्डनेऽपिं अषशङ्गखरन्धमानकानि ४ | 


४  अष्टाङ्रशृदधिमन्ति नेव रोहरिङ्गानि । तथाच-- ` 


 धाहोरष्टाङ््ं पूवंमष्टष्टा्रवधेनात्‌ । 


तरिहस्तान्तं नवेव स्युङिङ्धनि च यथाक्रमम्‌ ॥ इति। 
(अ० ४, श्छ ९१) । 


` एवत्र स्वह्ृतादु रूपमण्डनात परछृताच्छिल्परत्नाचान्यादशत्यास्य धातवरिङ्धानां रक्षत्य 
|  मूलमन्यत्र श्लान्नारण्येऽनु्न्धेयम्‌ । ` 


६१॥ अष्टानां  घातवलिङ्गानां नसान्याह-पनोहरमिति । एतानि नामानि नान्यत्नोप- 


ओ लभ्यन्ते! एवसुत्तत्रापि दादनादिलिङ्गानाम्‌ । सिल्परत्ने अ दशलिङ्गनामान्बुकतानि 


`  कथा्यदरतनमिश्नणवयादृ््थमेतदित्युसन्धेयम 1. यद्धो्तरपादे पीक्किरक्षणवदकषीमूतपत्वमात्र+ = ` 


 ( क्षिल्प० ० अ० २, श्छो० १-९ ) । 


६२। सोहमिति । लोहं चातवं शिङ्गं मिश्रं धाल्वन्तरसंयुतं न कर्तव्यम्‌ । यद्यपि ६ 


 भातुष्वपि केषनान्योन्यसंकरजन्मानो वन्त, अत एव तालुदिय निन्दाऽपि श्रयते-- ` 

सुख्यलोष्टानि चत्वारि हेमादीनि श्ुमानिष्ि। _ 

पिक्ाचरोहान्यन्यानिं कस्यादीनीति केचन ॥ इति । 
1 ( शिल्प०.उ० अ० ९ ४१-४२ श्टो० ) 


` षठौऽ्ष्यायः १०७ ` 


[ कारषरिङगमानस्‌ ] ध 


॥ 7न्या)रसह(खा एस्ताोन्तमष्टाविं शोच | 


पदव्यावत्तनीयसनेनाऽऽ्यपादेन दर्शितम्‌ , तथाच पीषिकिाः रोहमिश्ा न कर्तव्येति वर्तरोऽथैः 


यद्रा रोहमिश्रं लोहान्तरमिश्रं लिङ्गमिति शेषः, न कर्ज्यम्‌ । वञ्च वथाश्रत एव पारः ` 


प्रथमपादे । 


स्वमप्रेति। शङ्खं स्वमात्रयोनिसंयुतं कर्॑न्यम्‌ इत्यन्वयः । स्वमान येन धातुना इतं ` 
लिङ्खं तन्मात्रं तेन छता योनिः पीठिका तया संयुतं शिद्धं यादित्यर्थः, न त्वेकेन धातुना घटिते ` 


खिद्धं धात्वन्तरेण पीषिका कर्तव्येति भावः । तदेतत्‌ सर्वं विकिष्याऽऽह किल्परते- 
स्वथोनिः पीठिकेव स्थाच्छेलादीनामदुषणा । 
अभावै त्वे्टकी चेरे रलजानां हिरण्मयी ॥ 
राजती ताश्नरजा घा स्याच्‌ श्रष्ठमध्याधमक्रमात्‌ । ` 
| न्यनेवा पररोहानामिष्टकाभिश्च दारवे ॥ इति । - 
५ | ( उ० अ० १, ९७-९८ श्छयो° ) ` 
` हपसण्डनेऽपि- 9 

रत्ङिङ्क द्विधा ख्यातं स्वपदं धातुपीडकम्‌ । 

धातुजन्ठु स्वयोनिल्यं सिद्धिभक्तिप्रदायकम्‌ ॥ 

तान्रजं पुष्परागत्य स्फाटिकस्य तु राजतम्‌ । 

तान्रजं मोक्तिकल्यापिं शेषाणां हेमजं मतम्‌ ॥ इहि 

( ख्प० अ० ४, ४२-४३ शछो० ) _ 

एषमुत्तरपादे सम्मविनमथं प्रडवानोऽपि यथाश्रतः पाटः प्रमाणान्तराचुप्रहाभावादुपेक्षितः 


अतिरोहितार्थश् यथाश्रतः पाटः ! उक्तमर्थ रललिङ्धेऽप्यतिदिशति-क्न्यमिति । सत्प्यन्यत्र 


 रतररिङ्विषये विगेषो नेह प्रपलित इति दरषव्यम्‌ । 


६३। षोडशेति । एवमेव रिल्परलञ( उ० भ० २, श्लो ९६ )स्पमण्डनयोः (भ० ४, ` 
 श्ो० १२ )। व्रयधंस्यास्य प्यस्य प्रथमाय यथोक्तशोधनं विना मध्यमां शिङ्गसंल्या 
 इवपादा । तथादि येव्म्ाविशोत्तरं शतम्‌ इति संख्या श्रयते सा किं लिङ्गानासुवाङ्गरी- ` 
नामिति विचाय॑मागे न रिङ्गानाभित्यापातत आयाति । कथमिति चेह रसहत्तमवधीङत्य ` ध 
 षोडला्गरादारम्य षोडश-पोढशवधनेन नवेव लिङ्गानि भवेन यथोक्तानि । नाप्यङ्लीनाम्‌, = `, 
चथोक्तसंल्याकाभिरङकीभी रसहस्तानिष्यत्ेः । तस्मादत्र कवित्‌ कथि श्रमः क्टपनीय ` 


१. | 0... व, देवतामुत्तिषरङ्रणम्‌ 


(भकण्डास्यं (्रोरवं (*काम्यं (रपुष्पकच (फलोद्धवम्‌॥ 


| [ दार्वलिद्धनामानि-] 
(शोमकरेन्दु च (रमालक्यं (पुष्यं सिद्धायै 


तत. । 


५ [ लिष्गोचितवृक्षः ] 
भीपणीं शिशुकाशोकः शिरी(घ ? षः) खदिरोऽजेन 


` चन्दन नः) श्रीफल निम्बो रक्तचन्दनधीर्यकौ ॥६५ 
 कयरो देवदारश्च स्यन्वनः पारिजातकः 


` म्रन्थिकोटरसंयु(्ता एताञ्‌) शाखोदभू(ता एतान्‌ ) र" 
त परित्यजेत्‌ ॥ ६७ ॥ 


` चम्पको मधुद्तश्च (हिताश्चागरुडःहिन्तालश्चागुरुः) शुभः॥६६॥ 
[ ब्ष्ाणां रक्षणोद्धारः ] 
 नित्र(णा ¢: सु ) हटा षृ्ञा लिङ्काथं सोख्यदाय(कः १ काः) । 


| लिद्धोवितानि गृहाणि ] 


 शेखजं धातुलिद्गानां स्वरूपं वाऽधिकं शुभम्‌ ॥६८॥ ` 
| इति दारज्ा(ती ? नि) । 
[ शेङलिद्नमानम्‌ |] 


षकस्तादिमं रिङ्ं हस्तददधया नवान्तिकम्‌ 


शंखणिङ्गस्य मानन्तु हस्त(हितं दीनं) न कारयेत्‌ ॥६६ 


~+ 


 यावलिङ्गानि यथोक्तसंस्याकान्ेव स्युरिति सर्वमनवधम्‌ 1  (भरसेत्यादावाङ्‌ मयादायाम्‌ = 


^  पएकाङ्रोनरसदस्तान्तमित्य्थः, एवमेवा्टार्विश्ोत्तरशतसंल्या स्यात्‌ । मध्य दस्त 


|  प्राल्ताकक्यिव! 


६४ । नवानां लिङ्गानां नामास्याह-मकरेन्दु 


९९। खिद्ानाह--श्रीपणीत्यादि "हिन्तालश्राणुरः शभः” (६६) इत्यन्तेन । स्यन्दन === ` 


इत्यत्र चन्दनः इति प्रामादिकः पाठो रूपमण्डने ( अ० ४, छो० ९६ 9 । 


| | | ६९॥। शेकरिङ्गमानमाह--एेति । पकस्ततो नवहस्तान्तं देरचिष् इषत्‌! = ` 


त | | वठौऽध्यायंः 1 १०६: 
हस्तादिपादव्रद्धया च (भयलिं १ अयच्ि)शत्‌ कमेण वें । 
रिङ्गानि (न च १ नक) हस्तान्तं-- ` 


७0५०य०५००८५१००११ १०५०-५ 
त्‌ म ५४७५ तो ता न 


नाता तमत ४८० 


७० । पूर्वोक्तानां नवानां रिङ्कानां नि्माणक्रपेम त्रयक्चि्त्वमाह--हस्तादीति । 
'इत्तहीनं न कारयेदिश्युक्तत्वदिकडरतमारम्य एकहल्तं स्पादहत्तं खाद्धहल्तं पादोनद्विहस्त- = 
मित्यादिक्रमेण पादशो बद्धितानि लिङ्गानि नवहरतं यावत्‌ त्रयक्धिंशतसंख्यकानि भवन्तीत्यथः। = 
खपमण्डने- 
हस्तादि नबहृस्तान्तं शं शिद्धं विधीयते । 
हस्त्या नवेव स्युमधये ब्दधियंडच्छ्या ॥ ( अ= 9, श्छो० ५३) 
इति हत्तादिनवहस्तान्तं लिङ्गमानं नियम्य या चेह पाद्दधिस्क्ता तन्नोदासीन्येन याषच्छिकडद्धि 
स्तन्न प्रतिपादितेति तेयम्‌ । श्िटपरले पुनः-- 
(सक्च † एक)हस्तोचमारम्य पाद्रुदधगण तु पूववत्‌ । 1 
` श्रेष्ठानि नवलिङ्गानां त्रयस्त्रिरदुदाहतम्‌॥ ५ 
1.2 (उ० अ०र+ शछो०२४-२९) । 


इत्येन प्रहता पाद्ृद्धिः समर्थिता इश्यते । न 
रिङ्गमानं तावत्‌ नवधा भतेत्‌ ! तथाच-~ | 9 ५ 
लिङ्गं गभ॑गृह(१)्ा२(२) स्तम्भा(रे)धिष्ठान(४)किष्टछुमिः (६) । 
ताक(६)मानाङ्छे(७)श्वापि तथा माज्रङ्र (८ )रपि ५ ष 
यजमानोच्मानेन (९) षेवं नवदविधं स्श्रतम्‌ ॥ इति । ए 
क (शिर्ष ० भर र छो० १३)1 = | 
वित्‌ सप्तधेत्यपि । तथाच-- ` ^ 1 
गभगेहप्रमाण्च द्वारमानं तथेव च । स्तमभन्न कारुमानच्च हस्तताखङ्कुरं तथा ॥ | ॥ 
छिङ्मानं धवं सप्त" ^.“.* । ( काभ्यप० अ० ४९) छो० ६९-७०) | 
इति । ईह तु त्रिधा लिद्गमानयुक्तम्‌ । तत्र मानाङ्टेन पूवसुक्तं प्रास्ादगभमानाभ्यामिदानी- = | 
मुच्यते । प्रालादमानेन लिङ्मानक्धनस्यायमभिप्रायः--एवं हि सन्तरयुक्त्या शङ्िमानं | 
 छिद्धोचितप्रासादमानजोक्तं भवतीति । प्तं मत्ये-- = ` | | 
` प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते । 3 | 


छिङ्गमानेन वा विधात्‌ प्रासादं श्भक्चणम्‌ ॥ इति । 1 
( मतुस्य० अ० २६३, छो २)। 


सप्करणम्‌ ` 


[ शेरलिङ्गनासानि] | 

(शश्रीभवं (नु १त्‌)द्धवं द) भवप्‌ 

 (भभयहत्‌ (“पाशहरणं ($पापहस्तेज उच्यते 

ततः परं (महातेजा (परापरऽम(खे ? १॥७१॥ 
° शेखर (१४शिवं (प्रशान्तं (रोमनोहादकरं ततः । 


५ (१ स्द्रतेज (१५सद्‌त्मिज्ञं (१६)वांमदेव (भमघोर(श्भ्वरम्‌ ५७२ 
 (वततपुरुषं (णतयेशानं (रशमूतयुञ्जय^र्यविजयक्रमात्‌ । ` 
` (र्श्किरणान्त(्ण्महोयस्ं (र“श्रीकण्टं (रध) मुनिवधेनप्‌ ॥७३॥ 


(रभपुणडरीकं (रसुवक्ताख्यप््‌ ९९उमातेजं (२गविश्वेश्वरम्‌ । 


 षत्रिनेवं श्प्यम्बकं चैव (प्थमहाकार नामतः ॥७॥ ` 


[ प्राादमानेन छिड्मानम्‌ 1 


 इस्तमानं भवेग ेदहसत सुरारये। 0 
` ©व!ज्येलिङ्गन्तु वदेशं ? वेदांशे) षट्रिरो नवहस्तकम्‌ ॥७५॥ 


७६। प्राष्ाद्मानल्यावधिमाह--पञ्चादीति। पञ्चसंख्याया आदिः पृञ्ञादि | 
संख्येत्यथेः। तथा च चतुहह्ततो भूतव्ेदान्ते प्चचत्वारिशद्धस्तमिते प्रादे इस्तसंख्यया ` 


पथादिभूतवेदा(न्तं १ न्ते) प्रासादे हस्तसंख्यया ¦ 
मध्यमं पथमांशेन हस्तादिनवहस्तकम्‌ ॥७६॥ ` 
रित्यादि८)युगलं चान्ते हस्तसंस्था रिवाख्ये ! 
षडंशेन प्रकततव्यं हस्तादि (भव एनव)हस्तकम्‌ ॥७७॥ 


६५ प 1 = 9 
11 त भाता म 


लिङं स्थाप्यमित्यथंः। शहस्तमानं भेलिङ्गमः इव्युक्तत्वादेवमनाजंवेन व्याख्यातम्‌ । 


७७। 'रित्यादियुगरमित्ययं दुहः पाठ य॒च्च समानतन्त्रे सरूपमण्डने शृत्वा ` 


| कदुगलम्‌ः ( भ ४, छो० ६२ ) इति पाठः सोऽपि देय्रतोपयोग इतयुमषितः। 


|  अतिकोमरूमेकतोऽन्यतः सरसाम्मोकह 


स 1 द 


७९। इदानीं ग्भगेहमानेन सिङ्मानमाह- गभं इति । पञ्चभागीङतल्य ग्भगेहस्य श्येन 


` परिमितं टिङ्क जयेष्ठं मवेत्‌, एधं नघधा तस्य तस्य पञ्चांशेन मध्यमम्‌ , द्विधा कतस्य च॒ | 
` तल्याद्धन कनिष्टमित्यर्थः । मात्स्ये- ध ध ^ | 


गाधन तु यिङ्खं कायं तदिह शस्यते । ` 
 पञ्चभागविभक्तेष तिभागो ज्येष्ठ उच्यते । 
भाजिते नवधा गँ मध्यमं पाञ्चमागिकम्‌ ! 
8 इति ( अ० २६३; श्छो° ७-८ ) 
गरभ॑गृहत्वरूपमाह समराङ्धणसुत्रघरि-- 
शारा यत्‌ पुनमंध्यं वापी पुष्करिणी च सा। 
संछन्ना ८ चा १ सा )पि य्य त्यात्‌ तहु गर्भ॑गृहसुच्यते ॥ इति । 
` (अ० १८, श्योर २० ५। 
तन्मानन्तु- ` 
| प्रासादस्य तरिभागकं सक्तभागानरराकम्‌ । 
विषाद गभंगेहस्य विस्तारं प्राह कादयपः ॥ इति! = ` 


(शिप पूर्व॑, अ० २९०९) | 


यथोक्तमानल्य क्चिह विपर्ययोऽपि भवतीयाह--वक्तरिङ्ख षेति। पाथिवे 


| ` बक्तूलिद्धे इति सम्बन्धः । वतर लिङ्कविश्चेषः, मुखलिद्धभित्यस्य नामान्तरम्‌ । . ततह्वूपं 
शिल्परत्रे उत्तरभागे तृतीयाध्याये द्रष्टव्यम्‌ 1 श्म्भुबाणे इति दम्भो बाणे चेत्यर्थः 91 


२. ~:  देवतामूतपरकरणम्‌ 

1 [ रिङ्खविस्तारः | 
तृदाररोहश (लं बालाना) द॑ध्यं (= 
` भक्ते (दिनांशके{जिनांशकेः) 
१ र्यात्‌ षटसार्धसतांशनवांशे विस्त(ररं) क्रमात्‌ 
` (विषकीविष्कम्भं) नव(नागं}भार्ग) तु साद्धंमष्ट पितामहं 
 नारायणोऽभिज्ञ(योयः ) स्तसार्धं महेभ्वरः ॥८२॥ 


सा 


1 


८१-८२ 1 इदानीं द्धस्य वित्तारं ब्रह्मादिभागविभागच्च युरमकेनाऽऽह--शदाविति । 
 दादिशिङ्ानां देष्यं जिनशकश्वतुविंशत्येत्यथेः, भक्ते षट्साधौदिना विह्तरं कुर्यादित्यथैः । यद्रा 
 विष्कस्भनवभागं गभंगेहविष्कस्भस्य नवमांरामितं विस्तरं इयौदित्यथंः । अत्नोदिषटिनां 


शरृदादीनां चतुर्णा षटसार्घ॑त्यादिभिश्रतुभिरनुदेशाह यथासंख्येनान्वयो बोध्यः । विषमफरमपि ` 


त॒ल्यप्रकारं विभागवचनं शिल्परते- 
आथामे दरिते दिवाकययुजाऽभीशेऽ्टमिरविस्तृतिः 
४ ` न ५. 2 नः नै 
| न र, नरै. न भ म 
पञाशेरपि गभंगेहनवमिनापि सा स्सय॑ते ॥ 
| | | ( ० अ० २, श्षो- &७ ) । 
बरह्मादिमागमाह--साद्मष्टेति । अत्रापि जिरनादकभक्ते इत्येव । सप्तसाङमिति शाद्ध- 


`  सपषेत्यथेः। अत्रापि करविसंवाद्यपि संवादि प्रमाणं तन्नव- 


लिङ्क सवसं समोन्मितिविभ्छाश्त्रयं तत्‌ पुन 
 प्वायत्या सम-नाहकं यदि सरमां चाथ वृद्धयत्तरम्‌ । 
भक्ते भानुयुजोच्छरयेऽद्वि(७)चड (८)नन्दा(९)शेस्तु मूरादिष- 
पेतं दिगृदहिते त्रिरोकयुगख्यातेस्तथेशाधिक्म्‌ ॥ = 
ष | ( शिल्प० उ० अ० २ शछो० ६६ ) 


अल्यायमथेः--रिङ्गस्य उच्छ्राये भावुयुजा रविद्रमेन चतुर्विश्षतयत्य्थः, भक्ते क्रमेण अद्िव्ठ- ` 


नन्दो सप्ता्टनवभिरंशेम्‌ खादिषु मृलमध्योध्वंभागेष उपेतं पू्वाधविशेषणविशिष्टं लिङ्गम्‌ ५ 


शाधिकं शिवभाणाधिकं भव्रेदित्यथंः। पक्षान्तरमाह--दिगृदर्ति इति । दिशा दक्षभिर्दस्ति ` 


1 विभान्ति उच्य इत्येव, निरोकयुगसंल्यातेः यथाक्रम तरिमिच्धिभिश्ति् मृ मदिषु उपेतम्‌ ५ 4 


8 
4 


व [ सिद्धस्य अ्ह्मादिभागाः ] 

तुरो (वोऽधो) मध्येऽशखस्तु वर्य 
गः सुदत्त स्यात्‌ षीटोध्व शङ्करस्य च 
 [{ नागरलिङ्गानि | 
क | गभा(धध) कृन्थस श्र पथलिष्यै)शं {र धरः 
४. भवन्ति नव गरि 
निष्ानि व्िविभेदानि तानि हि। ` ` 

नागरे नागरस्यो मन्दिरे ॥८५॥ 


म्न तालान ततो काणि िकमि 


 अत्रेशभागोऽधिक इति दश्यते प्रहृते तु ब्रह्मभागः, तस्य॒ सार्घा्टमागभाजित्वात्‌ । 
तदतरेशपदं बह्यपरं वा स्यात्‌ मूलपदम्‌ उदर्‌ परं वेति तत्रभवन्तो निर्माणर्निषुमा जातिक्षिस्पिनो 


नि्िकञन्त्विति । परमीश्चपदस्य बरह्मपरस्वेऽपि तथ्य मूरमाक्‌त्वादाधिक्यभसमभ्भवमेव । 


८३ । ब्रह्मादिभागत्य देशं प्रकाराऽऽह--ब्रह्मंल इति । ब्रह्मारश्तुरखः समवतुष्कोणः, ` ( 
सच अधो विधेयः, वैष्णवः अष्टाक्लः, स तु मध्ये कतन्यः, शङ्करस्य पूजाभागः इद्त; पीठो ड ` 


स्यादिति योजना । पदेतदाह शिल्परते-- 
यथोचितातानवितानयुक्तां शिखां यथोक्तकमतोऽभिमन्य । 
मूं युगाश्रं विदधीत मध्यमष्टश्चकं प्रुत्तमयं परञ्च ॥ 


॥। 
#7 
॥ 


(७ 9 | दति ( ॐ० अभ० २, श्चो० ७७) । 
 ८४.८९॥ सम्प्रति रिङ्धल्य पू्ोत्तं श्रष्ठमध्यकनिष्टत्वादिमेदत्रयमनूचय नागरादिप्रासादमेदेन 
` शिद्धमानमाह--गभाधंमिति । गर्मार्धं शिवाख्यं शिवलिङ्गं कन्यसं कनिष्ठम्‌ › पञ्चन्यंशं गपन्लारस्य == ` 
यरं शिवसि ष्टम्‌ इति पूौक्ताद्ववादः । प्रस्तुतमाह--भवन्तीपि । तयोमध्ये ज्येष्ठ = | 
कमनिष्मोम॑ध्ये नवांशीङृतस्य ग्म॑ल्थ पञ्चाश इयर्थः, पूर्व तस्येव मध्यमत्वाभिधानात्‌ ; = ` 
अष्टभाजिते अषटभिर्विभक्ते नव लिङ्खानि भवन्ति ; तानि च ्रेष्ठमध्यकनिषटानीति चित्िमिदानि 
 भवन्तीत्यरथः। निगमयति--नागर दृति । नागरे मन्द्र नागरस्य शिङ्ल्य मानम्‌ इत्युक्छम्‌ ! ` 
 क्षिल्परते "नागरः इत्यत्र शरैश इति टिखितं विरक्षणेश्वंशादिभिरयमेव प्रफारोऽभिहितः। ` ` 
तथाच-- ` 


अभिह्ृत्यंशके (२६) गभ॑ षोडशा तदुत्तमम्‌ । 
त्रयोदर्शाशसधमं तयोमध्येऽटमाजिते ॥ 


देवता--१५ 


शद 


तयोम॑ध्येऽश्(भागिके?भाजिते) | ८४। 


नव छिङ्कानि सिध्यन्ति वेसर तानि कल्पयेत्‌ । ( उ० अ० २; श्छ ° ६४-६५ ) | 


। जयद्‌ यदि) विशालं तु पूवर्वद्‌ व्राविर मतय 


[व 


इति । काश्यपर्चिल्पे पुनद्ररमानेनेयं कल्पना, परं तत्न नागरादिंज्ञा नास्ति! तथाच 
कत्र हइारमानमभिधाय- 
| अधमोत्तमयोमेध्ये वछभागविभाजिते । 
५ ^ नवधा सकरोत्तङ्ं द्वार ( मानं १ मानाह्‌ >) विधीयते ॥ | 
 इत्युक्तम्‌। एतत्तु चित्रम्‌, सर्वत्रेव मध्यमषटिर्विभज्य नव लिङ्गानि विहितानि, परंकथं ` 
` तथाविधे भागे शिङ्गनवकोदपत्तिभंवेदिति कषिल्पिन एव कल्पयितु प्रभवः । भ 
८६1 नागरलिङ्स्य विस्तारक्रमेण नामान्याह--विकारशा इति। तदायासे छिङ्ायामे 
विकारे जयदं पौष्टिकं साधंकामक्च रिङ्कं यथाक्रमं भूततरेदाभ्चिविस्तरं पञ्चचतुस्त्यंशविशालं 
 विुः। पर्चाशविस्तृतं जयद्‌ , चतुरंखविस्वृतं पोषटिकम्‌ , व्यंशविस्वृतं साद्ंकामकम्‌ इति ` 
निष्कषेः। शिल्परते (ड० भा० अ० २, छो० ६३ >) पुनः (सावंकामिकमि"ति तृतीयं नाम 
दाविडे प्रासादे एषां स्थान्योक्तम्‌ । ` 
भत्र विकारपदेन षोडश परहृतिविकारा उच्यन्ते, काभ्यपरिल्पे-- 
भथोदये करे तु पर्चा स्वस्तिकं भवेत्‌ । ॥ 
4 वेदाश पोशिकं ख्यातं गुणां जयदं भवेत्‌ ॥ (अ० ४९, श्छो° ९१ ) 
इति यथोकछंशस्य कलाराब्देनोदेखात्‌ । अत्रापि नान्नं मेदः पौवापयेविपयंयश्र दरश्न्यौ । ` 
. ८७। दवाविइप्रासादे लिङ्गायामविस्तारो वक्तमशविभागमाह-गभं इति! द्वाविडे ` 
प्रादि त्रिःसक्षमागे एकविंशतिभागे छते कशांशोऽथमः त्रयोदराकं श्रेष्ठं मवति । मध्येऽ्टशे- 
नेति पूषवत्‌ नागरे इव तयोम॑ष्ये अष्टीशेन विभक्ते नवरिङ्गानि भवन्तीत्य्थः। = 
(1 सम्प्रति विस्तारमाह--त्रिःसक्ताय इति । निजायाम इति रिङ्दध्ये । षटपञ्च- व 
चतुरक चिश्चा विस्तारं कादिति शेषः। जयदादीति कमेण तेषामंशानां पूर्ववत्‌ जयदादि- ` 
~ ` कलाल्यादित्यथः। ` = ५. 


व्ठोऽध्याथः | ८ ११४ ` 


[ े्रङ्ानि ] 
॥ ग गभाकारे विमानके 


| लिक्गासादोवितनत्रानयनम्‌ ] 
उतसेधाष्टगुणे सतविंशभिहैरणे ततः, 
शेषमनश्चयुजारध्य्य) तु 


पिता ति नायमा त य ७५८८१५८ ०, कणम्‌ 


काश््यपवे-- 


रिङ्गोचे द्विनवांशे 8 रसभूतयुर्गाक्षके । ` 
गु्णांशे शान्तिकादिः स्याह द्राविडे च चतुविधम्‌ ॥ (अ० ४९, शछरो० ९३). 
हति द्विवेवाश् इति चतुविधमिति च प्रङताह्‌ भिधेते । | | 
८९। वेहारलिङ्खमाह--वेश्चर इति । प्रमादबहुरोऽयं पाडः । ` 
शिल्परले- 


पञ्चपर्वाके देयं वखसक्ठषडंशकं: । 


कादयपरिषस्पे- 
वेरः लिङ्तुडे तु विदहात्यंश्षविभाजिते । 
अष्ट वा संषटूपच्चभागेन्यौसं प्रकल्पितम्‌ ॥ ( अ= ४९; श्छो० ९४ ) 
इति चेकाथबोधकं पद्यम्‌ । 


९० । प्रसङ्घात्‌ प्रालादल्य लिद्धघ्य च नक्षत्रादीनि वक्तमादो नक्षत्रमाह--उत्तेषाशटयुणे 


इति। रुतानि च शिल्परलादौ आयादिरिति नान्ना व्यपद्ियन्ते। छभानाम्‌ एतेषामति- ` 


 प्राश्स्त्यमाष् समराङ्गणसून्नधार- | 
| आयो व्ययश्च योनि( त्वं १ श्र) ताराश्च भवनांशक्छम्‌ । 
 गृहनामेति चिन्त्यानि करणानि यहल्यषट्‌। 
तरिभिः छभेः श्चुमं वेदम द्वाम्यामेकेन चाञ्ुमम्‌ ॥ 
| करणेश्रतुरायेस्त श्मेरतिष्चमं मवेत्‌ ॥ (अ० २६, शो० ४९--९१ ) 
इति । इह गृहनाम वज॑पित्वाऽन्येषां पञ्चानां खश्चणानिं रिखितानि । = 
सम्प्रति व्याख्यायते । कतंग्यस्य प्रासादस्य 


विल्तारं वेशे विचत्‌ पूंबज्जयदादिकम्‌ ॥ इति (० भ० २, छो० ६९) ` 


५ दस्य लिङ्गस्य वा भाविते उत्सेधे उश्नतिमाने | 
अशसितुंणिते सपररस्या हते च अवशिष्ठसंल्यया नक्षत्रं जानीयादिति निकषः । अदवयुजाच- = ` 


^ ५ [ तस्करा्ंशानयनम्‌ ] 
न्तत च) चतुगं 
नवभिहं वभिहरणे (ष्मश्यकं {रोषमंशकं) तस्करं ति {रादि 0 
्तधनं (राज्ञा षडं का १ राजा षण्डाभयकं) वियत्‌ 
तस्करं (विषखण्डन्तु !वियत्‌ षण्डन्तु) 

निन्दित सुपार(के0केः) ॥६१ 


नात भ म४८७००१७५५१०१५४५१ 
समा जि जि ना णन ०० ०७9 ० - “~+ 


पिति अश्िवन्यादिनक्षत्रम्‌।  शेषसंख्यया  नक्षत्र्ानञ्च-यथोक्तयुणहरणास्यामेकल्मिन्नवरिष्टे 


अश्विनी, द्योमरणी तरिषु छत्तिकेति कमेण । इयमेव रीतिः काश्यपे । तथाच- 
| # # # अशसष्टगुणीकते । 
सप्तविश्चतिहच्छेषमदिवन्यादिक(कं }) सम्भवेत्‌ ॥ ( अ० ९०, शो ९१ ) 


 ईति। समराङ्णसूत्रधारे तु प्रकारान्तरेण नक्षत्रानयनमुपदिशटम्‌ । तत्र हि सप्तविश्चतिनश्चत्राणि १ 
मस्षम्पदादिसंक्तया नवधा विभक्तानि ; अत एव तत्र हरणमपि नवभिः कृतम्‌ । तथाच-- क 


गणयेत्‌ स्वामिनक्षन्नाह यावत्‌ स्याद्‌ भवनस्य भम्‌ । 
नवभिभाजिते तस्मिन्‌ शेषं तारा प्ररीत्तिता ॥ 


4... ( समराङ्ण० अ० २६, छो० ४०-४१), = ` 
। एवमेव शिल्परलेऽपि ( पूं अ० १९, शछो° १३-१४ ) । अयमेव हि प्रकारः साधीयान्‌, एक 
प्रयासेनेव नक्षत्राणां तच्छमाशुभानाञ्वाधिगमकत्वात्‌ । 


९१} अश्ञानयनप्रकारमाह--नक्षत्रे चेति। नक्षत्रे नक्षत्रमाने चलु॑णे चतुभिरंणिते 


४ |  नवभिह ते विभाजिते च गषमंशकं भवेत्‌ । तेषां संज्ामाह--तल्करमिति । ` 


युगधा नवे हासे त्वंशकं तरकरादयः' ( अ० ४९; छो १०३) इति काश्यपे यथोक्तावेव 


1 ` गुणहारो । परमस्ति नाश्नि विप्रतिपत्तिः । तथाच-- 


तस्करं भक्तिशक्तिश्च वनं राजच्च षण्डकम्‌ । | 
अभयं धन्रणज्चेव न्वांशकमुदाहतम्‌ ॥ (अ० ५०, शछो> ६१ ) 


4... ` इति । एवं शिल्परलेऽपि (पूं अ० १५, छो २७-२८ ) नाममेदो षिदयते। नवतातु 2 


प्राचीनेव । समराङ्गणसूत्रधाि पुनरुंणहारयोनाम्नि संख्यायां च तिप्रतिपत्तिः। तथाच-- ५ 


व्ययं कषत्रफरे क्षिप्टवा गृहनामाह्वराणि च । 
भागं ननिभिरे्त्र यच्छेषं सोऽश्राको भवेत्‌ । 
इन्द्रो यमश्न राजा च त्रयो नामभिरंशकाः। त. 

तल्यफरुदा विक्ातम्यादयोऽपि च ॥ (अ० २६, छो० ३७.४०) ` ` 


=: "` -वनामे 


षष्ठौ ऽच्यायः ५ ११७ 
[ घनणयोन्यानयनम्‌ | 


मता तमात्‌ त ताता सिति सि्‌ 


असिति चेषामं॑श्ा्ना करणषटृकर प्राधान्ययोतको हृदयः प्रशंसावादोऽपि तत्रव-- 


चतुर (ञो ? ङे) यथा (मन्त्रो ? मन्त्री) सुख्यो खगे नवांशकः । 
तथा गृहाष्षु प्रोक्तं युख्यस्वेनांशकन्रयम्‌ ॥ इति । ५1 
(अ० २६, इलो० ३८.३९) 
अशेष निन्दितानंशानाह--तस्करमिति। "निन्दितं वास्तुपाय इति शिल्पे | 
` (पूष अ० १५, श्छो० २८ ) पाठरलम्‌ । | १ 


९२ । सम्प्रत्येकोपक्रमेणम धनणंयोनीनामानयनप्रकारमाह तिभिः पादंः--उत्तङ्क इति । 
प्रासादस्य लिद्धस्य बा उत्तङ ओन्नत्ये ओन्नयपरिमापके हस्तादावित्य्थंः, वना अष्टभिः नन्देन = 
नवभिः अभिना त्रिभिश्च गुणे गुणिते, भष्टकाषटमिरिति-अष्ट च कः सूर्योऽथाद हदश्च च अष्टचेति 
अष्टका तेः अकामः अष्टभिह्मौदलभिरषटमिश्च हते विभाजिते यथाक्रमं धनम्‌ कणं योनित्वज्च = =` 
स्यात्‌, तथाच--अष्टमिगंणिते अष्टमिहैतेऽवशिषटं धनम्‌, नवभिगुःणिते दादशभिहंतेऽवशिष्टे 
ऋणम्‌ , त्रिभिगं गितेऽ्टमिहंतेऽवरिष्टं यो नित्वमिति निष्कः | ^ 

अत्र॒ शोके गुणनसंख्यास्तिखः सूपष्टत उपरम्यन्ते "वछनन्दाम्नीशत्यनेन $ हरणसंखल्या = = | 
 त्वहपटेति गुणनसंल्यालसाम्यपर्यारोचनया “अ्काष्टमिःरिति पाठं परिकरय भष्टमिहमदलभिरट- = । 

भिरिति कष्टेन कलिपितोऽथः, ततश्रेतहभायफलानां त्रित्वात्‌ संख्येयानामपि च्रित्वमावक््यकमिति ` ५ 

दधया; ्यथाक्रमश्पदोपात्तकरमान्यथाचुपपत्या श्योजित"पदस्यानथंस्याजसन्धानेन च शयोनित्व- = ` „| 

मिति पाठः श्चुत्वेन कल्पितः ! यथपि भ्योनिशवशतमेव पाठः साधीयान्‌ तथाऽपि यथाद्चोधित- = 
 मेषान्यत्रोपरुष्ध्या अक्षरसाम्यभूस्ना च तथा कष्पितम्‌ । == 

| इदमत्र दष्यम्‌--योनिः यथोक्तगुणहाराभ्यायेव स्व॑त्राऽऽनीता । आभिः संख्याभि- 
धन्णयोरानयनन्त्वन्धत्र नोपलभ्यते । तथाच शिल्परत्ने-- $ 4 

| अष्टाहते रन्थ्रहतेऽथ शेषह्त्वायोऽथवाऽत्रापि तिथिस्तु तिथ्या । 

नागे नवध्ने उपय एव दिगभिभंवेदिदं देवात्‌ प्रवश्यः ॥ 1 

(7. | (प्षंन्मान्भन शषच्लो० ३१) 
दति। ` एवमत्र अष्टाभिगुणिते नवभिहंते आयः, नवभिगुणिते दशमिहते व्यये इति | 
< करसिपतम्‌+ ` | 


 # # # तङ्क इस्ताश्छदधिदम्‌ । 
 नाभिष्तु निविशेषमाथामिन्युच्यते बुधः । इत्येकन्न । 
| | 6 8" ( अ० २५, श्छो० ४-९ ) 
अन्न द्वितीयाध--"नाडिभि्त्‌निते रेषमायमित्युच्यते बधरिति स्यात्‌ । अन्यन्न च-- | 
अनरे गुणिते चाष्टहूते योनिर्दाह्ता । 
अष्टमि्ंधिते भानुहते त्वायसुदाहतम्‌ । 
 नवभिगुगिते नाडीहते शेष्टणं भवेत्‌ । 
| (क्ाद्यप० अ० ४९, शौ १०२-१०३) 
इति यथोक्तसंख्यया युणमभिधाय भानुहते अयमा, यत्र प्रहृते अष्टरणयुक्तं यत्न च 
प्रते मानुष्रणमुच्यते, तत्र ऋणे स्वयं नवभिषट्रणमाह, गुणनन्तु परङृतवदेव । तदन्यत्र च 
पूषोदाहतवदेव अ्ययोन्यादिकमभिधाय-- 
| नवभिगु णिते त्वं (श्च १ शे) राशिमिहहाखयेचतः । 
रोषं व्ययमिति ख्यातम्‌ *  >*#* | | 
( काक्यप० अ० ९०; शछो० ९०-५१ ) 


| ` इति प्रङृतवदेव दवादशमिहरणेन ष्ययानयनं इयते । तदत्र व्ययो घनं वा ऋणं तैति शिल्पिभि- ` 
स्नुखन्येयम्‌ । मात्येऽपि अष्टाभिभाजिते आयन्ययाबाह । तथाच- 


यासेन गुणिते देये अष्टाभिवें हते तथा । यच्छेषसा८ यतं १ यं तं >विन्धात्‌ इत्यायम- 


` ।  भिधाय--“अ्टामिभाजिते बरे यः रेषः स व्ययो मलः” र व 
14... ( अ० २५७; डो १५.१६, २१ ) इति न्ययमह । न 
धनणयोहयोपदियत्वमाह--धनाधिकमिति। धनमधिकं यत्रेति, ऋणं क्षीणं य्त्रेतिच 


। विग्रहद्यम्‌, शेषं छगमम्‌। (आायाधिक्यं व्ययं क्षीणं सम्पदामास्पदं सदेति कारये ` ५ | | | 
८. ( अर ४९, श्छो० १०४ ) । इदसत्र दश्न्यमू-- विग गिता रैरेव च भाजिता संख्या विकार- ` 


`  मननुभवन्त्येव स्वस्वंरूपेणावतिष्ठते इत्यकलाऽन्ष्टफला वा प्रन्धङ्कतश्चरेत्यवगच्छामः । ` 


९३ । वारानयनमाह--तुङ्गमिति । स्पष्टम्‌ । एवमेव शिल्परत्न(पवं भा० अ० १९, दोऽ | 


३३) का््यपरिल्पयोः ( अ० २९, शलो० ३॥। अ० ४९, | गे १०१ अ० ५०, | ५ 


। ०), 


वज्र (दगेध्वंएदण्डाधचन्द्रौ च( 
 चक्रमतस्यो घटः) शुभाः॥ ६५ ॥ 

सोख्यदं चिह्वमित्या(च्य)माव्तो द्िणे हि य 

(8  रक्तभ्वेतपीतङकष्णरे(षो+खा) वर्णसुसोर 


| [ छि रखारूरणम्‌ ] | 

पूजायामे कांश तु खिद चिह्नं दशांशकेः। 

पीटस्योद्ध हिभागेन रे(षाखा) कार्या प्रदक्षिणे ॥ ६७ । 
| [ छिङ्शिरोवत्तनम्‌ 1 | 


लभागे शिङ्गविस्तारे चेकांशेनाधचन्द्रकम्‌। 
 सा्धत्रयशेन तुल्यं स्यादष्टांरो बदब्दाङ्(तिःति) ॥ ६६ ॥ 


९९ | लिङ प्रशस्तानि चिहान्याह--पद्ममिति । स्पष्टम्‌ । 


स्मैवालुबाद्‌ इति मन्याम । 


 क्म्पयते। 


[ प्रशषस्तचिह्वम्‌ | 


(सत्राचत्रा)ममषटमांसे तु सार््यंशंदंवरो)(षडङ्गकोएषंशके)। =` 
तरपुषाभं विस्तरा कुकुरा कुक्कुटाण्डं) शिरो मतम्‌ ॥६८॥ 


ना ताता ना कः 


८ ९६ । रेखामाह--पूजायाम इति । पूजायामे शिवां षोदशमिर्विभक्ते दशमिग््ेख्डि ध । 
 विहनितव्यम्‌। पीर्ल्य उबुद्विभागेन प्रदक्षिणे रेखा कायत्यन्वयः । द्वितीयार्धं प्रथमाधे- = 


| ९८ । सम्प्रति रिष्खस्य शिरोवतंनम्‌ भंशवभेन तस्य संत्ाश्चाऽऽह हाम्याम्‌--उत्राममिति। = | 
 जिभानीडृतल्य लिङ्गस्य उदु मागः शिर्वारा इत्युक्तम्‌ , शिर्वारं षुनच्िधा विभज्य रन्ध उष्वंभागो = | 
` उखम्‌, तत्र वनं भवेदिति वस्तुस्थितिः । वत्तेनमिति इृत्तक्रियामाह, यथा अर्धचन्द्राच्याकारः = | 


शिरोमागे अष्टमा अष्टो अष्टमिरंशीकृते इत्यथः, साधे छत्राभं षडे ्रदुषामं वतन | 
भवेत्‌) त्रपुषाभमिति चपुषाप्रलहशमित्यथः, ्रएुषं फरविशेषः यत्य शशका इति ल्यातिष्ञषु ; ` | 


१९०. + ५ देवतामूर्सिपरकरणम्‌ 
| । [ इश्िद्गरक्षणम्‌ | 
उ द्धो ध्यहीनं यद्धिङ्खं गारर्कर भवेत्‌ | 
 दीर्घवा सन्धिरे(वाखा)भियक्तं काकपदा८ि 
, [ स्फाटिकलिङ्गमानम्‌ | 
एकद्विव्यङ्कला बद्धिहौनिरायादिशुद्धय । 
 भात्रादि स्फाटिकं लिद्ध यावदेकादशाङ्खलप्‌ ॥१०१ 
। इति दार्जानि स्फारिकानि च) ] 


[ अथ बाणलिङ्ानि | 


1 [ तत्न िङ्गोत्‌पत्तिस्थानानि ] 
 कुरुतेवे च खिङ्भानि सरस्वत्यां तथा पनः 
 वाराणध्यां प्रयागे तु गङ्घयाः सङ्गमेषु च ॥ १०२ ॥ 
यानि बे नर्मदाया अन्तववेदे च सङ्गमे । 
केदारे च प्रभासे च बाणरि्धं सुखावहम्‌ ॥ १०३ ॥ 


(दिकेः)॥१००॥ 


[1 ०५०५०१५ 


~~~ 


4  विल्तराद्ध कक्कुटाण्डं त्रिभागेकभागे जडचन्द्रकम्‌ अर्टाशीकतस्य साद्श्यंेन तुल्यं उुद्वदाङृति शिरः [व 


स्यादित्यर्थः एवं पञ्चधा वर्तनं भवेत्‌ । तथाच शिल्परत्ने-- ` 


छत्राभं त्रपुषाकारं कक्वयाण्डनिमं तथा । 

अद्धन्दुसषशं चाथ बुददाभन्तु पञ्चमम्‌ ॥ 
सद॑षामपि छि्ञनां शिरसो वत्तनक्रमम्‌ । इति । | 
(उ० अ० र, इछलो° ११६-१९७)। 
१०० । सम्प्रति दुष्टलिङ्ञन्याह--उद्धधोमध्यहीनमिति । म्रत्थान्तरेऽल्य श्ल्षणोद्धारः 


| इति क्षिरोनाम इदयते। तस्य च वर्जनीयत्वमाह-- 


शिरसो वत्तनोपेतं रक्षणोद्धारवर्जितम्‌? इति 


(कादयप० अ० ४९, इ्छो० ४)। 


४. ध एतच स्फाटिकादिरिङ्गविषयमिति सम्भाव्यते, तत्ेवेतेषां दोषाणां इष्टत्वात्‌ । तथाच शलिल्परत्े ` 
, ` रत्नवोषमधिक्ृत्य-- 


रेखा बिन्दुः करश्च काकाङ्श्रि्षतधृख्यः। = ` 


4 ( तुषारत्रासरन्घाणि यत्नाद्‌ रलष्षु वजयेत्‌ । इति । 


¦ ( उ० भा० अ० १, शछो० ३९-३६ )। | । | 


` षष्ठोऽध्यायः १२१ 


[ बाणरिङ्गपरीक्षा | 
(नारएवार) यस्येव तुखसाम्यं (जनायते 
णं समाख्यातं रोषं पाषाणसम 

[ बल्य॑नाणषिङ्गानि ] 
स्थूलं वर्च दीं (स्फटिकं ! स्फुटितं) (चिन्न! 


वन्द 


युक्तश शृलग्रं कृष्णञ्च (विषवि)पिटं तथा ॥ १०५ 
(वक्त्‌ए्वक्र)च मध्यहीन् बहुवणेञ्च थद्‌ भवेत्‌ । 
 वजयेन्मतिमषटिङ्खं सवैदोषकरं यतः ॥ १०६ 

[ कचित्‌ पाषाणस्यावि पूज्यत्वम्‌ | 
महानदीससुद भूतं सिद्धन्तेलादिसम्भवम्‌ , 
पाषाणं परया भक्त्या रिङ्गवत्‌ पूजयेत्‌ सद! ॥ १०७॥ 

[ यथातथावस्थितस्यापि बाणस्य प्राशस्त्यम्‌ | 


 पुष्पषीटमषीरं वा मन्त्रसंस्कारवजितप्‌ । 


। भुक्तिमुक्तिकरं बाण सवेप्रासादपीटकमप्‌ ॥ १०्द्‌॥ ` | । | । ५ 


| | [ भोगद्बाणश्षणम्‌ ] 
 उद्स्थलं कृशं चाधो यवा लिङ्गं निवेशयेत्‌ 
तदा भोगं विजानीयात्‌ पुलपो(त्रा्र)श्च वधते ॥ १०६॥ 


| 0 11 


१०४1 बाणलिङ्गपरीक्षामाह--जिपञ्चवारमिति ! यत्येवेत्येवकारो भिन्नक्रमे ! 
 निपञ्चवारं पद्चद््ावारम्‌ एव दुराखाम्यं न जायते प्रतिवारमेव मानं मिदते इत्यथः, तदा बाणं ` 
 बाणरिङ्गं समाख्यातं कथितं सुनिभिरिति शेषः ; “अमेयः खलु भगवानि'ति भावः । ८ । 
१०७। महानदीति । रूपमण्डने (८ अ० ४, श्छो° ७८ ) प्परन्थान्त हत्युपकरम्यायं ` 


शोः पठितः । रिङ्खवदिति बागवदित्यधैः, तस्येव प्रल्तावात्‌ । 


| १०८॥ दुष्पपीडमिति। प्राणतोषणीतवीरमिन्रोदयेऽयं श्लोकः ुष्पपीठमित्यन्न | 
 श्तत्‌ सपीठःमिति, युक्तिख॒क्तिकरमित्यत्र “सिद्धिसुक्तिपरदःमिति 'पीर्कमित्यत्र वीकयामिति च॒ 
`  षिपरिवत्तनेनोपरभ्यते। एवमन्यान्यपि रक्षणानि पोराणिकान्येवेति द्यम्‌ । ॥ 


| र ठ नन र ५ 


। 6 > 


` रे(षाखा)कीरकसंयुक्तं सुवर्णं च निवर्णैकम्‌ । 

` रक्तं कृष्णं तथा श्यामं पीतं शुङ्कं च पाण्डुरम्‌ 
 सदोषगुणसंयुक्तं बाणं पूर्य निलशः। ` 
 बराछृक्मीं समाक्रष्य भुज्यते बाणलिङ्गतः ॥ ११३ 
 तस्माच्छतगुण (पुष्य पुण्य) ततसस्थापनपूजनात्‌ 

बाणलिङ्गं तथा पूज्यं ततसंस्थापनसुत्तमप्‌ ॥ १९९ ॥ 


[ बाणल्यापनप्रहञंसा | 


सर्वयज्ञतपोदानतीरथवेदेषु यत्‌ पलम्‌ । 


॥ 


यो विद्धं स्थापयेदेकं विपिपूर्वं सदक्षिणम्‌ । ` श 
1 ॥ सर्वागमोदितं पुष्प! प्यं) कोटिकोटिगुणं भवेत्‌ ॥ ११६ 


। दादामि नोता ततान 0 


शंतवारं कुरुचेत्रे सहस्र जाहवीषु च । 

नमेदाया लन्लेण कोरि च कुरुजाङ्गले ॥ १९.७ 

कृता स्नान (पी! पि)ण्डच हृतं वान भोजनप्‌। 
गुणितं कोटिवारओ सवपुण्यं लभेन्नरः ॥ १८ ॥ ` 


1 ध १८०५ उभ्वङृशमिति । पूव भुक्तिमुक्तिकरं बाणम्‌" इत्युक्तम्‌ , तत्र कीरं युक्तिं 1 
कीदशं वा सुक्तिकरमित्येतदाह श्ोकदयेन, तत्रापि पूकरलोके जुक्तिदशिद्धरक्षणमुक्तमितीदानीं 


५ ` अुकिदरिङरक्षणमादेत्यवधायं अर्थवानपि यथाश्नतः पाठो विपरिव्तित इति हेयम्‌ ` ४ ५ 


(बाणलिङ्गा तु लिङ्घनामाकर्बाणां ?) स्वयम्भुवा । 


पीट पर! प्रासादस्य यथेष्ठं कारयेत्‌ 
[ एकाखादिबाणमाष्ात्म्यम्‌ 1 


 एका(ख) स्रोबाणमारभ्य यावच्चतुदंशा(श्रयम्‌? खक 
पूजया परया भक्तया सवंसोख्यप्रदं चणा ॥ १२९२९ ॥ 


शनुधाः ॥ १२९१ 


धातवे शतहस्तेषु बाणे प्शतेषु च। 
खयम्भूसहसखहस्ते शिवती्थोदकं स्पृतम्‌ ॥ १२३ ॥ ` 
[ किवतीर्थोदकल्य पुण्यजनकत्वम्‌ 1 क 
ल्लाने ते महत्‌ पुण्यं लिङादिषु दिशं प्रति 
| [ शिवतीर्थादकलहुने प्रत्यवायः ] ४ 
लद्धिते च महत्‌ पापं शिवल्नानोदके नृणाम्‌ ॥ १२४ 
[ प्रदक्षिणनियमः ] 


४५१ 


[: एकां चण्ड्यां (वरे ! रथो) स(पत्‌ ? प) तिसो दाद्‌ विनायके । 


॥ [ जेनदेषार्ये विरेषः ] 
जेनदेवाग्रसंस्थाने स्तोवमन्त्राचेनादिकम्‌। 
(पृष्िःदष्टिः) प्रदातव्या (सन्मुखं?) हास्लक्ननम्‌ 


~~ वि -.-- 


५८. श ` । | 1 देवतापूत्तिश्रकरणम्‌ | 
स ॥ | [ प्रणारदिङ्नियमः } ` 
10: @; हर भरणाल चोत्तरे शुभ 8 
स्तं स्वदेवानामिति शाल्लाथेनिश्चयः ॥ १२७ ॥ 
[ पिण्डिकाया रक्षणम्‌ | 
| (आतत)दो ब्रह्मविष्णोश्च पिण्डिकाना(सुपध्य)षिदुः। 
| [ तस्याः स्वजातिकन्तेव्यत्वम्‌ | 


` जात्येकया विधातव्यं नेष्ठमन्योन्यसंकरम्‌ ॥ १२८ 


[ तत्र मतान्तरम्‌ ] 


आहुः शंलेष्टमेकेचित्‌ पीठं पकेटकाम(दम्‌ एयम्‌ ) । 


 [{ पीठानां सन्धिष्थानम्‌ ] 


 उषयपरि पीठानां सन्धिरङ्गवसानके ॥ १२६ ॥ 


[ नारूमध्ये कणसन्धेनिषेधः | 
मारस्य मध्यमध्ये च क्णैसन्धि न सन्धयेत्‌ । 


[ प्रणारङभागकथनस्‌ ] 


प्रणालन्तु त्रिभागेण तततव्यं चा(्मा्मार्धकप्‌॥ ९३०॥ ` 


त्रिधा विभक्तमग्रे तु मध्ये सजलमा(ग ? मतः 
| कन्देतु पादमेकेकं मध्यवंशोद्धवाकृ(ती ? ति) ॥ १३१॥ 
~ ४ 1 [ मेखछा | ` 
` प्रथुपीट{स्तुनां!गुणाँ)रेन मे(षःख)खा श्रवणाकुतिः 
4 [ खातविघानम्‌ 1 | 


^ मेखला (च!) त्रिभागेण खातं र्यत्तिथा परम्‌ ॥ १३२ 


नामा षि [र 
७७७ 


> . कर्तन्यः। प्रणाको जकनिःसरणमागंः । 


६ 8 व वि ॥ / ति व्याख्यानायोग्या । (1 


१२७ । यत्य देवाखयल्य पूवस्यामपरस्यां वा दिशि द्वारं वत्तते तत्र उत्तरस्यां दिलि प्रण।छ 1 


१३२ । इदानीं पीष्कामाह--मेखलेति। पचचश्छोकीयं क्विद्‌ विक्रतपाटा कविदन्- | 1 | 


वष्ौस्ध्यायः ` [क १२४ 


(याम्ोदस्तत्‌ ¢) संपादमगरे स्यात सार्घभा 

| | [ पी ] | 

 मेखलामध्यकन्तैव्या नवषीटन्तु कामदम्‌ 

 भागेकं भूगतं कार्य त्रिभागं (कत्ते)कण्ट)पदिका ॥९३४ 
 भागोगाधं मुखप (स्कन्धता्धंत्रिभागोन्नतप्‌ 

१स्कन्धं साधंत्रिभागतः) । 
स्कन्ध पटिकाद्(चं न्दर) भागाधं चान्तरपतिका ॥१३५। 

 कणकं सर्धं भागे >‹ > >‹ कथिन्निका भता । 


` द्विभागं चान्तरपटं (कच) (धोताविद्वितार्धकाः!) ॥१३६॥ क 


(अधं च मघ्रासपद्टि)कतेव्यं षिधिपृवेकम्‌ । 

अघं स्कन्धपटिकाख्या त्रिभागं स्कन्धशोभनप्‌ ॥१३७॥ 
 (अर्धमुखपहिका कार्या कर्णके तु भाग॑कम्‌ १) । 
 शोभनमश्टभागेकं कतैव्यं तमशङ्खिते ॥१६८॥ 

। [षिष्ीवयोन्युनाधिस्न्विषः] = 
यावदीघं भवेिद्धं ताषत्‌ स्यात्‌ पीठविस्तरम्‌। 


उमा तु पीठिका ज्ञेया लिङ्क शङ्कर(सुठच्यते ॥१३६॥ 


| | [ तथोन्यूनाधिक्ये दोषः ] ( 
न्यूनाधिका न कर्तव्या उमा च शङ्करस्तथा । 


५  न्यूनाधि(क)के) कृते दोषा (्षरते रा्विश्रमम्‌ १) ॥१४०॥ 


[ पीठिकामेदास्तन्नामानि च| - 
(रस्थण्डिला चेव (वापी च यक्षी शवेरी तथेव च । 


` (मण्डला पूर्णचन्द्रा च गवज(7पद्यङ्घ(तीएति)स्तथा॥१९१॥ = ` 


. प कृत्या मत्टलगकारय मेखलाभिरलङ्कता । 


वतां 

मधेचन्द्रा (णत्रिकोणा च विज्ञेया दश पीटिक 

9 [ पीतिकिरक्षणम्‌ | 

चतुरा स्थण्डिखा स्यात्‌ संयुता मेख(खाले)कया ॥१४२॥ 
चतुरा यदा वेदी स्वेकामफलप्रदा । 


[ इति स्थण्डिला(१) 1 


4. जवस तंत विया गान सिदित ।4 २२६ 


। [ इति मण्डरा(५) | 
पूर्णचन्द्र (विनि)भाकारा मध्यन्स्तद्विमेखला । ` 
विज्ञेया पृणचन्द्रा सा रुद्राणीशतसंप्रिया ॥१४९॥ ` 
४ हि [ इति पूणंचन्द्रा(६) | 
 षडसरा च भवद्रज्रा मेखटात्रयभूषिता ५ 
[इति बज्ञा(७) ] 
 षोडशाखा भवेत्‌ पद्या किथिच्च(स्यास्यान 
मरणाखवत्‌ ॥१४५। 
4. ति पा 
 ठभ्रज्यधनु(षाएरा)काराऽधेचन्द्रा चेव सा भवेत्‌ । ` 
` [ इत्यधंचन्द्रा(&) | 


अल्ला लिकोणा विज्ञेया सा शक्त्या सहशा भवेत्‌ ॥१४६ 


[ इति लिकोणा(१०) | 
[ आसा फम्‌ | 


स्थण्डिल पीठिका यत्र धनधान्यार्थदायिनी । 
` मदिषीगोप्रवा वापी यक्ती सर्वार्थवायिनी ॥१४५७॥ 


[1 माता 9१०८०५५ 


 १४६॥ रकषज्येति ज्याुक्तधनुराकृतिरित्य्ैः ; एवं शाट चनदाङतिेत्‌ । 


१९७॥। ददान पौिकानां नामभेदेन फलान्याह --स्थण्डिकेति । अत्राऽऽयायाः स्थण्डिलायाः . ` 
परं वापीयक्षीवेरीणां तिसणां पीठकानां रक्षणं नोपल 


ह्येते, वेरी तु वेरायमाणेध दश्िथं परिहतव रे तवती । 


रुध्यते । फलकथनप्रस्तावि युनर्वापीयक्ष्योनामनी = ` 


(वि षष्ठोऽध्याय तः ~. ५ 
मण्डला की पूण॑चन्द्रा तु शान्तिदा । 
वा शलुविनाशाय पद्मा सोभाग्यदायिनी । 
अधचन्दरा सुखाय स्यात्तिकोणा शल्ञनाशिनी ॥१४८॥ 
|  [ पीषठिकानां स्जातिकर्तन्यता ] | 
शेखजे शेलजा योज्या दारुजे दारुजा शुभा । 
पार्थिवे पाथि(वाण्वी) कार्यां लोहजे रोहजोत्तमा । 
रलजे धातुजा शस्ता रतजाता विशेषतः ॥१४६॥ 


[ प्रणार्न्यवल्था ] | 
मूखाद्र प्रणाख(स्या!स्य) परमाणारपधिकं शुभम्‌ । 
 जलख(मग्राविभाषेण एमाेस््रिभागेण) | 
चाग्रतस्त॒ सुशोभनम्‌ ॥१५०॥ 
४ [ उुखलिङ्म्‌ ] 
सम्भुं (चेव?चेकोवक्त्‌' स्यात्‌ लिव(क्तकले) प्रष्टतो नहि । 
पश्चिमस्यं स्थितं शुरं कुङ्माभं तथोत्तरम्‌ 
याभ्य करष्णकराखच प्राच्यं दी्ाधिसनल्लिभप्‌ ॥१५१॥ ` 
|  [ ञुखनामानि |] | 
 सश्यो वामं तथाऽघोरं पुरुष चतुथकम्‌ । 
पचम तथेशानं योगिनामप्यगोचरम्‌ ॥१५२॥ 


 . वामे गणाधिपत्य् द्लिणे पार्वती स्पृता । ५ 
ने स्ये भास्करं विथाद्‌ वायव्ये च जनादेनम्‌ ॥ १५३ ॥ 


त्ता नण न्न ०५५०७५५१०५०१५५ 
५ काण 


१९१। मुखरिङ्गमाह--सम्सुलमिति । पततपूरवाद्धत्वेन सूपमण्डने-- ` 
| सुखरि्खं त्रिवक्त्‌' वा एकवन्तूः चतु खम्‌, 


(नभव्ेभ) | 


इति पीठिकामखट्ङ्िधिक्रारः। | 


| | त | । त 


 दैवतामूत्तिप्रकरणम्‌ 
मात्‌ भर्मातरस्थानं कारयेदक्तिणां दिशम्‌ । 


म्ये शान्तिरहं कुरया(वदय)क्ाधीशख पश्चिमे ॥ १५४। 


इत्येकद्वारशिवायतनम्‌ | 


वामे लानं कुर्याद (यशो?) ह्वार दक्षिणे । 


1 मध्ये सद्र प्रकत्ते(द्यं0३यो) पातस्थान् दल्लिणे ॥१५५॥ 
 (वामवामे) देवी महालच्मीरुमा वे भेरवस्तथा । 
ब्रह्मा विष्णस्तथा संद्र प्रष्टेशे तु कारयेत्‌ ॥ १५६ ॥ 


 चन्द्रादित्यो स्थितो कर्णे आग्नेय्यां स्कन्दमेव च, 


` नन्दी सुकुटशोभाल्यः सर्वाभरणभूषितः ॥ १५८ 
 खटूाङ्गव कथा उमरू बीजपूरकम्‌ । 
`  दं्कराखवदनं महाकालन्तु दक्तिणे ॥१५६ 


तजनी च विशूल डमरं गजमेव च । ० 
(हरे्षहर्म्बो) वामभागे स्यद्‌ भङ्गी दक्तिणतः श्णु ॥१६०॥ ` 


ईशाने विघ्नराजं तु धश्चमीशानगोचरे ॥ १५७ ॥ 


इति चतुज्रखशिवायतनप्‌ | 
द नगेन्द्र )) उमर चात्तसृत्रकप्‌ 


इति पूर्वप्रतीहारौ। ` 


गजं उभरखटाङई तजनीवामहस्तकः । 


उभौ च दक्षिणे द्वरे गृङ्गी दक्षिणतः शुभः ॥१६१॥ 


` धिशूलं उमरुथेव खट्ग कपालकम्‌। ` 
डमर तधा दण्डं बीजपूरं तथव हि ॥१६२॥ 


क व ------ 


इति द्निणप्रतीह्यसे । 


०9 
न 


7 ॥ १६३॥ 
श्चिमप्रतीहारो । र 


| [ बाहनविधानम्‌ 1 
१ यस्य देवस्य तत्तस्यामे कलप 
एक-द्ि-त्रि-च (तत्‌ एतुःपञ् वा 
वाहनं मृत्तिलिङ्ग् मूलघासादमानतः 
वृषभस्य (विभावन्ते))खिङ् दशं नियोजयेत्‌। 
सूर्यस्याग्रे भवेत्‌ सोमस्तनसूत्रसमोद(धं१यः) ॥१६७॥ 


१६२ । अनेन वक्ष्यमाणयोः पश्चिमप्रतीहारयोरायुधानि प्रतिषादितानीति तत्वम्‌! ` 
सवषामेव प्रतीहाराणां चतुभंजल्वमनुमीयते प्रहरणचातुर्विध्यात्‌, इह तु द्वितीयार्धे श्रीण्येव ` 


प्रहरणानि प्राप्यन्ते । शूपमण्डने तु--"कपारं डमरु" दण्डं बीजपूरं तथा दधत्‌, ( अ० ४, श्लो 
१०४) इति यथापएूषं चत्वायवाऽऽ्युधानि छभ्यन्ते । 


१६३। प्रतिद्वारं दौ ष्ठी प्रतीहाराविति प्रृतम्‌, दह सेक एव रम्यते व्पाण्डुरः 
इति । सूपमण्डने--दुसुंखः पश्चिमे वामे पाण्डो दक्षिण तथाः (अ० ४, शको १०६) 
इति द्भावे प्रतीहारौ निर्वो) अत्र भ्न्थछ्तुप्माददिकः प्रतीहारो स्तः किंवा पाण्डरनामानौ 
| डेव प्रतीहाराविति चिन्तनीयम्‌ । एवच्च शवाण्डुरा"विति द्विवचनमेव न्याय्युद्पम्यामः 4 अत्र॒ ` 
॑ ` श्वामदक्षिणः इति युगपदुभयपादवेयोस्लेलात्‌ पाण्डर इत्येकमेव नाल्ना निवि दव प्रतीहाराविति ` 
` च नायोक्तिकं वक्ुमर्हामः। अपि च पूर्॑श्ठोकेः द्विधेवाऽध्युधानि प्रतिपादितानीत्यपि प्रतीहार- = 


दघं निबौघमुपन्यस्यति । 


 . १६४-१६९। उत्तरद्वारप्रतीक्रावाह--सितक्रेति। उत्तरे द्वारे वामे सितः दक्षिणे मित ५ | ४ 
इति वतुरोऽथेः। तदयं संकषपः--पूषंहारोभयपादवंयोनेन्दिमह्ाकारो, दक्षिणद्ारपारर्वयो्रम्ब- = ` 
गङ्धिणो, पश्िमद्वारपावंयोः पाण्डरो, उत्तरद्वारपापलयोश्च सितास्िताविवि । 


देवता--१७ 


० | [ बाहनहष्िकथनम्‌ | 
पादं नानु करि' थावन्‌ (मज)मृत्ते)वाहनहक्‌ शुभा । 
स्था(न(न) नाशं करोत्युध्वाऽधोटष्टिश्च ्रजाच्तयम्‌ ॥१६८ 
 (धातधाता) दिवं प्रति(हातगृगतः) कलनेऽस्य रूप॑ 
 (तत्यादयुग्ममगमदहाशो हरिहय्थ) । 


शतो न पारमम(्वपीष्वपि) नवनी(माएय.) 


क यदुपरि विरि्रिच ५ चं यातो" इत्यादि स््तिरत्रमूलमदुलन्धेथम्‌ 


 मव्य(ताक्तोरूपममरापिपतेश्च पातु ॥ १६६ ॥ 


इति श्रीत्ते्रा > > > > विरचिते बास्तुशाख्े रूपावतार 
शद्रसूत्तिलिङ्खाधिकारो नाम ष्ष्ठमो(ट)ऽध्यायः। 


१६८ । व्याख्यातमिदं प्राक ( पु५ ८८ श्छो° ६8६ ) | 


१६९ । अन्ते अध्यायान्तसुंख्यतः प्रतिपाचमाचं महादेवं ह्तौति--धातेति । द्वितीवपदे | ` 


४ 1 तस्मादुयुग्ममगमदं बहुशो हरिश्चेति कथञ्धित्‌ स्यात्‌ । तथाचायमर्थः--अल्य रूपं करने क्प | | 
` करूयितुमित्यथेः, घाता दिं प्रतिगतः, र्थि तघ्माह्‌ धातुर्युग्मं पृथगित्यथं बहून्‌ | ध 1 1 ५ 


कोकानगमत्‌, उभावपि यस्य पारमन्तं न यातौ तल्याव्यक्तं रूपं पातु । (्तवेश्वर्थ यन्नाह ` 


। 1.41 भ ५ शि 


[ भथ चतुविंशतिस्तीथंडयः 


4 [त <+ (>| (३) ८ ¢ (2.1) | ॥/ (2 ८“ नत १ ) ( च ९ नु <] १. र 


(सुमतिः (पद्मनाभश्च (अमूर्याधेुपा््व) स्तमानतः॥९॥ ` 


॥२९॥ । 


१६)शान्तिश्च ९७१८ पुथार १ कन्थनाथार ) (ऽमह्ययो 


-पा(यो्वनाथो(र्वर्षमान- ` 


(नाभि या? (श्नमि (स्रनेरि 


ते मतास्तीर्थङ्करा बुधः ॥ ३ 


। चतुतिं शतिरिः 


 १--३ । यावद्‌ देवतमूत्तिं कन्तंकामः सम्प्रदायविशेषाणामेव ताममिधाय यन्तः 


 त्तदाऽवशिष्टाऽपि जैनदेवतानां सूक्तिः किमनेना्तानादवन्तानाद्ठोपेशषितेति शिष्याणां भ्रमो मा 
भूदिति जिनानां मूर्विमाह--चषम इति । जिनाश्च सवं एव समानाकृतयश् इति तेषा मृत्तौ =` 
 विकेषमनमिधाय विरोषवतीस्तच्छासनदेवतानां मूतीरेवारे रक्चपिष्यतीति सेयम्‌ । ध ध | 
| जैनानां समये उतसर्पिण्यवसर्िणीति द्विषा युगानि भिन्ते । तत्रावसर्पिण्यां जना उत्ताः | 
ऋमेणावनति प्रपचन्ते, उतसर्पिण्याञ्ावनता जनाः ऋरमेणोन्नतिं रभन्ते । अवसर्पिणी अतीत । 
युगस्य उतूसर्पिणी वत्त॑मानयुगल्य संहा । अवसर्पिण्याल्ये व्यतीतदुगे चतुविशतिस्तीर्थं # 

` विलीनाः, वत्तमाने उवसर्पिण्यारूये युगे पुनश्रतर्विश्शतिक्षबभृदचः । तेषामेवायमधिकारः कारः, = 

| सएव च जेनेदंवाधिकत्वेन पू्न्ते मन्यते च देवा अप्येतानच॑यन्तीति । अत्र च वमान = ` 
 धुगीयलीधं्कराणामेच मूकतिः ऋमेणोष्िखितेति केयम्‌ । रूपमण्डने पुनः--“एतल्या(मिष१ मव ) = ` 
५ ` सर्पिण्या (ऋ १ ष्ट) षभो ( जिन? ऽजित ) सम्भवः" (अ० ६; श्टै+) १ कमी इष्यते; ` 


श्पुष्पद(न्त १ न्तः) (शीत(खा १ छो) ` 


स्तः परम्‌| 


व दिषः 


र्वङ्करा 


श दैवतात्तिरकरंणम्‌ 
नि ५ [ निनानां वणः 1 
रक्तो च पद्मप्रभवासपूर्यो 
 शुक्छो च चन्दरप्रभपुष्पदन्तो 


वर्षभ इति अस्थाऽऽदिनाथ इति नामान्तरम्‌ । (६)पद्मनाभस्यापि पश्मप्रभ इति नामान्तरं 

 एपमण्डने ( अ० ६, श्रो १), शीरलसूरिछृते चतुरविंशतिनिनल्तुतिंग्रहाल्ये भ्रन्े चोपरुभ्यते । 

 अन्धङ्ताऽषयुचतरतर वणेनिणंयावसरे पदप्रभ' इत्येव नाम तमिति द्वयमपि साधु । सतमानत 

इति छपाश्वः स्तम इत्यथः । (८)चन्दरप्रम इति, चन्दरपथुरिति जिनस्तुतौ सूवनायासुपरभ्यते । 
मूरुयन्थे पुनः-- 

| = च्वन्द्रुप्रभ च्रिभुवनाधिपते प्रघीद सोभाग्यद्ठन्दरविभो इरराबरीद 


इति यथोक्तमेव नाम इश्यते! यच्च जेनपद्मषुराणे श्ञशिष्रतपर्ुः" ( पर्वं २० शछो० ८ ) 


इत्युपलभ्यते, तत्र 'दशद्तप्मः' (्लशचतप्श्ु्वौ भविष्यतीति सम्भावयामः। (९) पुष्पदन्त 


^  इत्यल्य रूपमण्डने (अ० &, श्छो० २ ), जिनस्तुतो, पद्मपुराणे च 'डविधिःरिति माम । यद्यपि 
(तक्षकः इत्यत्र हिपिह्ृतप्रमाद्दधा (धमकः इति कल्यनमतिसाहसं तथाऽपि यथा्थपाणेद्धि | 
।  ब्धपरिक्राणामलमाकठं न केवलं रिगह्तधमादोच्छेदे तात्पर्यं सङ्खोचनीयम्‌ , दर्शितमेतदर्वाग्‌ ` 
| द्विष्यते चेत उद्ुभपि। उपरुम्थते च “धर्मकः इति नाम जेनपदयघुराणादौ स्पमण्डने च 
| (ज० &, शलो० ३१ )। एवच्च पुष्पदन्तः दृतयननाप्यपेक्िता शद्िनं कृतेति न्यनतां छन्दस्या- 
सञ्चयता कथद्ित्‌ छलमनुभूषते । यद्वा उभयत्राप्यनपेक्षिता श्ुद्धिल्तन्त्ान्तरे तथाविधाभिधानस्थ 
` पम्भवादितिदिक्‌। ` 


नमीति । नाथपदल्य सवन्नवान्वयः, नमिनाथो नेमिनाथः पार्वनाथक्चेति । किच्च शसम ` 


0 ॥ इत्यादीनि सर्वाण्येव नामानि नाथान्तानीति जेयम्‌ 1 वर्धमान इत्यल्य महावीर इति नामान्तरम्‌ ` 
|  भल्येवायं ज्ञास्नकालः। तथाच--श्चिमो वीरो श्चासनं यस्थ वर्तते" इति ( जे प० २०।१०) 


 ४। जिनानां वणानाह-रक्तौ चेति। जेनपद्मषुराणे एनरन्यथेव वणनिर्दैशः। ` 


 बन्द्राभश्न््रसंकाशः ुष्यदन्तश्च कीरसितः। परियड्गुमञ्चरीवणेः उपाद्व जिनसत्तमः ॥ ५0 


। . भपक्दारिद्काशः पाश्वौ नागाधिपर्तुतः । पञ्मगमंसमच्छायः पदचप्रभजिनोत्तमः ॥ 


किञचकोतकरसंकाशो वाडपूल्यः प्रकीर्तितः । नीराञ्नगिरिच्छायो निखबततीर्थद्त्‌ ॥ ४ | | < 
| : मयूरकण्डसंकाशो निनो याद्वपुद्गवः। छतपकाञ्चनच्छायाः शेषा जिनवराः स्ताः ॥ ` 1 


इति (पवर २० षो" ६३--६६) , 


[ि 


(उत्तरा फल्गुनी चेति जिनानां जन्म 


(२०६०) पा जैनपदमषुराणे । रूपमण्डने ^ ठ | 
८ ` (भर श्छो० ८ ) इत्यपपाहः । ^ ४ ५ 1. ` | 


सतभौऽध्यायः 3१३ | 


[ जिनानां ध्वजाः ] 


`गजोऽरश्वः “'घुवगः (“क्रोओो (5 


भ्रीवत्‌स(षट्भि ? !९खड्गी) (येम महिष > 0 
(रशक्रस्तथा॥५॥ ` 
(१०श्येनो (९८ ज९६)सरग(श७च्छागा (नद्या ! (शतनन्या) | 
नि वत्ता (१<घटोऽपि च । 
कूर्मो (शनीरोतपरं (र्रशंखः (रशेफणी (षहो १ (रणसिंहो) = ¦ 
ऽहेतां ध्वजाः॥ ६॥ 


[ जिनानां जस्मभानि | 


(१उत्तराषाढ(ररोहिण्यो श्रगशीरष (*पुनवेसुः । 


| (भा (चित्रा भविशाखा(नश्वाऽतुराधा (मूलमेव च ॥७॥ = | 
| (पूर्वाषाढा (४ुतिश्चैव (रयशताभो(््तर (भव्रपं?मादरपत्‌ ) । | 
| ` पणखाती च (५पुष्य($भरणी(७छ्त्तिका ("रवती कमात्‌॥९॥ 
 (्अश्चिनी (रणेश्रवणा(रश्िन्यो तथा (द्वित्रा ^ 


सधविशाखिका । = 


( नानि ? भानि) वे॥& 


1 


नम १४० 


९-६ । जिनानां ध्वजाय यथाक्ममाह--इृष इति । ` 


 ५-९। यथाक्रमं जन्मनकषत्राण्याह--उत्तरति । श्छगशीषमित्यत्र पिन्यस्‌" इति = | 
` जैनपदषुरणे पाठः। विाखेति तदधः । तत्र पवान्द्कष्‌ इति वा, व्याकरगसंसकारः = 
पुराणेऽनावश्यक ईति 'देन्दणक्चम्‌ः इति वा पाठो भवेन्न वेति चिन्तनीयम्‌ । स्वातीत्यन्न | 
` भवतीति (२०।९० ! ) रेवतीतयत्र रोदिणीति (२०।५४ ) उत्ता ल्युनीत्यन स्तेति = | 
शवती पुष्यमरणी छत्तिछठा रती क्रमात्‌" = | 


।  [ निनोपासकयक्षनामानि] 

स्य (ख्ये १ खो) (रमहायन्ञ(रलिसुखो ( 

तुम्बरः &कुसुमश्चापि (मातङ्को "विजयो 
1 ( (जयः ? ऽजितः ) ॥ १२ 
(चरा (११ य्लेट(^२कुमारः १३.बृ८सुखः ८ १०पाताख५५किन्नरः। 
(गरुडो (१०गन्ध्वो ("यतर्‌ (१९ुबे 
 (रेअङुटि< गमिघ(यार््वो (रणमातङ्गोऽहै(ड्‌ ! दु ) 

1 + पासकाः ॥ १३ । 


1 [ जिनानां श्ावनदेवताः] 
` (शोचक्र(रोश्वर्यनितबला (दुरिता रि ]श्च ® कालिका । 
। (महाकाली (श्याम(ेशान्ता(रध्नकुल्य ( स्प १ श्च ) 

॥ (शपुतारका ॥ १४ 


(अशोका (र्मानवी (ररचण्डा (शषिदिता (र्ण्वाङ्कशी तथा। ` 


५1. (“कन्दर्प (६! निर्वाणी (ग्बलछा (रूधरणी(दधरणप्रिया ॥१५। 


1 ५०१ 


+५८११५८४५.१५ 1 


जय इत्यत्राजित इति नाम सथुपरम्यते ; परं तत्न च्छन्दोभङ्घािकोष 


१२ । शुम्बः इत्यत्र पुस्बरःरिति रूपसण्डने (अ० ६, श्छो० १२) । प्रातित्विकरक्षणनिणंय- = ` 
गदिदेष आप्रतेदिति जय एव ५ 


918. स सुखो यत्तो हेमवर्णा गजासनः॥ १७। 
त्सूलं पाश बोजपू(रं) करेषु 


[ इति गोभुखः १ | 
चक्रेश्चरी हेमवर्णां ता्यारूढाऽध्बाहका । ` 
¦ बाणं चक्र शांङुश वक्ता १ शक्त्य)श निधेनुः ।॥१९ 
4 [इति चकरेश्वरी १] 
` अ(ति!?जि)तस्य महायत्तो (हरा ! हेसा)रूढश्वतुमेखः। 
` वरसुद्वरा( शा ? शनि )पाशाङ्कृशशक्स्यभयानि 1 
 बीजपरंच॥ २० 
(क ` [इति महावक्षः] . 
चतुभैजा गोरवर्णां गोधारूढाऽपराजिता। = । 
` वरं चेव तथा पाशमङ्कशं बीजपूरकप्‌ ॥ २१ 
० [ इत्यपराजिता ? अनितबखा २] 
सम्भवे तरिसुखो यत्तः श्यामो मयरवाहनः। - ८ ८. 
 नकुख्गदाभयान्लं नाग बीजपूरकम्‌ ॥ २२ ॥ 
| ` [दति निमुखः३] 


१७॥ इदानीं यस्यः तीर्थङ्करस्य यो यक्ष उपासकः, या च शासनदेवता तानू क्रमेण | 
वक्तमाह--अथात इति । तन्न एकेन शोकेन यक्षमूतीरन्येन शासनदेवतामृर्तीव॑क्ति । एवमेव = | 
चतुर्विंशतितीथ॑ङ्रणाम्‌ उपसकान्‌ शासनदेवताश्व प्रतिपादयतीति दरष्टञ्यम्‌। 3 ¢ | 


२३ 
न [इति दुरितारिः ३] 
श्यामवर्णां १ णा) गजारू(ढा ? ठ ) ईभ्वर- 
५ (भ्वा १ शा)भिनन्वने 
 मातुलिङ्गाक्तसूत्रथ शङ्कशं नकुलं तथा ॥ २४ ॥ 
{इति यक्ञनायकः ७ ] 
कालिका भ्यामवणां स्या(त्‌) पद्मारूढा चतु जा । 
वरं पाशाङ्कशं नागं वक्निणा( खश्र ? धश्च ) खष्टितः ॥२५। 
। [ इति कालिका ७ ] 
(115  तार्त॑यस्थं (वरदं १ तुम्बर) भ्वेतं सुमतो तु चतुभेजम्‌ । 
वरदं च तथा शक्तिनागपाशं गदा(धरे १ करे) ॥ २६॥ ` 
~ | [ इति तुस्बरः ५ | 
महाकाली ( महे ? हेम )रणा पद्मारूढा चतुसुजा । 
` वरदं नागपाशं चाङ्कुशं स्याद्‌ बीजपूरकम्‌ ॥ २७ ॥ ` 
1 ` [इति महाकाली ५] 
(षमपन्नख १ पद्मनाभस्य ) कुसु (मे? मो) 
५ नीलो हरिणवाहनः 
ब्रीजपूराभयं चेवात्तसत्रं नकुलं तथा ॥ २८॥ 
ध [इति कुषठुमः £ | 


निन ५ 


`  २४। वर इति क्षनायक इत्यर्थः । 


२९। दक्षिणाधर्च खष्टित इति खुकिमेण अनुरोमेनेत्यथैः ! - दक्षिणाधक्व इति । ५ 


५ दक्षिणयोहस्तयोरधःक्रमेण । 


२८। यद्यपि '्दमपन्नख' इत्यत्र श्द्प्रमस्यः इत्येव शुद्धिः स्वाभाविकी पदरभरभ 


(5 तथाऽपि मूले तथाव्रिधपारानुपकम्भादियं शदधिरस्माभिं भारिं 


सप्तमोऽध्यायः | १३७ 


णैः स्यान्मा ( तङ्क १ तङ्ञो ) गजवाहन 
) शरलीपाशं चाङ्कशं च नकुटं तथा ॥ ३ 
[ इसि मातङ्गः ७ | 
शान्ता [ भवेत्‌ ] सुवर्णास्या गजारूढा चतु जा 
वरदं चाक्षसूतं चाभयं तस्मात्तिशूलकप्‌ ॥ ३१ 

[ इति क्लान्ता ७ ] 
चन्द्रपरभस्य विजयो विनेवो हंसवाहनः 
द्विभुजो नीख्वणेः स्याच्क्रं च मुद्ररं कमात्‌ ॥ ३२ ॥ 

[ इति विजयः ८ ] 

` भ्रुकुटिः पीतवर्णां स्यात्‌ सिंहारूढा चतु जा । ` 
खड्गं तथा सुद्ररस्च परशु खेटकं कमात्‌ ॥ ३३ ॥ 

[ इति शङ्करः ८ ] 
अजितः पुष्पदन्तस्य कृमारूढ ८) सितो भवेत्‌ । ` 
बीजपूरात्सूत्रच कुन्त नकुलं कमात्‌ ॥ ३४ ॥ ` 

[ इत्यजितः, जयः ९ ] 
सतारका श्वेतवरणां ब्रषारूढा चतुभुजा। ` 
वरदं चाक्लसूलं चाङ्कशं च कशं भवेत्‌ ॥ ३५ ॥ 


[ इति खतारका ९ ] 


णोमा 
म ~ -~- ॥ ॥ - 


३०। नकं वा्ययन्त्रविशेषः । 


¦ 
1) 


पूर्वपदे सन्धिला विकृतिरप्येतदेव मतमनुद्ुरयति । 
३३। श्रङुिसित्युदेश्ोके (५७१४ ) । 


३२ । त्रिनेत्रः इत्यन्न 'द्विने्रः इति पाठः श्रेयान्‌, द्वि्ुजमूर्तौ ने्रत्रयस्थ विरख्दक्णेनत्वात्‌ । | ६ | 


शदेन 


३६ । 


[ इति ब्रहम १०1 


[ इति यक्षद्‌ ११ | 
| चतुरसंजा गोरवणां मानी सिंहवाहना 
शङ्कं वरदं हस्तं नकुं सुद्र(लं ? र) तथा ॥ ३६ ॥ 
(२ | | [इति मानवी १९) 
 वासपूज्ये कुमारः स्याच्‌ श्वेतो वें हंसवाहनः 
मातुलिङ्कश्च बाण धनुनकुमेव च ॥ ४० । 


४ [ इति इमारः १२ | 
पसुखः श्वेतः (शिषी ! शिखि) स 


बाणं खडगञख पशात्तमभयाङ्गशखेटकम्‌ । ` 


॥ ~~~ ~. १ क 


थः फृलचक्रत्‌ ।॥ 1 


३६1 श्लेतञ्ुखोजश्वरः इति वा, भ्नेतमुलोऽक्वगः' इति वा शतमुखाम्बुजः इति 
1 ह चा ल्यात्‌) अतिसाहसं पुन यक्चशरा्टभुजोऽक्जगः* इति कल्पनम्‌ । लङ्मिति 
 मातुज्गः, अशुर फरुविरशेषोऽयम्‌ । 


४० । बासपूज्यस्य यक्षः कमासेऽनेन रक्चितः, क्रमप्राप्ता क्षासनदेवता चण्डा 


घनन रक्षिता, तदयं छिपिक्तप्रमादो वा ग्रन्थतः स्लरनं वेति खधीभिश्रिन्तनीयय्‌ । == 


५. इति ह्पावतरे । = 


प्रचण्डा यामव स्याद्‌ अद्वाख्डा चतुभजा । 
वरदं च तथा राक्तिगदाम्बुजमनुक्मात्‌ ॥ 


कुरप्र्‌ ॥ ४२ ॥ 
[ इकति पातालः १४1 


[ इत्यद्कुशौ १४] 
 किन्नरच्िसुखो धमं लोहि(ते १ तः ) कूमेवाहनः। ` 
बीजपूर गदां चाभयाक्तषमा [ ला | ज्जनाङुलप्‌ ॥ ४४ ॥ | 
| [इति क््नरः १९] | 


| उत्प । चाङ्गर हस्तेऽभयं पद्यं कर 


[ इति कन्दर्प १९ ] 

गरुडः शान्तिनाथस्य श्यामः शूकरवाहनः 
 वाराहवदनो बीजपूरपद्माल्लनाकुलेः ॥ ४६ ॥ 
| [ इति गडः १६] 
निर्वाणो गोरर्णा स्यात्‌ पदमारूढा चतुयुजा। ` 


पुस्तकं चोत्पटं पद्यं कमण्डलुः कमाद्‌ भवेत्‌ ॥ ९७ ॥ ` 1 
| [इति निवांणी १६] == ` 


त ^ ०.५ 
तिमिना तेतेन क नण न - । 


४१। बहुवारं षण्युख इति सम्भाव्यते भयुघबाह्ल्यद्शनात्‌ ॥ = ` 
 ४२। त्रिञुखत्वात्‌. पातारः षडूभुन इति षदेवाऽध्युधानि । 
 ४४। किनयेऽपि ज्िष्ुल त्वात्‌ षड्जः । 


1 
॥ 
(॥ 
॥. 
॥0 
| 
1 
॥1 
| 
॥ 
॥ 
॥ 
| 
| 
1 
॥ 
। रीः 
[४ । 
1 ॥) 
17) 
+: 
¦ च 
[शि 
॥ 
| 
0 
4. 
| 
| 


। श 


दैवतामूलतिप्रकरणम्‌ ति 


[ इति गन्धर्वं: १७ 1 


[ इति बला १७ ] 


 अस्नाथस्य यन्ेन्दरखिनेवः शोषवाहन 
षण्सुखः श्यामवर्णा(स्या ? स्यो) मातुलिङ्ं शिरस्तथा ॥५०॥ 


खड्गं मुद्ररपाशो चाभयाक्लाङ्कशशरकप 


. खेटं धनुश्च नकुलं सुजा द्वादश कीततिताः ॥ ५९॥ 


नोपल माके १।॥ ५२॥ 


[ इषि यक्षे १८] _ 
धारिणी यल्िणी नीखपद्यव्णासनस्थिता । 


[ इति धारिणी १८ ] 


‡ मष्ट (सुतःलितः) (कुषोरोहकुबेरोऽथ) रथारूढश्चतुमेखः। 


छष्णवणां चतुहस्ता पद्यस्था धरणप्रिया। 
वरदं चान्सूत्रच शक्तिवें मातुलिङ्गकम्‌ ॥ ५९ । 


0 नलो वरुणो यन्तो धवछो सुनिसुत्रते । 
इषवाहश्चतुकक्तो जटामुकुटमण्डितः ॥ ५५ ॥ 


 वरपशुटमभया सुद्र शक्तिलङ्कम्‌ ॥ ५२ ॥ 


[ इति ङबेरः १९} 


[ इति धरणप्रिया १९] 


तान 


॥ ९९। पञ्च कभिति षरवमित्यादिवह्‌ बाडुविरोषणम्‌ ; पष; पर्पयायः! == ` 


सत्तमोऽध्यायः | १४ 


त्‌ ॥ ५६॥ 
[ इति वरुणः २० ] 


र्कप््‌ ॥ ५.७॥ 
[ इति वरद्न्ता २० 


८ प्रोक्तकायो १ ) ॥ ५६ ॥ 


ष कः [ इति गान्धारी २१] 
> मिनायसय गोमेधो नर(स्थाछ्िमृषर ! स्थश्िमुखः) सितः 


[ इति गोमेधः २२] 


अङ्कशं च तथा (पुषपलै) त(थास्या) हस्तेषु कारयेत्‌ ॥६१ 
| [ इति अम्बिका २२ | 


९९ । अक्षमिति ! अधंमिदं # श्द्टेरायुधप्रतिपादनपरमाहो गान्धायां इति न 


निश्रिनुमः। दास्यां द्वास्यामधौभ्यामेकेकल्य रुक्षणसमाश्षिरित्यत्मिन्‌ प्रकरणे हश्यते, 


 ततक्तमादेरे तु गान्धार्या आयुधप्रतिपादनपरमिदम्धमिति भवति । 


 भक्षवव्रपरन्चुनङ्कलं(मथावुस्तु ¶गान्धारी यक्षिणी । 
घरखड्गसेरल्ग हंलार्ढा(च्तिता कायो) ॥ = ` 


` इति रूपावतार एतन्मतप्रतिपादकम्‌ भपरित्यत्तमूखवोषविषमं पथम्‌ । | 
६१। 'सिहारूढाम्वि(कका)का(वीया) उमनागपाशकम्‌ः इति श्पावतासपाध्प्या- = = ` 
` छोचनया "वि्टाङडास्विका मातुखिङ्खज्च नागपाश्चकम्‌? इति पूर्वाधं पाठः सम्मन्यते । | | 


^ 
6 


६ ॥ 


| | [ इति सिद्धायका २४ ] 

# | | [ इति जिनानां यक्षयक्षिणीमूक्तयः | 1 | 
अथ द्ितीयभेदेन चक्रे (भ्वरी ) 4 

दादशमुजाष्टचकरे वजयोद्रेयमेव च! ` . 

मातलिङ्ाभयं चेव पद्यस्था ग(रखो ? स्डो)परि ॥ ६६ । 

केरासमोशरणाब्जसिद्धावत्तिसदाशिवम्‌ । 

सिंहासनं धमचकरसुपरीह चललयप्‌ ॥ ६७ 


 ६९॥। एतेषां जिनानां श्ाखनदैवतानाञ्च मध्ये चत्वारो सख्या इति रूपमण्डनपर्या- 


 छोचनया प्राप्यते| तथा च शपमण्डने-- 


जिनस्य मू्तंयोऽनन्ताः पूनिताः ८ सौल्यसवं १ सवंसौख्य )दा । ५ ५ 
 चतल्लोऽतिशयेयक्तस्तासां एूल्या विशेषतः ॥ । 1 1 
श्रीजदिनाथो नेमिश्च ( पवं ¢ पाष्वा ) घीर (चतु १ चतुर्थकः । 
` चक्रे ( चर्या! श्वय )म्विका पञ्चावती सिद्धायकेति च॥ ० 
1 ॥ इति (अ० ६, श्छो० २५२६)! ` 
५. ६७! . करसं सोमश्चरणं ( सिधि ! घिद्धि ) वतिक्षदाक्षिवम्‌ । ५ 
४ सिष्टासनं घरचह्ुपरोन्द्र तपत्‌ ॥ इति इयप्ण्डते (अ= ६, श्छो० २७) । 


सप्तमोऽध्यायः । व १७३ 
॥। प्रतीहाराः ] | ॥ 

धुर द्रो पद्य कश्च सुनाभः सुश्दन्दभिः 
इत्यष्टो च प्रतीहारा (वि ? बी) तरागे तु शान्तिदाः ॥६९ 
| [ प्रतीहाराणां स्वश्पम्‌ ] 

फलवजाङ्कशं दण्डमिन््रसव्ये (ध्जजय)स्तथा। ` 
द्रो वजो फरदण्डन्तु महेन्द्रस्य विजयस्तथा ॥ ७० ॥ 
( यवायुथयोगोद्धवा लिपथचफणतोऽद्भ गाः १) । 
 धरणेन्द्र८) पद्मकश्च सर्व॑शान्तिकरो स्मरतो ॥ ७९ ॥ 


यन्तरूपाधिका(रं च) राश्च) निधिहस्ताः शुभो(दरा दयाः)। ` 


सुना८भं ? भो) इन्दुभिश्चेव स्वे शान्तिप्रदायकाः ॥७२॥ 
 इत्यष्टो च प्रतीहारा जिनेन्द्रस्य च शान्ति(दः १ दाः ) । 
नगरादिपुरगामे सवविघ्रप्रणाशनाः ॥ ७३ ॥ 
मुत्तयथं विश्वमेतद्‌ भ्रमति च बहुधा देवदेत्याः पिशाचा 
रक्तो गन्धवयन्ञो नरमगपशवो नेव मुक्तिं विजग्म॒ः । 
एकः श्रीवीतरागः परमपदसुखे सक्ति(ना(मागे)विरीनो 


* वन्यस्तना(ग्य)जेनः सुरगण(म)चुजैः स्व॑सोख्यस्य ` | 


हेतुः ॥ ७९ ॥ 


इति शीन्तेनात्मज ( सूत्र )भ्न्मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे रूपावतार 


जिनमूत्तिचतुविंशतियक्तयक्तिण्यधिकासो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ ५ | 


१५५ भो के पमो के ९ ॥ 


 गोधासननोपरिस्था च क्‌ 


८ ` षष्टे शवे शिवमूत्तिः शिवरिद्धानि प्रसङ्गतो मण्डपतिषये विशेषाश्न प्रतिपादिताः । अन्तरा 


व्या सवेकामद्‌ा ॥ १॥ 1 
व [ इति गौरीमूर्तीनां सामान्यलक्षणम्‌ | ४ | | 


खण्डा तोतला वेव त्रिपुरा द्वादशोदिताः ॥ २ ॥ ५2 
[ इति गौय | | 


[ इत्युमा ] 


 अभ्रिककुण्डोभये पन्ते पार्वती प्वतोद्धवा ॥ ९ ॥ 
| | [ इति पावती ] 


१। पञ्चमाध्याये वेष्णवप्रकरमे श्िराशक्ररक्चमं विष्णोम्‌ स्यंन्तराणि च प्रतिपादितानि । 


नु क 


 सक्षमे जेनाधिक्ठरि जिनतहुषासकतच्छासनेवताः सरक्षणाः साभिधानाः प्रतिपाचा्मे १ 


` क्ञाक्ताधिकरे शक्तीनां शूतीवक्तमासां गोर्वशतथा मूरीभूरता गौरी लक्षयति--अथेति। श्वतु- ` 
जा त्रिनेत्रा च सवौभरणमूषिते*ति भविशेषेण सवासामेव गोरीमूत्तीनां लक्षणम्‌ ; अत एव प्रत्येक- ` 


( 0 रिखितानि । ८ | 


` रक्षणे भुजनेन्नादीनामुद्येलो न कतः । शगोयौः प्रवक्ष्यामीति रूपमण्डने पाठः । (६।१ ) । ध ५ 4 
` २। कास्तावहु गोयं मूत्त॑य इयपेक्चायासाह--उमा चेति । अयमासाम्‌ उश्चः। हष | 


४। “अभिङ्कण्डोभये पक्षे इत्यन्न षपश्षद्रयेऽभिङ्कण्डञ्चः इति शूपमण्डने ( ९।२ ) कहज्वरथं 


[ इति श्रिया ] 


डषु कृष्णा नाम सुशोभना ॥ ८॥ 
| [ इति इष्मा ] 
 हिमवन्ती शेटराजी ( शब्दवस्यात्‌ परीसुता ? ) 
(पद्मदप्णोभवा १) तु वीवाहे तु माहेश्वरी ॥ & ॥ 
[ इति हिमधन्ती ] 


छ ॐ 


कमण्डल्वन्तवजाङ्कशं गजास- 


[ इति रम्भा ] 


1 


६। छखिता रूपमण्डने नास्ति । 'सिद्धवामरसेविते'त्यल्य "विद्धामरनिपेधिते'त्यथं तात्प ( 


चा छतश्डौ प्रे तातपर्य घेति चिन्तनीयम्‌ । 


८। पञ्चाश्नयश्च ङण्डेष्विति उभयतः पाशर्वयोरधिङ्ण्डपञ्चकान्वितेत्यथंः । अन्न व्पक्च- 


` इयेऽश्िुण्डञेःति पाव॑तीवदेव पाठो भवेन्न वेति चिन्तनीयम्‌ । इयमपि रपमण्डने नाति । 
हिमवन्त्या रक्षणं पाठविकाराद्‌ दुश्तेयम्‌ । इयमपि रूपमण्डने नास्ति! 


 १०॥ ला रम्भा प्रतीतोदभवदुरूपा प्रतीतं ल्यातम्‌ उडभवह्‌ रूपं यस्याः तादी, यस्या ` 
श्प प्रतिक्षणमेव नवनवीभूतं सत्‌ प्रख्यायते हत्यर्थः । सोपसगंण भवतिना चत्तमानकाङ- = ` 
भाविना करन्ना च रूपस्य प्रतिक्चणोत्पच्मानत्वं म्यते । सपमण्डने- ` | ध. 


 देषता--१९ 


(असा) प्रतीतोद्ध८वा ? वद्)रूपा रम्भा च सवेकामदा ॥१०॥ 


8. 1 देवताभूत्तिप्रकस्णम्‌ 


) 


।कायप्रटः प्रदादापर्‌ )॥१२॥ ` 
[ इति न्िखण्डा | 


५ 


शत दण्ड (श्वेतचामकरेण्वेतचामरकं ) तथा । ` 


 भ्वेतदेहा भवे दहीिवी › तोतला पापनाशिनी ॥ १३ ॥ 
[ इति तोत ] 


पाशाङ्शाभयवरं चतुर्हस्तेष्वनुकमात्‌ । 


त्रिपुरा नाम संपञ्या वन्दिता विदशरपि॥ १४। 
[ इति ज्रिषुरा 1 


इति द्वादश गों 
वच्यामि गोर्यायत (नं ! न) मप्‌ 


वाने (स्याद्ि!लिद्धः) धिया सोम्ये सावित्री चेव पश्चिमे ॥ 


` (पृष्टिशृषष्ठं ) कणं तथा इाभ्यां भगवती सरस्वती 


ईशाने च गणेशः स्यात्‌ कुमारम श्ाभिकोणके ॥ १६ । 


2 | | इति रम्भालक्षणमुपलस्यसे । 


 कमण्डलवक्षसूत्रचच विञ्नाणा बजमङ्शम्‌ । ` ऋ 
गजासनस्थिता रम्भा कततंन्या सर्वकामदा ॥ (अ० ९, इछो० ९) 


१२ चनिखण्डा रूपमण्डनं न मण्डयति । 


१३1  शूाक्षसूत्रं दण्ड विभ्राणा चैव चामरम्‌) 
तोता कथिता चेयं सवं( कोप ? पाप )प्रणाशिनी ॥ 


(५ ` इति निःसन्दिग्धाथः पाठो रूपमण्डने (अ० ५, श्छो० ६) | | 
१-१७। गो्यायतनं कक्षयति-तरद्यामीत्यादिना। वमे इति दषिगस्यां दहि, ` 


अष्टमोऽध्यायः १४७ 


सदा प्रिया ॥ १७ ॥ 


[ इति गौर्यायतनम्‌ ] 


यापक म सा भवेत्‌ ॥ १८ । 
 अभयाङ्कशपाशदण्डम्‌ अजितासव्येऽपराजिता । 
अभयवजङ्कशदण्डं विभक्ताङ्कशापसव्ये मङ्गला । ^ 
अभ( यायं ) शहूपद्मदण्डं मोहिन्य( पि सव्ये सभिनीएपसव्ये ` 
स्तम्भिनी ) ॥ १६ ॥ 
 ज्ञया च विजया चेव थजिता चापराज्ञिता। 
विभक्ता मङ्गला चेव मोहिनी स्तम्भिनी तथा । 


न -- ~ 


 गोर्यायतने शस्ता (चश्च) अष्ट (स्याद्‌!स्युःदारालिकाः॥२० ` 


^ - | [ इति गोर्याः प्रतीहाराः ] 


॥ ण ४ ~. ध 


` इाभ्यामिति- 
ृटकर्णद्ये काया भगवती सरस्वतीः ५ 
इति खुपमण्डने (अ० ९, श्छो० ९ ] संस्कारछ्ुद्ः पाठः । अत्र. रेक्ञानान्नेययोवक्यमाणत्वात्‌ = 


सोभ्य इत्युत्तरस्याम्‌, एतेन पश्चिम्या प्रतिमेति अन्थकर्तरभिप्रायः प्रतिभाति । पृष्ठे कणं तथा + | 


 श्वृ्ठक्णह्वय्फेन वायुनेकरंतकोगद्वयं बोध्यम्‌ । एवञ्च -प्ध्यवत्तिन्यां प्रतिमायां पू्वास्यायां = 
सत्यामेव वायुनेवर॑तकोगद्वयं पृष्ठतः स्यादिति पूवं पक्चिमास्यपरतामवरूम्ब्य यहु व्याख्यातं 


ध तदु व्याहतमित्यन्यथा व्याख्यायते--वामे वामभागे पूर्वास्यत्वादुतरस्यां दिकशीत्यथं सोम्ये 
दक्षिणे भगे दक्षिण्यां दिक्रीत्यथः । | 


अन्न गौ्यीयततने पूर्वस्या दिशि मूरिविशेषाश्रवणात्‌ 'लिङ्खलस्यम्रे न कत्तव्य ह्यर्ाक्पेण = | 


परत्वव्याख्यानाह्क 


देवताः (अ० ३, इछो०-) इतिवदत्रापि गोयं मूतिनं विधेयेत्यायाति, तत्र लिङ्गपदस्योपरुकषण- ` १ (1 | 


 १८.१९॥। इदानी गौयाशरतखु दाष चतो द्वाराल्किा भाह--अभयेति। पूोदितः = | 
प्राद्षिभ्रेन ( पूर॑-दक्षिग-पशिमोत्तरक्रमेण) प्रतिहवरं दं द द्वारपालके वामदक्षिणोदुम्बरयोः 


[ इति गणेशः 


तत्व 


कमेण काय इति वर्तुराथेः । तत्र एवं द्वरे वामौदुम्बरे जया दक्षिणोदुम्बरे विजया, एवं दक्षिणे 
 अजितापराजिते, पश्चिमे विभक्ता-मङ्गले, उत्तर मोहिनी-स्तम्मिन्यो इति ज्ञेयम्‌ 

अन्न मविजया नाम खा भवेत्‌ः (१८) इत्यत्र "विजया तामसा भवेत्‌? इति रूपमण्डने 
(अ० ९, शलो ११) प्रामादिकः पाडः, प्रतिद्वारं इारषारिकानां यथाश्चुतद्वित्वभङ्गपसङ्गात्‌, 
अनूकश्छोके तामसाया अपाटाचच । उखबोधा्थं चित्रे गौर्या भायतनदेवताः प्रतीहारश्च 
भिवेभ्यन्ते-- ` | 


[ गौर्थायतनम्‌ | 
मोहिनी स्तम्भिनी 


श्वा ठ 


॥ 


सिद्धिः ` च 


सावित्री | । 


1 


€& 


ं ॑ अपराजिता अजिता | ॥ 
71 [ को्ठमध्ये यथोक्ता भयतनदेवताः । कोषठाद बद्धद्ंोदवयोक्ीरोदुम्बरथोः पूवक्करिमिग | 
1 ध यथोक्ता जयाविजयादद्वारदेवताश्च ] (१ | ^ 
२१। अथ गणेशमूतीराह--दण्डच्चेति । अत्राऽऽद्ञं श्रोकत्रयानन्तरम्‌ “इति देर 


अष्टमोऽध्यायः १७६. 


वत्त त्रिनेत्र हेरम्ब गणेश्वरम्‌ 
बक च समारूढ सवकामाथतस्ताधकप्र्‌ ॥ २३॥ 


। ॥ि इति हेरम्बः 
रक्ताङ्गो गजवक्तः स्थाद्‌ रलकुम्भं तथाऽङ्शम्‌ । 


परशु तथा द्‌(न्तोन्तं ) दक्तिणाधःकरक्रमात्‌ ॥ २४ ॥ 
इति गजानन 


इत्येवं पुष्पिका हश्यते । परं प्रथमश्छोके चतुर्णाम्‌, द्वितीये च दशानामायुधानां दशेनादिषट | ॥ | 


गणेशस्य पृथक्‌ रक्चुणाददंनात्‌, रूपमण्डने ( अ० ९, शछो० १६-१७ ) उभयोरेव प्रथक्‌ रक्षण- 


दुशषेनाच्च एतचृश्छोकानन्तरम्‌ [ इति गणश्च: ] इत्येघं बन्धन्यन्तः युष्पिकंका निवेशिता । क्षिल्प- 


रत्ने आयुधानां मेदो इष्यते यथा- ` 

विध्नेशं सपरद्वधाश्चवटिकादण्डोलसलण्डक- 

, दौभिः पाक्षदणीस्वदन्तवरदाव्येवा चतुभियंतम्‌ । 
छुण्डाप्रा हितबीजपूरमुस्छुश्चि चीक्षणं संहरेत्‌ 
सिन्द्राभमिभास्यमिन्डुशकराधयाकल्पमन्जसनम्‌ ॥ 
( क्ि० उ० अ० २५ इछो० ९७ ) 

इति । परमिदं गणेक्चस्य वा वध्यमाणवक्रतुण्डल्य वा रक्षणं नोभयोशपि वेति उधीभि- 
मान्यम्‌ । तत्र तु भथ बीजगणपतिःरित्युपक्रम्य रक्षणान्येतानि र्लितानि इश्यन्ते । 


२२। इदानी देरम्बं निर्दिशति- वरमिति । अत्र कण्ठतोऽनुक्तत्वेऽपि एतन्मते भयं दशयुज ` | 
इत्यायाति, आयुधानां तावतसंख्याकत्वदशंनाद्‌ । स्षिल्परत्नेऽपि अथ देरम्बः" इत्युपक्रम्य = | 
 सा्धश्छोकत्रयेण तदक्षणयुक्तम्‌, तत्रापि दशसुजत्वमेव हर्यते ( उ० अ० २९१ श्छो० ५८-६१)। | 


ख्पमण्डने तु-- 
घरं तथाऽड्क्षं दण्डं दक्षिणे पादवंभागयथोः | 


वामे कपालं बाणाक्चं पाश्चं कौमोदकी तथा ॥ 
( भ० ९, शछो० १६ ) इति विषमः पाटो विषमा चोभयतः पारश्वंयोरायुधस्वना दृयते । ' 
२३। पञ्चवक्त' त्रिनेत्रमिति गणेकेरम्बयोः साधारणं रक्षणम्‌, गणेशरक्षणे वक्तूनत्रयो- ` 


रलुदैखात्‌, अत एव श्देरम्बन्च गणेदवरःमित्यन्नोमोरेव विशेष्यपरताऽभ्युपेया न त्वैकेल्य = | 


:- निचेकनपरवा ऽपि । 


इति वक्रतुण्डः 


[ इति क्षिप्रमणपतिः 1 


| मा 


।  गणपततिप्रस्तवे-- 


२९ । वक्रतुण्डं रुक्षयति--रुम्बोदरमिति । वप्रमाणान्तसनुपलम्येऽपि भ्रन्थद्ता इषया 
पुष्पिकथा वक्रतुण्ड एवायं न छम्भोद्र इति जानीमः 
२६ 1 उच्छिष्गणपतिमाह--उच्छिष्टमिति । अयं रूपमण्डने नाष्ति । शिल्परत्ने तु बीज- 


 रक्ताश्वमारां परञ्च दण्डं भध्यज्च दोभिः परितो दधानम्‌ । 
हेमावदातं त्रिरं गजास्यं रम्बोदरं तं शिरसा नमामि ॥ 
( उ० अ० २९; इरो० ९९ ) 
इति प्रकृतोच्छिष्टगगपतिरक्षणान्वितः कश्चिहु गणपतिरुक्षितो इयते । “मदय” मोदकम्‌ । 


9 ५ २७ शखिन्दुसभमिति । नायं खूपमण्डने न वा शिल्परत्ते उपलभ्यते । पूष द्वार्विक्ञ- 


१ श्रयोषिशरोकाभ्यामेको हेरम्बो रश्चितः पुनरपरोऽपि र्यत इत्यहो हेरम्बप्रहिरुता अन्थकतत : । 


२८ । पाशाद्कश्चषाधिति । अयमपि शपमण्डने नाह्ति, अस्ति च शिल्परत्ने ; परं तत्र 


(0 ` अङगस्थाने शस्वरदः' पदं करोति। तथाच- 


शतपा्ञाङ्कशकस्प (क) रुतिकास्वरद्श्च बीजपूरयुतः 
शशिदाकरुकलितमोङिक्िरोचनोऽखणतनुश्च गजाननः ॥ 


 इति। एवन्रात्र शशङ्गमिःत्यत्र द्दण्डमि!ति पाठः कल्पनीयो न वेति सुधीभििन्तनीयम्‌ । 


अष्टमोऽध्यायः | | १४१ 


इति गणे शायतनम्‌ 
तजनी परशु दण्डमविन्नो दण्डहस्तकः ॥ ३० ॥ 


नीदण्डापस्ये स भवेद्‌ विघ्नराजकः! 
तजेनीखडगवरदं दण्डहस्तः सुवक्त्‌कः ॥ ३१ 


00०0० 


२९} इदानीं गणेक्षाथतनदेवानाक--उनत्तर इति ! रेखक्प्रमादादत्र कोणदेवताप्रतिपादकमेक्ं 
पं श्टितमिति सम्भाव्यते । तचच- 
वामा गजकणन्तु सिद्धिं दध्याचं दक्षिणे । 
पृष्ठकणं तथा द्धौ च धमको बारुचन्द्रमाः ॥ 
( रूप० अ० ९, श्छो० १९) 


इति रूपमण्डनो वदेव भवेद्‌ इति सखस्मावयामः । 


३० । गणेशप्रतीहारानाह--सवं इति । रूपमण्डने (सौम्याश्च पुरषाननाः' इति द्ितीय- 
दे छलसेव्यः पाठः ।! अष्टौ गणेशप्रतीहारा दक्षादिद्ारतो युग्मशः स्थापनीया इति बह्त॑दा्थः। = 
क्रमस्तु गोर्यायतनदष्व्या ससुननेधः । शिर्परत्ने एकेकं ृक्षमाश्चिताभ्यामग्रादिदिशषसरङ्वतीस्या 


द्वाभ्यां दास्या दारेवताभ्यां गणेश्ायतनमद्ुतमिति हश्यते । तथाच-- 
अग्रेऽथ विल्वमभितश्च रमारमेशौ तदक्षिणे वरजुषौ गिरिजादषाञ्ञो । 
पृष्ट ऽथ पिष्परुजुषो रतिपुष्पबाणौ सव्ये प्रियङ्मभितश्च महीवराहौ ॥ 
| ि | ( उ० अ= २९, श्छो० ४६ ) 
इति । एवद्धेषां यथाक्रममायुधानि च तत्रैवोक्तानि-- | 
ध्येयो च पश्चयुगवक्रदरेः पुरोक्तो पाशाङ्ङकलाल्यपरनुत्रिशिखेरथान्थो । 
 युग्मोतपरेश्चुमयवापशरेस्तृतीयावन्त्यो शुकाहकरमाप्रगदारथाद्धैः ॥ ` 
््‌ ॥ ( उ० अ० २५; शछो० ४७) 


इति । परमिदं प्रतीहाराणामायतनदेवतानां वा रक्षणमिति यद्यपि दुस्तरेयम्‌, तथाऽ्प्यादुधः = 

` दर्शनात्‌ प्रतीहारा एवैते इति निधिनुमः नाऽऽयतनदेवताः, आयतनदेवतानां कापि प्रहरणा. ` 
बुषरभ्धेः। ` 0 व | 1 
 ३१। अघर चतु॑वरणे दण्डहस्तः छुवस्कः' इति रपमण्डने (अ० ५, इछो० २२) पाडः । ` 


 गण्डकंश्चि(रक कुरे यः म हन्‌ 
स्थानीयं ये) खेटनगरे भुजा दादश कस्पयेत्‌ 


न ~~ "न 


३०५ 1 द्वा्रिंशष्लोकतुल्यमिष्टं पं सम्पातायातमिति सम्भाव्यते । 


३६ । कात्तिकेयमाह--कात्तिक्रेयमिति । स्थानभेदेन स्थाप्यमानोऽयं श्वि-चतु-हादश- 


शुजल्येन त्रिधा मवति। त्त्र स्थानीय खेदनगरे वा द्वादशजुजः, खर्वटे चतुर्भंलः, प्रामेवनेवा 


1 द्विभुज इति शिल्परतवस्मतं तत्वम्‌ । तथाच-- 
| ह्थानीये खेखकै वाऽपि कमारो रिष्यते यदा 

सुजा द्वादक्च ऊर्वी खवटे चतुरो युजाम्‌ । 

ग्रामे वने द्विबाहुः स्यात्‌.“ "इति । = | 
५ ५ ( शिल्प० उ० अ० ३५ शछो० १२९-१३० ) 
 ("कमण्डलोद्वणीभ्‌ः इत्यत्र ककरलोद्रव्णाभम्‌" इति सरूपमण्डने पाठः ( अ० ९, शलो 
 २६)1 एवन्च (तदणादित्यसप्रभमिश्त्यनेनोज्स्वल्यम्‌, "कमललोदरव्गाममिश्त्यनेन च वर्म. 


पर्वः प्राष्य | | | 
| ३७। श्यानीयं खेनगेे' इत्यत्र स्थानीय खेटके वाऽपिः इति. किस्परत्ने श्थापनीया- = 
| (: ६ ( खेटनगरे() इति सूपमण्डने पाठः । गण्डकश्चिङ्करेयं क्तमिति गण्डेश्विरुम्बिभिः केशैः ` 6 1 
शाहपाक्चः इति प्रविद्धैः शिखण्डकविरेते्यक्तमित्यर्थः। ` ४ 


धनु ( : ) पताका सुश्च तजनी तु प्रसारि(काता) 
खेटकं ताञ्चचूडश्च वामहस्तेषु शस्यते ॥४०॥ 
[ इति द्रद्शभुजः ] 
| द्विजस्य करे शक्तिवामे ( स्याऽन्यः ) कृशुटोपरि । 


५. [इति हिनः] 

चतुभूजे शक्तिपा( शो! शो ) वामतो दक्षिणे ( च 1 
[म 7 सः १ तसिः )॥४१॥ ` 
 वस्दोऽभयदो वा(पीएपि) दल्ति(णे स्या!णः स्यात्‌ ) तुरीयकः। 
| १.४ [ इति घतभंजः ] | 


य( मयंमिमं ) शुरं कत्तेव्यं सवेकामदम्‌ ॥ ४२॥ 
| दति कालिकेयः। 


१ 
ति ममका 


ति 


` स्थानीये इति स्थितियोग्ये खेटनगरे कषकग्रामे इत्यथः । ` | 


१. भ ३८। ख्बटे क्षद्रनगरे । रूपमण्डने-- ५ 
चतुर्भुजः कपटे स्याद वने ग्रमे बाहुकः । ` 
दक्षिणे शाक्तिपाशश्च खड्गं पादं त्रिशयूलुकस्‌ ॥ इति ५ 
( अ० ९, भ्छो० २८ ) । 
५ ४९१॥। वामे करे शक्तिरन्यः करः ककुटोपरीत्यन्वथः । । 
`  ४२। तुरीयकं इत्यत्र तुरीयकमिति रूपमण्डने प्रामादिकः पाठः । 
देषत्ा--२० 9 | 


अस्यानन्तर(त १ तो ) (से १ चय) नव दर्ग 


१४४ देवतासूत्तिप्रकरणम्‌ 
पथरीखया वक्लयाम शाख्मेदेस्तु भेदिताः। 
 (शलीखया ( (रलीदलीला )शरीखाङ्गी “भराता च 
(ली }खावती ॥ 
त कानवा वारसूयेसमप्रभा 
वक्ता च सनेला च ( स्यस्व )रूपारूपदायिन 
 अक्तमाखा तथा कुण्डी अधोहस्तेषु कारयेत्‌ 
न हस्ता( वि? वी ) दशो सर्वा(ह्¶वृ)दहस्तो निगवयते ॥४५ 
मृणालयु(मे (मेः) रीलया चे रीखा स्यात्‌ पद्यपुस्तकेः । 
लीला म्री ? जगी ) पाशपद्याभ्यां टछिता च ( ब्जा १ वजा- , 


॥ ९॥ 


4 करोः ॥४६॥ ` 
 पाशाङ्क(श ? शेः ) रीखावती लोलया) पच कीसिताः 


इति पञ्चलीखयाः । 


शुभावहा) ॥ ४७। 


~न 


। ४२ । इदान पञ्रीरुया कषयति । पञ्रीरूया इति नवदुगादिवत्‌ छीरुयादिपञ्चकमित्यथेः। 


|  हपमण्डने लंदास्वल्पनिदेदिा आच्या पथी नादिति । विचिन्धन्तोऽपि वथं पत्नरीरया- 
शक्षणं ` समराङ्णसून्नवर का्यपक्षिल्प्िल्परतयादिषु नोपर्न्यवन्तः । 


५९ स्बौसामेवाधोदस्तेषु भक्षमारा ङण्डी चेति प्रहरणम्‌ ; उदु इल्तानः विषो ` 


वदयत इत्यरथः! 'छुण्डीत्यत्न 'अम्डुपात्रम्‌ इति खूपमण्डने पाठः । सवौवृद्ध हल्ताविति राश्य- ध | 


पेक्षया द्विवचनम्‌ । निगद्यत इति शरं परम्‌ । 


६। गणाख्युग्मेरिति हेष्तयोयग्मं युग्मं श्रणारूमित्यथंः, शद युग्मेः इति रूपमण्डने | 


0 । | | \. | 0 । | | | | ( पाह |. 'पद्यपुर्तकेरिःति बहवचनमधिवक्षितम्‌ 9 एवयुत्तरत्र । सवन्न विशेषणे तृतीय । 


४७ । नवदुगा भाह--अस्येति । सपमण्डने हारथगीक्षमहरी-हरसविदधयस्तिच ` एव ` 01 


॥ . ° दक्षिताः । पताः स्श्रतुबहवः 1! किमिति वाव एव केवरं ठक्षिता इति न कश्मामःः। = ` ४ 


भष्मोप्ण्यायः 


वरदं त्रिशूरं खेटं पानपात्रच विभ्रती । ४५ 
ली ता ॥ ५० ॥ 


मध्ये महाखदमी८) प्रकीरि 
[ इति सहारुष्मीः ] 


नन्दा नाम (संख्य! १ समास्या)ता पूज्यते नन्दहेतवे ॥५१॥ 


,  वर(दं ‰) लि पद्मं च पानपालं विधृत्‌ कर । 
क्तेमङ्करी तथा नाम क्तेमारोम्यप्रवायि 


॥ स्वती च तदा नाम ( सवेकृष्ट ? ) प्रदायिनी ॥ ५३॥ 
व [कि सवी] 

| खड्गं तथा व्रिशूलं च घण्टापात्रं तथोन्नतम्‌। 
` महरण्डा (तथोन्ञाम ? तथा नाम) वन्दिता लिदशेरपि ॥५४॥ 


[ इति सषहरण्डा ] 


| ४८। श्ेसकरीत्यत्र क्षेमद्करीःति लक्षणनिरूपण्वेरायाम्‌ | = 
| ४९। अनुक्रम करमेण एकेकल्याः कथयिष्यामि लक्षणमितिरेषः। = ` 
९० 1: नागनीखकण्ठयोषपद्म नप्रयोजनमयुसन्धेयम्‌ । | ध 


[ इति नन्दा | $ | 


1 १५६ दैवतामूर्तिपरकरणम्‌ 


| 
वु | [ इति रमणी | 
अन्षसूलं तथा वज्र घण्टापालं तथोत्तमम्‌ । | 


 सर्वमङ्ग(र ! ला) मङ्गल्या सवेविन्नविनाशिनी ॥ ५६ 


ध [ इति सवंमङ्ल ] 
 दण्डलिशूरं खटाङ्गं पानपालं च विभ्रती । 


रेवती च तदा नाभ सर्वशान्तिपरदायिनी ॥ ५७ ॥ 1 
। [ इति रेवती | 


कमण्डलु खडगडमर पानपालं तथा शुभम्‌ । 


` हंरसिद्धिस्तदा नाम सर्वस्य सिद्धिहेतवे ॥ ५८ 
६. ~ ~ [ इति हरषिद्धिः ] 
इति नवदुर्गाः । 


| | कत्तिकां मरुं विघ्रदक्षिणे तु करये ॥ ५६ ॥ 
८ वामे शूल कपाट च सुण्डमालोपवीतक 
` करोटि(नी १ नि)करोदारमाखाग्रन्थितरोखरः ॥ ६० ॥ 


इति स्े्रपालः । 


(मामन 


त १५८११०१५ 


५९ । उदेशश्छोके श्रमणी"ति चत्तते अन्र च श्रामगीति इयते, कतरदेतयोः परिवित्तंन 


महंतीत्यनिश्िन्वनिररूपाभिः कापि न व्यापारितो हस्तः, परं प्रथमपरित्यागे सानामावं 
मन्यमानेः पुष्पिकाां "श्रमणीति विहितम्‌ । | 


५९-६० । क्षेत्रपालं रक्षयति--क्षेत्रपारु इति । शिस्यरसेऽथमादौ स्ास्विकादिभेदेन 


( ।  चरिषा भिंयते सात्तिकथ्च द्विुजचतुरमुंजत्येन पुनद्वियेति साकल्येन चहर्विधः । रूपमण्डने 4 
नरक एव चतुसूनः। तथाच-- . 


|  कोति(किलोदा्समन्थितयोका 


 क्षत्रपारो विधातन्धो दिग्वासा धवण्टभूषितः ॥ = 
` (कात्तिक १ कत्तिका ) उमर बिश्रहक्षिणे तुक््धये। ` 
वामे श्रं कपाल युण्डमारोपवीतकम्‌ । 


तशर र ॥., इति.(म० ९, छोर ७४७९) | 


| 


अमोऽध्यायः १ १५७ ` 


ग, बिश्र(त्तीं १ ती) चाभयप्रदा । 


[ इति बाह्मी ] ` 


| [ इति महेश्वरी ] 
 कोमारी रक्तवर्णा स्थात्‌ षडवक्ता साकंलोचना ॥ ६५ ॥ 


रविबाहुमंयूरस्था वरदा शक्तिधारिणी । 
पताका बिध्रती दण्डं (पाः 


प्रसिद्धिरिति युज्यत एव ततसस्बोधनम्‌ । 


६२। यिङ्गली छव्ण॑म्‌। कज" पद्मम्‌ । दृरभिन्नमेवास्य रक्षणं रिल्परल- (ड० : ` 


` भ० २९; शछो० ७६ ) शूपसण्डनयोः ( अ० ९, शखो० ६ १-६३ ) । तयोरियं चतु्भंजा । 
६३। इयमपि चतुभंजा श्षिह्परलशूपमण्डनयौ 


।  ६९॥ साकंरोचनेति। घा अकंरोचनेति च्छेदः, अकंरोचना द्वादशनेत्रा। बद्वा, ` 
 भकंरोचनेः सह वर्तमानेति विग्रहः । रविबाडद्दशुजा । इयमपि शिल्परल-रूपमण्डनयो- = ` 
`  श्रतुभजा। 1 ~ | 


† १ पाशं) बाणज्च दक्तिणे ॥.६६। 


करोटीति । करोटिनिकरेण ररारास्थिसमूष्ेन प्रथिता या उदारा महती माला तया ` 
ग्रन्थितः शेखरः श्िरल्यकेश्जयो यत्य सः । अयमेव पाडः साधीयानिति प्रतिभाति, चलिल्परले ` 
(० ० २९; छो १०८) नानानागविभूवितत्वस्योक्तत्वेऽपि रूपमण्डनीयपाडश्निन्त्य एवं । == ` 
६१ । इदान सक्च मातुर्चयत्ति--अथात इति । जयः इति विवकमणोऽन्यतममानख- = ` 
ुत्रह्थ नाम ! शिल्पशा्खल्य प्रवक्ता विरवकमा बोदधव्यश्च ततुतरेष्वन्यतमो जयो नामेति 


दनी सहलटक्‌ सोम्या हेमाभा गजसंस्थिता । 
वरदा सूत्रिणी वज्ज विघ्रतयृद्धं तु दक्िणे 
वामे तु कटं पात्रमभयं तदधःकरे ॥ ५१ 


चामुण्डा प्रेतगा रक्ता विकृतास्याऽदिभूषणा 
| दं्ू(दा! टा) न्ञीणदेहा च गर्ता 
` विगाहः क्षामकु्तिश्च सुसर ( चक्रं १ चरकं ) शरः। 
`  अङ्कु(क् १ शं) विभ्रती खड्गं. `“ चाप्यथ वामतः ॥७३। 

खेटं पाशधनुरदण्डकुठारं वे! चे)ति विश्रती | 


 दैवतासूरत्रकरणम्‌ 


र 


खंटपाशाभनया ! य्‌ बाते नव चापि लसईभजा ॥७०। 
[ इति षाराद्दी ] 


[ इति रेन्त्री ] 


[ इति चाञ्खण्डा ] 


नशः ममा ०००,७८०५८ 
~ " ५. 


। | ४ | ५ ६९ । शहुःचक्राभयंरिति । वामभागे शहुचवक्रादिभिविरुषहञुजेत्यन्वय 1 
ज 9९1 ज्व इतवदुकरोण । 2 
| ` ७३१ द्धश बिश्ती खड्गं" इत्यनन्तरं बरुटितस्थाने सन्ये" इति स्थात्‌ । 


 वीरिश्वरस्य रूपं तु मातणामग्रतो भवेत्‌ ॥ ७८ ॥ 


 पएक्वक्ता८) चतुसु जा सुकटेन विराजिता८)। ` 


 अक्तपद्यं वीणापुस्तकं महाविद्या प्रकीर्तिता । 


[1 ५ ~न 


विति। अचर आध्न्तादिपदानि किसम्बन्थीनीतिन चिद्चः। म्मध्ये च मातृकाः कार्याअन्ते । 
तेषां विनायकः (अ० ९; श्छो० ७४) इति रूपमण्डने सनिवेशस्य पेपरीत्यं इश्यते! = 
` कतरदेतयोर॑क्ततरमिति क्िल्पिन एव निधारयन्तु । | | 


ओ इति। एताः सरस्वत्यो नेतरत्र छभ्यन्ते । यत्र यत्र पुस्तक्रमिति च्यकषरेण नाम्ना छन्दसो 
अषङृतम्‌, तत्र तन्न युल्तमिति पटेऽपि न क्षतिः । & 


॥ि अ्टमोऽभ्यायः भ १५९ १ 
र णिका भ्वेतवेणां स्या(जावा ? च्छवा)रूढा च षडभ॒जा 
रखा च छसल्यन्ता वरदा शूटधारि णी ॥ ७६ ॥ 


कृत्तिकां बिध्रती दन्ते पाशपात्राभयान्यतः | 


| [इति चण्डिका | 
इत्यह ? ता ) मातरः पोक्ता रूपभेदव्य वृस्थथा॥ ७५ । 


भेरवं कारयेत्तल नृत्यमानं विकारणप्‌ । 

णेशमादो करतव्यमन्ते कुर्याच मेरम्‌ ॥ ७६ ॥ 
मातृणां मध्यतः कार्याः प॑क्तिशो १ शः ) चण्डिकादथः। 
रवरिश्यर्‌(स्य १ श्च ) भगवान्‌ वृषारूढो धनुरषैरः ॥ ७७ ॥ 

( वीणाहस्त ¢ वीणां हस्ते ) त्रिश बाणं चेव प्रकारयेत्‌ । 


इति मातरः। 1 
[ अथ द्ादक्ष सरस्वत्यः | 0 


प्रभामण्डलरसंयुक्ता८) $ुण्डलान्वितरोखश८:) ॥ ७६ ॥ 


 [ इति सरल्वतीनां साधारणरक्षणम्‌ ] 


| इति महाविया-! ] 


अन्तं पुस्तकं वीणा पञ्च महावाणी च नामतः ॥ ८० ॥ 
| [ इति महावाणी-र 1 0 


७६ । प्रसद्माल्मात्रायतने कततच्यानामन्येवां नामान्याह --भेरवमिति । गणेलमादा 


 ७९-८० । इदानीं हाद सरत्वतीरुक्षयन्‌ प्रथममास साधारणं रश्षणमाह-एकवक्ता = ` | 


0 11 


अष्टादश(जया ! 


॥ि १६० ॥ देवताभूसिप्रकस्णम्‌ 


` { इति भारती--३ | 


[ इति सरस्वती-४ | _ 


[ इत्यार्था--९ | 


८२ | | 
[ इति ब्राद्यी-६ | 


[इति महाधेलुः-५] 
(म्बुजम्‌ ॥ = ॥ | 
[ इति वेदगम्म--८ ] 


[ इतीश्वरी-९ ] | 


। अल्पं १ अन्तं प्म) पुस्तकथ महाकरमीस्तथोतृपलम्‌ ॥८९॥ ` 


[ इति महारष्ष्मीः-९० ] 
अक्तं पद्य पुस्तकं च महाकाल्यभ धृ तथा 

(7 ॥ [ इति महाकारी- ११ ] 
ती ॥ ८५॥ ` 

[ इति महासरस्वती-१२ ] 
| इति द्वादश सरस्वत्यः । 
धुजा) कायां भद्रकाटी मनोहरा 
0 आरीदस्थानस्था तु कर्तव्या सोर्यदायका ॥ ८६ 


अक्तपुस्तकमभयं पं महासरस 


भ्र्तमाः त्रिशूलञ्च खड्गशचकं करेषु च 


|  बमेतु चाप कृत्तैऽयं शङ्कपद् 


तथेव च ॥८७॥ ` 


५ ता 
न ५०००-७ 


1 ८६ । आकीढेति। दक्षिणं पादुमग्रतः कृत्वा वामपादाङब्रनमालीदल्थानम्‌, तेन॒. = ` 
। ` सन्तिष्ठत इति भारीदल्यानसंल्या। = `` -. | ५ = 


` अष्टमोऽध्यायः । १६१ 


इशाक्तश्च कत्तव्य ! व्या) कष्णाजिनहूता९ 8 
स्ताना भटदकाल्यास्तु भवत्‌ तु 0) शोभन 


इति भद्रकाली 


निगव्यते द्यथो चण्डी हेमभासा सुरूपिणी । 
त्रिनेत्रा योवनस्था च पीतपीनपयोधया ॥ ६० ॥ 
एकवक्ता तु सुग्रीवा वाहू १ विं)शतिसंयुता । 
शूखासिशक्तिचक्राणि गदाशड्खपवीन(पी ? पि) ॥ ६१॥ 
ऊद्वादिक्रमथोगेण विष्रती सासवा श॒भा। ` 
श्स्नोयतकरः कद्धस्तदम्रीवासम्भवः पुमान्‌ ॥ ६२॥ 
 शूलभिन्नो वमद्रक्तो रक्त(मू१शर्‌)मृद्धजच्तणः । 
सिंहेन खायमानश्च पाशाषद्धो गले भृशम्‌ ॥ ६३ ॥ 
 यास्यहो कान्तसिंहा च सव्यं योखीढगासुराः ¢) । ` 
चण्डी चोयतशस्ला च महिषासुरघातिनी ॥ ६४ ॥ 
इति चण्डी। 


1) 


न साकल्यतो विदातिभवन्त्यायुधानि, मूले अष्टानामेवाऽऽ्युधानां निदेशात्‌ । आश्रये तु-- = । 
| दूखासिक्क्तिषक्राणि पां खेटायुधाभयस्‌ । | 
डमर श्चक्तिकां वामंरनीगपाश्ञ्च सेटकस्‌ ॥ 
कुधराङ्श्ाचार्पाश्च वण्टाध्वजगदास्तथा। 
क? | आदर्ुदगरान्‌ हस्तः!“ '““ ॥ ( अ० ९०, शो १-३ ) 
इति विशतिरेवाऽऽ्युधानि प्रतिपादितानि । | 


देवता--२१ 


 ९१॥ इह बाहुर्विदातिपयावानामायुधानाघ्ेखो नास्ति । यथपि द विक्रमयोगेणः | ८ | 
इति परत उक्तया निर्दि्ान्येवाऽध्युधानि वामे दक्षिणे चेत्यायाति मादिपदसामर््यात्‌, तथाऽपि | 


९४ । "याम्याङ्ज्क्रान्तसिहा च सव्यादत्निनीचगाद्दे दयाप्नेये (अ० ९०, पलो ९)। = ॥ 


नी खद "सा (स्याद्‌) उमरदण्डको । == ` 


 वेतारस्तु समाख्यातः सव्यापसव्ये करटकः ॥ ६७॥ 
अभयं खडगखेटथ दण्डं पिद्कललोचनः 
अभयापसन्ययोगेन भवेद्‌ भृकुटिनामतः ॥ &८ ॥ 
५ तः नेनोवजाङ्शादण्डं धूम्रको नि कीत्तित 

पसव्ययोगे च भवेत्‌ (कक ? ककु)दनामकः॥ ६६॥ ` 
जेनीविशूलहस्तं खटाङ्गं दण्डमेव च ^ 

 श््तात्ञो नाम तस्येव सव्यापसव्य सुलोचनः ॥ १०० 

0 इति चण्डिकप्रतीहारा 
` दिव्याम्बुजकरा ( कुयां {कायां ) सवाभरणभूषिता 
गोरी शुङ्काम्बरा देवी रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ १०१। 

प्रथमा चतुसुंजा कार्या देवी सिंहासने शुभा । 

` सिंहासनं प्रकर्तव्यं कमरं चार( ! केणिकम्‌॥ १०२ ॥ 


धम ५१०-७०५०५८०१.००५ 


0 ९६। आनुधग्रतिपादनावसरे शततमद्ोके “ककुदः इति नामदर्शनाद्ापि तदेव ` 
1 र ` नाम युक्तमिति धन्नकः छकुदश्षवः इति षाठः स्यात्‌ । व 
५ वेता (छ † छः) कटश्व पिङ्गाक्षो शङ्करस्तथा । 2 
1 सूत्रकः कड्द्चेव रक्ताक्ष्च छरोचनः ॥ ८ भ० १, इछो० ९१-९२) | 
| प इति रूपमण्डने नाम्नो वेरक्षण्यमुषरभ्यते। = | 
1 ९७॥ करटक इति पूर्वं शवेतारो वरटश्रेव' इति घोषवदुवर्णनिमित्तक-विसर्गसन्धिद- = ` 
1 . नात्‌ सन्नपि रूपमण्डने “करटः इति पाठो नोपात्तः, अत्र पुनः "करटः इति दश्यते । परमत्र 
 । साधकबाधकप्रमाणाभावादेकाक्रमन्छृता "रेति छदिः शक्यशम्पादनेति मन्यामहे । = ` 


 १०२-३। सिहानमिति। चारकणिकम्‌ शष्पं कमलं सिंहासनं प्रकतन्थं | 
 सिहासनत्येन कल्पनीयम्‌ । तस्य कर्णिकायां महाभागा देवी संस्थिता इत्यन्वयः । "अष्ट- ` | 


पत्राम्बुजल्योद्ध रष्मीः सिंहासने शुभे । विनायकवदासीना सवीभरणभूषिता ॥ इति रूपमण्डनीयं- 
( अ० ५, श्छो० ९७ ) पाढदर्ंनादम्बुनोपरि सिंहालनं कत्र रुदमीविनायकवरदासीना इत्यथः 


सम्पद्यते । अयमेव यदि प्रमाणं तदा “सिंहासनं प्रकरत॑भ्यं कमरे चास्कणिके । अद्रे इति = 


पाटठपरिवत्तनेनात्रत्यं पादत्रयं क्ोधनीयम्‌ । विनायकवदाकषीनेत्यनेन किं रुषेयत इति न विद्यः 


१०६ । आवंजितघटमिति-- 
‹आवमितधरं काय ततष्ठे च करशिद्रथम्‌' 


ईति स्यात्‌ । अस्याथंः--तस्या देव्याः पृष्टे पृष्टपाश्वयोरित्यथैः, आव जितवटम्‌ अवनमितं- ` 
करद्वयं करद्वयं इत्तिनौ कार्यम्‌ इति ! ददं मतान्तरम्‌ “उत्त्हाटकनिभा करिभिश्वतुभिराव- 
 निताण्तवटेरभिषिच्यमानां' इत्यन्यन्रोक्तेः, | ४ 
| मुक्तागोरेश्रतुर्भिद्विपपतिभिरथौ दृष्करोचहवशस्या- 
नियद्रत्ाभिषिक्ता करकमरुरुघतपश्युग्माभयेश । 
नानाकल्पामिरमा दतकनकनिभा रक्तपङ्करहस्था 
रम्याङ्की खप्र्रन्ना वितरतु विपु सन्ततं श्रीः भियं वः ॥ 


॥ (1 इति रिल्परंतंववंनाच्चं ( उ० भा० अ० २४ शरो० ९) । करिदयपन्षमय्यबुगरहणाति-~ - 1 ¦ 


 नवयोवनसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम्‌ ॥ ९११ ॥ 
सुचारवदनां तद्वत्‌ षीनाोन्नतपयोधयाप्‌ 
भङ्कस्थानसंस्थानां महिषापुरसू 


` छभरभद्वयपुष्करेरितथटश्च्योतह विशुदधोदके 
 श्ायन्तीमतिह्रूपविभवां नीरोष्टसतङ्कन्तखाम्‌ । ` 
 शश्राकल्पविक्ेवविश्रमरसासत्तदेमप्रमां 
छ वन्दे बाहुयुगप्रसक्तकमलं देवीं सरोजासनाम्‌ । 
ईति लिर्परतनीयमेष पधान्तरम्‌ ( उ० भा० अ० २४, इको० १० १ । 
१०७ ॥ को्ठापुशदन्ये अन्यस्मिन्‌ कषेत्रे इत्यन्वयः । ` 
१०९॥। कात्यायनीमूत्तिमाह--कात्यायन्या इतिं । प्रायेणाविकठं तूस्यषुराणीयं दशयुजा 


| ध्यानमिद्म्‌ | (अर २६०) इरो० ९९-६९ ) विकलानि स्थानानि यथावसरं प्रदंविप्यन्ते । 
` ज्रयाणामपीति, ब्रहमविष्णुमहेश्वराणां प्रतीकसर्पामित्यथः । 'अनुकारानुकारिमीम्‌ इति मास्ये 


 ११०॥ अचेन्ुहृतशेखरामि'ति द्वितीयचरणे, ून्ुलद्ाननामिन्ति चदुधचरणे ` 
 मात््यानुमतःपाठः। ` 


१११। (नवयोवनसम्पन्नामि"ति वृतीयचरणगतो मात्स्ये पाडः । 


११२। छचाख्वशनामि^ति प्रथमपादे महिषारमर्दिनीमिःति चतुर्थपादे मात्याभुगत 
५ प 2 ~ 1 


[ शस्ये संस्थानवेंकिष्व्यम्‌ |] ० 1 
| कर्याद्ध(स्ते ! स्तो ) दष्टं च ध 8. 


9. 


११३ । शज्िश्ूरं दक्षिणे दयात्‌ खड्गं चक्रं क्रमादधः । 
 तीश्णबाणं तथा श्चक्तिं वामतोऽपि निबोधत । 
खेटकं पूण चापञ्च पादामङ्रमेद च ।' इति मात्स्ये । 


११४ । श्वामतः सन्निवेशयेदिति मोत्‌षल्ये पाठेः । श्रकर्पयेदिष्त्यत्र प्परदशवेदिषति | 
मात्स्ये पाठो ध्येयपरत्वेन निद्॑ाइ यथा उरिलछ एवमिहापि निमयत्वेनोपपादनात्‌ प्रकल्पये . | 
 दिष्येव पाठः प्रकृतोपयोगी । ११ 


 ११६। दतल्माच्छरोकात्‌ परं “सपाशवामहस्तेन शतकेरज हुगया । वमदरधिरवक््देव्याः = 


सिं प्रदर्शयेत्‌ ध ईत्ययं शछोकोऽधिको मात्स्ये ! 1 
| ११८ । भरव कारयेत्तन्न नृत्यमानं धिकारणम्‌? ( ८।७७ ) इतस्यादिपये वत्यन्मूत्ति- ५ | 
 दक्तनात्तदुपयोगितयाऽस्थान एव नत्यसंस्थानं द्ंविुमाह-भद्वे भङ्गे इति। न्तन भद्ध ` । । | 
द्धे नततनल्य प्रतिचिच्छेद प्रतिपाद्ेपमिति यावत्‌, सुखं हस्तो दृष डवाड विदध्यात्‌, 
 नत्तनविषयोपयोगितया सुखादीनि विन्यस्येदित्यथंः । अथवा तृतीयदोके आल्येनाऽऽलम्बयेह॒ = ` 

` गीतम्‌" इति द्चनाहु गीतघ्य भद्गे भङके मुखं कुयात्‌; मृतये हस्तो दिन कयादित्यधैः क्च. =` | 


इति कात्यायनीमूत्तिः। 


५ [ इह्तादीनां रसाभिन्यञ्चकता ] | 
थतो दः भावो थतो भावस्ततो रसः ॥ १९६ ॥ 


सुखादीनां प्रातिस्विकं विषयम्‌ “भस्येनाऽऽरम्बयेह गीतसर इत्यादौ दशं विष्यति । कथमेवं इयौ - 
 दित्यपेक्षायामाह--इष्तकाच्यमिति । यतः दल्तकाचं सुखहल्तदश्यः रोके कमंणश्ररन- 


कक 


भोजनादिरभिनये भवघ्यानुकारे अखिरं सप्रयोजनं भवेत्‌ । यथाहि लोके वाचा ष्व स्वं मनोगतं 


` ग्रकाश्यते एवमेव इस्तादेरिद्धितेनापि तत्‌ प्रकायितुमहदित्यथेः । अत्र पूर्वाधं मुखस्य व्राङ्‌- 
 नि्दश्षादिह 'सष्तका्यम्‌ः इस्येव पाठः साधीयानिति प्रतिभाति । यथाश्चुतपे हस्तकाचसरः 
दद्यत्राऽऽदिपदम्‌ आचन्तयोम्‌ खदष्व्यो््राहकम्‌ । 


११९1 सम्प्रति इस्तादीनां रसाभिव्यक्तौ कारणतामाइ--थत इति । अन्न वत्य 
५ प्रसङ्ञत्तदुपयोगितथा रशसस्येव चरमभावषिफरुत्वसुक्तम्‌ समराङ्णसूत्रधारे ऋ 


रसानामथ वध्यामो दृष्टीनां चेह रक्षणम्‌ 1 
तदायत्ता थतधिप्रे भाषव्यक्तिः प्रजायते ॥ (अ० ८२, श्छो० १) 


ईति चित्रविषयत्वेन भाषाभिव्यकतेरेव चरमप्रुत्वमुक्तम्‌ । तन्न भावाभिन्यक्तेहष्यायत्तवं 
इष्िथङ्यत्वम्‌ , रसायत्तत्वं रतानुक्षारित्वमिति विवेकः । | 


सम्प्रति व्याख्यायते-यतो यष्मिनरू विषये हतः प्रवत्तते, हहतो यं विषयं प्रतिपाद्यतीत्यथंः, 
` इष्िरपि ततस्तत्रैव भवेत्‌, हस्तानुुणविषये एव हसं प्रवतंमेदित्यरथः ! यत्र इषिल्तत्र मनः, 
मनोऽपि दष्व्यनुकूरषिषये निवेशयेदित्यथैः । यत्र मनत्तत्न भावः तह्य मनो धिकारशरूपत्वात्‌ 


यथोक्तं "निर्विकारात्मके चित्ते भावः प्रथमविक्रियेःति । यत्न भावश्चित्तविक्रिया तत्रैव रसो मचेत्‌ , 
रसस्य विभावायुभावन्यभिचारिभावव्यङ्गस्थायिभावरूपत्वेन तत्य भावस्य चाविनाभावत्वेन 


` प्रतीतेः। अत्र हर्तदृष्टिमिनतां व्यापारः कतत साध्यः, इतरयोस्तु व्यापारः प्रतिवन्धापगममात्रेण 


यदच्छयोत्प्यत इति मेदः, रसस्तु फरीभूत इति न तस्थ व्यापारचिन्ता । अत्र भावपरेन 
स्थायी भाव उच्यते। जत्र च चित्रे रलाभिव्यञ्चनाथुपक्षिसमिदं पमिति प्रत्यक्षयोैस्तटष्व्यो- 

।  वात्रोपयोगो न त्वप्रतयकषस्य मनसः, तथाऽग्यल्य इष््ररकत्मेन भावकारणत्वेन चोपन्यासो ` 
नानुपयोगमति। एवं यद्यपि चित्रे भावरसयोविविकोऽप्यनतिप्रयोजनीयल्तथाऽपि रसल्य 
सुल्थफरुत्वेऽविसंवादात्तदुपस्थापनञ्चोपयुज्यत इति ज्ञेयम्‌ । ५: ~ 
| ` बल्य खलु चित्रल्य हस्तो युद्धायोदुयुक्तो तल्य कथं भावः स्यात्‌ कथं बा डषटिरित्थादि ५ ५ 
`  शशयापलुत्यथंमयमारम्भः। तथा च यत्य इल्तौ युदधव्यापृतो तस्य प्रायेणोचाहो मावोष््े- = 
` कन्ग्वरत्वादिना रिषिषना प्रतिपाचेतेयथः । उकज्न समराङ्गणे- | | 


जनिभ == १५ 


च अ्मोऽव्याथः १ (य १६५७ ` 

[ कृत्ये आघ्यादीनां परातिल्विकविषयनिरूपणम्‌ ] = ` | 
अद्गे!आस्ये)नाऽऽलम्बयेद्‌ गीतं हस्तेनाथ प्रकल्पयेत्‌ 

चत्त॒भ्यां चं भवेद्‌ भावः पादाभ्यां तालनिणैयः ॥ १२ क 

[ ््धहतः स्वाहङ्कारपरिहारः ] 
ध्ीविभ्वकमणः शाले पुराणभरतागमे ३ 
रूपसंस्याऽप्यनेकाऽस्ति लेशोऽयं छिखितस्ततः ॥ १२१॥ 
[ म्रन्थसमा्िः ] 


यस्या नो कलयन्ति रूपमखिलं ब्रह्मादयो देवता 
गोर्या विभ्वमिदं विचिलरचनाश्च्यं समुतपद्यते 


[र 


क्त स्वानामिदमन्न ख्व दश्च संक्िषठतया तदेतत्‌ 


विज्ञाय चित्रं छिखतां नसणां न संशयं याति मनः कदावित्‌ ॥ 
| ( अ० ८२, छो० ३५ >) इति। 


१२०। पुनरपि नृस्यादो विशेरमाह--आस्येनेति । अर यथाश्चुतपाठे सामान्यवाचिनः 


भङ्गरब्देन अङ्धविशपो सुखं र्यते, यथा नदीवियोषजोऽपि गाङ्गेयः शान्तनवो नदीज इति। | 


शोकः स्पष्टाथंः । कमराङ्णसूत्रवरि-- 
| हस्तेन सुचयत्नथं हष्व्या च प्रतिपादयन्‌ । 
सजीव इति इश्येत सर्वाभिनयदशंनात्‌ ॥ 
इति ( अ० ८२१ शदो ३३-३४ ), 


आाङ्धिके चैव वित्रे * * * साधनयुच्यते । 
( भवेदत्रादत १) ल्तल्मादनयोशिन्नमाश्चितस्‌ ॥ 


इति यथोक्तमथंमनुवदन्निव तस्य विन्नोपकारकत्वमपि व्यादिदेश । नन्दकेक्वरविरचिते अभिनय ` 
द्पणे ( (९1५ ८॥४४ 98081} 861९8, ०, ४, )-- | ५ 


चक्चुभ्या दशशयेहु भावं पादाभ्यां तालमादिशेत्‌ः 
इति द्वितीयवरणपख््त्याऽयं श्छोक्ः, अविषः पूवेशटोक्श्च वत्तते । 


१२२ । सम्प्रति अ्न्थकरत्तौ स्वङ्ृतेरषमग्रस्वमन्यच्छायायोनित्वच्च प्रत्याययति--श्रीविशवकमग = ` 
 इति। घुराम मावूस्याञनेयविष्णुधर्मोत्तरदौ भरतागमे मरतङ्गतनाव्यसूत्रादौ च ख्पवंल्याऽपि, ` ८ | 
न कैवं तृत्यगीतादिगतविरेष इत्यपेरथंः, अनेका अस्ति, मया तु ततो ठेशोऽल्यमाघ्नं । | 
 हिखितः। भला नाम चृत्यगीतादिविषयके विरते न्यूनता तत्रास्माकमनयिकारात्‌, यततवस्म- 
 दधिङ्कतायां रूपलंख्यायामप्यसामग्रयं तदेव मां दुःखाकरोतीति भावः । 1 


१६१  देवतामूतिप्रकरणम्‌ 


इति ध्रीत्तेतवात्मजं [ सुतरं ? |-भृन्बण्डनविरचिते वास्तुशाच्े रूपावतार 
देवीभूत्तिखक्षणाधिकासे नाय अष्रमोऽध्यायः ॥ = ॥ 
समाप्तोऽयं ग्रन्थः । | 


जितत तिन ्म ाना५११.०५ + ५. 


[ श्रीडमामदेष्वरपंणवस्तु । शके १७५६ जयनामसंबत्सेरे ( ज्ये १ यै ) हे मसे 
 षृष्णयक्ते अयोदभ्यां भरगुवासरे समापितम्‌! सखोपन्तदादाटिभये अषकर्यां चा 
वुस्तकावरूस नकर तयार केखी भासं ॥ शके ॥ १७६२ ॥ क्ञयनामसंवत्‌सेरे माघङ्कप्ण 
११ पकाक्भ्यां मन्दवारे तारो २ मादे माच सन्न १८६७ इसवी सेजी नारायणकल 
 छिहिणार व्यंकाजी नारायण भरसा शीयहणार धीकनृहारकन्तेबस्थेन छिखि(त)प्‌ ॥ 


स्वार्थ परोपकारर्थम्‌। शरीङृष्णापंणमस्तु ॥ श्री शमं मवतु ॥ 


धीमही प्रसम्‌ व्रम्थसं० |! ६०० ॥ ]* 


जभ १००० ~^ 


0 प 


 १२२॥। अस्याघ्यायल्य देवीमूरिलक्षणायिकारत्वेन, देवीनाञ्च गौरीप्रङतिकल्मेन भरन्थ 
समाप्तो गोर स्तो्ति- यस्या नो इति! सा "यस्मात्‌ न कल्यन्ती'त्यादि श्तल्माद'सिक- 
जगदुवन्येति देतुदेतुमदभावः । | 
` वेषम्याहु विषयल्य वा विरसणात्ततूखम्प्रदायत्य वा 
 मो्ठ्यादाक्षरिकिस्य घा स्ललनतस्ततल्यावधानल्य वा । 
छस्प्राप्ठा य इ प्रमादनिचया याथाथ्यंबोधद्िक- 
स्ताल्तान्‌ शोधयितु' यथामति समारम्बि प्रयासो मया ॥ 
 ओदृस्यतोञत्र विदुषां न दशं निपात 
सञ्चात इत्यनपनीतदुरूहभावे । 
शास्त्रे न हिल्पविषये विद्तिः खकल्पा ` 
| ज्ञात्वाऽपि दिड्नियमने सम कल्प एषः ॥ 
,  उमेन्दमोहनाल्येन कोटालीपाडजन्मना । 
काह्कमतीर्थैन विप्रेण कालीक्ेनप्रवासिना॥ ` 
र ` कान्यप्रकाशं संस्कततुऽ्टमतो दशमावधि! ` 
‡ ` दीकेयं देवताभृत्तिगोचरा विहिता मया ॥ 
 # जदङ्गे लिपिः खकीयोऽं देख उपलभ्यते, = ` 


देवतामूर्सिप्रकरणस्थ-पाटेषु 


रूपावतारे भेदाः 


देवतामूत्ति्रकरणस्थ-पटेषु 
शषूपावतारे भेदाः 
प्रथमाध्याये 


† १३। (१) स्तादेवेद्‌-' इत्यन्न श्स्तादिवेद्‌-' । 
१५। ४) द्हविभागाः इत्यत्र षद्विमागे' | 
१६। छ) द्धिभागेः इत्यत्र द्विभागाः। 
 षोडखश्टोकाष्‌ परम्‌-- 
भागमेकं मवेत्‌ पीतं (?) कनिष्ठा मध्यमो(न्त १ त्त )मा। 
या प्रोक्ता द्वारमानेन सावा श्रेष्ठा प्रकीर्तिता ।। इत्यथिकम्‌ । 
१८ । (३) (्दशहस्तादितोः इत्यत्र द्राहस्तादिनाः 
२०। (१) श्वतुरस्रीकरतेः इत्यन्न (चतुरस कृतेः 
२१। (३) 'दशंशेनः इत्यत्र दशांशोनाः । (४) "पच्वाशेनः इत्यत्र “पच्वांशोनाः 
२३। (२) शचेरल-' इत्यत्र 'स्वणरल्न-; । ४) श्रुभाः इत्यत्र तथाः | 
२४ । (३) स्पुरिताऽप्यर्च्याः इत्यत्र ^स्पुटिता पूज्याः । | 
(४) 'दुःखदायिकाः इत्यत्र (दोषदायकाः | 
२५। (३) "काष्ठपाषाणजा भग्नाः” इत्यत्र (काष्ठपाषाणनिष्पन्नाः । ` 
। ‡८५) वराही वाः इत्यत्र 'वराहोऽथः 
३६। पटतंशः छोकः सपतत्िंश्छोकस्य प्रथमपाद्श्च न स्तः । 
 ४०। (४) श्मीतः इत्यत्र (शामतिः। 
४१। (३) भूमेगोदानात्‌? इत्यत्र ^भूमो गोदानात्‌? । 
धर | (२) इत्यत्र ध्चेव जनमरकम्‌ः । 


= पुतदुमन्थविवरणं भूमिकायां दव्यम्‌ । १ 
† सवंसन्या अङ्काः शोका नास्‌, बन्धनीस्थाश्च श्छोकपादानामित्यजुसन्धेयम्‌ । 
{ (९)-(&) इत्यहद्वथं षट्पादश्छोकविषयम्‌ । ११ 


४५ । | (१ ) "नत्तनं ह्यन्न नदन (४) “महद्‌ भयमुः इत्यत्र (अयं महत्‌ म ५ 


४८। (४) 


„28. (१) 
५०1... 


 ९५२-५३ । 


 ( ९५२ ) 
“स्तथा इयन्न ^-स्तदाः । 
दैवतायात्रा-” इत्यत्र 'देवतयात्र-' । 
श्रोद्‌भूतवे्तं' इत्यत्र ध्रोद्‌भूतं वेछतम्‌ः । 


` बेदव्यासे' इत्यादर्थात्‌ परमरधत्रितयं नास्ति । 


अध्यायान्ते देवतामूत्तिप्रकरणे? इत्यत्र “रूपावतार 


` 1..@ 


 @) 
। (१) 
५। (२) 
६ । (१) 
६। (२) 


८15. 
ताष्टः 


२८। (१) 


1 
१६1; @ 


दितीयाध्याये 
(क्रमाहदागणंः इत्यन्न क्रमादष्टगु्णंः 
'जनसंख्येः कराङ्कखेः' इत्यत्र जेनसंख्येः करोऽ 
'तटरुखंः इत्यत्र (तालमान । 
(जनस्तथा इत्यत्र जिनस्तथाः । 
'पथ्चताटेश्चः इत्यत्र "पच्चतारच्चः 
ब्रह्मात्मा" इत्यत्र श्रह्माया' । (५) जितेन्द्रा्चः इत्यत्र जिनेन्दराश्चः । 


` १२। दादश्श्छोकात्‌ परम्‌- 


पोडराभिः क्रर(दे १ दे ) वीरूपाणि कारयेत! । इत्यधिकम्‌ । 
(विस्तर इत्र "विस्तरे" | 

दीधे" इत्यत्र दर्ये, । 

'जरायुजाव्यंः इत्यत्र “जरायुजाद । (४) “विदवरूपं इयत्र 


 प्विरवरूपी' । 
अध्यायान्ते “रूपावतार देवतामूर्िप्रकरणेः इत्यत्र केवलं “रूपावतार | 


५८९. 


तृतीयाध्याये 
श्रह्माशिः इत्यत्र (नारो 


 ४-५1 चतु्-पञ्चमन्छोकौ न स्तः । 


(९, 


< ® 


(५ । | ध  १६। षोडकश्षोको नास्ति । 


“मातुष इत्यत्र “मानुष्यः । (३) ब्रह्मविष्ण्वंशाः' इत्यत्र श्रह्य- 
किष्ण्वी(शं १ शाः) । ` 


शाके इत्यत्र '्वेशाचिके' । (४) श्रमि चिजगमैरवरम्‌ इतयल॒ 
` ब्रह्मारां छिङ्मीदवरम्‌ः | ध ध 


द्वारादयोऽष्टाः इत्यत्र (ारोदयोऽष्टधाः 


र यसव ~ ~ ह 1 


२३। (२) “सोम एव चः इत्यत्र सौभं एव चः | 

२४ (४) 'पाणिवहमोः इत्यत्र "पाणिपहछवोः । 

२५ ४) प्रधाना पद्य इत्यत्र श्रधानपद्य-' | _ 
 २८। (३) भभर्गमू्तिः' इत्यत्र भोगमूर्तिः? । ` 

 ३२। (२) द्टोमजटीटकम्‌' इत्यत्र 'होमजकीखकम्‌? । 


 ३६। (१) आननेय तुः इत्यत्र मप्नेवयां तु । 
 ३७। (४) ५८ > खः इत्यत श्राच्यां स्थाप्य! । 


 ( १ ) 


२१। (१-२) “-रेकनामिर्जिनेः इत्यत्र “रेकनाभिल्िनेः | 


२२। (४) ग्रहा मात्रगणा-' इत्यत्र 'महामतरगणा- । | 
२३। (३) शष्टियातदहितंः इत्यत्र शष्टिघातहरतः । (४) ध्पुराघं' इत्यत्र पुरा- ` 
(चवं) । | 
२७! (१) “सदनं इत्यत्र वदनः । 
२८ | अस्य शोकस्य स्थाने ज्ञात्वा स विरवकर्मा सर्वद्यःः इति पाः । 
अध्यायान्ते 'देवतामूत्तिप्रकरणेः इत्यत्र “रूपावतार 


| चतुर्थाध्याये 
१।. (२) ("कमण्डलुवरान्वितः' इत्यत्र "कमण्डलुकरान्वितः' | 
% | (१) “नामानं इत्यत्र “-नामाऽ्यं' । 
५। सपुष्पिक-पञ्चमश्ोकल्थाने अक्षसूत्रं पुस्तः इति पाटः । 
६। ४) 'पित्श्चाध्ययने रतः इत्यत्र (तपश्चाध्ययनोद्यतः' | 
१३। (४) ततं त्रिखोचनम्‌! इत्यत्र (तत्तिलिचनम्‌? । 
१५। (२) गृहाश्चेवोत्तरेः इत्यत्र श्रहाश्चेवोत्तरे' । 
१७! अस्य शोकस्य पूर्वाधंस्थाने- 
“पदं शुचाऽश्षदण्डच्च सत्यभामा तु वामतः" इति पाठः 1 
(४) (कमण्डलुः इत्यत्र कमण्डलु स । ४ 
१८ । (२-४) (्ण्डागमस्त्रवाकूकाटं जयश्च इत्यत्र 'दण्डागममस्त्रवाकूफलनयस्य' । ` 
१६। (४) 'खड्गयुग्‌? इत्यत्र “खेटको' । ५ 
२० | (४) “~-निभवः? इत्यत्र -विभवः' | 
२१। (२) नते जय" इत्यत्र तेजसः । 


३३1 (१) शसदशना कराः इत्यत्र शुदशनकराः । 


८.९ ) 
ध ३८। (2) ` -भगाम्निकेशः' इत्यन्न “भगोऽस्बिकेदाः' । 
1  ३६। अस्य शोकस्य पू्ाधे-- ` | 


` श््रीकण्ठसूर्या()स्युरथोऽभ्बिकाजा (:) 
परदक्षिणं मध्यविदिष्च पूज्याः । इति पाठः । 


9 (४). “विघ्रातिपरसंस्थाः” इत्यत्र “विघ्रानि परत्र सं वा ¢? 


| क) चत्वारिशश्छोकस्य पराधम्‌ उत्तरपद्यच्च न स्तः । 
 छर-४६ । द्वाचत्वारिरण्छोकात्‌ षटचत्वारिशश्छोकान्तायां पच्चश्होक्यां पाठो 
| विसंष्टुखः। 
 ‰८ । अवत्वाररिश्छोकस्य परा्ध-- 
त (वामश्रुचवरे दोस्यः शशाङ्कस्य निरूप्यतेः इति पारः । 
 ५५। (१) श्ोरितिकसम्यमासं" इत्यत्र शरि नीरसमाभासघंः । 
५८ । (१) गृहाः किरीटिनः छर्यान्‌ इत्यत्र शृहाः किरीटिनः कार्याः । 
५६ । (१) (वरदं वश्राुरा्च' इत्यत्र वद (१) वजार । 


` ६०। @) मेषारूढं हुताद्यनम्‌? इत्यत्र भेषारूढो हुतारान 


 ६२। (२) (कतिकाः इत्यत्र कत्तिकाः । 
@) श्वानरूपन्चः इत्यत्र ( स्वा ? श्चा )नारूढन्चः 
६४ । (®) तलो दिरिए इत्यन्न (ततो दिरिः । 


। &५। (4) (िषिवीजपू न ^निधिकरशवे व । 


(३) भ्मृगारूढ इत्यत्र 'गदारूढ” । 
६६ । (४) 'मित्रफोणके इत्यत्र ईशकोणके 


 & | (२) 'आदियाद्याःः इत्यत्र 'आदिलयामीः (१ । 


` पालकस्य" इत्यत्र “पाठकः सःः । 
अध्यायान्ते द्देवतामूत्तिप्रकरणे रूपावतारिः इत्यत्र केवरं “रूपावतार 
। पञ्चमाध्याये 


।  २। (२) लाडशूख्रं छिवेतः इत्यत क्षत्रियाणां फलपरदौ । 
 @ श््रियाणां ल्द इत्य त्रिविक्रमो वामनन्धः 
४। @&) चाक्रिकाणां इत्यत्र चक्रिकाणां । 


२१ 


२९४ । 


२६ ` 


२६ । 


 ३७।. 


। (३). 
(५) 


“रावः पद्मं -चं-गो मधुसूदनख्च शं-प-गः इति पाऽः । 


°प-र-ग-चः इत्यत्र “पशं -ग-चैः ) | 


श्वसिंह्य-प-ग-शश्ः इत्यत्र प्ठसिंदधक्-पं-गं -शष | 


क-प-चां-गः' इत्यत्र “ङा-पं-चागः' । (३) शसं-च-ग-पः' इत्यत्र 
“शं-व-प-गःः । | कि वा) त 
माग्रतः इत्यत्र शतृष्टिमर्गतः? । (र) 'सरवतरेणायुध-? इत्यन्न = ` 


 भसवत्रेवाऽभ्युध- । 


व 
“च वत्तुखाः इत्यत्र सुवतु । ` | | 
“निद्राङ्खखः इत्यत्र “चछिद्राद्घखाः । (३) रेषाकरुषाः इत्यन रेखाद्ुलाः | 


 धपायुनः' इत्यन्न ध्या पुनः. । 
 श्वक्राऽथनामाः इत्यत्र “चक्राऽथवा साः । 


(सुरतः इत्यत्र शुर्ताः । 
(निषण्णा पाति इत्यत्र “छक्षणा पांक्ति-' । 
“पूजयेद्‌ यः” इत्यत्र “पूजयेच । 


ध्पाद्वभिन्ना विमेदिका' इत्यत्र 'पारर्वभिन्नविभेदिता' । 


ुष्णकर्षकम्‌ इत्यत्र ्ष्णवणेकम्‌ः । | 
“समे चक्रेः इत्यन्न “दयामचक्रेः । 
८नान्तरायिके" इत्यत्र “नान्तरायकेः । 
रेप्याया इत्यत्र ^ेखाणा' । ` 
८एकवसेकः इत्यत्र “एकचक्रस्य । 


“संज्ञाः स्युः पच्च इत्यत्र (संज्ञाः पच्च'। 


दारिद्रियमटनंः इत्यत्र दारिद्रय मदनः 


३६ । अस्य पूर्वाध-- 


+ 2.1 
. ४१). 


(३) 


1. 
1 


श्चक्रे तु मध्यदेशस्थे तेषामाख्यानकं श्णु" इति पाठः । 


(अनन्त्येदिति ज्ञेयः? इत्यत्र अनन्तश्चेति विज्ञेयः" । क 
'एकपद्यान्तिका' इत्यत्र “एक्र( पद्यकिता ? पद्माङ्किता )'। ` 


दक्षिणार्तसंस्थिताः इत्यत्र दक्षिणावत्तसंस्थिता' । = 


 ४२। (@ 
(४) 
(५-६) 


0. 
1 । ४४। (२) 


9) 
४५। (१) 
^^. 
 ‰७ । (१-२) 


 ४८। (९) 


५०। (१) 
५१ । (१) 
५२ । (१) 
५३ । (१) 
त (र) 


१७६ ) 
'पडयनादि य अङ्किताः इत्यत्र “पद्य न गदयाऽङ्किताः 
“सप्रसम्पद-' इत्यत्र सदा सम्पद~ | 
पञ्चम-ष्ट-पादयोः-- ` | | | 
-शसखन्छनेन विना माया सा प्रस्ता तु सा स्सता (?)" इति । 
'वाप्यथं यद्‌ गदाः इत्यत्र षवाप्यथ वा गदाः | 
“रोगज्ञः 'रोगतोः | (३) (तस्यः इत्यत्र (तच्च । 
रहे रोगे- इत्यत्र श्रेदु ४ । 
धविकटास्या' इत्यत्र कोटरास्या, । 
(-प्येषामद्क नः इत्यत्र ^-ण्येवमङ्केनः । 
“पीतवर्णाममहावत्त) ° इत्यत्र "पीतवणमिं ( सह १ महा ) चक्र । 
धरषठदिगृभागेः इत्यत्र 'मध्यदिगभागेः 
(जयदुखवश्ुभासक्तो ननः? इत्यत्र 'जपद्ःखं सुभासक्तो मानः(?); । 
(सुभः इत्यत्र सेः | ि 
(चतु्चक्रं' इत्यत्र '्वतुर्वकत्रः । 
रर्माङ्धितास्तु येः इत्यत्र शरूमाङ्किता(-)ध्ियेः । 
-दायकाःः इत्यन्न कारका) । 


 अस्माच्‌ छोकात्‌ परम्‌ उनचत्वारिश्छोकतल्यम्‌-- 


 ५५। (द) 
 ५६-५७। 


। © 
५1. 


(४) 


(परमेष्ठयमितक्रोधस्तथा नारायणोऽन्तकः । 

अनन्तश्चेति विज्ञेयो नानामूर्िस्तु ये तः(१)" |}! इति पयम्‌ 
'तरसेन्यस्यः इत्यन्न "परसेन्यस्यः । 
षटपञ्ान्ल-सप्तप्ाशरशछोकयोः स्थाने- 


अङ्कितं" `“ ग्रं चक्रं स्यात्‌ यजतादिवतादविः इति पाठः । 


अतः परम्‌- 


हला( कुष ९ इदा )धरं चैव चक्रमध्ये व्यवस्थितम्‌ | 
( बरं भद्रकितं ? बलमद्राङ्धितं ) चक्रं वाच्छिताथफल्प्रदमः || 


इति पमधिकम्‌ । 
धसीतायाःः इत्यत्र प्तृतीय 


धृतरूपिणः' इत्यत्र श्वृतिरूपिणः । 


 (प्रदृच्व यतः इयत्र “-प्रदं हि तत्‌! । 


व ५.११५. 
६२ (२) 'यश्चक्रमुदघाटयेन्नरः' इत्यत्र श्यो मूल्यमुदूचाटयेन्नरः' 
८ | अतः परं पुष्पिकायाम्‌ (इति पन्नगाशनः" इत्यत्र (ति ग्ड 
६६ । (&) 'वामवबाहषुः इत्यत्र (सवबाहष्‌? | ` ध 
, ४२ (१) महावराह" इत्यत्र भ्नृवराह । = 
७५ | (३) शशिल्युषलोः इत्यत्र शीरसुषलोः । 
 ७७। ४) श्वजपीनसटािताम्‌' इत्यत्र ्वजपीतसमाथितम (१) 
७६। (१) पुरषाकस्यैः इत्यत्र धुरुषस्येव!। ` 
 ८०-८१। अदसीतितमेकाशीतितमश्रोकयोः पौर्वापर्यविपर्यय 
८३। (३) श्वेतं स्फटिक-' इत्यत्र “दवेतस्फरिक- 
८५ । (४) छिनात्‌ प्रविद्यारदः' इत्यत्र “खिखिचित्रविरार (देः? दः ): 
८६ । शिरोधृतः" इत्यत्र दुनि रीक्षशिरोधर 
८८ । (१-२) (कतन्यमतिजानु-" इत्यत्र कृतंव्यः प्रतिजान्‌ः | 
६०। (४) ग्राच्‌ कार्यस्तु" इत्यत्र श्रागवन्‌ कार्यः । 
६१। (२) ध्यृष्टवाहु › इत्यत्र ्यष्टवाहु " । 
६२। (२) दक्चिणाखचवुष्टयम्‌? इत्यत्र दक्षिणासे चतुष्टये 
 ६८। (२) गिदव समुद्भवः" इत्यन्न “विरवसमुद्‌भवः 
१०८ । (२) वासुदेवं करम्‌! इत्यत्र वासुदेवकम्‌! । ` 
१११। (३) “चक्रं चेदं इत्यत्र “चक्रं च दण्डः । 
 ११३। (३) 'पद्यागमोक्ताः इत्यत्र "पश्चगं चोक्ता); | 
११४ (१) तर्जनीवाणचापच्च' इत्यत्र “पद्चिनीचापबाणच्चः। 
अध्यायान्ते ष्देवतामूर्तिप्रकरणे" इत्यत्र "रूपावतार" । = ` 
3 पष्ठाध्याये-- | ५ 
 २। (र) शक्रण्डखस्यमलडकृतम्‌? इत्यत्र शुण्डलाभ्यामलच्छृतम्‌!। ` 
| (१) (जटाकृतचन्द्रदेवं' इत्यत्र 'जटाचन्द्राकतिः। ` | 
६। (£ ्दष्राकराट्विकटास्यं' इत्यत्र दृश्राकराख्वदनम्‌? । 
 ८। @) श्लकशाङककतशेखरम्‌ः इत्यत्र शाङ्करं कुतशेखरम्‌ । 
 ८-६ । अष्टम-नवमश्ोकयोः पूरवापरीमावपरित्तिः। == 
११। (१) “खदुज्गं चक्रपालच्च" इत्यत्र खदुाङ्गच्च कपाख्च्च'। = 1 1 
द... 1 ५ | 


धि ९ क न । 


भि 


 _ ५ स ली न ध, 
अ 


{ १८ ) 
‰ १३। (३-४) (वामे अक्षसूत्रभ्व' इत्यत्र 'वामेऽ्षसूत्रच्चेवः 
 १४। (२) “विभूषितम्‌ इत्यत्र “विभूषणम्‌, । | 
 १५। ४) नागेन्द्रासनभूुषितम्‌? इत्यत्र 'नागेन्द्रोरविभुषितमः 
 १८। (४) श्वरदामयपाणिकम्‌ः इत्यत्र वरदाभयपाणिनम्‌ । 
 १६। एकोनर्विशः शोको नास्ति । 


| २८। (र) (स्तं रि्ूलिनम्‌ इत्र “दस्त निधिन्‌ 
`  २१। (४) शचित्रदवर्यसमन्वितम्‌' इत्यत्र “चित्रेदवर्यपलपरदम्‌' 


` २२। इ) खड्गचापरिरः- इत्यत्र खड्गचापशर” । 

२५} (३) '"पच्ववक्तूमयं' इत्यत्र “पथ्वास्यमभयंः | 

२६ भस्य पराध-- 
 श्च्छाज्ञा(नं ? न )कलायुक्तननिनेतरं ( व ? वि )ज्ञानार्णवम्‌ इति पाठः । 

२७। (४) “कणे बे तालपत्रकम्‌! इत्यत्र कणयोस्ताडपत्रकम्‌ः । 

२८। (४) ^स्वदष्षिणे' इत्यत्र च दक्षिणे । 

२६1 (१) अर्थे तस्य तरयो रूपः" इत्यत्र अर्धस्तस्य सियो शूपंः 
 ३०। ) गणेशं व्याप्यः इत्यत्र “(मणेदा चाथ ९ गणेशश्चाथ)ः 
 ३१। णकर्रिशशटोकात्‌ परम्‌- ` ५, 


4  # अंलिङ्गितवामहस्तं नागेह द्वितीये कर । ` 


|  इरस्कत्यलुमाहस्ं वर्णां द्वितये कर | इत्यधिकम्‌। 
३३। (२) शछरषणार्थेनस्तुः इत्यत्र श्ृष्णार्धेन तुः! ` 


`  ३५॥। अस्मात्‌ छोकात्‌ प्रम्‌ इति गरुडध्वजः इत्यधिकम्‌ । 


४४1 (३) ऋद्धासुखगतः' इयत्र “रज्यागतमुखः' । 


1 ४६ । पुष्यका्ां ह्रिहरपितामहः' इत्यत्र हरांहीरराय-पीतामहः' इति विरोषः। 
४७४८ चन्द्ा्पितामहरश्षणात्मकं शोकद्यंनास्ति । 


४६} अस्य शोकस्य परार्थं परस्य च पूर्वार्धं नास्ति । 


1 ५३। र) 'वामार्धादि इत्यन्नं 'वामोरध्वादि- । 


साना ण नोन 


भतभकरम भ७०१११८.५ ८ ० 


| | गत्या सन्निवे्ित आसीत्‌, पाठान्तरं तु छन्दः पाख्यदेवाऽऽत्मानं खसंहितमकरोत्‌। ` स 


य 


५५ | 


५६ । 


५८ । 
६ © | 


६२। 


(१) 


(१) 


व 
(४) 


( ` १७६ ` | ) ` 
-खटाङ्कपात्राणिः इत्यत्र “-खटाङ्गपाशानिः 
इरिहरस्यापिः इत्यत्र 'हरिहरश्चापिः 
न्ततः पुनः इत्यत्र प्पुनः स्मृतः | 


यथोक्तपू्वाधौस्‌ परम्‌-- 


(२) 
(४) 
(र) 


(१) 


(१) 


 ) 


क्रमेण नव छिङ्ानि षटकरान्तानि संख्यया ॥ 


` पोडशाङ्गरूमारभ्य एकेकाङ्खवरधनात्‌ । क 
 लिद्धानि रसदस्ता(तत्‌! न्तम्‌) अष्टाविंशोत्तरं शातम्‌! । इति पाठः । 


"हिन्ताश्चागरूडः शुभः" इत्यत्र "हिन्ताखश्चागरः शुभम्‌ ? :) 
पुष्पिकायां 'दारुजातीः इत्यन्न 'दारुजानिः 

भयित इत्यत्र त्रयखिंडात्‌ः । (३) न चः इत्यत्र नव~ । 
(-मघोरेश्वरम्‌ इत्यन्न ~मघोरकम्‌' । | 
“-महोरा्ं' इत्यत्र “-मघोराख्' । ` 

“-भूतवेदान्तं" इत्यत्र “भूतवेदान्त-' ! ` 
“रित्यादियुगटं चान्ते इत्यत्र “ह्तादियुगर्त्वान्तेः 
“भव-' इत्यन्न नव~ । 


अत्य शोकस्य पराध-- 


(२) 


1 
(२) 


` श्रासादा कन्यासे ज्याठा सिमामानमिदं स्परतम्‌? इति पाठः । # 


छ, 


"गभे पच्वांशाकेः पाभपन्चांराकेः 
दार्णेः इत्यत्र ्दारजेः 


अस्य शोकस्य पूर्वधि-- ` व 
मृहारुरोहशेखाश्च देध्यंमकंलिनांराके(:)' इति पाठः । 
(नवनाग तुः इत्यत्र नवभागं तुः | 

` 'शिवाख्यमः इत्यत्र 'शिवायतम्‌ । 

 न्नागरेः (नरः 

(यदः इत्यत्र “जयदं । 

` शमे चिसुप्रभार? इत्यत्र (मगा ? गम)त्रिसप्तमागेः 


८८ । (२) चतुरं शतम्‌ इत्यत्र प्वतुरंशकम्‌! । 


,.: श; 


¢ ८ ९२। 


६५ । 


(३-४) 
(६) 
(५) 
..().. 
४) 


(; १६०.) ४ 
(६) जयदाथि' शत्य 
'जयदादि 


अस्य शछोकष्य प्रथमाध-- ` 


मशकं तस्करादिकम्‌? इति पाठः! 
“राज्ञा षण्डं काभयकंः इत्यत्र "राजा षण्डं चाभयकं | 
सुपाठकेः इत्यत्र 'सुपाठकेः । 

'घनादिक-' इत्यत्र ध्वनाधि(प-१ क~) | 

“विजिताः ईत्यत्र विवजिताः' । 


(नवमिहरणे रिष्टं 


` क्रमस्त्याप्यटकः' इत्यत्र व्वक्रमतस्यौ घट 


८  ६६। (३-४) -दुष्णरेषो वणटुसौख्यदाः इत्यत्र कृष्णा रखा वणु सौख्यदा । 
अस्य शोकस्य पूवोधं-- ` 


त ५, 


६६। 
१०० | 


। १० वि । 
८.१६ 


1 १०६। 


18 1 


८ ९ 


४) 


(६) 


र 
(व 
@ 
७. 


श्टुत्राभमष्रमांशेन साध्य शषडंडकेः इति पाठः । ` 


ुद्रवुदाकृतिः" इत्यत्र चुद्‌ ुदाकरति 
'काकपदादिवेः इत्यत्र 'काकपदादि 


= पुष्पिकरायां दारुजानि स्फाटिकानिः इत्यत्र ^स्फरिकानिः 
(१) 


भस्य 


'वरच्चः इत्यन्न 'खण्डञ्चः | = ` 


 चतुर्थपादीय-दोषकरं यतः इत्यारभ्य भ्मन्त्रः ( १०८ श्लो २ पा०) 
 इत्यन्तोऽ शते नास्ति । ५ 
` एततपूर्वार्थात्‌ परं १०७-१०८-तम-श्छोकद्वयी तत्तः पुनरयं पूर्णः शोक इति 
 विस्ठख दिपिपद्धतिः। | 


पुत्रपोत्राश्च' इत्यत्र धुत्रपौत्राणिः 
श्रयस्तं पीट" इत्यत्र ¢यखं विपीठम्‌ । 
भुज्यते इत्यत्र ूज्यतेः 
तथाः इत्यत्र ततः: । 
"पीण्डञ्चः इत्यन्न “पिण्डच्वः 
स्थापितं इत्यत्र “स्थापितेः ५ 
(३) “करं इत्यत्र “करे । 


९४२1 (१) अर्धचन्द्रा 
१४८ । (३-४) शुखाय स्याचिकोणा' इत्यत्र शुखावाप्रय त्रिकोणा 


६ १८१ ) 


१२३ । (१) वातवे" इत्यत्र रे वे" ।. (३) 'सहखहुस्ते' इत्यत्र 'हस्तसा्हर. । 


१२४ । अस्मात्‌ शोकात्‌ परम्‌- 
घाटे जगति मध्ये तु वाणे गमगृहुं भवेत्‌ | 


स्वयम्भूपीठिकास्थाने चटे चण्डो न वियते ॥* इत्यधिकम्‌ ` 
१२५ । (१). एकं चण्ड्यां वरे सपत्‌? इत्यत्र "एकां चण्ड्या रवेः सप्त! । = 


(४) भङ्चिबस्याध प्रदक्षिणाः इत्यत्र रिवस्यार्धप्रदक्षिणम्‌ः 


१२८ } अस्य शोकस्य स्थाने- 


ष्छिङ्गानामष्वा कृत्वा पीरिकाणान्तु र्षणम्‌ । 


आदौ बरह्मा च विष्णोश्च पीरिका( सु १८ )च्छ्रयं विदुः" ॥ इति पाटः । 


१२६ । (२) “कामदम्‌ इत्यत्र ~कामय(म). 

१३०। (#) . न्तत्तुल्यं चाप्राधकम्‌? इत्यत्र तुल्यं चाप्राधकरं त्रिधा । 
१३१। (१) वत्रिधा विभक्तमप्रे तुः इत्यत्र "विभागाकृतिम्त्रे तु' । ` 
| (४) भ्मध्यवंदोदूभवाः इत्यत्र मध्यवङ्क्षोद्‌मवा' | 

१३२। (२) रवणाकृतिः इत्यत्र 'वापराजितेः | 


(क) अस्योत्तरं परश्छोकपूवर्धच्च १२४द-ष्टोकपूरवार्थात्‌ परं वतेते । 


१३३ । (१-२) शयाम्योत्तरततसंपादमप्रेः इत्यन्न 'याम्योत्तरततसपादमप्रः 


(क) अस्मात्‌. शोकात्‌. परस्‌. 


“उष्टपेये चुपीस्याशचा(प्रतिमाजिताम्‌ः इत्यधिकम्‌ । = 
१३५ । (२) “साधत्निमागोन्नतम्‌ इत्यन्न साधत्रिभागिकम्‌ः 


१३६ । (१-२) (्सार्धद्वयं भागे > >< > कच्चिन्निका मता" इत्यत्र ¦ 


'साध(दाय ? भागं) तु भागेकं चिपिका मताः। इति। 
अस्य श्छोकस्योत्तराध-- ` | | 
'द्विभाने चान्तरा पटरी कपोताटि(-)द्विसाधंकाः इति पाटः । 


 १३७। (१) अर्धयं च मघ्नासपटरीः इत्यत्र 'सार्धपच्च प्रासपटरी' । 


१३८ । अस्य शोकस्य पूवाध-- 


भअर्धुलं ९ अर्धं सुल-)पद्ठिका च कर्णे ु्यभागिकम्‌? इति पाठः । 


त्रिकोणा च इत्यत्र अरधकोणा चः 


स 
प 


0 | 4. | 


कर) 


^ | 


२ 
१५४ 


 ५६। 


 १६०। 
५ 


१६६ 


१६६ । 


( ९८२ ) 


प्रणारस्या' इत्यत्र श्रणारस्यः । (३) (जलमम्राविभषेणः इत्यत्र (ज~ 


मार्गो विधानेनः 


अस्मास श्टोकाच्‌ परम्‌- | | 
 (ुखलिद्धं त्रिवक्त्रं स्यादेकवक्तरं चतुम॒खम्‌? इत्यधिकम्‌ । 
द) श्रिक््तः इत्यत्र श्निवचतर' । (२) '“पश्चिमास्यं स्थितं" इत्यत्र 


 पपश्चिमास्यासिर्तंः 


 @) स्मरताः इत्यत्र (तथाः । | 
(१) “-मातरस्थानंः इत्यत्र मातरं स्थाप्यः । (४) ्यद्कषाधीराच्ः 


इत्यत्र छरयाद्‌ यक्चाधीराच्चः } 
(१) “वामः इत्यत्र धवामेः | 


(३) श्रेः इत्यन रम्ब" । (४) शुणु इत्यत्र स्थित 


(३) (असिनोः इत्यत्र असितो! ` 


(३) (-द्वितचरिचतत्‌-' इत्यत्र ^-द्वित्निचतुः- । 


अस्य द्वितीयपादे- 


"तस्मादयुग्ममगमद्‌ बहशो हरिः इति पाठः । 


(३) ननन्दनीमाः इत्यत्र "वन्दनीयाः । | 
(क) पुष्पिकरायाम्‌--श्रीक्षेत्रा > > विरचिते इत्यत्र श्री्षेत्रात्मजसूत्रभरन्मण्डन- 


. --विरशितै 
1 सप्रमाध्याये 


(३) पद्मनाभश्च इत्यत्र दप्रभश्वः । ` 


५ (४) सर्याभ्र सुप्रमान्तः- इत्यन्न सुपां सप्रमो मतः. | 


द 


(्) “~-नन्ततक्षकः" इत्यत्र “नन्दमन्दकः' | 


अस्य पूवंपादत्रये-- ` 


श्वरः शान्तिश्च (क)्न्थेरमद्धियो युनिराप्रतः । 
(ख) 'तेमिर्ननिपादवे नाथोः इति पाटः। 
(४). “मदिपाश्वैः इत्यत्र “-मदधिपारर्वौः 
(२) श्यः" इत्यत्र श्रीः 


(क) न्थाकहमहयो सुनिखरतः' इत्येवं स्याप्‌। (ल) नेमिनः पाश्वनाथोः इषि ध 
१ 1 1 ॥ 


 &। (२) नन्यावत्ताः इत्यत्र ^नन्दावत्तं 


म न 9 (0 क्र 


( १८ ) 


चग 


त्ता" । (४) 'षिहोः इत्यन्न “सिंहः 
अतः परं “इति जंनटच्छनानिः इति पुष्पिकाऽधिकरा । 
 ७। (३) वविराखाश्चा-' इत्यत्र "विशाखा चा- । 
८। (३) स्वाती चः इत्यत्र रेवती?! = ` 
६। (१) श्वणादिवन्यो" इत्यत्र “श्रवणादित्यौः 
भतः परं-इति (क) जनानक्चत्राः इति पुष्पिकाऽधिका । 
१०। (३) कुखब्रधिक- इत्यत्र कुम्भवृधिक-" । | 
११। (१) (कर्ममेषोः इत्यत्र (ककमेष- । 


 १२। (३) तुम्बरः' इत्यत्र तुवराः । (४) "विजयो जयः” इत्यत्र 'विजयो- ` 


ऽजि(म ? तः) 
१३। (३) 'अकुटि-' इत्यन्न भक्कुटि-' । | 
१४ । (१) -“-र्यमितबला' इत्यत्र ^-्यनिनवलाः । (२) "काटिकाः इत्यत्र 'पाख्काः | 
(2) शश्याम्ान्ता' इत्यत्र श्यामा घ्राता | 


 २०। (३) शवरमुदरर्ा-' इत्यत्र 'वरयुद्रराक्ष-' । । 
` २४। (-४) “सूप्रच्च (ख)भङ्छ्रं इत्यत्र “सूत्तच्चाङ्छुराश्' 


२६। (४) "गदाधर" इत्यत्र 'गदाक्रे' 
२८। (१) पद्मपन्नख' इत्यत्र पद्प्रभस्य' । ` 


 ३०। (३) भनिल्पारं इत्यत्र 'विरवपारो' । 
३१। (१) शान्ता सुवर्णास्याः इत्यत्र शान्ता (ग) सुवर्णा स्यातः | 


 (३-४) न्चाभयं' इत्यत्र च भवेत्‌? । 
(२) छवेतमुखाव्जञरथः' इत्यत्र खेतश्चतुम॒ खः । 
अस्य द्वितीयादं-- ` ५ 
-उजस्याक्गमुदगरपारावभवयाक्षक्ुरगदानक्घट्मः इति पाठः । 


३७। (९) शयुद्रव्णा' इत्यत्र सुद्गवर्णाः । (२) श्रमारूढा' इत्यत्र पद्मार्ढा'। = | 


३८ । (£) "कमलः इत्यत्र "करः । 


३६ । (४) शद्ग" इत्यत्र चुद्गरमः 


(क) 'जिननक्षत्राणिः जन्मनक््ाणि" वा स्यात्‌। (ख) अत्रापि पूलवव्‌ छन्दो ` ८ । 


मेदभीतिरेव मू सम्धिविच्छेदेतुर््यः । (ग) “खवणेव्ण स्यात. इति स्यात्‌ । 


( १८४ ) 


 # ४०। चत्वारि श्छोकात्‌ पर्म--- ` १ 
चण्डा इयामवर्णा स्यादश्वाूढा चतुभ्‌जा 
1 रदं च तथा राक्तिगदम्बुजमनुक्रमात्‌ || इत्यधिकम्‌ । 
 † ४१। (२) शईिषीस्थः इयत्र 'हिखिस्थाः । | 
४४। अस्य श्लोकस्योत्तरा्धे-- ` | 
 .  बीजपूरगदा चाभयाऽक्षमालाऽन्ननाद्ुटाः इति पाटः । 
`  ४६। (३) 'वाराहवदनोः इत्यत्र ्वराहवदनोः 
 ४६। (द) ्रिमूलने" इत्यत्र ५त्रिनूलके() । 
.. (द) भ्सुषांधिकाः इत्यत्र “पद्य सुषण्डिका ! 
५०। (२) शेषवाहनः' इत्यत्र 'ाद्वाहनः"। = 
`  ५२। (२) (पद्यवर्णासनस्थिता' इत्यत्र “वर्णा पद्यासनस्थिताः 
` - ५३। (१) शतः फषोरोदः इत्यत्र “सितङेरो(व १ ऽथ )" 
१४ अस्य श्लोकस्य परार्ध-- ` 


दावादक्तिपाराधनुस्तथा पद्य च नछुखम्‌ । चेति दक्षिणाधकरक्मात = ` 


वरदं चादसू्रच्च च शक्तिना मातुलिङ्घकम्‌ ।' इति क्रमहीनः पाठः । 


1  ५७॥। (१) (क) "रदन्ता इत्यत्र नरदनत्ताः । 


(१) श्चकुटिनेमिनाथस्यः इत्यत्र श्ृक्ुरिनमनाथस्यः । = 


:  ५९॥ अस्यशछोकल्य स्थाने-- 


'अ्षुवजञपरलुनङुरं मथानस्तु गान्धारी यक्षिणी 
वरखडगखेट्लुङ्ध' हंसारूढास्तिता कायो ।| इति पाठ 


६१॥ अस्यश्ोकस्य पू्वाधै-- 


सिंहारूढाऽम्बि(ककायं ? का कार्या) डम(र) नागपारक्रप्‌ इति पाडः | | 
(४) (तथा हस्तेषुः इत्यत्र तस्य हस्तेषु । ` 


‰ एतदंशसुद्रभावखर एवास्माभिरिदं “स्पावतारुस्तकमुपरुन्धम्‌ । परं तदानीमपि ` 


र ५ ¦ स्‌ ॑ त्ञातं यदिदं पुस्तकं नासमाव्रभिन्न द्ेवतामूतिप्रकरणमेषेति अधिकोऽयं रोक इति 
ध ( ख्पावतार इत्युरेखेन अ्रत्यपादटीकायां सन्निवेधितो न मूले । | 


†  मूणे १३८ तम-यृषटत्यस्यास्य खोकस्य संख्याट्को भ्रमान्न सुद्धित इति द्यम्‌ । 


ध (क) मूष्रन्थे उदेशल्टोके (१६ @ो०) “नरदन्तेत्येव नामोषलम्यत इत्यतो रश्चणनि्णय- = ` 


मूले “नरदतते"ति नान्ना भाव्यम्‌. प्रमादादस्माभिरनुतेक्चितपाढान्तरं यथाप्राक्षमेवं ५ 


( ' १५. ) 
६७ । अचय इटोकस्य पूर्वाध- 
'कंलाक्षसमोशरणं सिकालिसदाहिवम्‌ः इति पाठ 
६६ । () 'वित्तरागे तुः इत्यत्र 'वीतरगेषुः। | 
७०। (४) माहेन्द्रस्य" इदयत्र “महेन्द्रोऽपसब्ये' । 
७२। (२) शुभोदराःः इत्यत्र 'महोहरा' । (३) श्ुनाभंः इत्यत्र युनाभोः | 


प्रजग्मुः" | 
| | मष्टमाध्याये-- 
, ..& 1 (४) भसिद्धचामर-) इत्यत्र सिद्धचारण । | 
७। (१-२) “-सनाक्षसूत्रा च मभयं? इत्यत्र “-सनाध्वसूत्राव्जमभयंः । 
८ । (२) षहृदये चः इत्यत्र (हृदयापरेः । (३) "च्चाप्रवधः इत्यत्र 'पच्चाम्रयश्चः | 
६। (ष) ्वीवाहे तु माहेश्वरी? इत्यत्र “विवादेरवरीः । 
१०। (२) गजासनसंस्थित्ताः द्यत्र 'गजासनसुसंस्थिताः । 
 १३। (२) वेतचामकरेः इययत्र दवेतन्वामण्डक' । | ५ 
१६। @) भोदहिल्यपि सव्ये सभिनी 'मोहिन्ययसव्ये स्तम्भिन्यपि! । 
२९) पएकर्विश्चः शोको नसि। 
 २४-२६ । चतुर्विंशतः षड्विहषान्तानां त्रयाणां शछछोकानां स्थाने- ` 
"रक्ताङ्गो गजवक्त्र (:) स्याद्‌ रत्नकुम्भं तथा(ङक्)शम्‌ । 
> ॐ > > < > >‹ ॐ परञ्ुमोदकाक्रमात्‌ । 
 इत्युच्छ्ठगणेशः इति पाटः । ` 


9 2७ | अस्य शोकस्य स्थाने-- ` 
{. (सिन्दूराभ(त्रिण एत्रिनेत्रश्च प्रोक्तबीजगणाधिप() । 


दण्डपाशाङरो बीजपूरं बिभ्रत्‌ करेषु च ॥ 
इति बीजगणपतिः । 


 अक्प्रसारिधरं वा सिहवाहनत्रिनेत्रप्‌। 

. दानमये मोदका दण्डमेव च ॥ 

ट्ख रिरेक्षमाखा च मुद्गरं चाङ्कशं तथा | 11 

` त्रिशूलं चेति हस्तेषु दधानं छुन्दवत्‌ सितम्‌ ॥' एतावानूपाढः । ‰ = | 

"विन्ुराभस्तिनेतरश्च प्रोक्तो बीजगणाधिषपः' इति स्योत्‌ । 1 | 
ए. 


७४ । (र) शरष्नो गन्धवंयक्षोः इत्यत्र ररक्षोगन्धवंयक्षा । विज्य" ` इत्यत्र ` 


१८६ ) 
(२) श्ङ्धविन्रत इयत्र "गूं विधतः । 


भल्मात शोकात्‌ परम्‌-- 


२६1. 


:*2३२। 


ए 


र प 


४० । 

 ४१। 

4... ४६1 
र्‌ 

1 
9  ५६। 
६९1 
 &। 


` ६८। 


क 
७२ । ५ 


(५ 


५ | ध ४ ६४ । 


४ ¦ ७६ |. 
1 91 


वामागे जक णाहथाद्धे दक्षिणे 
प्र कर्णे तु द्वा पातु धष्रको बारुचन्द्रमा(:)' इत्यधिकम्‌ । 
८३) “राज्यं इत्यत्र “राजाः । (४) (्यवस्थितः' इत्यत्र (च संस्थिताः । 
(र) वल्वान्तक-' इत्यत्र बल प्रातक- । ` 
अयं शोको नास्ति । 


(३) "कमण्डलोद्वरणाभं' इत्यत्र "कमलोदरवर्णाभिः | 
(१) (-श्विरक- त्यत्र ८-श्चि | प (२) (स्थानीयं सैट इत्यत्र 


(स्थानीयखेट-' | 
(२) श्रसारिकाः इत्यत्र श्रसारिताः । 
(४) "च स' इत्यत्र ल्वसिः' 1 


(३) ्लीलाभ्रीः इत्यन्न (नीखाङ्गी' । 


(१) "वरदः इत्यत्र वरं" । 

(४) 'सर्वङ्रष्ट- इत्यत्र 'सव॑क्रह्ल-' । 

(र) (तथोत्तमम्‌ इत्यत्र 'तथोन्नतम्‌' । 
(४) श्ह॑सर्संस्थिताः इत्यत्र हंसवाहिनी । 
(२) निधत्त" इत्यत्र चिभ्रतिः । ` 
(३) दरदाः इत्यत्र "वरदा । 

(२) 'दादिनीः इत्यत्र (दनी? । | । 

(र) (स्ेर्य" इत्यत्र 'स चैवः | 

(२) द्रवा" इत्यत द॑ष्राखाः 


(२) चक्रये" इत्यत्र (चक्रकं! | (४) ५....चाप्यथ' इत्यत्र दक्षिणे त्वथः 


अस्य छोकस्य पू्वाध-- 
'खेटपादाधनुदण्डं कुठारं चेति बिभ्रतीः इति पाठः । 


(३) (इत्ये इत्यत्र त्येवं । (४) “व्यवस्थया, इत्यत्र व्यवस्थिता() । ` | 


(२) शत्यमानं विकारणम्‌ इत्यत्र (ृत्यमानपीणाकरम्‌? 
(३) ववीरेरवरस्यः इत्यत्र षवीरेरवरधः । ` 


| \  ५८। (र) नोगासवतनिधूख्ः इत्य धवीणाहस्वदिराख्च्चः । == ` 


---- --------------------------------~------ ~ न ----------- -----=--- 


 ( ७ ) 
८२॥। (३) वर्च पुस्तकं वीणा इत्यत्र वरं पुस्तकं वीणा चः । 
८४ । (३) "असपप्न' इत्यन्न 'अक्षाभयंः । 
८६ । ४) “दायकाः इत्यत्र “-दायिनीः । 
८८ | (९) श्युकछुचौः इत्यत्र श्युवश्चचौः | 
६१। (३) “बूलखासिशक्तिचक्राणिः इत्यत्र 'गूलासिराक्तिचक्रासि- । 
६२। (२) “सासवाः इत्यत्र 'समुवाः | 
६३। (9) “पाशबद्धो गले भृशम्‌" इत्यत्र पाराब(द्धं १ द्ध) गलेक्षणःः । 
६५ । (३) "वरटश्चंवः इत्यत्र 'करटश्चंवः । 
६६। (१) "कण्ठहवे, चेव इत्यत्र कन्दकश्चैवः । 
६८ ! ॐ) भृकुटिनामतः' इत्यत्र भूक्रुटिनामकः । 
१०१। (१) र्या इत्यत्र कार्या" । 
१०६। (२) ्ततुपूषठच्च करद्वयम्‌? इत्यत्र (तत्‌पृष्ठे च छुरहयम्‌ः । 
१०८ | (४) (तदधःकरेः इत्यत्र दधतः करे । 
 १०६। (३) त्रयाणामपि! इत्यत्र श्रयाणामनु- । 
११३! (२) (वामे खेटकचाप” इत्यत्र "वामे खेटकचापं चः । 
१९१४ (१) ्वण्टं वा परशु वापि' इत्यत्र “वण्टाश्च परश चापि 
२) वामहस्तेः इत्यत्र "वामे हस्तः । (४) श्रकल्पयेत्‌' इयत्र श्रदरीयेत्‌' । 
१९१५ । (४) (नियहन्त- इत्यत्र (तियगदन्त-' । 
११६। (१) “र्तरक्तिकताङ्च्च' इत्यत्र “रक्तरक्तीकृताङ्ख च्च । (२) “-विस्फारिते- 
| इत्यत्र “-विस्म्‌ रिते- । 


पाठान्तरं समाप्रम्‌ । 


` पुकत्रदेवपूजानिषेधः - क र 1 


विषयाः पन्नाः 


१। प्रतिमद्रव्यगुणदोषतालधि- 
काराख्ये प्रथस्राव्याये [ १--७ | 


विषयाः | व॒घ्राङ्काः 
तुर्या पूज्ञानिषेधः 1 ८ 
कमखाद्नः ४३ 


यन्थारम्भः ह | साविघ्री ६ (0 
मूर्तीनां करतेन्यतोपदेश्चः =, १ | चर्षयः ४ ९ 
प्रल्णष्तरशिखालक्षणम्‌ 9 ५) | विशधक्मी ० 9 
हुष्टशिरारक्षणम्‌ ४  »» | ब्रह्मायतनम्‌ 1 " 
पुनः श्चुभरिखालक्षणम्‌ =... ,› | ब्रह्ममुिः आयतनं प्रतीहाराः ॥ 
शिलाहरणदिनादिनिदंशषः ^ „ | स्यादिनव्रहसूर्यायतनप्रतीहाराः-- 
` गृहपूल्यप्रतिमामानम्‌ =“ ४ | सूर्यः क 
देवाख्यपूज्यप्रतिमामानम्‌ 182. | । । | 89 श्रहूमणां वृणाः + क | | 
अनावृतदेकषूल्यप्रतिमामानम्‌ + | । | | १ ग्रहार्णां वाहनानि #@ ४ | 99 
प्रतिमाघरनद्रम्याणि ह »» | ग्रहाणां भूषणानि ण 
जीणोद्धारविधिः क न सूर्थाथतनम्‌ ७७४ ` " च 
 मीषणदेवतास्थानम्‌ ८ व  प्रदीहाराः ,„ ९१ 
इ ५ ४ । | (7 7। १५ दिक्पाटमूत्तिष्यानम्‌- । | 
अ्चावेकतकथनम्‌ ५ ९ विक्पारेु शनः ॥ ४ + 
प्रतिमािरोक्ञानम्‌ क न 
¢ घ + ४ 99 ५१ 
तारसानेन मूततयः ५ 9, द 0. 
@ ¢ ४ 9१४ , 
रेणाङ्वधानम्‌-- ५ 
तालाज्ुसिणाद्कषिधानम्‌ तेग: क 
तन्न बटूताख्स्य १०० ६ छ 7 र 
सषतारस्य 11, + 8 पदनः रि ५ । ५ ५ + | 
अष्टतार्स्य ८" 8 इ 
 नवतारस्य ^“  . ६ | शान 4 


कपार्मूर्यधि- ५ 
| तव ¢ ४ 6 ३। विष्णुमूरयंधिकाराख्ये तृतीये ॥ 

जीर्णोद्धार विशेषः ४ 11, १ | 
| युगमेदरेन वर्णभेदेन च विष्णमूत्यः १३ 


(9 
(१९) 


विषयाः 


दिरोविधानम्‌ 


घर्णमेदेन विष्णुसूतीन्धं शुमदत्वम्‌ 


ध्रीहरश्यतु [द शातधुत्तयः- 


(९) 


(१२) 
(१३) 


(१४) 
(१९) 


` (१8) 
(१७) 
(१८) 


(१९) 
(२०) 


(श) 


५) 


(र्द) 
क 1), 


 दशावतासः-- 
4. मत्स्यः = | 


नारायणः 
माधवः 

पु्षोत्तमः 
अधोक्षजः 


 सडषणः 


गोदिन्दः 


विष्छुः 
मधुसूदनः 


भच्धुत्‌ ४ 
उपेन्द्रः 
प्रु 
चचिविक्रसः 
नर सिः 
जनादंन्‌ः 
वामनः 

| शरी दः 
अनिष्टः 


ह्षीकेशः 
पद्मनाभः 
दामोदरः . 


हरिः 
कष्णः 


9 € &. 


[ २] 


पश्राङ्ाः विषयाः 
१३ | वराहः. 
५ वृधिष्टः 
| बामनः 
४ | परयुरामः 
। साभ 
99 । 
बरराभः 
18. 
उः 
9५ , 
क्क 
द, 
जछ्दाथनः 


गर्डः 

क 

दु०८* 
विश्वसुखः 
अनन्तः 


ध ( | ्ररोक्यमोहनः 
| षिष्णुप्रतीहाराः | 
१६ | ४). शिवमूत्तिशिवलिङ्गल्तणाधि- | 
 » | काराख्ये चतुथं [ २९३२] ` 


शाटश्रायवर्ा-- 
पूञयश्िषाहष्धणन्‌ 
त्थाञ्यक्षिहछारक्षणम्‌ 

तत्र मतान्तरम्‌ 
वणसेदात्‌ दखूवि्रेरकथनम्‌ 
चक्रधिशेषे वणमेदः 

उत्तमा दिचक्रप्रमाणस्‌ 
त्रिचक्ररुकष्मीनारायणः 
दारग्रामस्थ प्रतिष्ठानिषेधः 
दाटग्रामप्रशसा 


मूसिविशेषाः-- 


1.2.8 


पत्राः 


विषयाः | पत्राः | विषयोः ` पत्राः 
ददश शिवघुचतेयः-- | | छिद्नान्‌ [ ४ २७ 
(१) सयोजातः ` ४ २१ | छिद्धवृक्चाः ५ ॥ त 
(२) वामदेवः ` ५ | * | चुक्ष्षणम्‌ू ०५५ ८ 
(३) अघोरः ` ० 9 | दावादिरिल्लोविताः प्राक्ाहाः ... र 
(४) ततपुरषः ५"  प्रासादमनेन शिष्मानम्‌ ... | त 
(५) ईशः ` 3५ % रिध छभव्ह्वानि ` ^ २८. 
(६) शल्युज्ञयः ,, | लि ्रह्मादिभामाः न 1 
(७) किरणक्षः ,, । दिङ्गस्योद्धौदिभागाः ४ 
(६) भ्रीकण्डस्वश्पम्‌ १. २३ | घटितरट छिङ्श्वणम्‌ 4 | २९ 
(९) भिश्च ८ ,, | बाणोुपत्तिस्थानम्‌ ध 
(१०) वचिषूपाष्टः 6 ,, | वाणपरोक्षा ता न 
(११) बहुरूपी सदाक्षिवः ... ~ चज्यंरिङ्धानि ००५ न 
(१२) च्रयम्बकः त ,, | बाणद्द्प्रशंला ` 1 
उमा महेश्वरः ^ 8. वाहनविधिः क 
हरिहरमूसिः 4 ,, | पीष्कि क 
हृरपितासहः 4 $ युखलिद्धभ्‌ 4 + 28 91 
युग्रम्‌ व | एकट्वारशिवायतनम्‌ ४ 
ठिङ्गनि-- | चतुमखश्िवायतनम्‌ 1 
 ष्टरोहरिद्धषलस्‌ २५ | दप्रातद्ध्यः | | 
 अग्टरललिङ्धफर्म्‌ 6 व॑परति्ारो [र ए 
पीडविधिः ५ दक्षिणपरतिारौ ध 9१ 
टिदोचिता मणयः वन २६ पश्चिसप्रतीहारो 1 
चङाचरुटिद्घम्‌ | | त | उत्तरप्रतीहासे [ । ^ | | 
चललिद्म ` ६ . ५। गोर्याः प्रमाणमूरिखक्षणाधि- | 
 स्थिररि्गम्‌ ह | काराख्ये पञ्चमे [३३-७१] = | 
रक्णादिदवीनस्थापि पूज्यत्वम्‌ ‰ „+ | गौर्या मुहेयः-- (द | 
 रलणिद्धिमानम्‌ = ^ वि 2  गौरीमूतैः सामान्यरक्षणम्‌ ,., 4६. 
धातुकिङमानम्‌ = = >» [उमा क. 1 ५ 
दारवरिङ्गमानम्‌ = ~ . क ५ 
(6 गरङिद्धमासम्‌, ५3. २७ | श्रिया | ५: क 


विषयाः 
रम्भा 
क्षता 

` च्िपुरा 
गोर्यायतनम्‌ 


| गोयं अष्टौ हारपाखिक 


वक्रतुण्डः 
 गणेश्षायतनम्‌ 
 गणेशप्रतिहाराः 

 कातिकेयः 


पञ्चलीलाः 
¢ 
 दुगा-मूतयः-- 


बरहार्दमीः 
= किमड्री 


` हरसिद्िः 
गोर्यादीनां वाहनानि 
 चाययुण्डा | 
ध र्तवायुण्डा 
 काल्यायनीमूर्तिः 
चण्डिकाश्प्रतिहासः 
। रुकम्या मूति 
 महारक््मीः 
` महाविया 


सरस्वती 


` सप मातरः 
ब्राह्मी 


(1 (1 | मादेश्वरी 
 ेष्णवी 


| ४ 
पत्राः 
३ 


„ | 
| 
| 
| 


| 
५४ 
३८ | 


[ विषयाः 


वारा 
इन्द्राणी 
चाययुण्डा 
्षे्रपालः 
वट्कभेरवः 


+ (1114 


६। जेन-ृतति-खत्तणाधिकाराख्ये 


वषठे--¡ ४२--७६ | 
चतु विश्ातिरहन्दः 


जिनानां वर्णा ५ 
यथाक्रमं जिनानां ध्वजाः ... 
नक्षत्राणि | 
राक्ञयः त 
जिनोपासक्यक्षनामानि  ,,, 
जिनानां शाक्नदेवताः + 
जिनानां यक्ष्यक्षिणीनामानि ,. 
 पतेषां उत्तणम्‌-- 
तत्र गोमुखः क 
चक्रेर्वरी ध 
अम्बिका र 
पावः ४ 
पश्चावती 
मातङ्खः र 
| सिद्धायका त 
द्वितीयभेदेन चकरेदवरी 
| जिनेषु चतुणा प्राधान्थकथनम्‌ 
३९ | एषां नामानि ` ध 
+» | जिनप्रती्ठारनामानि 
४०  प्रतीहाराणामायुधानि  .. 


४२. 


श्रीगणेशाय नम॑ः 


 ({ अन्थारम्मः ] 
विश्वं नमस्कृत्य पूवैतन्त्रानुसारतः । 
पण्डनस्तनुते वास्तुशास्त्र श्रीरूपमण्डनम्‌ ॥ १ ॥ 
[ मुत्तीनां क््तन्यतोपदशः ] 


प्रासादे चिङ्खमूर्तीनां प्रमाण शाख्ररक्चतः । 
 मनुष्यपशुपष्यादिरूपं कुर्या्तदजृतेः ॥ २ ॥ 


[ प्रशरूतक्षिररुष्षणम्‌ | 


निविडा नि्रणाऽमृद्री सुगन्धा मधुरा लिख । 
 स्वाचोटिङ्गपीरेषु श्रष्ठा कान्तियुत च या॥३॥ 


[ इष्टक्तिलार्क्षणम्‌ ] 


 विमरु हेमकांस्यादि चिदं रोहमयश्च यत्‌ १ 
| तथाऽन्यद्विविध चिं प्रतिमायां मयावहम्‌ ॥४॥ 


[ पुनः श्चुमक्षिखारुक्षणम्‌ | 


 कपोतभृङ्खकुयुदमाषमुद्गासितोपमा । 
पाण्डरा प्रतपद्मामा सवीचौयु श्भा शिख ॥ ५ । 


[ शिखहर्णदिनादिनिदश्नः ] 


(1 ५ सुदिने सुमहते च शकुने रान्तंचेष्टिते । 1. 
 प्रतिमाग्रृहकाष्ठादिकमं कुर्याच्च चन्यथा ॥ &॥ 


नि. = ् 4 ~ 


७  स्वमण्डै 


[ गयप्रतिमामानम्‌ ] 
आरभ्यैकाङ्खलादृङ्ध पर्यन्तं द्वादशाङ्कुख । 
गेषु प्रतिम। पूज्या नाधिका शस्यते ततः ॥ ७ ॥ 
[ देवारुवपूल्वप्रतिमामानम्‌ ] 
तद्ध नवहस्तान्तं पूजनीया छराल्ये | 
[ अनादृत्तदेशपूल्यप्रतिमासानम्‌ 
 दशदस्तादितो याऽचौ प्रासादेन विनाऽ्चयेत्‌ ॥ ८॥ 
दसादि(१)करषष्ठया तु षयुत्रित्‌ प्रतिमा() एथक्‌ | 
वाणवेदकरान्‌ यावत्‌ (र)चतुष्कां पूजयेत्‌ सुधीः ॥ ९ ॥ 
[ प्रतिमाघटनद्रन्याणि ] 
 अष्टरोहमयी मूषिः शेररलमयी शुभा । 
्ष्ठवृक्षमयी वाऽपि प्रवाखदिमयी शुभा ॥ १० ॥ 
[ जीर्णोद्धारविधिः ] 
 (३)अतीतब्दः चता (9)मूरतिः पज्या स्यान्महत्तमेः । 
खण्डिता स्फुटिताऽप्यच्यौ अन्यथा दुःखदायका ॥ ११ 
धातुरलविलेपोस्था व्यङ्गा() संस्कारयोभयका() । 
कष्टपापाणजा मगना() संस्कारा न देवताः ॥ १२ ॥ 
[ भीषणदेवतास्थानम्‌ ] 
भैरवः शस्यते कोके भरस्यायतनसंखितः । 
न मूरायतने कार्यों भेरवस्तु भयङ्करः ॥ १३ ॥ 
नरसिंहो वराहो वा तथाऽन्येऽपि भयङ्कराः । 
८ [ इष्टः प्रतिमाः ] 
 नाधिकाङ्ञा न हीनाङ्गः कत्तेव्या देवताः कचित्‌ ॥ १४ ॥ 


(१) “करद्वया इति स्यात्‌ । (२) च्चुष्क्याम्‌ः इति स्यात्‌ । (३) (अतीताम्द- । 


प्रथमोऽध्यायः ८१ 


प्रतिमाकाष्ट(१)लेपानुमदन्तचित्रायसां गहे । 
 मानाधिका परीवाररहिता नेव पूज्यते ॥ १५। 


[ अर्वावतकथनस्‌ | 


नने रोदनं हास्युन्मीरननिमीठने । 
देवा यत्र प्रकुवैन्ति तत्र विदान्महामयम्‌ ॥ १६ ॥ 
तूसेनाभिमुखे क्याद्‌ यात्रां द्वारञ्च गस्तुनः 

= प्रवेश() प्रतिमादीनां गुविंणीनां विरोषतः ॥ १७ ॥ 

[ प्रतिमाश्चिरोक्ानम्‌ 1 
प्राक्‌ प्श्ादृक्षिणे सौम्ये सितता भूमौ तु या शिखा । 
प्रतिमायाः हिरस्तस्याः कुयात्‌ पञ्चिमदक्षिणे ॥ १८ ॥ 
 [ तामनेन मूततयः ] ` 

गरासवक्तूमेकभागे द्वौ पक्षी कुञ्जराख्चयः । 
किनराधाश्चतु्तासः (र)पञ्चारितयुरा वृषः ॥ १९ ॥ 


शुकरो वामनश्चापि षट्ताखो गणनायकः । 

सक्तमागाः प्रकतेव्या वृषद्रूकरमानकाः ॥ २० ॥ 

अष्टा पार्षती देवी सर्वे देवा नवांराकाः । 

दरशताखे मवेद्रामो बलिषूष्वां जिनस्तथा ॥ २१॥ 

ता एकादश स्कन्दो हनुमान्‌ भूतचण्डिका। 
ताल द्वादश वेताला राक्षसाश्च त्रयोदश्च ॥ २२॥ 


देत्याश्चतुदशांशाः स्युभगु(र)खूपा ततोऽधिका व 
 (४)कारंशाः बरूरदेवाः स्युरत उद्र न कारयेत्‌ ॥२३॥ 


(१) “-लेपारमदण्डचित्रायसां ग्रहेः इति स्यात्‌ । (२) पञ्चासितञ्वरा' इति स्यात्‌ | 
(३) “रूपं ततोऽधिकम्‌ इति स्यात्‌ | “) "कल्मंशाः इति स्यात्‌ | | 


` स 
[ ाजुारणङ्कवषानम्‌ ] 


[ तन्न षट्ताङल्य | 


मुखं ताख्द्रयं तस्य जठरं तत्समं भवेत्‌ । 
गुह्यं वेदाङ्कलम्‌ ऊ सप्त जङ्घा च ततसमा ॥ २४ ॥ 


गुणाङ्करं भवेउजानु पादः कार्या गुणाङ्खकः । 
रसतार्मिति पोक्तं सप्ततारमथोच्यते | २५ |} 

[ सष्ठतारुल्य | 
वक्त्रं ताङ्परमाण स्यात्‌ कन्धरावगुखुततयम्‌ । 
साद्धेस्ाङ्रं वक्षो मध्यं नवभिरङ्ुलेः ॥ २६ ॥ 
साधेसप्त नाभि()मष्ये (र)ऊरूरषटदशाङ्करे । 
पादोतूसेध त्रिमालश्च मनुजाः सप्ततारके ॥ २७ ॥ 

[ अशवारस्य } 
अष्टतठे मुख कुयात्‌ तारं द्वादश्चमात्रकम्‌ । 
ओवास्य त्रयङ्ुखा कायां हृदयं तु नवाह्कुलम्‌ । २८ ॥ 


मध्यं द्वादशशमालं च नाभिमेट्‌ नवाङ्खुले । 


(३) उ स्यदेकर्विंशस्या जानु चैव गुणह्ुलम्‌ ॥ २९ ॥ 


जङ्क। तथेक्विंशस्या पादमूरं गुणाङ्करम्‌ । 


[ नवतारल्य 1 


 प्रतिमाश्लमानेन नव भागान्‌ प्रकर्पयेत्‌ ॥ ३० | 


वेदाङ्ु। भवेद्‌ वां भागेन हृद्यं धः । 


 नाभिभागेन मेदे च भागमेकं प्रकस्पयेत्‌ ॥ ३१ ॥ 


 चलुर्विशतिमात्रोरुजनु प्रोक्तं युगाङ्खरम्‌ । 
` द्विभागेन समा जह्खा पादस्तु चतुरद्कुरुः ॥ ३२ ॥ 


1 (१) “मेद्‌ इति स्यात्‌ । (२) 'अरू अशदशाङ्कलो' इति स्यात्‌ 
मि साद्‌ ४ 


मुखस्यापि त्रिभागेण र्खरं नाधिका हनुः । 

विस्तरे सनगं तु द्वादशाङ्कुमीरितम्‌ ॥ ३३ ॥ 

तदवाञच वेदवेदांरो कक्षे एकान्तरे ततः। ` 

सपसपाङ्गुलो बाह दैरष्ये च पोडशाङ्करः (१) ॥ ३४ 

रोऽष्टादशामात्रः स्याद्‌(र)वि्तारो रेणुनाङ्ुलः । 

द्ये सूयाङ्लः पाणिविस्तारे पञ्चमातकः ॥ ३५ ॥ 
मध्यं मन्वङ्खुरं व्यासे कदी रोक्ता जिनाङ्कुख । 

मूढ एकादशोर स्याजङ्खा प्रान्ते युगाङ्ख ॥ ३६ ॥ 

चतुर्दशाङ्कलः पाद (३)स्ततोद्धं च युगाङ्कखः । ` 

कक्षस्कन्धस्तदृद्धः तु कर्तव्य्चाष्ट(४)मातृकाः ॥ ३७ ॥ 


ओवा त्व्टङ्घुखा व्यासे पादः प्रोक्तः षडङ्गुरः । 
 षटुपप्ताष्ट(“+नवांशान्तासहैशाश्च प्रदशिताः ॥ ३८ ॥ 


केयो मानविभा(६)गश्च विस्तरः पूरवशा्लतः ॥ ३९ ॥ 


इति श्रीसूरधारमण्डनविरचिते रूपमण्डने वास्तुशास्ते प्रतिमाद्रव्यगुणदोष- 
| ताखधिकारः प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 


(३) ^-स्तदू््वे च युगाङ्गलः इति स्यात्‌ । (४) ^मात्कः' इति स्यात्‌ । (५) ^नवाशाना- ` ॥ | 
इति स्यात्‌। (६) (गस्य इति स्यात्‌ | | | 


(५). गलो इति स्यात्‌ । (२) वविस्तारोऽगरे गुणाङ्खलः इति स्यात्‌ । १ | 


1 चतुर्वक्त्रा तु साविती श्रोवियाणां गृहे हिता | 


अङ्गपरत्यङ्गमयां तु सूति धीमान्‌ बिसजयेत्‌ । 
 नखाभरणमारखरमयां तां न विवजयेत्‌ ॥ १ ॥ 
[ एकत देषपूजानिषेधः 1 
गृहे सिङ्द्रयं नाच्यं गणेशत्यमेव च । 
दाक्तितयं तथा राद्धं (१)मच्छादिदशकाङ्कितम्‌ ॥ २ ॥ 
द्रे चकर द्वारकायस्तु शालग्रामं तथा । 
रौ शङ्खो नार्चयेत्‌ तद्त्‌ सूथयुग्मं तथेव च ॥ ६ ॥ 
तेषां ठ पूजनान्नूनस॒द्षेगं प्राप्नुयाद्‌ गृही 
४ [ तुर्या पृजञानिषेधः ] 
तुरुप्या नाचैयेचचण्डी (र२)दीपं सूयं गणेश्वरम्‌ 
ब्रह्मादीनाच्च देवानां देवीनाञ्च यथाक्रमम्‌ 
आयुधानि तथा वणं वाहनं कथयाम्यथ ॥ ५ ॥ 
ऋ्वेदादिप्मेदेन कतादियुगभेदतः । 
विप्रादिवणभेदेन चतुपेक्तं चतुभूजम्‌ ॥ & 
 दक्षिणाधःकरात्‌ ख्या जयमाखं तथा (इ)श्ुतम्‌ 
` पुस्तं कमण्डटुं धत्ते सकूषैः कमखसनः ॥ ७ ॥ 
इति कमलासनः 


अक्षू पुस्तकञ्च धत्ते चेव कमण्डुम्‌ 


[ इति साचित्री ] 


(१) (मतृस्यादीति स्यात्‌ । (२) नवः इति स्यात्‌ ! (३) श्रुचम्‌ः इति स्यात्‌ । | 1 


जटिल८) इमश्चखाः शन्ता आसीना ध्यानततूषराः । 
कमण्डस्वक्षसूवाभ्यां संयुता ऋषयः स्मृताः ॥ ९ ॥ 


विश्वकमां चतुबोहरक्षमालाच्च पुस्तकम्‌ । 
(१)कम्बां कमण्डलुं धत्ते तिनेतो हंसवाहनः ॥ १० ॥ 
| [ इति विश्वकर्मा ] 


आग्नेय्यां तु गणेशः स्यान्मावृ्थानं च दक्षिणे । 
न्त्ये तु सहसाक्ष वारुण्यां जर्शायिनम्‌ ॥ ११ ॥ 
वायव्ये पर्वतीर््रौ ग्रदांशचेवोत्तरे न्यसेत्‌ । 
दाने कमला देवी प्राच्यां तु धरणीधरः ॥ १२॥ 
| इति ब्रह्मायतनम्‌ | 
` अह्मणोऽष्टो परतीहारान्‌ कथयिप्याम्यनुक्रमात्‌ । 
पुरुषाकारगम्भीराः सक्च सुकुरोज्ज्लः ॥ १३॥ ` 
पद (२)सक्‌ पुस्तकं (३)दण्डः सत्यो वामेऽथ दक्षिणे । 
सन्यापसम्य(४)करके (५)पद्मदण्डश्च धर्मकः | १४ ॥ 
(६)अक्षपदमाज्गकोदण्डः करे धतत प्रियोद्‌भवः । 
दण्डागम(अ)खक्फर्कैर्यक्ञः स्यात्‌ सर्वकामदः ॥ १५ ॥ 
अक्षसूत्रदाखेरदण्डेर्विजयनामकः । | 
अधोहस्तापसव्येन (<)युवेटब्द य॒ज्ञमद्रकः ॥ १६ ॥ | 
| , (ड)अक्षो पाशाङ्कलो (१०)दण्डो (११मब्य) स्यात्‌ सार्वकामिकः । 
दण्डाक्षाकुक्चपदयेश्च विभवः सर्वशान्तिदः ॥ १७ ॥ 
(१२)इति ब्रह्ममूर्ति; आयतनं प्रतीहाराः । ` 


ण तमित नातण-जणभहनत 
1 


(९) "कम्बुः इति स्यात्‌ । (२) शखुक्‌-' इति स्यात्‌। (३) "दण्डम्‌" इति स्यात्‌ । 


 («) “करयोः इति स्यात्‌ । (९) "द्मदण्डञच इति स्यात्‌ । (६) अ्षपद्ा्कयार्‌ ` 


दण्डम्‌ इति स्यात्‌ । (७) “सुक्‌ इति स्यात्‌ | (८) शखय्धृग्‌. इति स्यात्‌ | 
(९) "अक्षः इति स्यात्‌| (१०) "दण्डः इति स्यात्‌ । (११) “भवः इति स्यात्‌ । 
(४२) श्रहमूतैसयतनप्रतीहाराः इति स्यात्‌ । 

॥ इपर 


१० 


स्यात्‌ 


[ सुः] 
सर्वरक्षणसंयुक्तं सवोभरणभूषितम्‌ 


ैकवक्तश्च रवेतपङ्कजधृत्‌करम्‌ ॥ १८ ॥ 


वतर तेजसो बिम्बं (मध्यस्थं रक्तवाससम्‌ ¦ 


( 
आदित्यस्य विदं रूपं कुर्यात्‌ पापभणादनम्‌ ॥ १९. ॥ 


ह्वेतः सोमः कुजो रक्तो बुधः पीतो गुरुस्तथा । 


शुक्रः इवेतः शनी राहुः (२)कृष्णो धत्रा्तु केतवः ॥ २० ॥ 


पद्महस्तो भवेत्‌ सोमः कुजो दण्डकमण्डटुः 
अधकायः स्थितो राहुः केतुः करपुरज्ृतिः ॥ २१ ॥ 


 [ ग्रहाणां वाहनानि] 


 साश्चरथ आदिव्यश्वन्द्रो दशषहयः स्मृतः । 
मङ्गरो मेषमारूढे बुधः सपासनस्थितः ॥ २२ ॥ ` 


हंसाखढं गुरं विबयाद्‌ भेकारूढं च भागेवम्‌ । 


शनिं महिषमाखूढं राहुं कुण्डस्य मध्यगम्‌ ॥ २२॥ 
` पपुच्छाृतिं केतु शनिं ()द्टा कराकिनम्‌ ॥ 


[ अह्यणां भूषणानि ] 


` (भोृहाः किरीटिनः कायौ (५)रल्कुण्डल्दोभिता 


[ सूर्यायतनम्‌ ] 


| ॥ सूयस्याऽऽयतने स्थाप्या वहिकोणादितः कमात्‌ 
कुजो जीवस्तमः शुक्रः केतवो (६)यन्ञः शनिः शशी 


'द्यस्थः इति स्यात्‌ | (२) ष्णोः इति स्थात्‌ (३) षदा इति ध ५. | | 
(४) शहा इति स्यात्‌} (५) शल इति स्यात्‌ | (&) अत्रधः 
इत्यक्चरमधिकं न्नः" इत्येव स्यात्‌ | = 4 । 


तजेन्यशुता्रचूड(१)दण्डे तु वामतः । 
तजनीराक्ति(२)किरणं दण्डे स्यात्‌ पिङ्गर; परः ॥ २६ ॥ 
द्रे तजन्यो वजदण्डावानन्दो वामगो (३)दधात्‌ । 
तजनीदण्डापस्ये हन्तकः स तु दक्षिणे ॥ २७ ॥ 
द्वे तजन्यौ पद्मदण्डे चितो धत्ते स वामतः । 
तजनीदण्डापसव्ये विचित्रो दक्षिणे सितः ॥ २८॥ 
(४)तजनीदण्डापसव्ये ह्न्तकः स तु दक्षिणे । 
दे तर्जन्यौ प्मदण्डे चित्रो धत्ते स वामतः ॥ २९॥ 
तञजन्यो किरणं दण्डं किरणाक्षः स धारयन्‌ | 
तजनी दण्डापस््ये प्रतिहारः सुखोचनः । ` 
चतुद्रीरेषु संस्थाप्या  दिश्चश्चेते प्रदक्षिणम्‌ ॥ -३० ॥ 
इति सूर्यादिनवग्रहसूर्यायतनप्रतीहाराः। 
[ दिद््पारेषु इन्दः ] 
वरं वजाङ्कशौ चेव कुण्डं धत्ते करेस्तु यः । ` 
गजारूढः सहखाक्ष इन्द्रः पू्ेदिशाधिपः ॥ ३१ ॥ 
| [ बहिः ] 
वरदः शक्तिहस्तश्च समरणारकमण्डटुः । 
स्वाखापुञ्चनिमो देवो मेषारूढो इताशनः ॥ ३२ ॥ 
[ यमः] 
 केखिनीपुस्तकं धत्ते (५) कुकुटं दण्डमेव च । 
महाभहिषमाङूढो यमः कृष्णाज्ञ ईरितः ॥ ३३ ॥ 
[ नेन्ध^तः } 
खड्गश्च खेटकं हस्तः (६) कार्तिकां वेरिमस्तकः । ` 
दंष्ठाकरार्वदनः श्वानारूढश्च राक्षसः ॥ ३४ ॥ 


"म णा १८००८५५१ १८०५ 


(१) (-दण्डेदण्डीः इति स्यात्‌। (२) “किरणदण्डेः' इति स्यात्‌ । (३) (दधत्‌ ॥ त 
इतिः स्वात्‌। (४) पद्यमिदं सम्पातायातं स्यात्‌। (५). ङुङ्कटः इति स्यात्‌| = | 


(६) (कतिकां वेरिमस्तकम्‌ इति स्यात्‌ । 


ह हरिदूवणः पवनो बायुदिकूपतिः ॥ ३६ ॥ ` 
| ऊबेरः } 
गदानिधिवीजपूरकमण्डटधरः करैः । 
गजाखढः प्रकर्तव्यः (२) सोम्यो यो नरवाहनः ॥ ३७॥ 
[ कानः 1 
प्रं तथा विदल नागेन्द्रं बीजपूरकम्‌ । 
बिभ्राणो (३)वृषमाख्डो ईशानो धवख्दयुतिः ॥ ३८ ॥ 


इति दिकपारमूतिध्यानम्‌ | 


शुभा दः 


इति श्रीपूलधारमण्डनविरचिते रूपमण्डने बस्वुशाखर ब्रह्मसूधादिग्रहदिक्पाल- 
मूत्यधिकारो नाम दितीयोऽध्यायः ॥ २॥ 


न ४ 


(१) "वरपाश्ोतपरुः इति स्यात्‌ । (२) सौम्यायां इति स्यात्‌ । ( ३) ्षमा- 


1 वति खाद्‌) 


 ततीयोऽध्यायः 


ध. दे 
यव © ह द) भव्यम 


[ युगमेदेन वर्णभेदेन च विष्णुमूंयः ] 
वासुदेवः सङ्कर्षणः प्रयञ्चश्चानिरुद्धकः 
श्वतरक्तपीतकृष्णा८) क्रमात्‌ (१)कख्युगादिषु ॥ १ ॥ 
` पू्या द्विजादिभिश्च 
 {क्षिसोविधानम्‌ ] 
-------एषां छत्राभं कुक्कुराण्डवत्‌ । 
तपुषामच्च बलिन्दुरूपं कुयोच्छिरः क्रमात्‌ ॥ २ ॥ 


[0 


व 


4. [ वणभेदेन विष्णुमूरतीनां श्चभदत्वम्‌ ] 

| न नारायणः केशवश्च माधवो मधुसूदनः । 

| पूजिता मूर्तयो लेता विप्राणां सौरूयदायकाः ॥ ३ ॥ 

१ | मधुसूदनविष्ण्‌ च क्षत्रियाणां फरदं । 

५ त्रिविक्रमो वामनश्च वैदयानाम्‌ (र)अचैयेच्छुमा ॥ ४ ॥ ` 

| +: पूजिता (र)श्रीधरी मूर्तः शुद्राणां सोख्यदायिनी । ` 

चर्मह्ृदजकानाञ्च नटस्य वररस्य च ॥ ५ ॥ 

मेदभिष्ठकिरातानां हृषीकेशः सुखप्रदः । ` 
दुम्मकारवणिगूवेदया(४)चक्रिकाध्वजिनामपि ॥ ६ ॥ 
सर्वेषां प्रृतीनाच्च पद्यनामः सुखावहः । क 
दामोदरः सौख्यदः स्याद्‌ (५) ब्र्चर्यैकदण्डिनोः । ७ ॥ 
 (कफहरिहरो हिरण्यगर्भो नारर्धिहोऽथ वामनः । ` 

वराहः सर्ववर्णेषु सोख्यदो हितकारकः ॥ ८ ॥ ` 


(१) ककि इति स्यात्‌ । ८२) “अचैने छमौः इति स्यात्‌ । (३) श्रेधरी इति ` 
स्यात्‌ । (४) ^चक्रिक-” इति स्यात्‌ । (५) श्र्चायेक- इति स्यत्‌ । (ई) हरिः 
हिरण्यगमश्चः इति स्यात्‌ । | | 1 


5 कम्बुं" इति स्यात्‌ । 


न । हय्णते" : 
॥ [ वादेः ] 
वाघुदेवो (१)गदां शङ्क चक्रपद्मधरो मतः । 
[ कैश्षवः | 
केशवः कमर कम्बु धत्ते चक्रं गदामपि ॥ ९ । 
नारयणः | 
नारायणः केम्बु(२ )पल्लगदाचक्रधरो भवेत्‌ | 
[ साधवः | | 
माधवस्तु गदां चक्र राङ्क वहति पङ्कजम्‌ ॥ १० ॥ 
[ इ्गेत्तसः } 
 पुरुषोत्तमस्तु चक्र पद्मं शङ्कं गदां दधत्‌ । 
| | [ अधोक्षजः } 
अधोक्षजः सरधिजं गदां शङ्क युदरीनम्‌ ॥ ११ ॥ 
[ सङ्ककंणः | 
सङ्कर्षणो (३) गदां कम्बुसरसीरुहचकमृत्‌ ! 
[ गोषिन्दः ] 
गोविन्दो धरते चक्रं गदां पद्मं च कम्बुना ॥ १२ ॥ 
# [विष्णः] 
विष्णुः कौमोदकीं दरं पाञ्चजन्यं सुदर्शनम्‌ । 
| [ मधुसूदनः 1 
 मधु्रदनस्तु चक्र शङ्खं सरसिजं गदाम्‌ ॥ १३ ॥ 
५ { अच्युतः | 
 अच्युतस्तु.गदपिद्चचक्ररङ्कैः समन्वितः । 


(१) गदा-शङ्खं ५. 


प्वक्रयद्म" इति स्यात्‌ | (२) “पश्च इति स्यात्‌| (३) गदः 


पद्युन्नश्च (१)चक्रशङ्कं गदाम्भोजानि पाणिभिः । 


तरिविक्रमख्िषु गदाचक्रशङ्कान्‌ बिभर्ति यः ॥ १५ ॥ 
[ नरकिहः 1] 
नरतिंहस्तु चक्रान्जगदाकम्बुविराजितः । 
| जनादनः | 
जनाईनोऽम्बजं चक्रं कम्ब कौमोदकीं दधो ॥ १ 
[ वासनः | 
वामनस्तु शङ्कचक्रगदापञ्र्सत्‌करः । 
[ श्रीधरः { 
श्रीधरो वारिजं चक्रं गदारङ्खं दधाति च ॥ १७ ॥ 
अनिरुद्धो रसच्क्रगदासङ्कखारविन्दवान्‌ । 
 [ हषीकेकः ] 
हृषीकेशो गदां चक्रं पश्चशङ्क च धारयन्‌ ॥ १८ ॥ 
[ पद्मनाभः | 
पडनाभः पाञ्चजन्यं पदं च्रं गदामपि । 
[ दामोदरः] 
दामोदरोऽम्बुज शङ्कं गदां धत्ते युदशनम्‌ ॥ १९ ॥ 
[ इरिः | 


 हरिधारयते कम्बं चक्रं पदं तथा गदार्‌ । 


[ इष्णः | 


कृष्णः करैः पाश्चन्यं गदां पदन सुदशनम्‌ ॥ २० ॥ ` 


(4 एताः घुमूततेयो ज्ञेया दरक्षिणाधःकरक्रमात्‌ । | 
(वाघ्वदेवादिव्णाः स्युः षडेते तददादयः १) ॥ २१ ॥ 


तानति तिमता ममि थत 


न्वक्रशङ्खगदाम्भोजानिः इति स्यात्‌ । ` 


१६ 1 | ह  शूपमण्डने 


सङ्कष्णः कार्विकेयोऽब्जरक्तिखेरककम्बुमिः । 
-गरुडध्वजस्तक््यस्थोऽउजशङ्खष्वजविहवान्‌ ॥ २२ ॥ 
 जयन्तोऽक्षचक्रदण्डपंदेवीदित्रसंबृतः । 
गोवर्धनो कसच्क्रशङ्खपदोर्गदां (१)टहि तत्‌ ॥ २२ ॥ 
इति श्रीदरेर्थिश तिमूत्तेयः | 
मत्सयद्र्म स्वस्व्पो नृवराहयो गदाम्बुजम्‌ | 
(२) बिमूत्स्यामो वराहास्यो द॑ष्टामरे तु धृता धरा ॥ २४॥ 
[ इति सत्त्यकुसमंवराहाः ] 
नृसिंहः सिंहवक्त्ोऽतिदष्टारः कुरिरेशकः । 
हिरण्योरखरसक्तविदारणकरट्रयः ॥ २५ ॥ 
[ इति दृसिहः ] 
वामनः सशिखः इयामो दण्डी (२)पीताम्बुपत्रिवान्‌ । 
(४) जटिठीनधरो रामो मागेवः परह दधत्‌ ॥ २६॥ 
[ इति वामनपरक्चुरामौ ] ` 
रामः शरेषुधुक्‌ इयामः सदीरमुशख वरः । 
| [इति रामबल्रामौ | 
(५) बद्धपद्मासनो रक्तस्स्यक्ताभरणमूधजः ॥ २७ ॥ 
` कषायवसलो ध्यानस्थो द्विुजोऽङ्ोद्धपाणिकः । 
थ [ इति इद्धः] 
कल्की सखड्गोऽश्वारूढो हरेरवतरा इमे ॥.२८ 
[ इति करकी |] 
इति ददावताराः+ 


(दपं शेषतस्पे (७)दो दण्डमुजोऽस्य तु । 
शिरोधरो वा वामस्तु सपृष्पोऽये जलेशयः ॥ २९ ॥ 


४ ह क न ~ 
क त ा 


(१) (दधत्‌ इति स्यात्‌ । (२) व्विभ्रच्‌ श्यामो इति स्यात्‌ |` (३) चठतराश्बु 
पाचरवाच्‌ इति स्यात्‌ | (४) जरी वाणधसोः इति स्यात्‌ | (५) बुद्धः पद्मासनोः इति 
स्यात्‌ । (६) 'सुत्तरूपः" इति स्यात्‌ । (७) दक्षे दण्डो युजञ्स्यं ठः इति स्यात्‌। ` 


| तृतीयोऽध्यायः ` व; व ९७ | । 
तन्नाभिपङ्कजे धाता ( श्रीमूमिवदिरोन्थिगे १ ) । 


निष्यसादिस्वखूपाणि पाश्वयोभधुकेरमो ॥ ३० ॥ 
इ {त जलखदयम्‌ः 


६ ) अथ शाचिम्रामपरीक्षा 
| [रि [ पूल्यशिललक्षणम्‌ ] 
वण ॥ि नागभोगसमाकारा शिख सुक्ष्म च या भवेत्‌ | 
4 पूजनीया प्रयलेन सिरा क्लिगध। सुवसख ॥ ३१ ॥ 
| तत्राप्यामश्कीमानात्‌ सृक्ष्मा चातीव या भेत्‌ । 
तघ्यामेव सदा छृष्णः भिया सह वसत्यसौ ॥ ३२ ॥ 
यथा यथा शिख सुक्ष्मा तथा तथा महत्‌ फरस्‌ । 
तस्मात्तां पूजयेित्यं धर्मकामाथेसुक्तये ॥ ३२ ॥ 
[ व्याज्यरिरारक्षणस्‌ | 
कृपिखा कवुरा भया सुक्ष्मा(र)किनाकुख च या । 
रेखाकुरऽयिरा स्थृख बहुचक्रेकचक्रिका ॥ ३४ ॥ 
बृहन्मुखी बहच्यक्रा बद्धचक्रा च या पुन 
(२)बद्धचक्राऽथ वा स्याद्‌ मिन्नचक्रा त्वधोमुखी 
दग्धा सुर्क्ता चापूज्या मीपणा पड्किचक्रिका । 
पूजयेद्‌ यः प्रमादेन दुःखमेव रमेत्‌ सदा ॥ ३६ ॥ 
॥ तत्र मतान्तरम्‌ | 
खण्डिता स्फुरिता मन्ना पदवैभिन्ना प्रमेदिता | 
शासिरामसमुद्भूता शिखा दोषावहा नहि ॥ २७ ॥ 
[ वणमेदात्‌ फरविश्ेषकथनम्‌ | 
सिग्धा सिद्धिकरी मुद्रा कृष्णा कीतिप्रदायका । 
ण्डुरा पापदहना (३)पिता पुत्रपरदायका ॥ ३८ ॥ 
नी दिश्चति (४)रुक्ष्मी च रक्तमोगप्रदायिनी । 
| [ चक्रविशेषे वणभेदः | ॑ 
कपिर्‌ नारसिंहञ्च वामनं (“)चातसलिभम्‌ ॥ ३९ ॥ 


ना 


नन 


(१) चदव" इति स्यात्‌ । ^सिनाङ्खा' इति वा कथञ्चित्‌ सङ्गच्छत एव । ` 


(४) लक्ष्मी च रक्ताः इति स्यात्‌ । (५) "पीतसन्निमम्‌' इति स्यात्‌ । 


(२) ध्ट्य्मचक्रास्थ वा या स्याद्‌ इति स्यात्‌। (३) पपीता इति स्यात्‌। | 


वि छ 


वादुदेवं सितं जञेयं रक्तं सङ्क मतम्‌ । 
दामोदरं तु नीटभमनिरुदधं तथेव च ॥ ४० ॥ 


इयां नारायणं ज्ञेयं वेष्णवं कृष्णव्णैकम्‌ 
 बहूुव्णैभनन्ताख्यं श्रीधरं पीतमुच्यते 


वृत्त(१)सूत्रेऽष्टमो माग उत्तम (र)वक्तरक्षणम्‌ । 
मध्यमच्च चतुमौगं कनीयस्तु त्रिभागकम्‌ ॥ ४२ ॥ 
[ त्रिचक्रर््मीनारायणः } 
रक्षमीनारायणो देवस्तिमिशचकैव्येवखितः । 
पूजनीयः प्रयलञेन भुक्तिमुक्तिफस्प्रदः ॥ ४३॥ 
[ श्षार्प्रासस्य प्रतिष्ठानिषेधः ] 


अहं ब्रह्मादयो देवाः सर्वभूतानि केश्वः । 


सदा सच्निहितस्त पतिष्ठाकमे नास्त्यतः ॥ ४४ ॥ 
[ ्ालग्रामप्रक्षंसा ] 


 क्चास्मामद्चिकम्रे तु यो जुहोति हुताशनम्‌ । 


एकाहुतिहुता सम्यक्‌ कट्पकोरिगुणोत्तरा । \ ॥ 
इति सायिग्रामपरीक्षा | 
 [ अथ मूत्तिविकेषाः ] 
तायो (र)मकङ्कतः प्रक्षः कोरिकाकारनापिकः । 


 चतुभुजस्तु कतेव्यो वृत्नेलमुखस्तथ। ॥ ४६ ॥ 


गृध्ोरुजानुचरणः पक्षद्रयविमूषितः । 
प्रमासस्थानसोव्णः करपेन विभूषितः । ॥ 
छतञ्च पूणकुम्भञ्च करयोस्तस्य कारयेत्‌ 


 कद्वयश्च कव्यं तथा विरचिताञ्छि ॥ 
 नवतारः प्रकत्तव्यो गरुडो मानसूत्रतः । ` 
 (भोपादजानुकटियावदचोयां वाहनस्य इक्‌ ॥ ४९ ॥ 


यदुश्च भगवान्‌ एषे छलकुम्भधरौ करौ । 


(९) 


 किश्िमबोदरः कायैः सवीमरणभूषितः ॥ ५०॥ ` 


सूत्राष्टमोः इति स्यात्‌ (२)  भ्वक्र- इति स्यात्‌ | (३) 


प्रख्यः इतिस्यात्‌ (४) ्ादं जानु कटि यावदर्वायांः इति स्यात्‌। ` 


वतीयोऽध्यायः १६ 
(वामम कुञ्चितः पश्वादन्यपादस्त॒ जानुना । 
प्रथिवीं सथितो यत्र गारुडं स्यात्तदासनम्‌ ॥ ५१ 
| इति (रोगारुडः | 
वेकुण्ठच्च प्रवक्ष्यामि सोऽ्टबाहूर्महावलः । ` 
तक्ष्यासनश्वतुर्वक्त्रः करेव्यः शान्तिमिच्छता ॥ ५२ ॥ 
गदां खड्गं चक्रशरं दक्षिणे च चतुष्टयम्‌ । 
दाङ खेरं धनुः पञ्ं वामे दचाच्चतुष्टयम्‌ ॥ ५३ ॥ 
अग्रतः पुरुषाकारं नारसिंहं च दक्षिणे | 


अपरं खछीयुखाकारं वाराहास्यं तथोत्तरम्‌ ॥ ५४ ॥ 
दति वैकुण्ठः] 


विंशत्या हस्तकैयुक्तो विश्वदूपश्चतुरमैखः । 
पताका हर्राङ्खं च वजङ्कुश(३)शरास्तथा ॥ ५५ ॥ 
चक्रञ्च (४)बीजपूरश्च वरो दक्षिणबाहुषु । 

पताका दण्डपाशौ च गदासार्खोत्पलानि च 

शृज्धी सुशक्मक्ष्च क्रमात्‌ स्युर्वामबाहुषु ॥ ५५६ ॥ 
हस्तद्वये योगमुद्रा वैनतेयोपरि स्थितः । 

क्मानर-नृिंह-खी-वराह-सुखवन्युखः ॥ ५७ ॥ 

इति (५)विश्वमुखः | 

 जनन्तोऽनन्तरूपस्तु हतेद्रदशभियूतः । 
 अनन्तशक्तेसंबीतो गरुडस्थश्चतुमुखः ॥ ५८ ॥ 

दक्षिणे तु गदाखड्गो चक्रं वज्ाङ्करो ररः । 


शङ्खः खेटं धनुः पश्च दण्डपारो च वामतः | ५९ ॥ 
| हत्यनन्तः | 


सुखानि पूर्ववत्तस्याप्यत त्रैरोक्यमोहनः। ` 
स षोडशमुजस्ता्ष्याखटः प्रागवचतुरमुखेः ॥ ६० ॥ 
गदाचक्राङ्कशो (धबाण राक्तिशचक्र वरः क्रमात्‌ । 
______ व्षषु द्रः पाशः श्गगङ्खाग्नङुण्डिका()॥६१॥ ` 
(९ शवामो्तेः इति स्यात्‌। (२) गरुडः इति स्यात्‌ । (३) ~शरास्तथा 
इतिस्यात्‌ | (४) बबीजपूरशः इति स्यात्‌| (५) गविश्वरूपः इति स्यात्‌। 
(& बाणः इतिस्यात्‌ र 


 स्वमण्डने ` 

शुडधी वमेष हस्तेषु योगसुद्रा (१)करद्रयम्‌ 
नरश्च नारर्सिहञ्च श्ुकरं कपिरननम्‌ ॥ ६२ 

| इति तेरोक्यमोहनः | 
दक्षिणे पुण्डरीकाक्षः पूर्वे नारायणः स्मृतः । 
गोचिन्दः पश्चिमे स्थाप्य उत्तरे मधुसूदनः ॥ ६३ ॥ 
ईशाने स्थापयेद्‌ विष्णुमामेय्यां तु जनार्दनम्‌ । 
नेसे पञ्चनाभच्च वायत्ये माधवं तथा | ६४ ॥ 


केशवो मध्यतः खाप्यो वायुदेबोऽथवा बुधैः । 


सङ्कर्षणो वा प्रचुम्नोऽनिरुद्धो वा यथाविधि ॥ ६५ ॥ 
 दशावतारसंयुक्तः प्रोक्तो जलशयोऽथवा 
अमतः शूकरः ख्यः सर्वदेवमयः युमः ॥ 

| इति विष्ण्वायत्तनम्‌ 
परतिहारांस्ततो वक्ष्ये चतसणां दिरां कमात्‌ 
वामनाकारखूपस्ति कतेव्याः सर्वतः शुभाः ॥ ६७ ॥ 
(र)तजनी शङ्खचक्रे च चण्डो दण्डं दधत्‌ क्रमात्‌ 
वामे खाने प्रचण्डोऽस्यापस्व्ये दक्षिणे शुभः ॥ ६८ ॥ 


= पृद्च खड्गं खेटकञ्च क्रमाद्‌ बिभ्रद्‌ गदां (३)च यः । 


 (४)विकोमे पञ्मगदयोर्बिजयस्तो (*)क्रमाद्धिखेनयसेत्‌ ॥ ६९ ॥ 
(६)तभनी बाणचापौ च गदां धाता च सृषटितः । 
 (ॐेसदापसव्ये तेरसतर्विधाता वाम-दक्षयोः ॥ ७० ॥ 
 तजेनीकमङं शाङ्खं गदां भद्रः क्रमाद्‌ दधत्‌ । 
(८)शखापसव्ययोगेन सुमद्रस्तौ करमान्यसेत्‌ ॥ ७१ ॥ 
| इति विष्णुप्रतीदारा 
इति भश्रीसूत्रधारमण्डनविरचिते वास्वुशास्रे रूपमण्डने 


विष्णुमू(स्याश्च्ये)धिकारस्तृतीयोऽष्यायः ॥ ३ | 


त ७७००१००१ ०५०६५०११६ 


(२) करयेः इति स्यात्‌ । (र) सनी इति स्यात्‌ । (३) शनयश्इति = 


स्यात्‌ । (४) विलोमे इति स्यात्‌ | (५) क्रमाद्िचित्‌' इति क्रमान्न्यसेत्‌ 


इति वा स्यात्‌ । (६) (तजनी इति स्यात्‌ | (७) सव्येऽपसन्ये' इति स्यात्‌ । . 


(८) शसबव्यापसव्य- इति स्यात्‌ ¦ 


[ रिवमूरत्तिरिवलिङ्लक्षणाधिकासख्यः | 
चतुर्थोऽध्यायः ` 
अथ रिवमूर्तयः 


[ हाद क्िवमू्तयः ] 
शाङ्काम्बरधरं देवं शुद्धमाल्यानुकेपनम्‌ । 


 नटमारयुतं कुयाद्‌ बालेन्दुञ्ृतरोखरम्‌ ॥ १ ॥ 


त्रिरोचनं सोम्यसुखं कुण्डलाभ्यामख्ङ्कृतम्‌ । 
सच्ोजातं महोत्‌साहं बरदाभयपाणिनम्‌ ॥ २ ॥ 
इति सदोजातः [२] 
रक्ताम्बरधरं देवं रक्तयज्ञोपवीतिनम्‌ । ` 
रक्तोष्णीषं रक्तनेत्र रक्तमास्यानुरेपनम्‌ ॥ २ ॥ 
जटाचन्द्रधरं कुर्याततिनेतरं तुज्गनासिकम्‌ । 


वामदेवं महाबाहुं खड्गखेरकधारिणम्‌ ॥ ५ ॥ 


इति वामदेवः [२] | 
द्ाकरार्वदनं स्शीषं त्रिरोचनम्‌ । 


 रुण्डमाखधरं देवं सपेकुण्डर्मण्डितम्‌ ॥ ५ ॥ 
` सजङ्गकेयूरधरं सर्पहारोपवीतिनम्‌ । 
| योनसं() करिसूत्रेण | गले दृशचिकमाकिकिम्‌ ॑ ॥ ६1 ` 


 नीरोत्पल्दल्दयाममतसीपुष्पसनिभम्‌ । 


1 


(१) 


 िङ्गभ्रपिङ्गजटिरं सशाङ्ककृतरोखरम्‌ ॥ ७ ॥ 


(तक्षकं सुष्टिकश्चैव पादयोस्तस्य नूपुरौ । 
 अधोररूपकं कुर्यात्‌ काररूपमिवापरम्‌ ॥ ८ ॥ 


` ्तक्चको युष्टिकश्चैवः इति स्यात्‌ । 


दपा मिणानणममप्ननयन 


महावीर्यं महोत्साहमष्टाहुं महाबलम्‌ । 
कमयन्तं रिपोः (१)सद निवेशो यत्त भूतले ॥ ९ ॥ 
खगरङ्गश्च कपारुश्च खेटकं पात्रमेव च 
वामहस्तेषु करैन्यमेतच्छस्रचतुष्टयम्‌ ॥ १० ॥ 
त्रदं परशुः ८२)खड्गं दण्डश्ेवारिमर्दनः । 
शखाण्येतानि चत्वारि दक्षिणेषु करेषु च ॥ ११ ॥ 
इत्यघोरः [३] । 
पीताम्बरस्ततपुरूषः पीतयन्ञोपवी तवान्‌ । 
मातुलिङ्गं करे वमेऽक्षमाख दक्षिणे तथा ॥ १२॥ 
इति तत्पुरुषः [४] | | 
(२)शुद्धः स्फटिकसंकाशो जटाचन्द्र विभूषितः । 
(४)अक्लिदूरुहस्तौ च कपारं वामतः शुभम्‌ ॥ १२ ॥% 
[ इतीक्ञः ९] ` 
कपारमालि-पुश्वेतं शशाङ्कृतरोखरम्‌ । 
व्या्रचर्मधरं मृलयुज्ञयं नगेन्द्रमूषितम्‌ ॥ १४ ॥ 
रिदं चाक्षमारा च दक्षयोः करयोः स्मृतौ ! 
कपालं कुण्डिका वामे योगमुद्रा (५)करदरयम्‌ ॥ १५ ॥ 
5 इति मत्युज्ञयः [६]। 
 चतुभुजो महाबाहुः शुङ्कपादाक्षिपाणिकः | 
पस्तकामयहस्तोऽसो(६)सच काक्षिरोचनः ॥ १६ ॥ 
ईति फिरणाक्षः [७] | 


० 11 या भा कातता न 


(९) त्व इति स्यात्‌ । (२) (लङ्गो' इति स्यात्‌ । (३) श्द्धस्फरिक 


इति स्यात्‌| (४) च्यक्षलिद्यूखहस्तश्चः इति, “दश्च तिदय हस्ते चः इति वा स्यात्‌ | 


(4 (५) (करद्वये' इति स्यात्‌ । (६) (स-चक्राक्ष इति [किरणाक्ष- इति वा १ स्याद्‌ । 


-------------------~- ~~~ ~ ------ ~~~ --------------------------------- ८ 
1 


# पद्यमिदं मृत्यन्तरस्य लक्षकं न त॒ मूयुज्ञयमृततैः, द्विरायुधनिरदेशात्‌ । मवति ` 


५ च मृयुञ्ञयलक्षकत्वेन भ्रान्तिरन्ता पुष्पिकान्तरविरहात्‌ । देवतामूत्तौ ैसलक्षणत्वेनेदं 


निरदिम्‌ ( देष० ६।१४ ) ; तद नुगत्याऽस्माभिरपि पुष्पिकैका कसित ; एवञ्चभर १ ४ 


(1 दति द्वादश रुद्रा इति पुष्पिकाऽपि नादतमाषिणी स्यात्‌ । | 


२३ ति 


वित्लवखधरं कुयांचितयज्ञोपवीतिनम्‌ | ` 
चितख्यं महेशानं चित्रे्र्थसमन्वितम्‌ ॥ १७ ॥ ` 


चतुर्बाहुं चेक (१)वघं सर्वालङ्कारमूषितम्‌ । 

खड्गं धनुः शरं खेटं श्रीकण्ठं बिभ्रतं युजः ॥ १८ ॥ 
इति श्रीकण्ठखसूपम्‌ [८] । । 

अहिर्वघ्रो गदासपं चक्रं उमर्-मुद्गरी 

शूलङ्काक्ष(र)माखा च दक्षोध्वाधःक्रमादधत्‌ ॥ १९ ॥ 


तोमरं पटटिदं चर्म कपाठं तजनी । 
(३)शक्तिः परशुकं वामहस्ते सन्धारयत्यसौ ॥ २० ॥ 


इत्यदिः [९] | 
 विूयाकषस्ततः खड्गं शूलं उमरुमङ्कराम्‌ । 
= सर्षञ्चक्रं गदामक्षसूतं बिभ्रत्‌ करटकः ॥ २१ ॥ 


लेटे खट्ज्गशक्तिच्च परशं तजनीधरम्‌ । 
ण्टाकपारुकं चेति वामोध्वीदिकराष्टकेः ॥ २२॥ 


इति विरूपाक्षः [१०|| 


 बहुखूपो दधद्‌ दक्ष डमरं च सुदशनम्‌ । 
सपं शरूलाङ्कशौ कुम्भं कौसुदीजयमालिका्‌ ॥ २२ ॥ 
घण्टाकपारुखटङ्गतजनीकुण्डिकां धनुः | ` . 
पर (४)पञ्िकं चेति वामोध्वीदिक्रमेण हि ॥ २४ ॥ 


इति बहुरूपी खदारिवः [११|| 


| तयम्बकोऽथ दधचकं डमरुं मुद्‌गरं शरम्‌ । 
 (=चूलङ्कशान्यक्षसूत्रं दक्षोध्वदिक्रमेण हि ॥ २५ ॥ 


पि 


| 


(१) “वक्लंः इति स्यात्‌| (र) “मखाश्च इति स्यात्‌| (३) शाक्त ८ 


इति स्यात्‌ । (४) द्द" इति स्यात्‌ । (५) श्यूलङ्कंशावकषसूलं' इति स्यात्‌ । 


१ 


सूपमण्डने 


गदाखयाङ्गपाव्ाणि कार्पकं तभनीधरो 


पर पड चेति (१)वामाधांदिकराष्टके 


इति च्यम्रकः [१२] 
| इति द्वादश स्द्राः। 
उमामहेश्वरं वक्ष्ये उमया सह राङ्करः । 
(२)मातुलिङ्ग विद्यूख् धरते दक्षिणे करे ॥ २७ ॥ 
आलिङ्गितो वामहस्ते (र)नगेन्द्रं द्वितीये करे । 


` हरस्कन्ध उमाहस्ते दर्पणो द्वितीये करे ॥ २८ ॥ 
अधस्ताद्‌ वृषभं कुयात्‌ कुमारच्च गणेश्वरम्‌ । 


भृह्धिरीरं तथा(४)कुयांनिमंसिन्नृत्यसं स्थितम्‌ ॥ २९ ॥ 
इति उमामहेशवरः। 


कार्यो («)हरिहरस्यापि दक्षिणं सिवः सदा | 


हषीकेदाश्च वामर्थे शवेतनीराङ्कती क्रमात्‌ ॥ ३० ॥ 
वरं विदुख्चक्राठजधारिणो बाहुका क्रमात्‌ 


| दक्षिणे वृषभः पावे वामे विहगराडिति ॥ 


इति हरिहरमूतिः। 


 एकपीटसमारूढमेकदेहनिवासिनम्‌ । 
षडूभुजच्च चतुवैक्लं सवैरुक्षणसंयुतम्‌ ॥ २३२ ॥ 
 अक्षमाखं चिश्ूखच्च गदां कुर्याच दक्षिणे । 
कमण्डटु्च खराङ्ग चक्रं वामसुजे तथा ॥ ३२ ॥ 


इति हरपितामहः | 


 उमान्च द्विजां (६)कु्यीहृक्ष्मीनीरायणाधिता । 


देवं शतैः स्वकीयैश्च गरुडोपरि संयतम्‌ ॥ २४ ॥ 


(१) '्ामेर््वादि- इति स्पात्‌ । (२) "मतङ्गः इति स्यात्‌। (३) ननजेन््रोः 
इति स्थात्‌ । 


स्यात्‌ । (£) कुर्याछक्ष्मीं नारायणाभिताम्‌ः इति स्यात्‌ । 


व 


चतुर्थोऽध्याय क 


दक्षिणः कण्ठरूनोऽस्या वामो हस्तः सरोजधक्‌ । 


विमोवीमकरो रण्षम्याः कुक्षिमागस्थितः सदा ॥ ३५ ॥ 
सर्वेषामेव देवानां युग्मं युग्मं विधीयते। ` 
तेषां शक्तिः प्रथग्रूपा तदखवाहनाश्ृति८) ॥ ३६ ॥ 
| इति युग्मम्‌ । 
अथ लिङ्गानि । 
स्थिरलक्ष्मीपदं हैमं (१)तारजच्व राजतम्‌ । 
प्रजावृद्धिकरं (२)ताग्रं वङ्गमायुर्विवधेनम्‌ ॥ ३७॥ 


 (इ)विशेषकारकं कांस्यं पित्तं सुक्तिमुक्तिदम्‌ । 


सीसकं (४)चङ्ृद्धिज्गमायसं (“)पुरिनाश्नम्‌ ॥ ३८ ॥ 
अष्टलोहमयं लिङ्ग कृष्ठरोगक्षया(ई&)पहम्‌ । 
त्रिरोहसम्भवं लिङ्गमन्तधानप्रसिद्धिदम्‌ ॥ ३९ ॥ 
 [ इत्यषटलोहलिद्गसरम्‌ ] ह 
युष्यं हीरकं छिङ्गं भोगदं मोक्तिकद्धवम्‌ । 
सुखछघत्‌ पुष्परागोस्थं वेदृयं सलुमदैनम्‌ | ४० ॥ 


श्रीप्रदं पद्मरागञ्च इन््रनीरं यशःपदम्‌ | 
लिङ्गं मणिमयं पुष्टये स्फटिकं सर्वकामदम्‌ ॥ ४१॥ 


| [ इत्यष्टरललिद्धफरम्‌ | 
रलरिङ्क द्विधा स्यातं स्वपीटं धातुपीटकम्‌ । 
धाठुज्ञ तु स्वयोनिस्थं सिद्धिरक्तिप्रदायकम्‌ ॥ ४२ ॥ 
प्रज पुष्परागस्य सफिकस्य तु (७)राजितम्‌ । 
ताम्रजं मोक्तिकस्यापि रोषाणां देमज मतम्‌ ॥ ४३ ॥ 
1 [ इति पीठविधिः ] | 


नभिः ५४७५०१०१०.७०८१२० भम ८ 


(१) 'राजतञ्ैव राज्यदम्‌' इति स्यात्‌ । (२) शराङ्ग ताम्रमायुःप्रवधनम्‌ इत्याकरे | 
(३) ¶विद्ेष- इति स्यात्‌ । (४) व्वंशङ्छिङ्ग इति स्यात्‌ । (५) “रिपु इति 
(६) “वहम्‌? इति स्यात्‌ । (७) "राजतम्‌. इति स्यात्‌ | | 

श्प. ~ 


५ व | ( 
समस्तमणिजातीनां ()दीप्सानिध्यकारकम्‌ । 
( मनोसानं प्रमाणानि तेषु माद्यं नवाम्बुदेः १) | ४५ ॥# 
[ दति शिङ्धोचिता प्रणयः | 
रटेयं मोगदं रिङ्ग मन्मयं सर्वकामदम्‌ | 
दारुजं वपुसिद्धयथं सर्वमेतच्चलाचरम्‌ |! ४५ ॥ 
[ इति चरचरूडिडम्‌ ] 
एकाङ्कुखादिपञ्चान्तं चरुख्िडि्च कन्यसम्‌ । 
षट्पमोदिदलान्तच्च मध्यमेकादसादितः ॥ ४६ ॥ 
` [ इति चररिङ्गम्‌ | ` 
नेकहस्तादधो(र)वाचं प्रासादे स्थिरतां नयेत्‌ । ` 
स्थिरं तत्‌ स्थापयेद्‌ गेहे (गग्रण्यां हे दूरकरद्‌ यतः ॥ ५७ ॥ 
[ इति स्थिरलिङ्गम्‌ ] 
(४)वाणरक्षणदीनेऽपि यल वे रोचते मन 
तत्र पूजां प्रकुर्वीत धर्मकामा्थमोक्षदम्‌ ॥ ४८ ॥ 
| [ इति रश्षणादिहीनल्यापि पूल्यत्वम्‌ ] 
 रलमेकाङ्कुलं रिङ्गमङ्गखङ्कु्डद्धितः । 
 नवान्तं नवि बृद्धिवी सुदृगमानिका ॥ ` 
[इति रलङिङ्गमानम्‌ ] 
 धातोरष्टाङ्ुरु पूवैमष्टाषटङ्गुख्वधेनात्‌ 
` तरहस्तान्तं नवेव स्युरिज्गानि चं यथाक्रमम्‌ ॥ ५० ॥ 
{इति धातुरिङ्गमानम्‌ ] 
| इढकाष्ठमयं रिग कत्तव्य षोडशाङ्ुरम्‌ । 
 षोडयाङ्कुसिका बृद्धिः पट्करान्तं नवेव हि ॥ ५१ ॥ 
[ इति दारवलिद्धमानम्‌ ] अ 
(९) श्दीत्तिः सान्निध्यकारणम्‌ इति स्यात्‌। (२) शिङ्ग इति स्यात्‌| 
(२) श्दिद्रकृद्‌ः इति स्यात्‌ | (४) व्वर्ण- इतिस्यात्‌} 


9०१ र 
क तामा नतानभ 
किन 


ता तत न 0 ~न ~+ ~ 


। कातता तिक 


#  अकत्राऽऽदर्ञंः चतुश्वत्वारिंशसंख्यावोधकोऽङ्खो नोपरम्यते, तत्संख्याकः शेक 


पतितो न वेति चिन्तनीयम्‌ |. अस्माभिस्तु यथाक्रममेवाङ्का निवेदिता 01 ध 


चतु्ाऽभ्यायः २७. 


 हसतादिनवहस्तान्तं यरं िङ्गं विधीयते 

हस्तबुद्धयी नवव स्यु्मध्ये वृद्धियरच्छय ॥ "५२ 

| | [ इति रेररिङ्मानम्‌ 1] 
 म्रहारुखेहशेखानां देध्यं मक्त जिनांश॒कैः [२४ 

कुयात्‌ षटूसाघसप्ता्टनवांरे (१)स्तरं शुभम्‌ ॥ ५२ ॥ 
| | [ इति छिङ्गमानम्‌ ] | 
श्रीपर्णी (२)श्ंदुपाशोकरिरीषः (३)खादिनोऽजजनः | 
चन्दनः श्रीफल निम्बो रक्तचन्दनवीजकें ॥ ५४ ॥ 
कुरो देवदारुश्च चन्दनः पारिजातकः । 
चम्पको मघुव्क्षश्च हिन्तास्धागुरः शमाः ॥ ५५ ॥ 

[ इति शिद्धघष्षाः ] 

(9ोनिर््ेणाः >८०८८ सवे लिङ्गार्थे सौख्यदायकाः । 
मन्थिकोटरसंयुक्तान्‌ शाखोद्‌भूतान्‌ परिल्जेत्‌ ॥ ५६ ॥ 
[ इति व्रक्षरक्षणम्‌ |] | 
निर्यं दारुलिङ्गानामिष्टकादारुज शुभम्‌ । 

रेज धतुरलानां स्वह्पं चाधिकं शमम्‌ ॥ ५७ ॥ _ - 

[ इति द्षव्तदिलि्नोचितः प्रासादाः} 

 धातुजे रलजे बाणे दाश्जे च स्वयम्भुवि । 
(५ )गरृहनूनाधिकं वाऽपि (ह)वक्तलिङ्धिषु पार्थिवः ॥.५८ ॥ 
 इस्तमानं मवेषिङ्गं बेदहस्ते सुराख्ये । 
 (अ)ग्येष्ठलिङ्गे तु वेदांशे षटूत्रिदं नवदस्तकम्‌ ॥ ५९. ॥ 
 पृञ्चादिमूतवेदांसे प्रासादे हस्तसंख्यया । ` 

मध्यमः पञ्चमांदोन हस्तादिनवहस्तकम्‌ ॥ ६० ॥ 


पा ताना तातान तारि 


“वित्रं इति स्यात्‌ । (२) शिशपाऽ्योकः' रिद्यकाऽशोकः' इति वा ` ` 
(र) श्लादिरो- इति स्यात्‌ । (४) ननिर््रणाः इयनन्तर खुद्दा इति 
ं (५) श्यं न्यूनाधिकं इति स्यात्‌) (&) शवक्त्लिङ्िषुं पा वे  । 


(७) भ््येष्टकिङ्गन्॒ वेदांरो षट्‌र्तिशेः इति स्यात्‌ । 


 षृष्ठारोन प्रकर्तव्यं हस्तादिनवहस्तकम्‌ 


(क्ृलादियुगख्लान्तं 9हस्तसंख्ये हिवाख्ये । 
॥ ६१॥ 

(१)कनिषठाज्यषठरिष्गेषु मध्यमामध्यमेषु च 

प्रासादाः कन्यसे उयेष्ठाः सीमामानमिदं स्मृतम्‌ ॥ ६२ । 


मर प्शवांशके तयेरो ज्यष्टलिङ्गं तु मध्यमम्‌ 
नवांश पञ्चभागं स्याद्‌ गभाधं कन्यसीदयस्‌ 


६३. 


[ इति प्रासादमानेन शिङ्खमानम्‌ } 

पशं शङ्खो ध्वजा छत्रं (२)खड्गरक्तिकचामरे । 

वजं (३)दण्डोद्धमागच्च चक्रं मसस्यो घटः उुभः ॥ ६४ ॥ 

सौख्यदं चिह(४)मित्यायामावर्ता दक्षिणेऽपि यः । 

श्वेतरक्ता पीतङ्ष्णा रेखा वर्णेषु सौरूयदा ॥ ६५५ ॥ 
[इति शिद्गे ्॒मचिह्वानि |] 

्रह्मराश्चतुरस्रोऽधो मध्येऽ्टा्ष्तु वैष्णवः । 

पूनामागः सुवृत्त८ः) स्यात्‌ पीटोद्धं शङ्करस्य च ॥ ६६ ॥ 

[ इति शङ ब्रह्मादिमागाः ] 


पूजायामे करांरो च (५)िङ्ञचितरे दशांशः । 


 पीटप्य द्विमागे च रेला कार्या पदक्षिणे ॥ ६७ ॥ 
(मस्तकं मानमध्ये तु बिऽङ्गे रष्टूविभ्रमः 1 £) 
 (दोच्न्ाममष्टमांशेन ()साषे दरयंशषडज्गके ॥ ६८ ॥ 
 च्पुषाम विस्तराषं कुक्कुटाण्डं शिरो मतम्‌ । 


५ त्रिभागे सिङ्गविस्तारे एकांरोनाधचन्द्रकम्‌ ॥ ६९ ॥ 


इति स्यात्‌ । 


0  सधैत्यंशेन तुल्यं याद्ट्े बुदूबुदाकृति८) । 
उद्भषोमध्यहीनं यहिङ्गं नाशकरं भवेत्‌ ॥ ७० ॥ 


(कनिष्ठ इति स्यात्‌ | (२) (लड्गः इति स्यात्‌। (३). ष्दण्डोऽधै. 
चन्द्रश्च इत्यन्यत्र । (४) “मित्यायमावत्तौ' इति स्या । (५) लिङ्ग चिहधं' ` 
(६) छत्राममि'ति स्यात्‌ । (७) (वाद्ये षडंशकेः इति स्यात्‌! 


. चतु्थाऽष्यायः = 6 6 ५ | 
दीर्घे वा सन्धिरेखाभिर्यक्तकाकपदाकृति (£) 
रङ्गं नान्याधितं रिङ्गमाधिताः सर्वदेवताः । ¢ 
स्थापयन्सुख्यदेवस्य (१)स्कन्दमेदान्तरे सुरान्‌ ॥ ७१ ॥ ` 
इति घरितरललिङ्गलक्षणम्‌ । 44 
वाराणस्यां प्रयागे च गङ्गायाः सङ्गमेषु च । ` 
दुरक्षत्र सरस्वत्यां बाणरिङग ुलावहम्‌ ॥ ७२ ॥ 
यानि वरै नर्मदायाञ्च अन्तरवेचाञ्च सङ्गमे । 
केदारे च प्रभासे च बाणलिङ्गं ुखावहम्‌ ॥ ७३ ॥ ` 
[ इति अणोतपत्तिस्थानम्‌ 1 | 
तरिपञ्चवारं यस्यैव तुखसाम्यं न जायते । 
तदा बाणः समाख्यातः शोषं पाषाणसम्भवस्‌ ॥ ७४ ॥ 
| [ इति बाणपरीश्षा ] 
स्थरं (२)खण्डच्च दीधेञ्च स्फुरितं छिदरसंयुतम्‌। ` 
निन्दुयुक्त चं शखर कृष्णं च चिपिटं तथा ॥ ७५ ॥ 
 (इ)चक्रन्च मध्यदीनश्च बहुव्णैश्च यद्‌ मवेत्‌ । 
वजयेन्मतिर्मोलिङ्ग सर्वदोषकरं यतः ॥ ७६ ॥ 
[ इति वर्यंरिङ्गानि 1 
अन्थान्तरे ;-- 
महानदीसमुद्‌(४)भूतसिद्धक्षतादिसम्भवम्‌ । 
पाषाणं परया भक्त्या छिङ्गवत्‌ पूजयेत्‌ सुषीः ॥ ७७ ॥ 
सदोषं गुणसंयुक्तं बाणे पूज्यं हि नित्यशः । 
` बलाहक्मीं समङ्ष्य मुज्यते बाणलिङ्गतः ॥ ७८ ॥ ` 
(4 सवै त्रततयो दानं तीं देवेषु यत्‌ फकम्‌ । = 
तत्‌ एरं कोरिगुणितं प्राप्यते लिङ्गपूजनात्‌ ॥ ५ | 


(१) :्कन्ध-2 इति स्यात्‌ । (र) श्र्वः इति स्यात्‌। (३) ` चक्रञ्च | 


त | | . इति स्यात्‌ । (४) “यूतमिःति स्यात्‌। (५) श्वर्त्रततपोदानतीथेदेवेषु" इति स्यात्‌ । । | 


~ शतवारं स्पते सहसत जवीज्छे। = ` ४. 
 रक्षवारं नर्मदायां कोटिं च कुरजङ्गकरे ॥ ८० ॥ ` 
कला खानं तथा पिण्डं होमं दानं च भोजनम्‌ । 
(गुणिते कोविवारच्च सवैुण्यं लमेन्नरः ॥ ८१ ॥ 
(२) प्त्रे मै शतदस्तेषु (३)बाणेषु च शतेषु च । 
स्वयम्भुवि सहस्रान्तं रिवतीर्थोदकं स्मरतम्‌ ॥ ८२ ॥ 
 [ इति बाणषिङ्गप्रशंसा } 
चिङ्गायामसमेो दैर््ये उच्छायः पीठिकासमः । 
(४)समभागयतो व्रष्र()पन्चमागोचनतो भवेत्‌ ॥ ८३ ॥ 
वाणलिङ्गे रषं कुर्यात्‌ (“)स्वयम्मूमखसून्मये 
शते सहसलिङ्गे च वृषं न्युनाधिकं विदुः ॥ ८४ न 
| [ इति वाहनविधिः ] . | 
विस्तारस्य विभगेण प्रणारं चाधिकं मतम्‌ । 


(६)तदर्धे न्मविस्तारं त्रिमागो जख्वाहकः ॥ ८५ ॥ 
इति लिङ्घानि। | 


 पथत्वं पीरिकायास्तु लिङ्गायामसमं भवेत्‌ 
उदयो विष्णुभागान्ते उमावतर्‌ पीठिका स्पृता ॥ ८& ॥ 
` जाययेकया विधातम्यं (७)नित्यमन्यन्योसंकुरम्‌ | 
आहुः शैरुदुमे केचित्‌ पीठं फकेषटकामयम्‌ ॥ ८७ ॥ 
 उप्ुषरि पीठानां सन्धिरङ्गावसानके । 
` (<)जारु्य मध्यमध्ये च कर्णे सन्धि न सन्धयेत्‌ ॥ ८८ ॥ ` 


 चतुरसरादिवृत्ान्ता पीठिका दशधा स्पृता । 
उन्नता दपंणाकारा बाह्ये मेखर्याऽस्विता ॥ ८९ ॥ 


| 
| 
४ 
| 
| 


(१) गुणितः इति स्यात्‌ । (२) "धातवे इति श्वटे वैः इतिवास्यात्‌। | 
(३) ध्वाणे पञ्चशतेषु चः इति स्यात्‌ । (८) सममागायतो इषः इतिस्यात्‌ | ¦ 
(५) श्वयग्भूमुल इति स्यात्‌! (द). ततद्धनाशरविस्तारंः इति स्फत्‌ । | 
(७) -नेषठमन्योन्यः' इति स्यात्‌ । (<) ^नाठस्यः इति स्यात्‌ । 0 


चत्ोऽष्यायः ३१ 
(१)जिचोदंशस्तु पीण्ड्याश्च जगरथाश्च परिष्िपेत्‌ 4 | 
 ऊद्धाधो (जाव्यकुम्भस्य १) तन्मध्ये कनकं भवेत्‌ ॥ २० ॥ 
(द्धौ ९) देष्थ॑समा दर्ये लिङ्ञायामायता भवेत्‌ 
यस्य देवस्य या पली पीठे तां परिकस्पयेत्‌ ॥ ९.१ 
| इति पीठिका । 
मुखणिङ्गं त्रिवक्त्रं वा एकवक्लञ्चतुयखम्‌ । 
सम्मुखं चेकववत्रं स्यात्तिवक्तरे पृष्ठतो नहि ॥ ९२ ॥ 
` पृश्िमास्यं सितं शम्‌ कुङ्कमामं तथोत्तरम्‌ । ` 
, याम्यं कृष्णं करार स्यात्‌ प्राच्यां दीप्ाथिसन्निभम्‌ ॥ ९३ ॥ 
, सयो वामं तथाऽघोरं तल्ुरषं चतुथैकम्‌ । 
पञ्चमञ्च तथानं योगिना(२)मथ गोचरम्‌ ॥ ९४ ॥ 
न | इति म॒खलिङ्गम्‌ । 
(4५4१ वामे गणाधिपः स्थाप्यो दक्षिण पर्वती तथा। 
(9 नेकैत्ये भास्करं विद्याद्‌ वायग्ये च जनार्दनम्‌ ॥ ९५ ॥ 
5 मातृभिमीतृकास्थानं कारयेदक्षिणां दिशम्‌ । ` 
सौम्ये शान्तिगृहं कुयाद्‌ यक्षाधीशांस्तु पश्चिमे ॥ ९& ॥ 
 इत्येकद्वारशिवायतनम्‌ । | 
(३) वामहस्ते गृहं कुयाद्‌ यशोद्रारच्च दक्षिणे । ` 
मध्ये रुद्रः प्रतिष्ठाप्यो मातृस्थानश्च दक्षिणे ॥ ९७ ॥ 
वामे देवी महारक्ष्मीर्मा (४) > भेरवस्तथा । 
 (~त्रह्मविष्णस्तथा शद्रः प्ष्ठदेो तु कारयेत्‌ ॥ ९८॥ ` 
इन्द्रादित्यो च (६)कणे। च आग्नेयां स्कन्द एव च । 
ईने ()विघ्नराजस्य धूम्र दैसानगोचरे ॥ ९९ ॥ 


इति. चतुमखशिबायतनम्‌ । 


“(2  शतिशदंशन्त॒ पिण्ड्याञ्चः इति स्यात्‌ । (२) “~मप्यगोचरम्‌' इत्यन्यत्र । 


(३) वामे स्नानण्दंः इति स्यात्‌ । (४) बुटितस्थाने श्वः षवे वा स्यात्‌। | 


(५) '्रह्मविष्ण्‌ तथा रुद्र इति स्यात्‌ । (£) प्कृरणी च आग्नेय्यां दति स्यात्‌ । ९५ | | 
(७) विन्नरजोऽस्य' इति स्वार | . ~ = : | | 


`  मातुरिङ्गश्च नागेन्द्रं डमरं बीजपूरकम्‌ । 
नन्दी मुकुरशोभाव्यः (१)सवभरणभूषितः ॥ १०० ॥ 
साङ्ग कारश्च डमरं बीनपूरकम्‌ 
द॑ष्टाकराख्वदनो महाकारप्तु दक्षिणे ॥ १०१ ॥ 
इति पूर्वधरतिहारौ । ` 
तजनी च त्रिशूलञ्च डमरं गजमेव च॑ 
हेरम्बो वामभागे स्याद्‌ भृङ्गी दक्षिणतः स्मृतः ॥ १०२ ॥ 
, गजं डमरुखटाङ्ग तजेनीं वामहस्ततः । 
 उमो च दक्षिणे द्वारे भङ्गी दक्षिणतः स्मृतः ॥ १०३ । 
इति दक्षिणप्रतिहारो । 
वियु उमरु्चेव खग्ग च कपालकम्‌ ! 
कपारं डमर दन्तं वीजपूरं तथा दधत्‌ ॥ १०४ । 
दुमखः पश्चिमे वामे पण्डुरो दक्षिणे तथा | 
५ | [ इति पश्चिमप्रतीहारो ] 
 मातुरि्ग मृणारुशच सद्ग पद्द्डकौ ॥ १०५ ॥ 
| सितो वामेऽसितो दक्षे उत्तरद्रारसखितौ । 
पद्मदण्डञ्च सङ्ग मृणालं बीजपूरकम्‌ ॥ १०६ ॥ 
[ इत्युत्तरपरतीहारो ] | 
इति (२)रिवप्रतिहारो । 


इति श्रीसूत्र >< >‹ मण्डन विरचिते वास्वुशाखे रूपमण्डने शिवमूिरिवलिङ्क 
 रुश्चणाधिकारश्चतुथांऽध्यायः ॥ ४ ॥ 


जिनाति मनना ५ क ०११०. 


(९) “स्पौमरण-' इति स्यात्‌ । (२) च 1 त तीडाराः' इति स्यात्‌ । 


क 


[ चाक्ताधिकारः 


जथ गौर्याः प्रवक्ष्यामि प्रमाणे मूरतिनिर्णयम्‌ 
चतुभज चरिनेता या सवीभरणमूषणा ॥ १ ॥ 
| [ इति गोरीमूर्चः क्षामान्यरक्षणम्‌ ] 
 अक्षसूवाम्बुज धत्ते दर्षणञ्च कमण्डटम्‌ । 
 उमा-नाक्नी भवेनमूरिरवन्दिता त्रिदशैरपि ॥ २॥ ` 
| [ इत्युमा | 
(१)अक्षसूत्रां शिषां देवीं गणाध्यक्षकमण्डटुम्‌ । 
पक्षद्रयेऽथिकुण्डच्च पार्वैती पर्वैतोद्भमवा ॥ ३ ॥ 
। (4 क [ इति पावती ] 
। अक्षसूत्र तथा पद्ममभयञ्च वरन्तथा। ० 
|  गोधासना(र)प्रियामरिगंहे पूज्या धिये सदा ॥ ४॥ 
त [ इति किया ] 
 कमण्डस्वक्षसूत्रच्च विभ्राणा वजमङ्कुशम्‌ । 
 गजासनयिता रम्भा कत्ततथा सवेकामद्‌ा ॥ ५५ ॥ 
[इतिरम्मा] 
 शूलाक्षतूलदण्डच्च विभ्राणा चेव चामरम्‌ । ` 
| तोता कथिता चेयं स्वैकोपप्रणारनी | ६ ॥ 
11. ५ [ इति ततल ] 
(4  नागपाश्चङ्कलौ (द)चेव भयदं वरदं करम्‌ । 
 ज्रिपुरा नाम सा पूञ्या वन्दिता तिदशरपि ॥ ७॥ 
४. [ इति श्िषुरा ] 
इति गोयां मृत्तयः। ` 


कनन 


त 


| ॥ इति स्यात्‌। (३) श्चैवाभयद्‌ इति स्यात्‌ | 
५ सपु ~ | 


(१) "अक्षू शिवं देवं गणाध्यक्षः इति देवतामूत्तौ (८) । (२) शिवाः 4 


4. ॥ 
. = वक्ष्यामि (१)गोयायतनं देवतानामनुक्रमात्‌ 
वामे सिद्धिः धिया याम्ये सावित्री चैव पश्चिमे ॥ ८ ॥ 
 पृष्ठकर्णद्वये काथ भगवती सरस्वती । | 
 $शाने तु गणेशः स्यात्‌ कुमारो चाथिकोणके ॥ ९ ॥ 
कुण्डरभ्यामरुद्रता चेश्वरस्य सदा प्रिया । 
मध्ये मौरी प्रतिष्ठाप्या सवीमरणमूषिता ॥ १० ॥ 
इति गौर्यायतनम्‌ । 
 अमया्कुरपाशदण्डेजैया नैव तु पूरवैतः । 
सन्यापसन्ययोगेन विजया (र)तामसा मवेत्‌ ॥ ११॥ 
 अमयान्बुन(३)षोदण्ड अजिता चापराजिता । 
` अमयवज्ाङ्कुशदण्डेविसक्ता (४)मण्डखऽपि च | १२ ॥ 
अभयं शङ्खपदमदण्डेर्मोहिनी स्तम्भिनी तथा । 
जया च विजया चेव अजिता त्वपराजिता ॥ १३ ॥ 
विभक्ता (५)विमस चैव मोदिनी स्तम्भिनी तथा 
 गौया आयतने श्रष्ठा(६)अष्टा स्युद्ररपारिका८) ॥ १५ ॥ 
। ति मोयौ अशे द्वारपाक्िका | | 
दन्तच्च परशुं पञ्मं मोदकञ्च गजाननः । ` 
| गणेशो मूषकाूढो बिभ्राणः सर्वकामदः ॥ १५ 
५ इति गणेश्षः | 
वरं तथाऽङ्कुशं दन्तं दक्षिणे (ॐ)पार्धधाभयो । 
वामे कपाङं बाणाक्ष पचे (<८)कोमोदकीं तथा ॥ १६ ॥ 


माननम 


(१) शगोयायतनदेवतानामनुक्रमम्‌ः इति स्यात्‌ । (२) नाम साः इति स्यात्‌ 


। (ड) (पाश्चदण्डेरनिताः इति स्वात्‌ । (४) सङ्गलाः इति स्यात्‌ । (५) पूर्वर (श्र) ` 


। | भङ्गलाः मण्डलाः वतयुपलम्मादव्ापि तयोरन्यतरदेष नाम स्वात्‌। (६) अष्ट ` 
८ ५ 4 अष्ट ५ वा स्यात्‌ । (७) धपश्वधाभयेः इति स्यात्‌ 9 ` एवश्चात्र प्रश्वषशब्द्ः "पद्यु - 4 


शब्दवत्‌ परपयाय रवयः । (८) मोदकी) इति चाघुः ¦ 


म ६ 
धारयन्तं करे रम्यैः पञ्चवक्तं विरोचनम्‌ । ` 
हेरम्बं मूषकाखूदं कुयैत्‌ सवीथेकामदम्‌ ॥ १७ ॥ 
इति हेरम्बः $ 
छम्बोद्रं तिनयनं पाराङ्कधरं परम्‌ । 
वरदाभयहस्तश्च (१)रुसत्कणे सचामरम्‌ ॥ १८ ॥ 
[ इति षक्ूतण्डः ] = 
वामाङ्गे गजकणं तु सिद्धि दाच दक्षिणे। 
पृष्ठकर्णे तथा द्वो च धूमको बारुचन्द्रमाः ॥ १९ ॥ ` 
उत्तरे तु सद। गौरी याम्ये चैव सरस्वती 
पश्चिमे यक्षराजश्च बुद्धिः पूरवे सुसंस्थिता ॥ २० ॥ 
इति गणेशायतनम्‌ । 


सर्वे च वामनाकाराः सौम्याश्च पुरुषाननाः | 
 तञनीपरद्ुपद्ममविन्नो दण्डहस्तकः ॥ २१ ॥ 
 तनीदण्डापसम्ये स भवेद्‌ विघ्राजकः । 
तजनीखड्गखेरञ्च दण्डहस्तः सुवक्तकः ॥ २२ ॥ 
तजनीदण्डापसव्ये दक्षिणे बख्वान्‌ भवेत्‌ । 
 तजनीवाणचापञ्च दण्डञ्च गजकणैकः ॥ २३ ॥ 
 तजनीदण्डापसव्ये गोकर्णः पश्चिमे स्थितः | 
 (र)तजैनीपदमा्ङ्कं दण्डहस्तः सुसोम्यकः ॥ २४ 
तञनीदण्डापसव्ये स चैव शुमदायकः। 
= पक्षदरारादिके सवे प्राच्यादिष्वष्ट संस्थिताः ॥ २५ । 
| ति गणेश्ग्रतिहायः 


कारिकेय प्रवक्ष्यामि तणादित्यसननिमम्‌ । 
कृमकोदरणीमं कुमारं सुकुमारकम्‌ ।॥ २६ ॥ 


(१) "चङूत्कणैः इ्युचितः पाठो देषतामूत्तौ (अ० ८; ° २५ ) | 
(२) (्तजेनीपद्माङ्कट च” इति देवतामूतों ( अ° ८; ° ३३) । 


= गण्डकीरकेर्यक्तं मयूरवरवाहनम्‌ । 
(१)स्थापनीयाखेटनगरे अजन्‌ दश्च कल्पयेत्‌ ॥ २७ ॥ 
 चतुभजः (२)क्ैटे स्याद्‌ बने भ्रमे द्विवाहुक | 
दक्षिणे शक्तिपाराश्च खड्गे वाणे लिदयुरुकम्‌ ॥ २८ ॥ 
 द)षरदैशकहस्तस्यादथवाऽमयदो भवेत्‌ 
एते दक्षिणतो ज्ञेयाः केयूर्‌(४)वनकोज्ञ्वलखः ॥ २९ । 
` धनुः पताका मुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता । 
(५)खेटकं ताप्रचडञ्च वामहस्तेषु समस्यते (च 
(६)द्विुजश्च करे शक्तिवोम ऊर्वे च (७)कर्कुटम्‌ | 
चतुभज शक्तिपाशो वामतो दक्षिणे खसिः ॥ ३१ । 
व्रदोऽमयदो वाऽपि (<)दक्षिणस्यत्तरीयकम्‌ } ` 
कार्तिकेयममं शुभ्र कर्तव्यं सर्वकामदम्‌ ।॥ ३२ ॥ 
इति कातिकेयः | 
अक्षसूतरग्ुपात्रे च अधोहस्ते प्रकारयेत्‌ 
 स्वासामीदशो हस्तौ द्वावृष्वौं कथयाम्यथ ॥ ३३ ॥ 
पन्च युमे रस्या स्याही पञ्मं च पुस्तकम्‌ । 
।  ठीलङ्गी पास्षपद्ाभ्यां रलिता वज्रमङ्कशम्‌ ॥ २४ 
प्रशङ्कौ टीखवती ठीर्या(८) पञ्च कीतिता८) । 
८, इति पञ्च टीला 
बरं त्रिश सेर पानपात्रं च भिन्नती। 
नीरकण्ठं तथा नागा महारक्षमीः प्रकीतिता ॥ २५ ॥ 
1 [ इति महार्ष्मीः ] 4 


फलिता ११५५५१५ 


(१) श्थानीयखेट-' इति स्यात्‌! (२) “लर्वटेः इति स्यात्‌| (३) ध्वर्दश्चक- ` | 


खेटकस्ताम्रचूडश्चः इति साधुः| 


द्वः इति स्यात्‌ । (४) “कनकोज्न्वला इति “कटकोज्जवलाः इति वा स्यात्‌ । ` 
1 (4, ५ द्विभुजस्य य इति स्यात्‌ । (७) च्छट (1 | 
इति साधुः। (८) दक्षिणः स्वाज्ञरीयकः इति स्वात्‌ ।, ‰ ` ‰  , 


; म्‌ द७ 
वरं तरद्रूरं सेटश्च पानप।त्श्च विभ्रती । 
क्षेमङ्करी तदा नाम क्षेमारोग्यपदायिनी ॥ ३६ 
` [ इति केमङ्करी ] 
कमण्डटुञ्च खड्गञ्च (१)मरं पानञ्च पातकम्‌ 
 हरसिद्धिस्तदा नाम सर्वेषां सिद्धिहेतवे ॥ २७ ॥ ` 
„५ [ इति हरसिद्धिः ] 
| इति दुगा मूतैयः । 
 गोधासना भवेद्‌ गोरी ङीर्या हंसवाहना८) । 
सिंहारूढा भवेद्‌ दुगी मातरः स्वस्ववाहनाः ॥ ३८ ॥ 
[ इति गो्यादीनां वाहनानि ] 
चण्डिका क्रूररूपा च पिङ्गकेशा कशोदरी । 
रक्ताक्षी (२)मयनेल्ञा च निमांसा विछतानना ॥ २९ । 
(३)चण्डिका कृरख्पा च पिज्गकेशा कशोदरी । 
व्याघ्रचगंपरीधाना सुजज्ञभरणान्विता ॥ ४० ॥ 
केपार्माछिनी कृष्णा रावारूढा भयावहा । 
 व्रिद्यूरं खेटकं खड्गं धनुः पाशाङ्कुश यरः ॥ ४१ ॥ 
कुठारो दर्पणं षण्डा शङ्कं वस्रं गदा प्विः। 
दण्डमुदूर इत्येतेयथास्थानायुधेथता ॥ ४२ ॥ 
बाहुषोडश्स॑युक्ता चण्डयुण्डविधातिनी । 
| इति चण्डा 
खड्गं पात््च सुरं छङ्गरुच्च बिमर्ति सा । ध. 
आख्याता रक्तचायुण्डा देवी योगेश्वरीति च ॥ ४३ ॥ | 
अधीते य इमं नित्यं रक्तदन्द्या वपुस्तवम्‌ 


4 ५ ` ते सा परिचरदेषी पतिं ्रियमिवाङ्गना ॥ ४४ ॥ 


[ इति रक्तचायुण्डा. | 


नि 0 तातान ज ११८१०१०१ 
1 ५५११५१५५ 


(१) डमरं पानपाज्रकम्‌ः इति स्यात्‌ । (२) “मीमनेलाः इति स्यात्‌| 
(३) इदम सम्पातायातं स्यात्‌ । 


र । | (८११७) पाडः। (५ 


। अथ (शकात्यायिनीं वक्ष्ये (२)दशस्तां महज्‌ । 
 तेजःपरतापदां नित्यं वृपाणां सुखबोधिनी(मू) ॥ ४५ ॥ 
 त्रिभङ्गीस्थानसंस्थानां महिषासुरसूदनीम्‌ । 
(३)दकषत्रिश्ूर खड्गञ्च चक्रं बाण चं शक्तिकाम्‌ ॥ ४६ । 


खेटकं पूणेचपञ्च पाशमङ्कशमेव च 
घष्टाञ्च वामतो दाद्‌ दैत्यसूषैजघृकराम्‌ ॥ ४७ ॥ 
हृदि शूलेन निमित्त तिर्गदन्तविभूषितम्‌ |. 
रक्तरकीङृताङ्गश्च रक्तविस्फारितेक्षणम्‌ ॥ ४८ ॥ 
वेष्टितं नागपाशेश्च भृकुदीमीषणाननाम्‌ ॥ ४९ ॥ 
देष्यास्ु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम्‌ । 
किच्चिदूष्वे तथा (छ)वाममङ्कषठो महिषोपरि ॥ ५० ॥ 
हति भरीकात्यायनीमूर्तिं | 
चण्डिकाया प्रतीहारान्‌ कथविष्याम्यनुक्रमात्‌ 
 वेताक()करस्थेव पिङ्गालो भृकुरिस्तथा ॥ ५१ ॥ 
पुष्कः कङ्कदश्चैव रक्ताक्षश्च सुरोचनः। 
 ष्टाननविक(५)स्यसरपुरदशनोञ्ज्वलः ॥ ५२ ॥ 
 बबेरीव्यक्तदेहश्य रक्ताक्षश्च महाबरः | 
तनी चेव सटाजञमूध्वं उमरुदण्डकोौ ॥ ५३ ॥ 
नेतारः सुसमाख्यातोऽपसम्ये करटः पुनः । 
` अभयं खड्गसेरच्च दण्डः पिङ्गलखोचनः ॥ ५४ ॥ ` 
| (ोवामापसव्ययोगेन भवेद्‌ भूकुटिनामकः | 
= तनी च तिश्ूख्च खट्ग दण्ड एव च ॥ ५५ ॥ 


८. 1 ~ 
1 ग ध पि 


(१) कात्यायनी इति साधुः! (२) ्दशहस्तां सुदुजयाम्‌ इति स्यात्‌ 
(३) दक्षः इति स्यात्‌ । (४) '्वाममह्षठः इति मातूस्ये (२६०।६५) देवतामूक्तौ चं 
(५) “-टास्यः संस्फु त इति स्यात्‌| (€) षवामेऽपसव्य 


| 4 पक्चमोऽभ्यायः (4 3 
१ | रकतक्षो (श्वाम मेदोऽसो वामे दक्षे विरोचनः। ` 
9.६४ „थ दिगृद्धारपक्षयुग्मे च परशस्ता विश्ननाशनाः ॥ ५६ ॥ 
इति चण्डिकाष्टकप्रतिहाराः । 
अष्टपश्रा्बुजस्योध्वं रक्ष्मीः िंहासने शमे । 
बिनायकवदासीना सवामरणभूषिता ॥ ५७ ॥ 
ऊर्णवहस्तो प्रकम्य देव्याः पडकजधारिणौ | | 
(२)वामे धृतघटं धत्ते दक्षिणे मातुलिङ्ककम्‌ ॥ ५८ ॥ 
| इति रक्ष्या मूर्तिः | ~. 
` क्षेत्रे कोह्ा(३)पुरे देये महारक्षमीर्यदाऽच्यते । 
रक्ष्मीवत्‌ सा सदा कायां ूपाभरणभूषिता ॥ ५९ ॥ 
दुक्षिणाधःकरे पत्रमूव कौमोदकी भवेत्‌ । 


वामेव खेटकं धत्ते ्ीफं तदधःकरे ॥ ६० ॥ ` 
| | इति महारश्ष्मीः । च 


॥ एकवक्त्रा चतुर्हस्ता सुकुटेन विराजिता । 

| प्रभामण्डरुसंयुक्ता कुण्डखान्वितरोखरा ॥ ६१ ॥ 

अक्षाठ्जवीणा पुस्तकं महाविद्या परकीतिंता 
[ इति महाविद्या ] 
वराक्षान्जं पुस्तकञ्च सरस्वती शुभावहा ॥ ६२ ॥ 
[ इति सरस्वती ] ( 
हंसारूढा परकर्तन्या साक्चसूवकमण्डटः 0 
युवं च पुस्तकं धत्ते उष्वहस्तद्रये शुमा ॥ ६२ ॥ 
५ एति ब्राह्यी । न । 

मादेश्वरी प्रकर्तय्या वृषमासनसंखिता । 

 कपार्दूडख्खट्राङ्गवरदा च चतुभुजा ॥ ६५ ॥ 

| | इति माहेश्वरी । 


(1 (१) भनामः इति स्यात्‌ | (२ वामेऽमृतघटः इति स्वात्‌ । (३) “युरदन्येः 
इतिस्यातू। 1 3; 


४० 


कुमार्या कौमारी मय॒रवरवाहना । 
| 


 रक्तवखधरा तद्वच्छट्रक्तिगदाधरा ॥ ६५ ॥ 


इति कौमारी 


वैष्णवी विष्णुसदश्ची गरडोपरि संवित । 
चतुबीहुश्च वरदा शाङ्कखवकरगदाधरा ॥ ६६ ॥ 


इति वैष्णवीं 


वाराहीं तु प्रवक्ष्यामि महिषोपरि संखिताम्‌ । 
 (शोवाराहसद्दी षण्टानादा चामरधारिणी ॥ ६७ ॥ ` 


गदा चक्रगदा तद्वहानवेन्द्रविघातिनी । ` 


 टोकाना्च हिताथय सर्वैव्याधिबिनारिनी ॥ ६८ ॥ 


इति वारारी | 


इन्द्राणी विन्द्रसदश्ी वज्ररारखुगदाधरा । 


 गजा्नगता देवी रोचनेैहुमिरवृता | ६९ 


५ © 


इति इन्द्राणी । 


॥ = दंष्टाख क्षीणदेहा च गत्ाक्षा भीमरूपिणी । 
40 दिगृबाहुः क्षामकुक्षिश्च सुशं चक्रमार्गणो ॥ ७० ॥ 
अङ्कं बिभ्रती खड्गं दक्षिणेष्वथ वामतः | 


1 खेटं पाश धनुदेण्ड कुठारं चेति बिभ्रती ॥ ७१ । 


चामुण्डा प्रेतगा रक्ता विङ्कता(२)स्यादिमूषणा 


 ॥  द्विमुजा वा प्रकर्तव्या ( कृततिकाकार्यरन्विता १ ) ॥ ७२ ॥ 


इति चामुण्डा | 


 वीरिरस्तु भगवान्‌ दषारूढो धुरः 
बौणाहसतं त्रिशूल मातृणाम्रतो भवेत्‌ | 
| मध्ये च मातृका कायां अन्ते (रै)तेषां विनायकः ॥ऽ२॥ 


'वराह- इति स्यात्‌ । (२) “स्याहिमूषणाः इति स्यात्‌ | 


८ ध इति सप्त मातरः। 


५१००५०७५ 


(३) ` तासां 


पञ्चमोऽध्यायः ४१ 


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्षे्तपारो विधातव्यो दिगृवासा घण्टभूषितः 
कर्तिकां डमरं बिश्रदक्षिणे तु करद्वये ॥ ७४ 
वमि शूलं कपारच्च मुण्डमालोपवीतकम्‌ | ` 
(१)करोतिकटितोदारसर्षमन्थितशेखरः ॥ ७५ ॥ 
इति क्षेत्रपाः | 
खटाज्मसिपाशञ्च शूर दधतः कर 
इडमरुश्च कपार्च्च वरदं भुजग तथा ॥ ७६ ॥ 
आस्मवणेसमोपेतसारमेयसमन्वितम्‌ । 9 
त्वा जपेत्‌ घुसंदृष्टः स्वान्‌ कामानवाप्नुयात्‌ ॥ ७५७ ॥ 


इति बटुक भरवः | 


9 


इति शीसू्रधारमण्डनविरचिते रूपमण्डने वास्वुशाच्रे गोयाः 
प्रमाणमूर्तिलक्षणाधिकारः पञ्चमोऽध्यायः 


(९) करोयिनिकरेदार-' इति देवतामू्तौ पाठः ( अ० ८} शछो० ६०) | ` ध  । 


अथ जेैनमूर्सिलक्षणाधिकारप्रारम्भः | ५ 


एतस्या(श)मिषस्पिण्या ऋषभोऽ(२)जिनसम्मवः । ` + = 
 अभिनन्दस्तु (र)घुमूतिस्ततः प्चप्रमामिधः॥ १॥ ५ 
` पुपाश्चश्न्द्र(प्रमेव(५स्तुविचिस्याथ रीतर | 
(श्रियो वास्पूज्यश्च विमलोऽनन्ततीथ्ृत्‌ ॥ २ । 
 धर्यु्ान्ति()कुप्यरोममदिश्च सुनि(८)ुश्रृतः । 
(र)नेमि-नेमि-पाश्च-वीरश्तुर्विशति अहताः & ॥ ३ ॥ 
[ जिनानां वर्णः] 
 (१०)स्को च पद्म(११)रभु-.-"मवा पूरय 
(१२) च चन्द्रपरमपुष्पदन्तो नि 
 दष्णौ पुनर्नमि(१ शोषुगुणविलीने ` 
 (१४)श्ीमद्िः पां कनकखिषोऽन्ये 
४ { [ यथाक्रमं जिनानां घ्वजाः | । 
वृषो गजोऽदव(१ ५)जो मृगवक्तो चोभ्जः स्वस्तिकः शशी । 
 मकरवरसखङ्गीरमहिषः शरकरस्तथा ॥ ५ ॥ 
श्येनो वज्ञे (१६)मृगछ्ागो नन्वावत्तां घटोऽपि च । 


( कूर्मो नीरोलरं शङ्ख निश (थी विदा वा (१७)फाणी पिंहोऽदैतां ध्वजाः ॥ ६ ॥ 


८) भष र: मवस्िणया्‌ इति स्यात्‌ । (२). (नित इति स्ात्‌  (श)श्वमतिः ` 


ध कतिः स्वात्‌ । (८). शम, इति स्वात्‌ । (५) भ्ुविचिश्वाथः इति स्यात्‌ । 
 (& भ्र्ासोः इति स्यात्‌ | (७) “कुन्थारयोः इति स्यात्‌ । (८, “उतरत इति दयात्‌ । ^. 
6) नभिः ति स्यत्‌. (१९) सौ इति स्यात्‌ । (११) भ्रभवादपूच्यौ" 

| ॥ इति स्वति ८ र) शोः इति स्यात्‌ । (१३) “मुनी च नीलो" इति स्यत्‌ । 
| (४) श्रीमल्पार्थोः इति स्यात्‌| (१५) “शः छवगः क्राजचोऽन्ज इति स्यत्‌ ४ 


(१६) “मृग्छागो' इति साघु | (१७)..फणी इति स्यात्‌ | 


न वष्ठोऽध्याथः | । । | । घ 


 अथनक्षत्राणि ` 
उत्तराषादरोहिण्यौ सृगदीषं पुनर्वसुः । 
भवा चिला विशाखा चानुराधा मूलमेव च ॥ ७ ॥ 
पूवैषादा श्रुतिशवैव शतमिषोत्तरं पदम्‌ । ` 
रेवती पष्यभरणी इृत्तिका रेवती कमात्‌ ॥ ८ ॥ ` 
 अश्िनी श्रवणाधिन्यो तथा चिता विशाखिका 
उत्तरया फल्गुनी चेति जिनानां जन्ममानि वे ॥ ९ ॥ 
| अथ राशय ~ 
धनुर्षोऽथ (१)मिथुनो मिथुनं सिंह(र)कन्यकैः | 
तुखबृधिकचापानि धनुमकर(र)कुम्भकैः ॥ १० ॥ 
(४)मीनामीने ककमेषा वृषो मीनोऽप्यजः क्रमात्‌ । 
मकरो मेष-कन्ये तु तुख कन्येति राशयः ॥ ११ ॥ 
[ जिनोपासकयश्चनामानि ] 
(यक्षिणी स्याद्‌ गोमुखो महायक्षक्िमुखो यक्षनायकः । 
तुम्बरु; कुठमश्वापि मातङ्गो विजयो जयः ॥ १२ ॥ 
ब्रह्मा यक्िट्‌ कुमारः षण्युखपातारकिनराः । 
गर्डो गन्धर्वो यक्षद्‌ कुबेरो वरुणोऽपि च ॥ १३ ॥ 
` भृकुरि(क्)र्गोऽभिधः पार्थे वा मातङ्ञोऽहेदपासकाः , 
कर [ जिनानां श्षासन्देवताः] = ` 
` चक्रश्च(<)यजिनबल दुरितारिश्च कारिका ॥ १४॥ 
 महाकाटी(८)श्मा शांता (र)भृगुढयश्च सतारका । 
अशोका मानवी चण्डी विदिता चाङ्कसी तथा ॥ १५ ॥ ` 


पादाता । माना भ्ण ०७१५५ 


(९) मिथुनः इति स्यात्‌। (२) “कन्यके इति स्यात्‌। (३) “कुम्भको इतिः 
स्यात्‌|. (४) मीनो मीन- इति स्यात्‌] (५) अच्र यक्षिणीति सम्पातायातं स्यात्‌ ; ` ` ध | | 
 श्स्याद्‌ मोमुखो महायक्ष इतिक्रमेण पाख्चम्‌ । (६) “गोमेषपाश् मातङ्कोऽ इति ` 
स्यात्‌| (७) ^यनितवखाः इति देवतामृत्तौ (७।१४) । (८) श्यामा इति स्यात्‌ | . | 
(५) ्यिश्रः इतिस्यात्‌! ॥ 1: 


1 
। ^ ॥ 
1 ` 
४ ५ # ^ 
॥ 1 


कन्दपीं नि्वीणी बाला धारिणी (होषरणाप्रिया । 
 नादरक्ता च गन्ध्वीऽम्बिका (२)पद्मवती तथा| 
सिद्धायका चेति जेन्यः(३)क्रमा वासवदेवताः ॥ 
दति जिनानां (कयक्षणीनामानि | 
{तेषां लक्षणम्‌ , तत्र गोखुखः | 
(“)रिषमो गोमुख यक्षो(&)हेमवणा गजानना 
(जोवराक्षसूत्रमाशाश्च उभवीजपुरेषु च ॥ १७ । 
त [ चक्रेरवरी | 
चक्रेश्वरी हेमवणी। ताक्यारूढाऽष्टबाहुका 
व॒रं बाणं (“चक्रं ( शक्तिश्रूरमनाकुरम्‌ £) ॥ १८ ॥# 
[ अम्बिका] | 
सिंहारूगऽम्बिका पीता(मडवि 2नागपारकम्‌ । 
अङ्कश्च तथा(९)पुत तथा हस्तेष्वनुक्रमात्‌ ॥ १९ ॥ 
[ पाश्वेः | 
(१ ०)पार् स्यात्‌ पाश्चनानाथास्य दूमीरूढा गजजानना । 
वीजपूरोरगं नागं नकुं इयामव्ैकेः ॥ २० ॥ 
| [ पावती ] 
(१ शरक्तायसावती पणी कुकुटोरगचतुभना 
(१ र)पद्मपाशशो बीजपूरं हस्तेषु कारयेत्‌ ॥ २१ ॥ 
| (१) श्वरणगप्रिया" इति स्योत्‌ } (२). पद्मावती इति साधु । (३) क्रमान्‌ 
स शासनदेवता इति स्यात्‌ | (४) '्यक्षयक्चिणी इति स्यात्‌ । (५) ऋषमे' इति ` 
, स्यात्‌। (६) श्देमवणों गजाननः" इति स्यात्‌] (७) (वरोऽक्षसूलं पाशञ्च बीजपूरं 
५ ध करेषु चः इति स्यात्‌ । (८) भाशचक्रः च्वक्रपाशः वा स्यात्‌ | (९) पल्ल इति 


१६॥ 


1 , वती रक्तवर्णां कुक्छुटश्या' इति स्यात्‌ । (१२) भद्र पाक्चाङ्कशो इति स्यात्‌ 


नाति  ा ाा्  ाान 


* अन्नेतदनन्तरं नेमिनाथोपासकल्य "गोमेवण्यक्षल्य र्षणं लेखकप्रमादात्‌ प्रटितम्‌ इति 
८. सम्भाव्यते । यतोऽन्न ध ग्रन्थक्ता संक्षेषनुद्धया जिनोपासकानां यक्षाणां यक्षिणीनाच्च तावन्ति 


 सिण आदिनाथ( वषम )-नेमिनाथ-पाश्वंनाथ-महावीराणासुपासकछान्‌, गोुसल-गोमेष- 


स्यात्‌ । (१०) 'पाश्वः स्यात्‌ पाश्चनाथस्य कूर्मारूढो गजाननः" इति स्यात्‌} (१९) पञ्चा- 


नमिधाय "वतलरोऽतिक्चयेयंक्तास्तासां पूल्या विशेषतःः ( २९) इत्यग्रिमप्रतिन्ञाग्रन्थानु- ` „ 


[ माङः | 


महावीरस्य मातङ्गो (१)गजाशूढो मितो भवेत्‌ 
दक्षिणे नकर हस्ते वामे स्याद्‌ बीजपूरकम्‌ ॥ २२। 


[ सिद्धायका ] 


` सिद्धायका। नीख्वण (र)सिद्धाखढाश्चतुमजा । 


पुस्तक चाभय (२)दत्ते बाणे वे मातुलिङ्क ॥ २६ । 
अथ द्वितीयमेदेन चक्रेशवरी ` 


` द्वादशमुजाष्टचक्राणि वज्ञयो्हरयमेव च | 


मातुलिङ्ग[भये चेव पदस्या गरुडोपरि ॥ २४ ॥ ` 
 [ जिने चतुणों प्राधान्यकथनम्‌ ] 


जिनस्य मूरयोऽनन्ताः पूजिताः (४)सौख्यसवैद्‌ । 


चतसरोऽतिरयेयुक्तास्तासां पूथ्या विरोषतः ॥ २५ 
[ एषां नामानि ] 


 श्रीआदिनाथो नेमिश्च (५)पर्वे वीरचतुथेकः । 


। (६)चकरे चर्याम्िका पद्मावती सिद्धायकेति च ॥ २६ ॥ ति 


कैलासं सोमशरणं सिद्धिवतिं सदाशिवम्‌ 
सिंहासनं धमेचक्रमुपरीन्द्रातपतकम्‌ ॥ २७ ॥ 
[ जिनप्रतीहरनामानि] 


इन्द्र इन्द्रजयश्चेव माहेन्द्रो विजयस्तथा । 


धरणेन्द्रः प्मकश्च सुनाभः सुरदन्दभिः ॥ २८ ॥ 


 इत्य्टो च प्रतीहारा वीतरागे तु शान्तिदाः। 


[ प्रतीहाराणामायुघानि ] 


फं वजङ्कतौ दण्डमिन्र(७)मिन्दनयस्तथा ॥ २९ ॥ ` 
द्धौ बजी फल्दण्डश्च माहेन्द्रो विजयोद्धव 


(दा युद्धयोगाद्धवा तरिपञ्चादिफणोद्धंगाः १) ॥ ३०॥ ` 0 
दति स्यात्‌ । 


[1 


गजारूढः सितोः इति स्यात्‌ । (२) "सिदहारूढा चद॒भृन 


(१ 


ततता ५ ~ 


(३) '"धत्तेः इति स्यात्‌ | (४) स्सर्वं सौख्यदा इति स्यत्‌ | 
वीरशथवुधेकः' इति स्यात्‌ । (६) च्वक्रेश्वयस्विका इति ` स्यात्‌ । (७) 


| ध इति स्यात्‌ | 


(५) भपाश्ों 


'इन्द्रजय- ` 


इति स्यात्‌ । (४) “युतम्‌ इति स्यात्‌ । (५) गोरसिंहे | 
` (&) भेद इति स्यात्‌ । (७) शेलाख्योऽभूत्‌! इति स्यात्‌ । (८) श्ष्ठोऽष्यायः ` 
` इत्येतन्मालं साधु। ध 4 


४ | 1; हेपमण्डने ~ | | 
धरणेन््रः पद्मश्च सर्वे शान्तिकराः स्पृताः । 1 
 यक्षह्पाधिकारार्च निषिहस्ताः (१)गुभोदराः ॥ ३१ । द 
 (रोचनाभ्यो दुन्दुभद्चैव क्रमेणाष्टो प्रकीर्तिताः । व 
इत्यष्टो च प्रतीहारा वीतरागाः प्रकीर्तिता ॥ " + 
(२)नागरादिपूरमामे सवे विश्वभणाशनाः | 
 छत्रलयं जिनस्थेव रथिकामिक्लिभि(*)यताः ॥ ३३ ॥ 
 अदोकद्रमपत्रेरच देवदुन्दुमिवादिकै 
= सिंहासनमसुरा्ो गजसिंहा विमूषिताः ॥ ३४ ॥ 
मध्ये च कर्मचक्रं च ततूपश्वयोरच यक्षिणी । 
द्विताख्विस्तराः काया बहिः परिकरस्य तु ॥ ३५ ॥ 
देये तु प्रतिमा तुल्या तयोरूध्वे तु तोरणम्‌ । 
वाहिकाबाह्यक्षे तु (“)गोसिरैररुकृताः ॥ ३६ ॥ | 
कर्तव्या द्वारशाखा च तत्तममूर्तिगसंयुता । ६ 


तोरणं पञ्चधा प्रोक्तं रथिकाये च देवता ॥ 
 रुछितं चेतिकाकारं त्रिरथ वरितोदरम्‌ । 
श्रीपं पच्चरथिकं सप्तावानन्दवधेनम्‌ | ३८ 
 रथिकायां भवेद्‌ ब्रह्म विष्णुरीशदच चण्डिका 
जिनो गोरी गणेश्व स्वे स्वे स्थाने सुखावहाः ॥ ३९ ॥ 
0 | इति परिकरः । | 
श्रीमदेशे (६)मेदपाठाभिधाने (जक्षि्ास्येऽभूत्‌ सूत्रधारो वरिष्ठः । 1 
पुत्रो जयेष्ठो मण्डनस्तस्य तेन परोक्तं शाखं मण्डनं खूपपूर्वम्‌ ॥ ४० ॥ ^. 
इति श्रीसूलधारमण्डनविरचिते वास्वशासतरे रूपमण्डते (८)षष्मोऽध्यायः समासतः । = ` 


। ॥ समाषठश्वायं अन्धः ॥ 


(१) श्मोदयाः" इति स्यात्‌ । (२) श्वुनामोः इति स्यात्‌ । (३) (नगरादिषुर- 
समट्कृताः इति स्यात्‌ 


 कपमण्डने 
( © 


श्मो° 


तौ स्याख्यातानां सरूपाणां 


दैववामूर्तौ 


० 


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शछौ० 


७ 


१७ 
१८ 


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क्पथण्डने 


पुऽ 


श्छो० 


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` देवता 


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७२ 


द्विरूपाणाश्च रूपमण्डनीयपदयानां निर्वेशः 


स्तौ ` 
छमे० 
४४ 

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| ¢ १७-१८ ४ 


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१४२ 


द 


10 


। देवतामूत्तपिकर स्य 
शब्दसूची 


णी ज 


९९ ` 


अ 


१५६ 


 शब्डाः पत्राङ्ञाः | शब्दाः पत्राः 
अश्चमाला ९१०६२१६९९३०१०१,१४९, कपाङ ९९११००,१०३११४९ 
अक्षसूत्र ५९१६ १,६२,६४,९९११००११०१, | कपालिन्‌ दद्‌ 
१०२११०३१ १०४११३७११७०१४ १; | कृमण्डडु ९९.६ १,६३०६९,७ १,७२.८९ 
१४४१९०१, १४६ ९४,१०२११०३०१७४.१४९.१४६.१६१ 
अधो | | ९८ करा . ` ४४ 
अङ्का  ६१,६४,७१०९४,१०३१ १०४११३७, | कल्पान्त १६८ 
| १३८,१३९,१४० | कार्सिकेय १९२ 
अद्ूलर ६९ | कालक ४७ 
अङ्कु १६५ । काल्य १० 
अण्डज्ञ ५१ | किन्नर १३९ 
भतसी ९८ | ङक  ७दर्‌ 
 अनिर्द ७९,८० । कुण्डल ९७,९८,१००,१०१,१४७ 
 भनुलेपन  ९७,९८ | कुण्डिका 
नान्तरीयक ८० | कुमार १०९१ 
अपस्य ६७,६९,९६, १०७, १५१,१५२ | कृष्णाजिन ८९, १६१ 
अभय ९७,९९ । केतु्ंस्थान्‌ ६७ 
अधंनारीम्वर १०० | केयुर ७११०२ 
 अष्टरोह  २१,१०९ | केरव २६ 
आमलकी ७८ | करोष्धापुर १६४ 
` उपवीत ८९ | क्रर ११८. 
उमा १००१५४४ | क्षिप्रगणाधिप 
उल्का २६ | कषत्रपारु १५६ 
उष्णीष | ९८ | खदाङ् ९९११००,१०२११०३११०४ 
ऋण ` ९९७ | खड्ग.  ९८,९९,१०३,१०४ 
कज ५. 4 ९९७ ॥ खवर 
कटिसूत्र ति ९८ = १ १२४ 


शृण 


गदा 


गदड 
गर्भगृह 
गोधासनं 
गौरी 
चक्र 


चक््त 


` चण्डमेरव 
चण्डिका 


चतुःल 
 चतुष्की 


` चाप 


चामुण्डा 


` विपि 


¦ छाया ~ 


जटा 
जया 


 जराघयुज 


क्न 


जेन 


(1 
0.2 

< स्कर 
काच्रचूह 


॥. 


पत्राङ्काः 
७०,७१.७२,९०,९६१९८१९९१ १०३ 
१३७०१३८११५२ 
१२६४१२७ 
६६,६९,७०,७२१८९१९ १५९२१९४ 
९६११०२४१०४ 
१०१ 


२० 


{ 
॥ 
| 
1 
! 


॥ 
॥ 
॥ 
॥ 
॥ 
॥ 
॥ 
1 
॥ 


दार ११९१६४७ 
तापन १०४ 
तीक १३१ 


, भपुष ११९ 


# 
¢ 


॥ 


१४४११४९ | 
१४४०१४९ 


६५३८० ९०१९ १९२५९ ३३९४३९ ९४ 


दिक्पा 


१०९,१०२११०३११०४ | 


| ४२ 
९८,९९, १० ०,१०१ 
| 
५१ 

१२३११४२ 
१२३,१४३ 

१ 
 १००,१०४ 

-“ 

११६ 


स ~ 


त्रिविक्रम ७९ 
चिश्यू ६२६६७३९९ १०१११०२११०३ 


` तिद्ूक १२७ 


दणड ७२,१४८, १९१५१११५ 
दशावतार | ९५ 
५६,७३ 
द्राविड ११४ 


५, धनं | १९७ 


धातुर १०६ १०८ 
ध्वज व १०१११३३ 


ध्वजपताक ७२ 


नट | | ७ध्र 


नन्दी | १२८ 
111 | ॥ १५९ 


नगपाक् १३८,१९४० 


नागर ११३ . 


नारसिंह | ३ 


 नेमिनाध | १४१ 


परि | ४ १०४ 


पतका 5. 


परश्च |  ९९,१० 


पश्च ` ६४,६९०७२,९९ 


| पीठ 


1 ६९ | पुरपीत्तम 


पिण्डिका ^ १२४ 


११२३१११९ 


७९२८१०८६ 


स ~ त-न 


क - 


दन्दः 
प्रणा 
प्रतीहार 
प्रदक्षिण 
परद्यश्च 
परार 
बाण 
बाणदिङ् 
643 
बोद्ध 
ब्रह्मसूत्र 
भद्रकाली 
भरतागम 
भाव 
टि 
 च्धिरी 
द्धी 
मधुपक 
 महरण्डा 
महाकाल 
महाकाली 
महामष्टिष 
 अहारकष्मी 


मातु 


मात्‌ 


मावृयम 


 मवृ्प 


माधव 


खंड 
युण्डमारा 


[ ३] 


पत्ाङकः 


१२४. 


१४३ 

६८ 

७९५,८० 

२१ 
 १२१,१२३ 
१२०११२२ 


५१ 
१ 


१६१ 

१६७ 
१६६.१६७ 
१३७ 
१०१ 


१२८ 
लोकपा 


३२ 

१९५९ 

१२८ 
१३६११६० 


७२ 


७ 


९९,१००,१०१ 
५७ 


| ५६ | 
१९५. 
१०२ वाहन ` 
१००,१०१ | 
४ । विना 


न्दः 
श्ण 
मेखला 
यक्ष 


यज्ोपवीतिन्‌ 


| 

| 

| 

| 

ति 
योगञ्ुदा 
| योनि 
| रस 

| राजन्य 

| राशि 

| राहुसस्थान्‌ 
| रण्डमाखा 
| स्‌ 
| 


4 । 


रीख्या 
लेखनी 


वक्तलिद्धं 
वङ्ग 
वघ 
वर 


घेरट 
वरद्‌ 
वरार्हं 
वर्णा्टक 


& 


वत्‌ 


# ~ 


वामन 


` विजय 


 पन्नाङ्ः 
७१ 


१०९३१२४०१२५.१२६ 
१३१५१३८, १४०,१४३ 


८ ९४९९ 

| (4 
९३५९४७९६ 
११७ 

१६६ 

[१५ 

१३४ 

६७ 
९८ 

१०३ 


४१९११०९, ११३०१२०. 


१९४ 
७२ 
९६. 
९११ 
१०५ 
६९,५१,९४ 
७६३ 
 ७४,१६२ 
५ 
२३,७४ 
३९ ` 
७७5८० | 
०४७९१८८... | 
१९९.१३०. ` | 
+. 
-१६३ 


धिप्र 
विरिञि 
विरूपाश्च 
विलोम 
विश्वकम्‌ 
विष्कम्भ 
यैताछ 

वेदि 

वेसर 
वेङुण्ठ 
व्याल्का 
शाक्तिः 

शाहु 

श्र 
शालग्राम 
कारप्रामशिल 
क्षिखा ` 


श्रव ` 
^ 


[ ४ | 


पत्राः 


५९ ` 


११९ 


१६१ | 
१ 


५८१५ ९११६७ 
११२ | 


८२१९२ । दशन 
१०० खपिरं 


८७ । 
॥ 
९ | 


९४११०००१०३११०४ 
९४९६१ १०१,१०२११०३ । 


[1 


१५५ 


९६१६७४७ 


न 


व्व 


न - 


शब्दा इ 


# 


अश्चसाखा 
` भश्चदुत्न 


अड्क्षा 
1 


अतक्चीपुष्प 
अनिश्द(क) 


अपस्य 
अष्टरोष 
आभघ्नयी 
ईशान 
उटेश 
उष्णीष 
कूष्म 


कमण्डट्ु 
कृञ्च 
कल्की 


करिका 
ण्ड 
कुमार 


इष्ठरोग 


केतु 


केलास 

`  कोमोदकी 
धवे 
खड्ग ५ 


चेर ` 


गणनायक 


रूयमण्डनस्य 


न © ~~~ 


पत्नाङ्ाः 
९,२२.२४ 
८१९१३ 
२३४१६६२७ 
२१ 
१३.१९ 
२० 
२९ 
९ 
१५ 


। 


२१ 
छर्‌ 


८९४१०११ २,२ ७३३३१३७ 


९११४१ १५;१६ 
१६ 

४१ 

४ 
 ३५,४० 
२५ 

१० 

| ४९ 
 १४,१९ 

; । ३५ 


| 
| 
| 
। 


। 
| 
। 
| 
। 
| 
॥ 
॥ 
| 
। 
॥ 


| 


॥; 


गदा 
गोरी 
चक्र 
चण्डिका 
चामुण्डा 


| जिन 


डमर 


। तजनी 
 ताश्नचूड 


ताछ 


| तुखसी 
। तोमर 


तोरण 


तिरो 


| करिद्यूर 


दण्ड 
दशाधतार 
दामोदर 
धातु 


ध्यान 
नेन्त्य 
 पञ्चरथिक 
प्ति 

५ पाञ्चजन्य 
` ११,९६.३६३९ | पीच्ि 


५ प्रतिमा 


पन्नाङ्ाः 
१२११४११५ 
४६ 


१४,१५.४९ = ` 


४६ 

"> 

५२ ७,४२४ ३,७६ 
२३,३२,३८,४१ 
११ 

११ 


५ 


26; 
पर्य म्नं 

॥ + 
बाणलिडुः 
 उहवबदं 
कुटि 
ङ्गी 

0 
भेर 
महारुषमी 
महाधिया 
महावीरं 
मातिटद्च 
मावृष्छा 
मुहगर 
मेखला 


य्लोपवीतिन्‌ 


योगपुद्रा 


शक्तवायुण्डा 
५ ष 

 छिङ्गपीड 

 केखनी 


~ 
पत्राः  इब्दाः 
१३३१५ वायतत 
२९ वादेव 
२८ विनायक 
४३ ` विश्वकमां 
३२ | वेतार 
४. | शङ 
२६.३९ ` शक्ति 
३९ | शारिग्राम्‌ 
४९  श्रीषुञ्च 
२२,२४ | श्रीफल 
३१ श्रोत्रिय 
२२ पटलं 
६० सङ्ध्पण | 
२१,२३ सावित्री 
१९ | सिद्धाय 
३७ | खुदुशंन 
१० | हिरण्यगमं 
& | दरक 
९१ | हपीकेद 


[8 


पनर; 


` विष्णुधमोत्तरम्‌ ( पुराणम्‌ ) 


मत्स्यपुराणप्‌ 
अथ्िपुराणत्‌ 


बृहत्संहिता ( ज्योतिषग्न्थः ) 


दक्रनीतिसारः 
पयमतम्‌ ( शिस्पराखम्‌ ) 


कार्यपरिद्पप्‌ + 


समराङ्गणसूत्रधारः + 


 दिष्परत्नम्‌ ( पू्वात्तर-भागद्रयात्मकम्‌ ) , 


रूपमण्डनप 

रूपावतार 

प्राणतोषणी ( तत्त्रम्‌ ) 
श्रीत्वचिन्तामणिः ( तन्त्र्‌ ) 
शिखचक्राथवोधिनी 
वीरमित्रोदयः ` 
जेनयपद्यपुराणम्‌ 


चतुर्वि शतिजिनस्तुतिसंम्रहः । 


परे अध्याये श्ोकाङ्कः अद्ुद्धः 
५७ इव २७ | नैछतास्यो 
६२ थथं ८ पुधिक्रायां ° 
ॐ ॐ ६२९ नवतुरहस्ता 
९४ ५ २० युष्पिकाय। ° 
६९ ` १ ४६ पुष्पिक्ायं ० 
८० ५म २७ (रः १ ल्म) 
८३९ ¢ ४१ एकपद्या 
८४ +: 4: कलाधिका 


र्दः 
नैकऋष्यास्यो 
इति ब्रह्मायतने द्वारदेवताः | 
चतुदस्ताः 


इति ब्रह्मणः प्रतीहाराः | 


दति सू्ग्रतीदह्ाराः। 


(ल्म श्रः) 


एको पद्या 

फलटाधिक्रा | 
अणु (दी) 
गुल्फ (०) 


९२ प्रष्टे ८७ सप्तालीतितमशछछोकस्योत्तरार्धं एकपादोऽस्यः इत्यनन्तरम्‌-- 


 “कृतैम्यो क्युस्ङ्गगतः प्रभो; । तथाऽपरश्च'! इति पाच्यम्‌ । 


९३ देषठ 9. तुङ्गं 
१०० रेष्ठ २१.  चित्रचन्दर 

त ९९१  परण्डच्चामयकं) 
११९ ऽ“ + ५ .&& रिवारो 


१२९ > श्६३ इति पश्चिमप्रतीहरो 


दद छम. १ शमाः 


र 1 समानाश्च 


1 ५ 1 18  गन्धायधिका 


ङ्ग 
चिलवस््र | 
` पण्डञ्चा )मयकं 
कलार (दी°) 
[इति पश्चिमप्रतीहारो] 
ऋषम- | 
 समानाकृतथः (दी°) 
गान्धायम्विका | 


। ९४१६ »» ५७ बरद चाक्सं रि्ूलञ्च वरदं चाशषसूलश्च विय 


द. दम १२. (-किवण्डश ण्डं). 


 लिल(ण्ड ष्ठा)